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पेशवाई की ब्राह्मणवादी प्रतिक्रांती दहाड़ते हुए आयी, क्योंकि हमने ज़िंदा मॉडल छोड़कर मरे हुए मॉडल अपनाए!

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समाज वीकली यू के

तमिलनाडु में क्रांती और प्रति-क्रांतीः
पेशवाई की ब्राह्मणवादी प्रतिक्रांती दहाड़ते हुए आयी, क्योंकि हमने ज़िंदा मॉडल छोड़कर मरे हुए मॉडल अपनाए!

– प्रोफे. श्रवन देवरे
मोबाईल: 8177 86 1256

(पार्ट-5)

किसी भी सामाजिक-राजनीतिक उथल-पुथल का एनालिसिस एकतरफ़ा नहीं हो सकता। संघ-BJP बुद्ध, फुले, अंबेडकर, पेरियार, शाहू के विचारों को दफ़नाने की जरूर कोशिश करेंगे! क्योंकी यह “उनका” काम है और “वे” अपना काम पूरी श्रद्धा और भक्ति के साथ, तन-मन-धन लगाकर करते हैं। सात सौ साल पुरानी ग्लोबल बौद्ध क्रांति एक पुष्यमित्र श्रृंग की प्रति-क्रांति में खत्म हो गयी। लेकिन प्रति-क्रांति के बाद, उन्हें भी “ब्राह्मण-राज” लाने के लिए कम से कम 700 साल तक दिन-रात बड़ी मेहनत से काम करना पड़ा। लेकिन हमारे तब के शूद्र, अतिशूद्र बौद्ध क्या कर रहे थे? आज जब नेशनल लेवल पर पेशवाई की प्रतिक्रांती हो रही है, तो हमारे आजके नेता जो कर रहे हैं, वही उस समय के नेता भी कर रहे होंगे!

आज भारत में सत्ता में या सत्ता के करीब जितनी भी छोटी-बड़ी पार्टियां हैं (सिर्फ तीन पार्टी को छोड़कर) उन पर ब्राह्मणों और क्षत्रियों का कब्ज़ा है। कांग्रेस और BJP पर तो खुलेआम ब्राह्मणों का कब्ज़ा है। रीजनल लेवल पर सत्ता के आस-पास जो पार्टियां हैं, उनपर ब्राह्मण जाती या ज़मींदार (क्षत्रिय) जातीयों का वर्चस्व हैं, जैसे पवार (मराठा), ठाकरे (ब्राह्मण-CKP), नवीन पटनायक (ब्राह्मण), चंद्रशेखर राव (ज़मींदार क्षत्रिय), जगनमोहन रेड्डी (ज़मींदार क्षत्रिय), ममता बॅनर्जी (ब्राह्मण), चंद्रा बाबू नायडू (ब्राह्मण)। सिर्फ तीन पॉलिटिकल पार्टियां हैं जो सत्ता के करीब हैं और आज भी ब्राह्मणवादियों के खिलाफ ईमानदारी से लड़ रही हैं, और ये तीनों ही पॉलिटिकल पार्टियां OBC वाली पार्टियां हैं। पहली बेशक सामी पेरियारिस्ट DMK है, दूसरी सोशलिस्ट-लोहियावादी लालू प्रसाद की RJD है और तीसरी सोशलिस्ट-लोहियावादी मुलायम सिंह की SP है! ये तीनों OBC वाली पार्टियां जातिव्यवस्था खत्म करने की दिशा मे उम्मीद की किरण हैं। बाकी पार्टियां जो खुद को प्रोग्रेसिव, लेफ्टिस्ट, कम्युनिस्ट और फुले-आंबेडकराईट मानती हैं, वे सत्ता की संभावनाओं से बाहर हो चुकी हैं और उनमें से ज़्यादातर ने खुले तौर पर या चुपके से संघ-BJP के सामने सरेंडर कर दिया है। यह कोई इत्तेफ़ाक नहीं है कि ब्राह्मण छावणी (War camp) के ख़िलाफ़ ईमानदारी से और आक्रामक जोश से लड़ने वाली तीनों पार्टियाँ OBC की लीडरशिप वाली पार्टियाँ हैं। यह एक ज़िम्मेदारी है जो नियती (Destiny) ने समय की ज़रूरतों के हिसाब से OBC नेताओं पर डाली है और इसके पीछे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक कारण हैं।

लालू-मुलायम के संघ-BJP विरोधी मजबूत गढ़ के कमज़ोर होने के बाद, तामीळनाडू की DMK एकमात्र उम्मीद की किरण है, जो ब्राह्मणवादी छावणी के ख़िलाफ़ ईमानदारी से और आक्रामक तरीके से लड रही है और सत्ता में बनी हुयी थी। हालांकि, ब्राह्मणवादियों ने बिहार में लालू की RJD और उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह की SP के खिलाफ जो साज़िश रची थी, वही साजिश तमिलनाडु में स्टालिन की DMK के खिलाफ रची और उस साजिश मे ब्राह्मणवादी छावणी कामयाब हो गयी। तमिलनाडु का मॉडल देश के दलित OBC के सामने एक आदर्श मॉडल के तौर पर आज भी खड़ा है। तमिलनाडु में न तो फुले हैं, न अंबेडकर, न ही शाहू महाराज! वहां सिर्फ और सिर्फ सामी पेरियार हैं! किसी राज्य में महापुरुषों की संख्या ज्यादा हैं, तो क्या वह राज्य प्रोग्रेसिव हो जाता है?। किसी राज्य में महापुरूष ज्यादा संख्या में हैं, तो उनका गलत इस्तेमाल भी ज्यादा होता है। महापुरुषों के नाम पर लोगों को अपनी ही जाति के ईगो और विचारों में फंसाकर रखा जाता है। ‘मेरी जाति का महापुरुष सबसे ज्यादा महान है’, यह कहकर जाति के ईगो को बढ़ावा दिया जाता है और इन ईगो के तले सच्चाई को कुचल दिया जाता है। जितने कम महापुरुष होंगे, क्रांति की संभावना उतनी ही ज्यादा होगी! महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल ने साबित कर दिया है कि पेशवाओं की ब्राह्मणवादी काउंटर-रिव्होल्युशन के लिए महापुरुषों की “भीड़” ही ज्यादा जिम्मेदार है।

ब्राह्मण अपनी जाति से एक भी महापुरुष (वोल्टेयर) पैदा नहीं होने देते। डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर ने कहा है कि “ब्राह्मणों में कोई महापुरुष (Voltaire) पैदा नहीं हुआ है”। लेकिन यह राज़ कोई नहीं जानता कि ब्राह्मण अपनी जाति में एक भी महापुरुष (वोल्टेयर) पैदा नहीं होने देते। ब्राह्मणों में कोई महापुरुष (वोल्टेयर) नहीं है, इसीलिए वे 85 परसेंट बहुजनों पर बिना किसी रोक-टोक के राज कर सकते हैं, यह राज़ आज तक किसी को पता नहीं चला। “महापुरुष तुम्हारे… बर्तन धोते हमारे!” यह ब्राह्मण जाति का नारा है! जो महापुरुष एक पीढ़ी के लिए क्रांतिकारी थे, वे अगली पीढ़ी के लिए बेड़ियाँ बन जाते है और अगले पड़ाव पर क्रांति में रुकावट बन जाते हैं। कल के फुले शाहू अंबेडकर का इस्तेमाल आज सिर्फ़ जाति के ईगो को खुश करने के लिए किया जा रहा है। अगर इन महापुरुषों का 1 परसेंट भी इस्तेमाल क्रांति के लिए किए गया होता, तो पेशवा की प्रति-क्रांति महाराष्ट्र या देश में कहीं देखने को नहीं मिलती।

आज देश में क्रांति का एकमात्र मॉडल सामी पेरियार है। जातीव्यवस्था नष्ट करने की दिशा मे एकमात्र सफल मॉडल! देश के कितने सो-कॉल्ड प्रोग्रेसिव नेताओं ने सामी पेरियार को माना है? नेताओं की तो बात ही छोड़ो, बुद्धिजीवियों का क्या? साहित्यकारों का क्या? अगर आप सफल और काम करने वाले क्रांतिकारी जीवित मॉडल को ठुकराकर कांशीराम-लालू-मुलायम के मरे हुए मॉडल से चिपके रहेंगे, तो ब्राह्मणवादी पेशवाई सज-धजके, ढोल बजाते आयेगी।

सामी पेरियार के योगदान की कहीं तुलना नहीं की जा सकती। ब्राह्मणवाद से कहीं कोई समझौता नहीं है। न सामाजिक और न ही राजनीतिक जीवन में! ‘दो कदम पीछे हटो तो 100 कदम आगे बढ़ो’, ऐसे गलत समझौते पेरियार ने कभी नही किये। ‘थोड़ी सी भीख पाने के लिए कभी कांग्रेस से हाथ मिलाओ तो कभी BJP को गले लगाओ’, इस तरह का सौदेबाजी का गंदा-धंदा पेरियार ने कभी नहीं किया। वह किसी का भी डर नहीं पालते थे। वे ब्राह्मणों द्वारा सर पे बिठाए गये (uproar) काल्पनिक देवी-देवताओं को सडक के चौक के बीच में चप्पलों से पीटते थे। उन्होंने ब्राह्मण नाम वाले होटलों पर बैन लगाने के लिए कानून बनवाया। पेरियार के अलावा और किस महापुरुष में महात्मा गांधी की मूर्तियां तोड़ने की हिम्मत हो सकती थी? जब पूरी दुनिया में भारतीय संविधान को सर पर उठाया जा रहा था, पेरियार ने संविधान के उन पन्नों को सबके सामने जला दिया जो उनको मंज़ूर नहीं थे। उन्होंने कई पब्लिक मीटिंग में अपनी साफ और पक्की राय दी कि यह संविधान जाति व्यवस्था और ब्राह्मणवाद को बढ़ावा दे रहा है। उन्होंने सच्ची रामायण नाम की किताब लिखी और उसमें राम को विलेन और रावण को हीरो बनाया। यह ब्राह्मण संस्कृति के खिलाफ गैर-ब्राह्मण संस्कृति का एक बहुत बड़ा संघर्ष था और इसी सांस्कृतिक संघर्ष की वजह से तमिलनाडु के OBC-दलित लोग एक साथ आए और ब्राह्मणवादी सत्ता को उखाड़ फेंका।

बुद्ध ने वर्ण व्यवस्था को केवल विचारों की क्रांती (Enlightenment-Renaissance Movement) से खत्म कर दिया था। लेकीन वर्णव्यवस्था की तुलना मे जातीव्यवस्था के खिलाफ लड़ना हज़ार गुना ज़्यादा मुश्किल था। इसीलिए बौद्ध धम्म जाति व्यवस्था के खिलाफ लड़ते-लड़ते थक गया और आखिर में भारत से देश निकाला (Expelled) हो गया। मैदान की लढाई हो या सामाजिक लड़ाई, आप के पास सिर्फ़ दो ही ऑप्शन होते हैं, या तो जीतकर सत्ता पर कब्ज़ा करो या हारकर गुलामी मान लो! तीसरा ऑप्शन है – ‘आत्महत्या’ (Suicide)! बौद्ध धर्म ने तीसरा ऑप्शन चुन लिया! भारत से निर्वासन मतलब आत्महत्या! जैन, लिंगायत वगैरह जैसे क्रांतिकारी धर्मों ने ब्राह्मणवादी जातिव्यवस्था के आगे सरेंडर कर दिया, लेकिन बौद्ध धर्म ने देश निकाला (निर्वासन-Suicide) होना पसंद किया।

जातिव्यवस्था के मुकाबले वर्ण व्यवस्था के खिलाफ लड़ना बहुत आसान था क्योंकि ब्राह्मण वर्ण के खिलाफ शूद्र (दास) वर्ण लड रहा था। इस शूद्र-दास वर्ण में छूत और अछूत, दलित और OBC जेसे भेद नहीं थे। इसलिए, इस एकमात्र दास-शूद्र वर्ण ने मिलकर ब्राह्मणवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ी और जीत गया। ब्राह्मणवादियों को एहसास हुआ कि अगर मेहनती दास-शूद्र लोग एक रहे, तो ब्राह्मणवाद हार जाता है और इसी दास-शुद्र वर्ण को विभाजित कर दिया जाय तो ब्राह्मणवाद फिरसे जीत सकता है। उन्होंने एकमात्र दास-शुद्र वर्ण को कास्ट सिस्टम बनाकर हज़ारों अवरोही (Descending) विषम जातियों में बाँट दिया। वे सिर्फ़ विषम जाति बनाकर नहीं रुके, उन्होंने दास-शूद्र वर्ण को इस तरह से क्लासिफ़ाई किया कि उनका फिर से एक होना नामुमकिन हो गया। ब्राह्मणों ने इन शूद्र जातियों को दो मुख्य ग्रुप में बाँट दिया, छूत और अछूत। शूद्र वर्ण को अछुत दलितों और छूत OBC मे बाँटने वाली यह मज़बूत दीवार ब्राह्मणों ने बड़ी मुश्किल से बनाई थी। हालाँकि फिर भी, मंडल युग और सामी पेरियार युग ने छूत ओबीसी और अछूत दलितों को एक साथ ला कर सघर्ष किया और ब्राह्मण-वाद को पराजित किया। लेकिन ब्राह्मणों ने फिर से साज़िश करके दलित और ओबासी को एक-दूसरे से अलग कर दिया, जिसकी वजहसे मंडलयुग और पेरियार युग हार गए, ब्राह्मणवाद जीत गया, पेशवाई की प्रतिक्रांती सज-धजके नाचते-गाते आ गयी है। आज पेशवाओं की ब्राह्मण Counter-Revolution बिना किसी रुकावट के दहाड़ती हुई आ गई है। यह अब हमारे गले में मटका और पिछवाड़े में झाड़ू जरूर बाँधेगी!

इस सीरीज़ के छठे और आखिरी आर्टिकल में, हम इस बात पर गौर करेंगे कि ब्राह्मणवाद के खिलाफ लड़ाई में लालू, मुलायम और स्टालिन खुद कैसे जिम्मेदार हैं!

-प्रोफे. श्रवण देवरे,
OBC पॉलिटिकल फ्रंट,
मोबाइल- 81 77 86 12 56

ज़रूरी सूचना-
1) आर्टिकल का यह पांचवां हिस्सा (P5) दैनिक ‘बहुजन सौरभ’ के 26 मई 2026 के अंक में पब्लिश हुआ है।
2) अगर आपको इस आर्टिकल की मराठी pdf (P5) फाइल चाहिए, तो नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें
https://drive.google.com/file/d/1rjEjVQp4ytA7Cj_GNrRJjvGMy46cX9eS/view?usp=drive_link
3) इस आर्टिकल की हिंदी pdf (P5) फाइल के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें-
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4) इस आर्टिकल की English pdf (P5) फाइल के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें-
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5) जिनको यह विचार ब्रीफ में हिंदी में सुनना है वो बहुजन-85 चैनल की VDO लिंक क्लिक करें- लिंक-
https://youtu.be/3jDC9Si3UAQ?si=T4GQ05SbWZ09mGLM

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