राम पुनियानी

(समाज वीकली) टीपू सुल्तान का नाम समाचारपत्रों (विशषकर कर्नाटक के) में आता रहता है. ऐसा उनकी जयंती के राज्य-प्रायोजित आयोजनों के आसपास कुछ ज्यादा ही होता है. वहां भाजपा हमेशा इन आयोजनों में बाधा डालती है और प्रायः हमेशा इसके नतीजे में उपद्रव और हंगामे के हालात बनते हैं.
इस बार टीपू से जुड़ी खबर महाराष्ट्र के मालेगांव से आई है. वहां की नवनिर्वाचित उपमहापौर निहाल अहमद ने शान-ए-हिन्द टीपू सुल्तान का एक चित्र अपने कार्यालय में लगाया. इसकी जानकारी मिलने के बाद शिवसैनिकों ने अधिकारियों का हस्तक्षेप करवाकर उसे हटवा दिया. कुछ विरोध प्रदर्शन भी हुए. महाराष्ट्र प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाल ने चित्र हटाए जाने को अनुचित बताते हुए कहा कि टीपू का मैसूर के लिए उतना ही योगदान है जितना छत्रपति शिवाजी महाराज का महाराष्ट्र के लिए है. इस वक्तव्य का महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडनवीस ने विरोध किया. फडनवीस ने कहा कि टीपू की तुलना शिवाजी महाराज से करना महाराज का अपमान करना है. इसके बाद कांग्रेस कार्यालय पर भाजपा कार्यकर्ताओं ने पथराव किया जिसके नतीजे में हुई अफरातफरी में करीब सात लोग घायल हुए.
भाजपा को सपकाल के वक्तव्य पर इसलिए आपत्ति है क्योंकि उनके मुताबिक टीपू ने बड़ी संख्या में हिंदुओं का कत्ल करवाया था. उन्होंने हिंदुओं को धर्मपरिवर्तन कर मुसलमान बनाने का प्रयास किया. हिन्दू राष्ट्रवादी टीपू को अन्य कई अन्य बातों के लिए भी दोषी ठहराते हैं. इनमें से ज्यादातर का उद्देश्य टीपू को हिन्दू-विरोधी और एक जालिम शासक के रूप में पेश करना होता है. ये बातें सच्चाई से कोसों दूर हैं. इनमें से कई मिथक अंग्रेजों द्वारा फैलाए गए आख्यान पर आधारित हैं. अंग्रेज़ टीपू से चिढ़ते थे. वजह यह कि टीपू अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने वाले राजाओं में से एक थे. टीपू ने निजाम और पेशवा से ईस्ट इंडिया कंपनी की सेनाओं का मुकाबला करने का आव्हान किया था. टीपू को भारत में अंग्रेजों की जड़ें मजबूत होने से उत्पन्न होने वाले खतरों का पूर्वानुमान था.
टीपू का प्रशासन मिश्रित था जिसमें बहुत से उच्च अधिकारी हिन्दू थे. पूरनिया उनके मीर मीरान (विभागाध्यक्ष) थे और उनका टीपू के राज्य के प्रशासनिक ढांचे में महत्वपूर्ण स्थान था. कृष्णा राव उनके कोषाध्यक्ष थे. शामैया आयंगर उच्च दर्जे के मंत्री थे और नरसिंह आयंगर डाक विभाग के उच्चाधिकारी थे. कहा जाता है कि टीपू सुल्तान श्रृंगेरी के शंकराचार्य को दान देते थे, जिसमें मंदिर के पुननिर्माण और देवी सरस्वती की मूर्ति की स्थापना के लिए दी गई रकम भी शामिल थी. उन्होंने अपने साम्राज्य में स्थित विभिन्न मंदिरों को जमीन और धन दिया. उनके राज के दौरान दस-दिवसीय दशहरा समारोह मैसूर के सामाजिक जीवन का अभिन्न अंग था.
सन् 1791 में रघुनाथ राव पटवर्धन के नेतृत्व में मराठा सेना ने ऐतिहासिक श्रृंगेरी श्रद्धा पीठम् पर हमला किया और उसे लूटा. हमले की वजह से शंकराचार्य को वहां से भागना पड़ा. यह पता लगने पर टीपू सुल्तान ने गहरी नाराजगी जताई और कहा कि ऐसा करने वालों को इसका नतीजा भुगतना पड़ेगा. उन्होंने तुरंत धन, उपहार और पत्र भेजे ताकि मंदिर को पहले जैसी स्थिति में लाया जा सके और मूर्ति को पुनप्रर्तिष्ठापित किया जा सके. यह हमला तीसरी ब्रिटिश-मैसूर लड़ाई का हिस्सा था जिसके दौरान मराठा सेनाओं ने मंदिर को भारी नुकसान पहुंचाया जिसमें लोगों की हत्या, उन्हें घायल करना और संपत्ति की लूटपाट करना शामिल था. टीपू सुल्तान, जिनका श्रृंगेरी जगतगुरू से संवाद होता रहता था, और टीपू उन्हें अत्यंत सम्मान से संबोधित करता थे, ने मैसूर के प्रशासन को तुरंत आदेश दिया कि वहां पहले जैसी स्थिति बहाल करने में सहायता प्रदान करे. इससे यह पता चलता है कि वे हिन्दू संस्थानों को संरक्षण प्रदान करते थे. हालात बहाल करने की बात की पुष्टि कन्नड़ में लिखे गए कई पत्रों से होती है जिन्हें श्रृंगेरी पीठ में सुरक्षित रखा गया है. इनमें जगतगुरू से टीपू के इस अनुरोध का भी जिक्र है कि वे उनके साम्राज्य की समृद्धि के लिए प्रार्थना करें.
टीपू अंग्रेजों के कट्टर विरोधी थे. उनपर यह आरोप लगाया जाता है कि उन्होंने कुछ हिंदू और ईसाई समूहों को प्रताड़ित किया. इस प्रताड़ना की वजह शुद्ध राजनैतिक थी और इसका धर्म से कोई लेनादेना नहीं था. इस बारे में इतिहासवेत्ता केट ब्रित्तलबैंक का कहना है कि “यह धर्म से जुड़ी नीति नहीं थी बल्कि ऐसा संबंधितों को दंडित करने के लिए किया गया था‘‘. टीपू के निशाने पर सिर्फ हिन्दू समूह नहीं थे. उन्होंने महदवी जैसे कई मुस्लिम समुदायों के खिलाफ भी कार्यवाही की. इसकी वजह यह थी कि ये समुदाय अंग्रेजों का साथ दे रहे थे और इन्हें ईस्ट इंडिया कंपनी की सेनाओं में घुड़सवार के रूप में नियुक्त किया गया था. एक अन्य इतिहासविद् सुसान बाइले का कहना है कि अपने राज्य के बाहर के हिंदुओं और ईसाईयों पर उनके हमलों को राजनैतिक वजहों से किए गए हमलों के रूप में देखा जाना चाहिए क्योंकि ठीक उसी समय मैसूर में रहने वाले हिंदुओं और ईसाईयों से उन्होंने नजदीकी रिश्ते बनाए थे.
सरफराज शेख अपनी पुस्तक ‘सुल्तान-ए-खुदाद‘ में ‘टीपू सुल्तान के घोषणापत्र‘ को उद्धत करते हैं जिसमें टीपू यह घोषणा करते हैं कि वे धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं करेंगे और अपनी आखिरी सांस तक अपने साम्राज्य की रक्षा करेंगे. राकेट संबंधी तकनीक में उनकी गहरी रूचि थी. एपीजे अब्दुल कलाम अपनी पुस्तक ‘विंग्स ऑफ फायर‘ में इसका जिक्र प्रशंसनात्मक लहजे में करते हैं.
यह दिलचस्प है कि आरएसएस ने बच्चों के लिए भारतीय इतिहास पर केन्द्रित पुस्तकों की श्रृंखला प्रकाशित की थी जिसके अंतर्गत 1970 के दशक में उसने टीपू सुल्तान पर पुस्तक प्रकाशित की. भाजपा नेता येदियुरप्पा ने 2010 के कर्नाटक चुनावों के दौरान वोट हासिल करने के लिए टीपू का ताज पहना था. भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने टीपू जयंती के अवसर पर 2017 में भेजे एक संदेश में टीपू की प्रशंसा की थी. कोविंद आरएसएस से थे मगर उन्होंने टीपू की तारीफ करते हुए कहा ‘‘टीपू सुल्तान अंग्रेजों से लड़ते हुए एक वीर की तरह शहीद हुए. वे मैसूर राकेट के विकास और युद्ध में उसके उपयोग के प्रवर्तक थे‘‘. टीपू का चित्र हमारे संविधान की हस्तलिखित मूल प्रति, जिस पर संविधान निर्माताओं के हस्ताक्षर हैं, के सोलहवें भाग में पृष्ठ 144 पर रानी लक्ष्मीबाई और अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने वाली अन्य हस्तियों के साथ सुशोभित हैं.
टीपू अपनी नीतियों के कारण मैसूर की जनता में लोकप्रिय थे. गांवों में गाए जाने वाले कई लोकगीतों में उनका गुणगान है. यही वजह है कि हमारे महानतम नाटककारों में से एक गिरीष कर्नाड ने कहा था कि यदि टीपू हिन्दू होते तो उनका दर्जा उतना ही ऊंचा होता जितना शिवाजी महाराज का महाराष्ट्र में है. लगभग यही सपकाल ने कहा है.
उपमहापौर के कार्यालय में टीपू सुल्तान का चित्र लगाने का विरोध साम्प्रदायिक ताकतों की विभाजनकारी राजनीति का एक और उदाहरण है. राजाओं को सिर्फ उनके धर्म के आधार पर नहीं आंका जाना चाहिए बल्कि इसका मुख्य आधार विभिन्न धर्मों के लोगों के प्रति उनकी नीतियां और उनके लोक कल्याणकारी कार्य होना चाहिए. इस पैमाने पर टीपू बहुत उच्च स्थान पर नजर आते हैं. उनके खिलाफ साम्प्रदायिक शक्तियों का अधपका प्रोपेगेंडा विभिन्न समुदायों को बांटने के प्रयास के अलावा कुछ नहीं है.
टीपू को बेहतरीन श्रद्धांजलि सुभाष चन्द्र बोस ने अर्पित की थी. उन्होंने टीपू के छलांग मारते शेर को अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध करने वाली अपनी आजाद हिन्द फौज का प्रतीक चिन्ह बनाया. टीपू का सबसे बड़ा योगदान यह था कि उन्होंने भारतीय राजाओं को ईस्ट इंडियां कंपनी और अंग्रेजों के बढ़ते खतरे के प्रति खबरदार किया था. इसके चलते ही उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ वीरता से लड़ाई लड़ी और चौथी अंग्रेज-मैसूर लड़ाई में अपनी शहादत दी. टीपू का दानवीकरण करने में जुटी साम्प्रदायिक शक्तियां उस विचारधारा से जुड़ी हुई हैं जिसने अंग्रेजों के राज के खिलाफ कभी एक अंगुली तक नहीं उठाई. (अंग्रेजी से रूपांतरण अमरीश हरदेनिया. लेखक आईआईटी मुंबई में पढ़ाते थे और सेंटर फॉर स्टडी ऑफ़ सोसाइटी एंड सेकुलरिज्म के अध्यक्ष हैं)
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