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सामाजिक क्रांति के अग्रदूत शाहूजी महाराज

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समाज वीकली यू के

26 जून, सामाजिक क्रांति के अग्रदूत शाहूजी महाराज का जन्मदिन ….

शाहू जी महाराज का जन्म कुनबी (कुर्मी) जाति में हुआ था। कुनबी जाति का होने के कारण उनके सामने जातिवदियों ने बहुत ज्यादा परेशानियां पैदा की। क्योंकि उस समय राजा के सिंहासन पर ब्राह्मण या क्षत्रिय वर्ण से अलग कोई व्यक्ति बैठे तो यह वर्ण व्यवस्था के ख़िलाफ़ था।

जातिवादियों से संघर्ष करते हुए शाहूजी महाराज महसूस कर पाए कि जब मुझे राजा होकर इतना जातिवाद भुगतना पड़ता है तो अछूतों की कितनी अमानवीयता सहन करना पड़ती होगी। उन्होंने अपने राज्य की गैरबराबरी की व्यवस्था को खत्म करने के लिए 1902 में पहली बार दलितों-पिछड़ों के लिए आरक्षण व्यवस्था लागू की। अछूत वर्ग के बच्चों की मुफ़्त शिक्षा की व्यवस्था की। छात्रों के लिए छात्रावास स्थापित किये।छत्रपति शाहूजी महाराज ने पिछड़ी जातियों समेत समाज के सभी वर्गों के लिए अलग-अलग सरकारी शिक्षण संस्थाएं खोलने की पहल की, जो देश में पहली बार हो रहा था। वे सदियों से उपेक्षित जातियों को शिक्षित करने के लिये आजीवन प्रयासरत रहे। इस पहल में उन्होंने दलित-पिछड़ी जातियों के बच्चों की शिक्षा के लिए ख़ास प्रयास किये गए थे। वंचित और गरीब घरों के बच्चों को उच्च शिक्षा के लिए उन्होंने आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई और उन्हें सामान्य छात्रों के साथ ही पढ़ने की सुविधा प्रदान की। उन्होंने स्त्री शिक्षा को भी बढ़ावा दिया, लड़कियों के लिए मुफ़्त स्कूल और हॉस्टल खुलवाए।

इससे अछूतों-पिछड़ों में शिक्षा का प्रचार हुआ और सामाजिक स्थिति बदलने लगी। परन्तु उच्च वर्ग के लोगों ने इसका घोर विरोध किया, वे शाहूजी को अपना बहुत बड़ा दुश्मन समझने लगे। उनके राज पुरोहित तक ने यह कह दिया कि आप शूद्र हैं और शूद्र को वेद के मंत्र सुनने का अधिकार नहीं है। छत्रपति शाहूजी महाराज ने इस सारे विरोध को दरकिनार करते हुए राज पुरोहित पद पर सिर्फ ब्राम्हणों की नियुक्ति पर रोक लगा दी।

शाहू जी महाराज ने ब्राम्हण पुरोहितों की जातीय व्यवस्था को तोड़ने के लिए अंतरजातिय विवाह और विधवा पुनर्विवाह कराए। उन्होंने पुनर्विवाह को क़ानूनी मान्यता दी और बाल विवाह का घोर विरोध किया। उन्होंने अछूतों के लिए उद्योग-धंधे भी खुलवाए। वे क्रांति ज्योति ज्योतिबा फुले से अत्यंत प्रभावित थे और लंबे समय तक सत्य शोधक समाज के संरक्षक भी रहे।

1902 के मध्य में शाहू जी महाराज ने इस गैरबराबरी को दूर करने के लिए देश में पहली बार अपने राज्य में आरक्षण व्यवस्था लागू की। एक आदेश जारी कर कोल्हापुर के अंतर्गत शासन-प्रशासन के 50 प्रतिशत पद अछूत जातियों के लिए आरक्षित कर दिये।

महाराज के इस आदेश से ब्राह्मणों पर तो जैसे गाज गिर गयी। शाहू जी महाराज द्वारा पिछड़ी जातियों को अवसर उपलब्ध कराने के बाद 1912 में 95 पदों में से ब्राह्मण अधिकारियों की संख्या सिर्फ 35 रह गई थी, जबकि पहले ये संख्या बेहद कम थी। महाराज ने कोल्हापुर नगरपालिका के चुनाव में अछूतों के लिए भी सीटें आरक्षित की थी। इसी के चलते देश में पहली बार राज्य की नगरपालिका का अध्यक्ष अस्पृश्य जाति से चुन कर आया था।

बाबा साहेब अम्बेडकर बड़ौदा स्टेट के महाराज की छात्रवृति पर पढ़ने के लिए विदेश गए लेकिन छात्रवृत्ति बीच में ही खत्म हो जाने के कारण उन्हें वापस भारत आना पड़ा l इसकी जानकारी जब शाहू जी महाराज को हुई तो वे खुद अम्बेडकर का पता लगाकर मुम्बई की चाल में उनसे मिलने उनके घर पहुंच गए और आगे की पढ़ाई जारी रखने के लिए उन्हें वित्तीय सहयोग दिया। शाहूजी महाराज ने बाबासाहेब अम्बेडकर के समाचार पत्र ‘मूकनायक’ के प्रकाशन में भी सहायता प्रदान की।

शाहू जी के राज में कोल्हापुर में दलित-पिछड़ी जातियों के दर्जनों समाचार पत्र और पत्रिकाएँ प्रकाशित होती थीं। सदियों से जिन लोगों को अपनी बात कहने का हक नहीं था, शाहू जी के शासन-प्रशासन ने उन्हें बोलने की स्वतंत्रता प्रदान की।

करोड़ों अछूतों का उद्धार करने वाले शाहू जी महाराज को कोटि-कोटि अभिनंदन….💐🙏

-अजय रावत

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