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भूमिगत आवाज़ें: हमारे शहरों की रीढ़ को सशक्त करना

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 दिल्ली में सीवर कर्मचारियों की कार्यशाला में सीवर में हो रही मौतों को रोकने और गरिमा, 

न्याय और श्रम अधिकारों की गारंटी के लिए तत्काल सुधारों की मांग

नई दिल्ली,    (समाज वीकली)   — 24 मई 2025 को डिप्टी चेयरमैन हॉल, कॉन्स्टिट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया, नई दिल्ली में आयोजित एक कार्यशाला “भूमिगत आवाज़ें: हमारे शहरों की रीढ़ को सशक्त करना” में 100 से अधिक प्रतिभागियों — जिनमें सीवर और सेप्टिक टैंक कर्मचारी, यूनियन प्रतिनिधि, शोधकर्ता, वकील, शिक्षाविद, पत्रकार और सिविल सोसाइटी के सदस्य शामिल थे — ने भाग लिया। यह कार्यशाला भारत में सीवर और सेप्टिक टैंक कर्मचारियों की व्यापक और रोकी जा सकने वाली मौतों के खिलाफ एक सशक्त आह्वान थी और गरिमामय, कानूनी और सुरक्षित कार्य स्थितियों की मांग थी।

यह कार्यशाला दलित आदिवासी शक्ति अधिकार मंच (DASAM) और यूनियनों व नागरिक संगठनों के गठबंधन द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित की गई थी, जिसमें उन सीवर कर्मचारियों की आवाज़ों और अनुभवों को केंद्र में रखा गया जो नियमित रूप से जीवन-धमकियों के संपर्क में रहते हैं लेकिन उन्हें कोई संस्थागत समर्थन या सुरक्षा प्राप्त नहीं होती। सुप्रीम कोर्ट के बार-बार के आदेशों और वैधानिक प्रतिबंधों के बावजूद, खतरनाक मैनुअल स्कैवेंजिंग जारी है — जो प्रवर्तन, नियमन और राजनीतिक इच्छाशक्ति की विफलता को उजागर करता है।

भारत में मैनुअल स्कैवेंजर्स सबसे अधिक शोषित श्रमिक समूहों में से एक हैं। अनुमान है कि लगभग 92% कर्मचारी ऐतिहासिक रूप से उत्पीड़ित दलित समुदायों से आते हैं और उन्हें जातिगत भेदभाव का नियमित रूप से सामना करना पड़ता है। ये कर्मचारी आमतौर पर निजी ठेकेदारों या अनौपचारिक व्यवस्थाओं के माध्यम से काम पर रखे जाते हैं, जिससे उन्हें नौकरी की सुरक्षा, उचित वेतन, कानूनी सुरक्षा और सुरक्षा उपकरणों तक पहुंच नहीं मिलती।

इसी संदर्भ में यह कार्यशाला आयोजित की गई — ताकि सीवर कर्मचारियों की दुर्दशा की ओर ध्यान आकर्षित किया जा सके और उनके लिए गरिमामय, सुरक्षित और न्यायसंगत कार्य स्थितियों को आगे बढ़ाने के लिए एक सहभागी मंच बनाया जा सके।

कार्यशाला में सरकारी आंकड़ों और मैनुअल स्कैवेंजर्स की हो रही मौतों के बीच एक तीव्र विरोधाभास को उजागर किया गया। जहां सरकारी आंकड़े प्रत्येक वर्ष अपेक्षाकृत कम मौतों की रिपोर्ट करते हैं, वहीं स्वतंत्र जांच और DASAM की नवीनतम फैक्ट-फाइंडिंग रिपोर्ट संकेत देती है कि असली आंकड़े कहीं अधिक हैं। यह अंतर प्रणालीगत अंडर-रिपोर्टिंग, डेटा संग्रह की कमी और ठेकेदारों व नगर निगमों द्वारा की गई जानबूझकर की गई अस्पष्टता को दर्शाता है।

कार्यशाला के केंद्र में DASAM की फैक्ट-फाइंडिंग रिपोर्ट का विमोचन हुआ, जिसमें मई 2024 से मई 2025 के बीच दिल्ली-एनसीआर के शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में रिपोर्ट की गई 11 से अधिक मैनुअल स्कैवेंजिंग मौतों का दस्तावेजीकरण किया गया है। यह रिपोर्ट दर्शाती है कि इन मामलों को अक्सर छुपा लिया जाता है या दुर्घटनाओं के रूप में खारिज कर दिया जाता है, और ठेकेदार कानूनी जवाबदेही से बचने के लिए औपचारिक रोजगार संबंधों से इनकार करते हैं।

प्रमुख वक्ताओं के विचार:

  • हेमलता कंसोटिया, राष्ट्रीय संयोजक, NCDRSAW: “लंबे समय तक जहरीली गैसों के संपर्क में रहने से होने वाले स्वास्थ्य प्रभाव प्रलेखित नहीं होते। यह एक अदृश्य संकट है जिसे कानून और नीति में उचित स्थान नहीं मिला है।”
  • मोशिना अख्तर, राष्ट्रीय समन्वयक, DASAM: “नगर निकायों और पुलिस अधिकारियों की प्रणालीगत लापरवाही इस समस्या के मूल में है। कई मामलों में एफआईआर दर्ज ही नहीं होती और कुछ तो महीनों तक ‘जांचाधीन’ रहते हैं।”
  • धर्मेंद्र भाटी, अध्यक्ष, म्युनिसिपल वर्कर्स लाल झंडा यूनियन: “दिल्ली जल बोर्ड के ठेका सीवर कर्मचारियों को स्थायी कर्मचारी बनाया जाना चाहिए। जब तक औपचारिक समावेशन नहीं होगा, शोषण जारी रहेगा।”
  • डॉ सुनील राम, सामाजिक कार्यकर्ता: “मैनुअल स्कैवेंजर्स की मौत के बाद मुआवज़े की चर्चा होती है, पर इन मौतों को रोकने की बात नहीं होती। न नीति में, न बजट में, इनकी कोई प्राथमिकता है।”
  • डॉ सीमा माथुर, प्रोफेसर, दिल्ली विश्वविद्यालय: “पहचान—विशेषकर जाति और लिंग—सीवर कर्मचारियों के साथ व्यवहार को प्रभावित करती है। सामाजिक सुरक्षा की कमी और काम की प्रकृति के मानसिक प्रभाव उपेक्षित हैं।”

कार्यशाला में सीवर कर्मचारियों के प्रत्यक्ष अनुभव भी साझा किए गए। उन्होंने असुरक्षित कार्य स्थितियों, सुरक्षा उपकरणों की कमी, वेतन में देरी, कम वेतन, दुर्व्यवहार और पहचान की कमी जैसे मुद्दों को उजागर किया। कानूनी, अकादमिक, शोध, पत्रकारिता, नागरिक समाज और यूनियन पृष्ठभूमि के पैनलिस्टों ने इस शोषण के बहुस्तरीय स्वरूप पर चर्चा की और संरचनात्मक समाधान की आवश्यकता पर बल दिया।

पैनल में शामिल प्रमुख विशेषज्ञ:

  • वीरेन्द्र गौड़, अध्यक्ष, CITU, दिल्ली-एनसीआर
  • हेमलता कंसोटिया, राष्ट्रीय संयोजक, NCDRSAW
  • वेद प्रकाश, अध्यक्ष, दिल्ली जल बोर्ड सीवर विभाग मज़दूर संगठन
  • डॉ सुनीलम, सामाजिक कार्यकर्ता
  • धर्मेंद्र भाटी, अध्यक्ष, म्युनिसिपल वर्कर्स लाल झंडा यूनियन (CITU)
  • विजय कुमार बलगुहेर, उपाध्यक्ष, अखिल भारतीय श्रमिक संघ (दिल्ली प्रदेश)
  • अजय हितैषी, सामाजिक कार्यकर्ता, गाज़ियाबाद
  • आज़ाद सिंह डेढ़ा, अध्यक्ष, ऑल DJB एम्प्लॉयीज़ वेलफेयर एसोसिएशन
  • डॉ सीमा माथुर, प्रोफेसर, दिल्ली विश्वविद्यालय
  • मोशिना अख्तर, राष्ट्रीय समन्वयक, DASAM
  • वर्षा प्रकाश, पत्रकार

कार्यशाला के अंत में निम्नलिखित मांग पत्र (Charter of Demands) पारित किया गया:

  • सभी हालिया मौतों में उपयुक्त कानूनी धाराओं के तहत तत्काल FIR दर्ज की जाए
  • मृतक श्रमिकों के परिजनों को न्यूनतम ₹30 लाख मुआवज़ा
  • प्रत्येक मृत्यु पर समयबद्ध न्यायिक जांच
  • सभी सीवर कर्मचारियों को नगर निकायों में स्थायी रोजगार का दर्जा
  • शहरी और ग्रामीण भारत में सफाई व्यवस्था का राष्ट्रीय ऑडिट
  • सुरक्षा प्रशिक्षण और पर्याप्त PPE की आपूर्ति सहित सख्त सुरक्षा प्रोटोकॉल का क्रियान्वयन

यह कार्यशाला सीवर कर्मचारियों की पीड़ा पर चुप्पी तोड़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम थी, और इसने सरकार, नगर निकायों और नागरिक समाज से अपील की कि वे मिलकर उन संरचनात्मक सुधारों को लागू करें जो इन अनिवार्य श्रमिकों की गरिमा, सुरक्षा और न्याय सुनिश्चित कर सकें।

द्वारा: दलित आदिवासी शक्ति अधिकार मंच (DASAM)
अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें: 8491052270

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