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भयंकर बिजली संकट योगी सरकार की नीतियों की देन

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मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ

 दिनकर कपूर, प्रदेश महासचिव, ऑल इंडिया पीपुल्स फ्रंट, उत्तर प्रदेश।

दिनकर कपूर

 (समाज वीकली)  विगत एक हफ्ते से उत्तर प्रदेश में बिजली का संकट चर्चा के केंद्र में बना हुआ है। ऊर्जा मंत्री एके शर्मा बिजली विभाग की हाई लेवल मीटिंग में बिजली के शीर्ष प्रबंधन पर बुरी तरह बिफर गए। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा बिजली संकट के लिए कर्मचारियों को दोषी ठहराते हुए चेतावनी दी गई है। परिणामतः प्रदेश में इंजीनियरों और कर्मचारियों पर दमन की मनमानी कार्रवाई हो रही है। वास्तव में प्रदेश अभूतपूर्व बिजली संकट के दौर से गुजर रहा है। सरकार की घोषणा कि  जिला मुख्यालयों पर 24 घंटा, तहसील मुख्यालयों पर 21.30 घंटा, ग्रामीण क्षेत्रों में 18 घंटा और सिंचाई हेतु ट्यूबवेल के लिए 10 घंटा बिजली उपलब्ध कराई जाएगी। यह एक दिवा स्वप्न बनकर रह गया है। गांव और छोटे शहरों की बात तो छोड़ दें राजधानी लखनऊ तक में विधानसभा और सचिवालय के आस-पास के महत्वपूर्ण इलाके में भी घंटों बिजली की कटौती हो रही है। दरअसल पूर्वांचल और दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम के निजीकरण से पहले उत्तर प्रदेश में एक ऐसा माहौल बनाया जा रहा है ताकि लोग खुद ही कहने लगें कि सरकारी क्षेत्र से बेहतर निजी क्षेत्र होगा। सचेत ढंग से सरकार और भाजपा के लोग इस बिजली संकट के लिए बिजली विभाग के अधिकारियों, इंजीनियरों और कर्मचारियों को जिम्मेदार ठहरा कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ले रहे है। जनता की नजर में कर्मचारियों को खलनायक बनाने के लिए चौतरफा प्रयास हो रहे हैं।

दरअसल उत्तर प्रदेश के व्याप्त मौजूदा विद्युत संकट का मुख्य कारण योगी सरकार की नीतियां हैं। प्रदेश में आज लगभग 29000 मेगावाट तक बिजली की पीक डिमांड है, जो पिछले 10 वर्षों  की तुलना में दोगुनी से भी ज्यादा है। इस डिमांड के सुचारू संचालन के लिए जिस मैनपावर की आवश्यकता थी जिसे पूरा करने के लिए सरकार तैयार नहीं है। जितनी संख्या में जूनियर इंजीनियर, फील्ड स्टाफ, संविदा कर्मचारी की जरूरत थी उनकी भर्ती नहीं की गई। रोजगार अधिकार अभियान की एक रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश में बिजली विभाग में करीब 40000 पद रिक्त पड़े हुए हैं, जिनमें बड़ी संख्या जूनियर इंजीनियर और फील्ड स्टाफ की है। आज की जरूरत के हिसाब से पदों का सृजन भी नहीं किया जा रहा है। उलटा हो यह रहा है कि जो स्टाफ अभी मौजूद है उसी के ऊपर अतिरिक्त बोझ डाला जा रहा है। जूनियर इंजीनियर संगठन के पदाधिकारियों का कहना है कि एक-एक जूनियर इंजीनियर 20-20 किलोमीटर के एरिया को देख रहा है। यहीं नहीं उसके ऊपर ही जिले तक के नोडल आफिसर से लेकर अन्य जिम्मेदारियां भी डाल दी जाती हैं। हालत यह है कि मध्यांचल विद्युत वितरण निगम से लेकर अन्य डिस्काम में हजारों अनुभवी संविदा कर्मियों को 55 वर्ष की उम्र का हवाला देकर काम से ही निकाल कर बाहर कर दिया गया है। इतना ही नहीं संविदा कर्मियों का भी ट्रांसफर किया जा रहा है। कर्मचारी संगठनों का यह साफ-साफ कहना है कि बिजली विभाग एक अत्यंत दक्षता का विभाग है। यहां अन्य विभागों की तरह ट्रांसफर नीति लागू नहीं की जा सकती। जो इंजीनियर जिस जॉब पर काम करता है वह उसकी सभी कमजोरियों के बारे में जानकार होता है और ट्रांसफर के बाद आए नए व्यक्ति के लिए मशीनों को सुचारू रूप से चला पाना संभव नहीं होता है। इसके बावजूद इस वर्ष मनमाने तरीके से बिजली कर्मियों के तबादले किए गए हैं। उत्पीड़न करने के लिए निजीकरण विरोधी आंदोलन में लगे हुए कर्मियों के तो बहुत दूर तबादले हुए हैं। इस तरह की कार्रवाई से कर्मचारियों का मनोबल गिरता है और कार्य संस्कृति प्रभावित होती है।

          मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कह रहे हैं कि हमने बिजली विभाग को बहुत बजट दिया है, इसलिए किसी भी कीमत पर बिजली विभाग में दुर्व्यवस्था को स्वीकार नहीं किया जाएगा। जबकि सच्चाई इसके उलट है। प्रदेश में हर वर्ष फरवरी माह अनुरक्षण कार्यों के लिए होता है। क्योंकि अप्रैल, मई, जून, जुलाई और अगस्त जैसे महीनों में बिजली की डिमांड बेहद बढ़ जाती है, इसलिए इसके पूर्व अनुरक्षण आदि कार्य पूर्ण कराए जाते हैं। लेकिन पिछले कई वर्षों से सरकार और उसके अधीन कार्यरत पावर कारपोरेशन प्रबंधन द्वारा ट्रांसफार्मर डग, तेल, केवी वायर, फ्यूज वायर आदि न्यूनतम चीजें भी पावर स्टेशनों को उपलब्ध नहीं कराई जाती है। ट्रांसफार्मर मिलने की भी दिक्कतें मौजद हैं। नियम यह है कि कोई भी ट्रांसफार्मर तीन बार जल जाने के बाद उसको रिपेयर नहीं किया जाएगा और उसे बदल दिया जाएगा। लेकिन 10 बार से ज्यादा वही ट्रांसफॉर्मर रिपेयर करके चलाया जाता है और जैसे ही लोड बढ़ता है वह ट्रांसफार्मर क्षतिग्रस्त हो जाता है। बिजली कर्मचारियों का तो कहना है कि  एरियल बंच कंडक्टर और ट्रांसफार्मर की खरीद की यदि जांच हो जाए तो इसमें बड़ा घोटाला सामने आएगा। इस बार बेहद खराब क्वालिटी के इन समानों की खरीद हुई है, जिसके कारण आए दिन वह खराब होते हैं।

       सरकार ने टेक्निकल और इफेक्टिव ऑपरेशन के नाम पर डिस्ट्रीब्यूशन में ऑटोमेशन की प्रक्रिया तो की लेकिन आज तक सरकारी सिस्टम का अपग्रेडेशन नहीं हुआ है। इसलिए यह ऑटोमेशन प्रभावित नहीं दिखता है। कारपोरेट कल्चर की तरह रोज वीडियो कांफ्रेसिंग की जाती है। लेकिन जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर के अभाव में यह महज अधिकारियों को डांटने, फटकारने और कार्रवाई करने में ही बीत जा रही है। इसी प्रकार मुख्यमंत्री जी का यह भी कहना है कि बिजली विभाग में किसी भी उपभोक्ता को बिलिंग की दिक्कत नहीं होनी चाहिए। उनके वक्तव्य से लगता है कि कर्मचारी बिलिंग में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार कर रहे हैं। जबकि सच्चाई यह है कि  का पूरा काम निजी आउटसोर्स एजेंसियों को दे दिया गया है और मीटर लगाने, उसकी रीडिंग से लेकर बिलिंग तक का काम वही करते हैं। आमतौर पर अब इसमें अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका नगण्य है।

         दिनांक 27 जुलाई 2025 को 24 घंटे में उत्तर प्रदेश में 545 मिलियन यूनिट खर्च की गई। जिसमें से 112 मिलियन यूनिट उत्तर प्रदेश उत्पादन निगम की, 219 मिलियन यूनिट केंद्रीय पूल की और शेष निजी बिजली घरों की है। प्रदेश में करीब 8000 मेगावाट बिजली का उत्पादन सरकारी बिजली घरों से किया जा सकता है। लेकिन आमतौर पर 4000 मेगावाट से ज्यादा बिजली का उत्पादन सरकारी क्षेत्र में नहीं हो रहा है। लोगों को जानकर आश्चर्य होगा कि बिजली की इतनी बड़ी डिमांड के बावजूद आजकल हरदुआगंज, जवाहरपुर और पनकी जैसे सरकारी उत्पादन गृहों में थर्मल बैकिंग यानी उत्पादन को शून्य कर दिया गया है। दरअसल यहां बिजली उत्पादन में भी एक बड़ा घोटाला मौजूद है। सरकार को उपभोक्ताओं के लिए अभी करीब 29000 मेगावाट बिजली की जरूरत होती है, जिसमें से करीब 15000 बिजली हम सेंट्रल पूल से ले लेते हैं। इसके अलावा हमारी स्टेट सेक्टर जेनरेशन सिस्टम से 13500 मेगावाट बिजली मिलती है। जिसमें उत्तर प्रदेश उत्पादन निगम और प्रदेश के निजी क्षेत्र के विद्युत उत्पादन गृह और जल विद्युत उत्पादन गृह आते हैं। इसके अलावा राज्य सरकार ने पहले से ही कॉर्पोरेट घरानों से बिजली प्राप्त करने का समझौता किया हुआ है। यह बिजली 7 से लेकर 19 रुपए तक खरीदी जाती है। इन बड़े कॉर्पोरेट घरानों के मुनाफे के लिए ही दरअसल थर्मल बैकिंग सिस्टम के जरिए सरकारी सस्ती बिजली उत्पादन को रोका जाता है।

         बहरहाल उत्तर प्रदेश में जो बिजली संकट है उसे दूर किया जा सकता है। बशर्ते कि सरकार बिजली क्षेत्र में आज की जरूरत के हिसाब से बड़े पैमाने पर पदों का सृजन करें और  सभी खाली पदों पर तत्काल भर्ती करें। अनुरक्षण और इंफ्रास्ट्रक्चर पर खोखली बयानबाजी की जगह बजट का आवंटन करें। मनमाने स्थानांतरण और अधिकारियों, इंजीनियरों, कर्मचारियों के बेलगाम उत्पीड़न पर रोक लगाई जाए। पूर्वांचल और दक्षिणाचंल के निजीकरण का फैसला हर हाल में वापस लिया जाए। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि ऐसे समय में विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति आज के जरूरी इन सवालों पर जनता का ध्यान आकृष्ट करने और निजीकरण विरोधी आंदोलन को मजबूत व व्यापक करने की जगह अनावश्यक तौर पर सरकार के बीच के अंतरविरोध में फंस गई है। ऐसे में प्रदेश के लोकतांत्रिक संगठनों को उत्तर प्रदेश में बिजली के निजीकरण और बिजली दुर्व्यवस्था के विरुद्ध एक व्यापक जन संवाद की पहल लेनी चाहिए।

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