समाज वीकली यू के
भारतीय संविधान में शिक्षा और रोज़गार के क्षेत्र में समान अवसर सुनिश्चित करने की व्यवस्था की गई है। सामाजिक और ऐतिहासिक विषमताओं को दूर करने के लिए आरक्षण को एक औज़ार के रूप में अपनाया गया। इसी संदर्भ बीते दिनों इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने एक ऐसा आदेश दिया है, जिस पर विमर्श ज़रूरी है। कोर्ट ने साफ़ कहा है कि उत्तर प्रदेश के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में अनुसूचित जाति वर्ग को 21 प्रतिशत से अधिक आरक्षण नहीं दिया जा सकता।
गौरतलब है कि इससे पहले हाईकोर्ट की एकल पीठ ने आदेश दिया था कि कुछ मेडिकल कॉलेजों में अनुसूचित जाति वर्ग के अभ्यर्थियों को 70 प्रतिशत तक आरक्षण का लाभ मिले। इस आदेश को राज्य सरकार ने चुनौती दी और मामला डिवीजन बेंच तक पहुँचा। डिवीजन बेंच ने राज्य सरकार के पक्ष को मानते हुए कहा कि आरक्षण की सीमा तय है और इससे अधिक की अनुमति नहीं दी जा सकती। हालाँकि, जिन छात्रों का प्रवेश पहले से हो चुका है, उनका एडमिशन सुरक्षित रहेगा। आगे की काउंसलिंग में यही सीमा लागू होगी।
वर्तमान में मेडिकल कॉलेजों में आरक्षण की स्थिति पर बात करें तो ऑल इंडिया कोटा (15 प्रतिशत सीटें) में अनुसूचित जाति को 15 प्रतिशत, अनुसूचित जनजाति को 7.5 प्रतिशत, अन्य पिछड़ा वर्ग (केंद्रीय सूची) को 27 प्रतिशत और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) को 10 प्रतिशत आरक्षण मिलता है। उत्तर प्रदेश के राज्य कोटे (85 प्रतिशत सीटें) में अनुसूचित जाति को 21 प्रतिशत, अन्य पिछड़ा वर्ग को 27 प्रतिशत और EWS को 10 प्रतिशत आरक्षण दिया जा रहा है।
यदि जनसंख्या और आरक्षण की तुलना करें तो तस्वीर और साफ होती है। देश में अनुसूचित जाति की आबादी लगभग 16.6 प्रतिशत है जबकि उत्तर प्रदेश में यह 21 प्रतिशत है। अन्य पिछड़े वर्ग की संख्या 40 से 45 प्रतिशत के बीच आँकी जाती है। इसके विपरीत, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS), जो उच्च जातियों का गरीब वर्ग है, उसकी वास्तविक जनसंख्या 10 प्रतिशत से भी कम है, लेकिन उन्हें 10 प्रतिशत आरक्षण का लाभ दिया गया है। इस दृष्टि से देखें तो बहुजन समाज (SC, ST, OBC) कुल आबादी का 70 प्रतिशत से अधिक हिस्सा रखते हुए भी आरक्षण की सीमा से बंधा हुआ है, जबकि एक विशेष समाज को उनकी संख्या से अधिक लाभ उपलब्ध है।
सामाजिक न्याय की दृष्टि से यह सवाल अहम है कि क्या आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था वास्तव में समान अवसर उपलब्ध कराती है? मेडिकल जैसी प्रोफ़ेशनल शिक्षा ग्रामीण और वंचित वर्ग के लिए पहले से ही कठिन है। कोचिंग, अंग्रेज़ी माध्यम और आर्थिक दबाव जैसी चुनौतियाँ पिछड़े और दलित छात्रों को और पीछे धकेलती हैं। ऐसे में 21 प्रतिशत की सीमा कानूनी रूप से उचित भले लगे, लेकिन वास्तविक समानता के लक्ष्य तक पहुँचने में बाधक है।
इस आदेशित दृष्टिकोण से यह साफ है कि आरक्षण केवल सीटों का बँटवारा नहीं है, बल्कि लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व और बराबरी का सवाल है। सुप्रीम कोर्ट ने 1992 में इंद्रा साहनी मामले में आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत तय की थी, किंतु सामाजिक न्याय की दृष्टि से यह सीमा मनमानी प्रतीत होती है। जब असमानता 70 प्रतिशत से अधिक आबादी को झेलनी पड़ रही है तो प्रतिनिधित्व की सीमा भी उसी अनुपात में होनी चाहिए।
इस प्रकार इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश कानूनी रूप से व्यवस्था संचालन की तो बात करता है, लेकिन सामाजिक न्याय का सवाल अधूरा छोड़ देता है। यदि वास्तव में लोकतंत्र को मजबूत करना है तो शिक्षा और रोज़गार में बड़ी आबादी की वास्तविक हिस्सेदारी सुनिश्चित करनी होगी। आरक्षण की नीतियों की समीक्षा जनसंख्या और पिछड़ेपन के वास्तविक आँकड़ों के आधार पर की जानी चाहिए, तभी सामाजिक न्याय का सपना साकार हो सकेगा।



