HOME **व्यंग्य – “कर-कर लंबे हाथ..!”**

**व्यंग्य – “कर-कर लंबे हाथ..!”**

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    (समाज वीकली)  
यादविंदर वाहद

मनचाही शादी की ज़िद पूरी करवाने के लिए चिंकी ने दूसरे दिन भी न तो ढंग से रोटी खाई और न ही वह अपने कमरे से बाहर निकली।

अभी स्वामीजी किसी जजमान का फंडा करवाकर लौटे ही थे कि बंसो ने इशारे से सब कुछ बता दिया। एक लंबा सा “हूँ…” कहकर स्वामी जी बोले, “कल तो मैं बड़े बाबाओं के साथ ‘विशेष कार्यसिद्धि’ के लिए जाना है, करमों वालीए… अच्छा फिर, परसों बुला लेना, साथ ही मैं लड़के को सामने से देखना चाहता हूं और कुछ सवाल भी करने हैं। बेटी देने से पहले सौ बातें सोचनी पड़ती हैं..!” आखिर में उन्होंने अपना तकियाकलाम “असीं मोहरे बुद्धू तां नईं…” कहकर बात खत्म कर दी।
चिंकी को सुनाने के लिए स्वामी जी ने आम से थोड़ा ऊंची आवाज़ में यह बात कही थी। … भला कौन सी बात? “यही कि परसों लड़के को बुला लो, मैं परख करनी है।”
बंसो भले ही आज के ज़माने की पढ़ाई से वंचित है… पर… बेटी का दुख दिल से महसूस कर रही थी, आखिर मां-बेटी का नाता जो हुआ..! स्वामीजी को इस फैसले तक लाने के पीछे उसी का ही दिमाग था।
 चिंकी से 48 घंटे मुश्किल से कटे। उसे उत्साह था कि उसका होने वाला आने वाला है।
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उधर, शिगनापुर का नाम लेकर अपनी दुकानों में तैयार किए गए अलग-अलग सस्ती धातुओं से बने नग, रंग-बिरंगी और तरह-तरह की अंगूठियां और अन्य तामझाम का बाजार ग्राहकों की लगातार मांग के कारण गर्म है। इधर, बिलगा और अपरा में राज करने वाला एक सौदागर अपने शोरूमनुमा ठिकाने पर बैठा ग्राहकों के फोन सुन रहा है और “काम” हो जाने की सूचनाएं दे रहा है। इतने में कॉल रिसीव करते समय आवाज़ आती है—आवाज़ भारी और खुरदरी होने के कारण फोन के स्पीकर से ऐसे बह रही है जैसे सामने वाले ने स्पीकर ऑन किया हो।
फोन करने वाला और सुनने वाला दोनों गहरे दोस्त हैं, बल्कि यूं कहें कि जिगरी यार हैं तो गलत नहीं होगा। शिगनापुर के नग-अंगूठियों के नाम पर जितनी साधारण और सस्ती धातुएं बेचकर इन्होंने अपार दौलत इकट्ठी की है, शायद ही किसी ने की हो। फोन से आने वाली आवाज़ खुरदरी और रूखी है। ये दोनों दोस्त माया के घमंड में चूर हैं और समाज से जुड़े सरोकारों से दूर, साहित्यिक और सामाजिक चेतना से कोसों दूर हैं।
फोन करने वाला कह रहा है कि उसे जेल का डर सता रहा है। यह बात उसे किसी तथाकथित पहुंचे हुए आदमी ने बताई है। इसलिए किसी तरह जेल के कैदियों के लिए बनने वाली रोटी का एक महीने का इंतजाम करवा दो। वह कहता है—“यार पैसों की चिंता मत कर, पानी की तरह बहा दूंगा…!”
(इस तरह बिना जेल गए, जेल की रोटी का इंतजाम करने के प्रयास शुरू हो जाते हैं। एक आदमी मिल भी जाता है।)
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“इधर, चिंकी का रिश्ता चाहने वाला लड़का अपने पिता और चाचा को साथ लेकर स्वामीजी के घर पहुंच गया है। लड़की के पिता ने कोई खास खातिरदारी नहीं की, बल्कि घर के बाहर बैठे मजाकिया स्वभाव वाले हलवाई प्रेम की दुकान से खूब मीठी बर्फी ले ली, घर में चाय बना ली और किसी जजमान से मिली सेवा-भेंट में से निकली मिठाई ही मेहमानों के आगे रख दी।
अब कमरे में सबके बीच झिझक और नएपन का अजीब सा माहौल बना हुआ था… फिर चाय आधी-अधूरी पी गई।
“हाँ भई बरखुरदार, फिर क्या काम-धंधा करते हो? कितनी पढ़ाई की है?”
चिंकी के पिता के सवाल सुनकर ज्ञानवीर (लड़की की पसंद) बोला—
“दसवीं की थी साल 2009 में। फिर टीवी और डेक की मरम्मत का काम सीखा। वह काम अब खत्म हो गया। गाने वालों के साथ ढोलकी बजाता रहा हूं, ऐसे कई धंधे करने के बाद अब जेल में रसोइया लगा हूं, ‘ऊपर से’ भी बना लेता हूं…!”
“‘ऊपर से’ क्या है? अपने साहब के घर जाकर कुछ करते हो या…?”
“नहीं जी! जेल में रसोइये का ठेके का काम है। सुनिए… ये जो जुगाड़ू और परंपराओं में पले-बढ़े मुनाफाखोर लोग होते हैं, जो दूसरों का हक मारने से नहीं चूकते…!”
“हाँ… आगे बताओ?” (स्वामी उत्सुकता से बोले)
“ऐसे लोगों को हर समय जेल जाने का डर रहता है। हमने इसी मनोविज्ञान से धंधा निकाल लिया…!”
“अच्छा… फिर?” (चिंकी का पिता स्वामी …और पूछने लगा)
“ऐसे लोगों को मैं ‘जेल की रोटी’ भी बाहर ही उपलब्ध करवा देता हूं। दोगुने-तीन गुने दाम पर बेचते हैं। उन्हें तथाकथित समझदार और ज्योतिषी कह चुके होते हैं कि तुम जेल की रोटी खाने के योग में हो। अगर बाहर से मंगा कर नहीं खाई तो जेल जा कर खानी पड़ेगी। इस तरह ये मुनाफाखोर भी ‘जेल की रोटी’ खा कर निश्चिंत हो जाते हैं… और हम ने भी बढ़िया व्यापार जमा लिया है और जेल के रसोइये का चोला पहन रखा है।”
ज्ञानवीर की बात सुनते ही स्वामीजी खिल उठे। उन्हें अपनी बेटी की पसंद पर गर्व महसूस हुआ।
थोड़ी देर बाद ज्ञानवीर और उसके साथ आए लोग वहां से चले जाते हैं।
रात को चारपाई पर लेटी बंसो ने अपने पति से शादी के बारे में पूछा। स्वामीजी बोले—
“लड़का तो हमारे जैसा पूरा जुगाड़ू है। मैं कौन सा कम हूं, हर तरह के ठगों को मैं भी तो जेल की रोटी खाने की सलाह देता ही रहता हूं। करमों वालीए, जिनसे मैंने ये ठगी सीखी थी, वे भी यही करते थे…”यह ठगी का 5 हज़ार साल पुराना कारोबार है एवं धर्म की आड़ में चलता है।” “बरसों बाद कोई दीदावर पैदा होता है, कर्मकांड का खंडन करता है, ये लोग उसे बुरा-भला कहते हैं। फिर उसकी मौत के बाद उसकी पूजा शुरू कर देते हैं। महापुरुष का पैग़ाम कहीं खो जाता है। खैर… हम जैसे भिखमंगे तो सदियों से इन्हें गुमराह कर के रोटी खा रहे हैं और खाते-डकारते रहेंगे……..”
पगली बेटी के प्यार में पागल चिंकी की माँ…बंसो ने पूछा—“तो हाँ ही समझें?”
“और क्या..! तैयारी करो और ज्ञानवीर को कह दो कि जल्दी शादी की तारीख निकाल ले और हमें सगुन की चिट्ठी भेज दे। ऐसे कमाने वाले लड़के रोज-रोज नहीं मिलते…!”
यह कहते हुए स्वामीजी गर्व से खिले हुए थे और बंसो भी… और खैर! चिंकी तो खुश होनी ही थी…!
लेखक: यादविंदर वाहद
फोन संपर्क: 6284336773
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