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बिना महिलाओं की कार्य भागीयता और उद्यमिता के आसान नहीं है विकसित भारत का सपना

डॉ राकेश सिंहमार,सहायक प्रोफेसर, अर्थशास्त्र-विभाग चौधरी रणबीर सिंह विश्वविद्यालय, जींद (हरियाणा-भारत)

अजीत ग्रोवर, शोधार्थी अर्थशास्त्र- विभाग, चौधरी रणबीर सिंह विश्वविद्यालय जींद(हरियाणा-भारत)

डॉ राकेश सिंहमार
अजीत ग्रोवर

  (समाज वीकली)   भारत में महिलाओं की कार्य भागीदारी और उद्यमिता केवल एक सामाजिक विषय नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय विकास और आर्थिक सशक्तिकरण का एक महत्वपूर्ण पहलू भी है। भारत की कुल जनसंख्या में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग 48.5% है, लेकिन श्रम शक्ति में उनकी भागीदारी केवल 41.7% थी, जबकि पुरुषों की भागीदारी 78.8% रही। इससे भी अधिक चिंता का विषय यह है कि महिलाओं का सकल घरेलू उत्पाद में योगदान केवल 18% है। तुलनात्मक रूप से देखें तो चीन में महिला श्रम भागीदारी 65.8% है और उनका आर्थिक योगदान काफी उल्लेखनीय है। भारत में महिलाओं के श्रम भागीदारी में कमी के पीछे सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक बाधाएँ हैं। पारंपरिक सोच, विवाह और मातृत्व से जुड़ी सामाजिक अपेक्षाएँ, घरेलू कार्यों की प्राथमिकता, कार्यस्थलों पर सुरक्षा की कमी जैसी समस्याएँ इसमें मुख्य भूमिका निभाती हैं। महिलाएं पुरुषों की तुलना में कई गुना अधिक अवैतनिक घरेलू श्रम करती हैं, जिससे उनकी आर्थिक गतिविधियों में भागीदारी सीमित हो जाती है। इसके अतिरिक्त कार्यक्षेत्र में महिलाओं को वेतन असमानता का सामना भी करना पड़ता है, जहाँ उन्हें समान कार्य और योग्यता होने के बावजूद पुरुषों से 20 से 30 प्रतिशत कम वेतन मिलता है। महिला सशक्तिकरण की दिशा में शिक्षा एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, लेकिन 2023 में महिला साक्षरता दर केवल 72% रही, जो पुरुषों से लगभग 12% कम है। बाल विवाह, पारिवारिक जिम्मेदारियाँ और उच्च शिक्षा की सीमित उपलब्धता इसके कारण हैं। सरकार ने इस दिशा में कई योजनाएं आरंभ की हैं, जैसे मुद्रा योजना, स्टैंड-अप इंडिया, TREAD योजना और महिला उद्यमिता मंच, जो महिलाओं को ऋण, प्रशिक्षण, नेटवर्किंग और मार्केटिंग सहायता प्रदान करती हैं। हालांकि इन योजनाओं की पहुँच आज भी सीमित है, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाएं इनसे या तो अनभिज्ञ हैं या सामाजिक दबावों के कारण इनका लाभ नहीं उठा पातीं। बैंक और वित्तीय संस्थानों में लिंग आधारित पूर्वग्रह भी एक बड़ी रुकावट बना हुआ है। प्रेरणा का एक उदाहरण सुधा मूर्ति हैं, जिन्होंने टेल्को की पहली महिला इंजीनियर बनने के बाद इंफोसिस फाउंडेशन के माध्यम से शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक क्षेत्र में विशिष्ट योगदान दिया। उन्होंने यह सिद्ध किया कि यदि महिलाओं को अवसर, संसाधन और समर्थन प्राप्त हो, तो वे सफल उद्यमी बनने के साथ-साथ समाज के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। भारत में महिला श्रम भागीदारी का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य देखें तो स्वतंत्रता पूर्व समय से यह असमान रही है। 1950 और 60 के दशक में महिलाओं की भागीदारी कृषि और घरेलू उद्योगों तक सीमित थी। 1991 के आर्थिक उदारीकरण के बाद सेवा क्षेत्र में कुछ सुधार हुआ, परंतु आज भी यह संतोषजनक नहीं है। ग्रामीण क्षेत्रों में महिला श्रम भागीदारी 25 से 30 प्रतिशत है जबकि शहरी क्षेत्रों में यह लगभग 47 प्रतिशत तक पहुँचती है। फिर भी, दोनों ही क्षेत्रों में सामाजिक और सांस्कृतिक अवरोध बने हुए हैं। कार्य क्षेत्रों के अनुसार देखें तो महिलाएं मुख्यतः कृषि, विनिर्माण और सेवा क्षेत्र में कार्यरत हैं। कृषि में लगभग 54 प्रतिशत महिलाएं कार्यरत हैं, जिनमें अधिकांश अवैतनिक पारिवारिक श्रमिक होती हैं। विनिर्माण क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी 16 और सेवा क्षेत्र में 30 प्रतिशत है। आईटी और तकनीकी क्षेत्र में यह भागीदारी 8 से 10 प्रतिशत के बीच है, जो दर्शाता है कि महिलाएं पारंपरिक क्षेत्रों तक सीमित हैं। वेतन असमानता और उच्च पदों पर पहुँच की कमी अब भी बनी हुई है। ग्लास सीलिंग प्रभाव के कारण महिलाएं निर्णयात्मक या नेतृत्व के पदों तक नहीं पहुँच पातीं, जिससे उनकी दीर्घकालिक व्यावसायिक प्रगति प्रभावित होती है। हाल के वर्षों में डिजिटल माध्यमों के विकास ने महिलाओं को नए उद्यमशील अवसर प्रदान किए हैं। Meesho, Etsy और Instagram जैसे प्लेटफॉर्म पर हजारों महिलाएं व्यापार कर रही हैं। डिजिटल भुगतान और फिनटेक सेवाओं जैसे UPI में महिलाओं की भागीदारी भी लगातार बढ़ रही है। इन चुनौतियों से निपटने के लिए कुछ नीति सिफारिशें आवश्यक हैं। जमीनी स्तर पर महिला केंद्रित जागरूकता अभियान चलाए जाने चाहिए। कार्यस्थल की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए POSH कानून (2013)के तहत आंतरिक शिकायत समितियों की सक्रियता सुनिश्चित करनी होगी। इसके साथ ही CCTV और फास्ट-ट्रैक कोर्ट जैसे उपायों को भी लागू किया जाना चाहिए। महिला स्वयं सहायता समूहों(SHGs) को तकनीकी और बैंकिंग सहायता दी जानी चाहिए। स्कूली पाठ्यक्रम में लिंग समानता और कौशल विकास को शामिल कर बचपन से ही दृष्टिकोण में परिवर्तन लाया जा सकता है। शिक्षा के क्षेत्र में छात्रवृत्तियों की उपलब्धता और महिला केंद्रित इनक्यूबेशन सेंटरों तथा डिजिटल प्रशिक्षण केंद्रों की स्थापना भी समय की आवश्यकता है। यदि भारत महिलाओं की कार्य भागीदारी को सुनियोजित और समग्र रणनीति के माध्यम से प्रोत्साहित करे, तो यह GDP में 18 से 27 प्रतिशत तक की वृद्धि कर सकता है। यह न केवल आर्थिक दृष्टि से बल्कि सामाजिक रूप से भी एक समावेशी और न्यायपूर्ण राष्ट्र निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम होगा।

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