(समाज वीकली) नेपाल में जो राजनीतिक उथल-पुथल हुई है उसमें एआईपीएफ ने नोट किया कि नेपाल अभी भी राजनीतिक संक्रमण के दौर से गुजर रहा है। अभी यह कह पाना मुश्किल होगा कि इस घटनाक्रम को अंजाम देने में किन बाहरी ताकतों ने मदद की और किस दिशा में राज्य व्यवस्था आगे बढ़ेगी। राजशाही वापसी की संभावना कम ही दिखती है। लेकिन यह जरूर है कि हमारे देश में निरंकुश, लोकतंत्र विरोधी ताकतें राजशाही के लिए माहौल बना रही हैं। यह भी नोट करने लायक है कि दुनिया में जो संप्रभु राष्ट्रों के संबंधों के निर्धारण की व्यवस्था की गई थी, उसे अमेरिका और पश्चिम कतई मानने के लिए तैयार नहीं हैं। जिसकी वजह से पूरी दुनिया में क्षेत्रीय टकराव बढ़ रहा है। मध्य पूर्व एशिया इसका जीता-जागता प्रमाण बना हुआ है। यह भी सच है कि आर्थिक तौर पर अमेरिका की अगुवाई में चल रही एक ध्रुवीय दुनिया को गंभीर चुनौती विकासशील देशों खासकर चीन से मिल रही है। दो राय नहीं है कि पूरी दुनिया में अस्थिरता पैदा करने में अमेरिका और उसकी सैन्य ताकत नाटो लगी हुई है ताकि उनका वर्चस्व बना रहे। दक्षिण एशिया भी इस षड्यंत्र की चपेट में आने से बचा हुआ नहीं है। बांग्लादेश की राजनीतिक घटना इस तरह की संभावनाओं को खारिज नहीं करती हैं। नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टियों व नेपाली कांग्रेस पर भ्रष्टाचार व भाई-भतीजावाद के गंभीर आरोप लगे हैं। बेरोज़गारी, मंहगाई, क्षेत्रीय, जातीय और लैंगिक असमानता यहां भी बड़े पैमाने पर मौजूद है। लेकिन यह जरूर ध्यान दिया जाना चाहिए कि कम्युनिस्ट और उदारवादी विचार की पार्टियों की समझ मौजूदा दौर में अद्यतन (अपग्रेड) नहीं है। इसलिए डिजिटल पीढ़ी के लोगों को समझने में वे असफल रहे हैं। यह उभरती हुई पीढ़ी दुनियाभर में प्रभाव डाल रही है जबकि इसके पास कोई भौतिक संगठन और विचारधारा नहीं है। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि उनकी ऊर्जा और उभरती हुई आकांक्षा के अनुरूप एक गतिमान विचारधारा और राजनीतिक व्यवस्था के लिए काम किया जाए, इसे अब कतई नज़रंदाज नहीं किया जाना चाहिए और तदनुरूप कार्य करना चाहिए।
राष्ट्रीय कार्यसमिति की तरफ से!
एस. आर. दारापुरी
राष्ट्रीय अध्यक्ष, ऑल इंडिया पीपुल्स फ्रंट।



