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शिक्षा और सत्ता

समाज वीकली यू के

भारत का बहुजन समाज सदियों से जाति-आधारित दमन, बहिष्कार और असमानता का शिकार रहा है। यह दमन केवल आर्थिक या सामाजिक नहीं था, बल्कि बौद्धिक और शैक्षणिक बहिष्कार के रूप में भी लागू किया गया। ज्ञान पर नियंत्रण रखकर समाज के बहुसंख्यक तबकों को अज्ञानता में बनाए रखना, ब्राह्मणवादी प्रभुत्व की सबसे प्रभावी रणनीति रही है। ऐसे में बहुजन मुक्ति का संघर्ष स्वाभाविक रूप से शिक्षा के प्रश्न से शुरू होता है।

इतिहास साक्षी है कि बहुजन क्रांतिकारियों ने कभी सत्ता को संघर्ष की शुरुआती मंज़िल नहीं माना। उन्होंने पहले यह समझा कि बिना वैचारिक तैयारी और संस्थागत आधार के सत्ता क्षणिक होती है। इसीलिए बहुजन आंदोलन ने सबसे पहले विद्यालय, महाविद्यालय और शैक्षणिक मंच खड़े किए।

इस ऐतिहासिक परंपरा की शुरुआत उन्नीसवीं सदी के पूर्वार्ध में बंगाल के हरिचंद ठाकुर से होती है। मध्यभारत में गुरु घासीदास करते है, ज्योतिबा फुले से पहले ही उन्होंने आंदोलन के अंतर्गत जाति के शिकार समुदायों के लिए विद्यालयों की स्थापना की। ये संस्थान केवल साक्षरता केंद्र नहीं थे, बल्कि वे ऐसे सामाजिक स्थल थे जहाँ पहली बार बहुजन समाज ने मानव गरिमा के साथ बैठकर सीखने का अधिकार अनुभव किया। शिक्षा यहाँ मानवीय गरिमा और संगठन का माध्यम बनी।

इसके बाद ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले ने 1848 में पुणे में बालिकाओं और बहुजन बच्चों के लिए विद्यालय खोलकर शिक्षा को सीधे-सीधे सामाजिक क्रांति का औजार बनाया। यह केवल स्कूल खोलना नहीं था, बल्कि जाति और पितृसत्ता दोनों को दी गई खुली चुनौती थी। फुले दंपति ने शिक्षक तैयार किए, पाठ्यक्रम विकसित किए और यह स्थापित किया कि बहुजन समाज को मुक्त करने के लिए ज्ञान का लोकतंत्रीकरण अनिवार्य है।

उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध और बीसवीं सदी के आरंभ में दक्षिण भारत में अय्योथिदास ने शिक्षा को वैचारिक पुनर्निर्माण से जोड़ा। उन्होंने बहुजन समाज को उसके ऐतिहासिक बौद्ध अतीत से परिचित कराया और अध्ययन मंडलों व पत्रिकाओं के ज़रिए ब्राह्मणवादी इतिहास-बोध को चुनौती दी। शिक्षा यहाँ पहचान की पुनर्प्राप्ति का माध्यम बनी।
इसी काल में केरल के अयंगकाली ने अछूत बच्चों के लिए विद्यालय खोलकर यह ऐतिहासिक घोषणा की कि “शिक्षा हमारा अधिकार है।” यह घोषणा कोई नैतिक अपील नहीं थी, बल्कि सामाजिक बराबरी के संघर्ष की राजनीतिक घोषणा थी। अयंगकाली का आंदोलन दिखाता है कि शिक्षा के बिना नागरिकता अधूरी रहती है।

उत्तर भारत और पंजाब में अछूतानंद, मंगूराम इत्यादि के नेतृत्व में चले आद धर्म आंदोलन ने शिक्षा को समुदाय निर्माण का आधार बनाया। विद्यालयों, छात्रावासों और संगठनों के माध्यम से उन्होंने यह स्पष्ट किया कि बहुजन समाज को पहले स्वचेतना शिक्षित और प्रबुद्ध समुदाय बनना होगा, तभी वह अपने राजनीतिक अधिकारों की रक्षा कर सकेगा।
छत्रपति शाहू महाराज ने इस चेतना को राज्य-स्तर पर आगे बढ़ाया। उन्होंने शिक्षा को सामाजिक न्याय की नीति से जोड़ा—छात्रावास, छात्रवृत्तियाँ और अवसरों की संस्थागत गारंटी देकर यह सिद्ध किया कि समानता केवल संवैधानिक भाषा नहीं, बल्कि व्यवहारिक व्यवस्था का विषय है।

इस पूरी ऐतिहासिक परंपरा को वैचारिक स्पष्टता और संस्थागत मजबूती डॉ. भीमराव आंबेडकर के नेतृत्व में मिली। “शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो”—यह नारा नहीं, बल्कि बहुजन राजनीति का वैज्ञानिक सूत्र था। पीपुल्स एजुकेशन सोसायटी, सिद्धार्थ कॉलेज और मिलिंद कॉलेज जैसे संस्थान इस दृष्टि के ठोस उदाहरण हैं। आंबेडकर जानते थे कि विचार बिना संस्थान के निष्प्रभावी हो जाता है।

आज जब बहुजन राजनीति अक्सर केवल चुनावी अंकगणित तक सिमटती जा रही है, तब यह इतिहास हमें चेतावनी देता है। सत्ता अपने-आप सामाजिक परिवर्तन नहीं लाती। यदि शिक्षा, शोध और वैचारिक उत्पादन पर प्रभुत्व नहीं होगा, तो बनी हुई सरकारें भी बिना उल्लेखनीय बदलाव किए समाप्त हो जाएँगी।
आज देश में 18 से 23 वर्ष की आयु के लगभग 16 करोड़ युवा हैं, लेकिन उनमें से केवल लगभग 4.25 करोड़ ही उच्च शिक्षा तक पहुँच पा रहे हैं। यह केवल शैक्षणिक संकट नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संकट है। यह उन करोड़ों बहुजन युवाओं की लड़ाई है, जिन्हें ज्ञान से दूर रखकर भविष्य से बाहर किया जा रहा है।

इतिहास स्पष्ट है— बहुजन समाज ने जब-जब शिक्षा को आंदोलन का केंद्र बनाया, उसने अपनी ज़मीन खुद तैयार की। आज भी रास्ता वही है: अपने विद्यालय, अपने महाविद्यालय, अपने विश्वविद्यालय और अपने वैचारिक संस्थान।
बहुजन मुक्ति की कोई तात्कालिक राह नहीं है। आधुनिक गुणात्मक शिक्षा ही उसका सबसे भरोसेमंद, सबसे ऐतिहासिक और सबसे क्रांतिकारी रास्ता है।

जय भीम!
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