HOME सावित्रीबाई फुले: भारतीय सामाजिक और शैक्षिक रक्तहीन क्रांति की अग्रदूत

सावित्रीबाई फुले: भारतीय सामाजिक और शैक्षिक रक्तहीन क्रांति की अग्रदूत

Savitribai Phule

समाज वीकली यू के

जन्मदिवस पर विशेष लेख:

Dr. Ramjila

डॉ. रामजीलाल,
सामाजिक वैज्ञानिक, पूर्व प्राचार्य,
दयाल सिंह कॉलेज, करनाल (हरियाणा)
email.id. [email protected]

पृष्ठभूमि:

सावित्रीबाई फुले (3 जनवरी 1831 – 10 मार्च 1897) पहली महिला शिक्षिका, प्रधानाध्यापिका, मराठी भाषा की आदि कवयित्री, महिला समाज सुधारक, विदुषी, समतावादी विचारक, परोपकारी, व महिला सशक्तिकरण की महान पैरोकार थी. वह महिलाओं, दलितों और उत्पीड़ित वर्गों के संघर्ष का प्रतीक हैं. सावित्री बाई फुले का जन्म 3 जनवरी 1831 को पुणे से 50 किमी दूर नायगांव (वर्तमान में सितारा जिला – महाराष्ट्र) में खंडोजी नैवेशे (पिता) और माता लक्ष्मीबाई (माता) माली जाति (अब सैनी) के परिवार में हुआ था. माली जाति को महाराष्ट्र का मूल निवासी माना जाता है. कुछ विद्वान इस बात की भी वकालत करते हैं कि सावित्रीबाई फुले महार जाति से थीं.यही कारण है कि आज उत्तर भारत में चमार जाति के लोग मानते हैं कि वह उनकी जाति से संबंधित थी. हमारा दृढ़ विश्वास है कि सावित्रीबाई फुले संकीर्ण निष्ठाओं से ऊपर है.

सविस्तार:

विवाह और शिक्षा:

सन् 1841 में लगभग 10 वर्ष की किशोरावस्था में सावित्रीबाई की शादी ज्योतिराव फुले से हुई थी. उस समय ज्योतिराव फुले 11 वर्ष के थे. सावित्रीबाई पूरी अशिक्षित थीं क्योंकि तत्कालीन समाज में लड़कियों को पढ़ाना पाप माना जाता था और यही महिलाओं के पिछड़ेपन का मुख्य कारण था. ज्योतिबा फुले ने अपनी पत्नी सावित्रीबाई फुले और बहन सगुणाबाई के साथ घर पर ही अपनी शिक्षा शुरू की. घर पर प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद, ज्योतिबा फुले के दोस्तों – सुखराम यशवंत राय परांजपे और केशव शिवराम भावलकर से शिक्षा प्राप्त करने के बाद, सावित्रीबाई फुले ने अमेरिकन मिशनरी स्कूल (अहमदनगर) और पुणे के नॉर्मल स्कूल से शिक्षक प्रशिक्षण लिया.अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद ज्योतिबा फुले के प्रोत्साहन से सावित्रीबाई फुले और सगुणाबाई ने अपने घर पर लड़कियों को पढ़ाना शुरू किया. तत्कालीन समाज में यह एक आश्चर्यजनक कदम था जो बाद में मील का पत्थर साबित हुआ.

‘ फुले’ शब्द का शाब्दिक अर्थ ‘फूल’ है. लेकिन फुले दंपति के लिए यह कांटों भरा रास्ता था.उनके चुने हुए रास्ते में ‘फूल कम और कांटे ज़्यादा’ थे. प्रतिगामी तत्वों द्वारा घर और समुदाय में उनका विरोध और आलोचना की गई . उन्हें बहिष्कार का सामना करना पड़ा. ज्योतिबा फुले के पिता, जो रूढ़िवादी संकीर्ण मानसिकता से पीड़ित थे, ने फुले दंपति को उनके पैतृक घर से बाहर निकाल दिया था और उन्हें अपने मुस्लिम मित्र उस्मान शेख के घर में शरण लेनी पड़ी. उस्मान शेख और उनकी चचेरी बहन बेगम फातिमा शेख की मदद से स्कूल की शुरुआत उनके घर से हुई. यह हिंदू-मुस्लिम सौहार्द का सर्वोत्तम का उदाहरण है. यदि हिंदू धर्म से संबंध रखने वाली सावित्रीबाई फुले को भारत की पहली महिला शिक्षक माना जाता है, तो उनकी सहकर्मी बेगम फातिमा शेख भारत की पहली मुस्लिम महिला शिक्षक के रूप में सम्मान दिया जाता है .

प्रथम महिला शिक्षिका क्यों कहा जाता है?

ऋग्वैदिक काल में महिलाओं को ऋषियों का दर्जा प्राप्त था. महिला ऋषियों को ऋषिका कहा जाता था. सवाल यह है कि इन ऐतिहासिक तथ्यों के बावजूद भी सावित्री बाई फुले को पहली महिला शिक्षिका क्यों कहा जाता है?

तत्कालीन समाज में महिलाओं पर अनेक प्रतिबंध थे.उस समय लड़कियों को पढ़ाना पाप और अभिशाप माना जाता था.ऐसे माहौल में फुले दम्पति ने 3 जनवरी 1848 (सावित्री बाई के जन्मदिन) पर भिडे वाडा (पुणे) में एक बालिका विद्यालय की स्थापना की.इसमें मात्र 9 छात्राओं को प्रवेश मिला था. ज्योतिबा फुले और बेगम फ़ातिमा शेख़ की मदद से सावित्रीबाई फुले ने पुणे में लड़कियों के लिए पांच स्कूल खोले. इन विद्यालयों का पाठ्यक्रम ब्राह्मणों द्वारा घर पर पढ़ाये जाने वाले विद्यालयों से भिन्न था. क्योंकि इन स्कूलों के पाठ्यक्रम में गणित, विज्ञान और सामाजिक अध्ययन शामिल थे. शिक्षा और शिक्षण के तरीके पारंपरिक स्कूलों की तुलना में काफी बेहतर थे. फुले दम्पति ने प्रथम दलित विद्यालय एवं प्रथम किसान विद्यालय की स्थापना की. सावित्रीबाई देवनागरी, अंग्रेजी और मराठी लिपियाँ जानती थीं. उन्होंने स्कूलों में लड़कियों को गणित, मराठी, संस्कृत, भूगोल और इतिहास पढ़ाया और हिंदी में रचनाएँ लिखकर योगदान दिया. सावित्रीबाई द्वारा स्थापित स्कूलों में विधवाओं के साथ-साथ मांग, महार कुर्मी, मराठा, तेली, तंबोली, ब्राह्मण, हिंदू, मुस्लिम और जैन धर्म की लड़कियों को भी शिक्षा दी जाती थी. यही कारण है कि सावित्रीबाई फुले को पहली महिला शिक्षिका माना जाता है. संक्षेप में हम कह सकते हैं कि सावित्रीबाई फुले के विद्यालयों में दी जाने वाली शिक्षा अंतरजातीय और अंतरधार्मिक सद्भाव का प्रतीक थी.

सावित्रीबाई फुले का यह कदम एक रक्तहीन क्रांति और मील का पत्थर साबित हुआ. एक ओर तो समाज के संकीर्ण विचारधारा वाले और रुढ़िवादी व्यक्तियों द्वारा सावित्रीबाई को लगातार गालियां देकर, गोबर, कीचड़ फेंककर और पत्थर मारकर अपमानित और धमकाया गया, वहीं दूसरी ओर 16 नवंबर 1852 को फुले दंपत्ति को सम्मानित किया गया. शिक्षा के क्षेत्र में अभूतपूर्व व अतुलनीय कार्य के लिए ब्रिटिश सरकार द्वारा उन्हें सर्वश्रेष्ठ महिला शिक्षिका के रूप में सम्मानित किया गया.अत्याचार और अपमान उसके विश्वास और दृढ़ संकल्प को डिगा नहीं सके.उन्होंने अपने पति, बेगम फातिमा शेख और सगुनाबाई (ज्योतिबा की चचेरी बहन) के सहयोग से अपना काम जारी रखा. अपने जीवनकाल में उन्होंने 18 स्कूलों की स्थापना की. शिक्षा के क्षेत्र में सावित्रीबाई फुले, के साथ-साथ सगुणाबाई और बेगम फ़ातिमा शेख़ का योगदान आधुनिक भारत के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में अंकित है.

समाज सुधारक:

.एक समाज सुधारक के रूप में, सावित्रीबाई ने बाल विवाह, दहेज प्रथा, सती प्रथा, कन्या भ्रूण हत्या, अस्पृश्यता आदि कुरीतियों का विरोध किया और विधवा पुनर्विवाह और बालिका शिक्षा पर जोर दिया. समाज सुधारक और शिक्षिका होने के साथ-साथ सावित्रीबाई एक महान कवयित्री भी थी. सावित्रीबाई फुले को मराठी भाषा की पहली ‘आदि कवित्री’ के रूप में जाना जाता है. सन् 1854 में सावित्रीबाई फुले की मराठी भाषा में लिखी पहली काव्य पुस्तक “काव्य फुले” (कविता के फूल) प्रकाशित हुई. उन्होंने सन् 1892 में ‘भवन काशी सुबोध रत्नाकर’ भी प्रकाशित किया. इसके अतिरिक्त, उनकी कविता ‘जाओ, शिक्षा प्राप्त करो’ सबसे सर्वाधिक प्रेरणादायक है क्योंकि यह संदेश देती है कि बुद्धि के बिना मनुष्य एक जानवर है. इसलिए बेकार बैठने की बजाय जाओ, और जंजीरों को तोड़ने की शिक्षा प्राप्त करो.

प्लेग से संक्रमित 10 वर्षीय लड़के की जान बचाने की कोशिश करते हुए वह महामारी की शिकार हो गईं और 10 मार्च 1897 को जीवन लीला समाप्त हो गई.लेकिन उनके द्वारा जगाई गई प्रकाश क्रांति लगातार महिलाओं का मार्गदर्शन कर रही है.

संक्षेप में, सावित्रीबाई फुले को अपने जीवन में बचपन से लेकर मृत्यु तक परिवार और समुदाय द्वारा बहिष्कार सहित कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा. उन्होंने कुरीतियों का विरोध किया लेकिन हार नहीं मानी और अपने लक्ष्य की ओर निरंतर बढ़ती रहीं. यही कारण है कि उनका नाम महिलाओं के स्वर्णिम इतिहास की आकाशगंगा में ध्रुव तारे की तरह चमकता है. उनके विचार और आदर्श वर्तमान सदी में भी प्रासंगिक हैं. हमारा यह सुझाव है कि सावित्रीबाई फुले और उनकी सहकर्मी बेगम फातिमा शेख को देश के सर्वोच्च पुरस्कार – भारत रत्न से सम्मानित किया जाना चाहिए .सावित्रीबाई फुले के जन्मदिन को पूरे देश में ‘बालिका दिवस’ और बेगम फातिमा शेख के जन्मदिवस को ‘महिला सशक्तिकरण दिवस’ के रूप में मनाना चाहिए.

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