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गुरु नानक देव जी के जाति के बारे में विचार तथा वर्तमान सिख समाज

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गुरु नानक देव जी

(गुरु नानक देव जी के गुरुपर्व पर विशेष)

एस आर दारापुरी आईपीएस (से. नि.)

 गुरु नानक देव जी के जाति पर विचार

एस आर दारापुरी

  (समाज वीकली)  गुरु नानक देव जी (1469-1539), सिख धर्म के संस्थापक, ने जाति व्यवस्था को कट्टरता से नकारा था। उनके अनुसार, जाति मानवता को विभाजित करने वाली कृत्रिम रचना है, जो ईश्वर की एकता के विरुद्ध है। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा था: “न कोई हिंदू, न मुसलमान” – अर्थात्, मानवता में कोई धार्मिक या जातिगत भेदभाव नहीं होना चाहिए। उनके विचारों के प्रमुख बिंदु निम्नलिखित हैं:

– समानता का सिद्धांत: सभी मनुष्य ईश्वर की संतान हैं, चाहे वे किसी भी जाति, धर्म, लिंग या वर्ग के हों। जाति जन्म से तय नहीं होती, बल्कि कर्म से।

– लंगर की परंपरा: गुरु नानक जी ने लंगर (सामूहिक भोजन) की शुरुआत की, जहाँ सभी जातियों के लोग एक पंक्ति में बैठकर भोजन करते हैं। यह जाति-भेदभाव को तोड़ने का प्रतीक था।

– सिख ग्रंथों में प्रतिबिंब: गुरु ग्रंथ साहिब में उनके भजन (जैसे “जाति जाति न पचानौं नीसानौं नीसानी” – जाति को मैं नहीं पहचानता, केवल अच्छे-बुरे कर्मों को) जाति-विरोधी संदेश देते हैं।

– सामाजिक सुधार: उन्होंने ब्राह्मणों की श्रेष्ठता और छुआछूत का विरोध किया, तथा निचली जातियों (जैसे कोढ़ी, चमार) को भी समान सम्मान दिया।

ये विचार सिख धर्म की नींव हैं, जो बाद के गुरुओं (जैसे गुरु गोबिंद सिंह) द्वारा और मजबूत किए गए, जिन्होंने खालसा पंथ में जाति-भेद मिटाने का प्रयास किया।

 आज का सिख समाज: क्या उनकी शिक्षा का पालन हो रहा है?

आज का सिख समाज आधिकारिक रूप से गुरु नानक की जाति-विरोधी शिक्षा का समर्थन करता है। सिख रीति-रिवाजों में जाति को अस्वीकार किया जाता है – जैसे गुरुद्वारे में सभी को समान प्रवेश, लंगर में एकजुटता, और अमृत संचार में जाति पूछना वर्जित। हालांकि, व्यवहारिक स्तर पर चुनौतियाँ बनी हुई हैं। निम्न तालिका में स्थिति का संक्षिप्त विश्लेषण है:

धार्मिक संस्थाएँ:  गुरुद्वारे जाति-निरपेक्ष; SGPC (शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी) जाति-विरोधी नीतियाँ लागू करती है परंतु कुछ क्षेत्रों (जैसे पंजाब) में जाति-आधारित गुरुद्वारे (रविदासिया, रामगढ़िया, जाट सिख) मौजूद हैं।

 विवाह :   अंतर-जातीय विवाह को प्रोत्साहन; अकाली दल और अन्य संगठन अभियान चलाते हैं। जाट सिखों में अंतर्जातीय विवाह का दबाव; दलित सिख (मजहबी, रविदासिया) अक्सर अलग-थलग हैं।  2020 के सर्वे (NSSO डेटा) के अनुसार, पंजाब में 70%+ विवाह एक ही जाति में होते हैं। |

राजनीति व समाज:  सिख नेतृत्व (जैसे हरसिमरत कौर बादल) समानता पर जोर; युवा पीढ़ी (डायस्पोरा में) अधिक उदारता देखि जाती है। जाति-आधारित राजनीति (जाट vs. दलित); 2021 किसान आंदोलन में जाति-विभाजन दिखा। आरक्षण मुद्दों पर तनाव।

सुधार प्रयास: संगठन जैसे ‘सिख फॉर जस्टिस’ और ‘अंतरजातीय विवाह फंड’ सक्रिय; शिक्षा से जागरूकता बढ़ रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में छुआछूत के अवशेष; COVID-19 के दौरान दलित सिखों पर भेदभाव की रिपोर्ट्स। |

निष्कर्ष: सिख समाज सैद्धांतिक रूप से गुरु नानक की शिक्षा का पालन करता है, लेकिन सामाजिक-आर्थिक कारक (जैसे भूमि स्वामित्व, परंपराएँ) के कारण पूर्ण पालन नहीं हो पा रहा। युवा और शहरी सिख अधिक प्रगतिशील हैं, जबकि ग्रामीण इलाकों में सुधार की गुंजाइश है। गुरु नानक का संदेश – **”सबना जीआ एका छांव” (सभी प्राणियों की एक ही छाया)** – आज भी प्रासंगिक है, और निरंतर प्रयासों से समाज इसे और मजबूत कर सकता है।

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