एस आर दारापुरी आई.पी.एस. (से. नि.)
प्रस्तावना

(समाज वीकली) डॉ. भीमराव अम्बेडकर का मानना था कि धर्म केवल व्यक्तिगत आस्था का विषय नहीं है, बल्कि वह एक शक्तिशाली सामाजिक संस्था है जो समाज के नैतिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक जीवन को गहराई से प्रभावित करती है। किन्तु उनका यह भी मत था कि हिन्दू धर्म की तत्कालीन संरचना, विशेषकर उसकी जाति-आधारित व्यवस्था और वंशानुगत पुरोहितवाद, सामाजिक असमानता को बनाए रखने तथा करोड़ों लोगों को सम्मान और समान अधिकारों से वंचित रखने का प्रमुख कारण है। यद्यपि डॉ. अम्बेडकर ने अंततः बौद्ध धर्म को अपनाया, फिर भी उन्होंने हिन्दू धर्म में व्यापक सुधारों का एक सुविचारित कार्यक्रम प्रस्तुत किया। अपनी प्रसिद्ध कृति Annihilation of Caste (जाति का विनाश) तथा अन्य लेखों और भाषणों में उन्होंने पुरोहितों की नियुक्ति, हिन्दू मन्दिरों के प्रशासन तथा मन्दिरों की आय के उपयोग के संबंध में क्रांतिकारी सुझाव दिए। उनका उद्देश्य धार्मिक संस्थाओं को लोकतांत्रिक, उत्तरदायी तथा समाजोपयोगी बनाना था, ताकि वे स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के संवैधानिक आदर्शों के अनुरूप कार्य कर सकें।
पुरोहित व्यवस्था में सुधार
डॉ. अम्बेडकर ने हिन्दू धर्म की सबसे तीखी आलोचना ब्राह्मण जाति के वंशानुगत पुरोहित एकाधिकार को लेकर की। उनका मानना था कि पुरोहित केवल धार्मिक अनुष्ठान सम्पन्न करने वाला व्यक्ति नहीं होता, बल्कि वह समाज में अत्यधिक नैतिक, धार्मिक और सामाजिक अधिकार का स्रोत भी होता है। जब यह अधिकार केवल जन्म के आधार पर एक जाति तक सीमित हो जाता है, तो वह जाति व्यवस्था को स्थायी बना देता है और सामाजिक भेदभाव को वैधता प्रदान करता है।
डॉ. अम्बेडकर ने इस व्यवस्था को अस्वीकार करते हुए कहा कि पुरोहित का पद जन्म से नहीं, बल्कि योग्यता से निर्धारित होना चाहिए। प्रत्येक हिन्दू—चाहे वह किसी भी जाति, वर्ग या लिंग का हो—यदि आवश्यक धार्मिक शिक्षा और प्रशिक्षण प्राप्त कर ले, तो उसे पुरोहित बनने का समान अवसर मिलना चाहिए।
उन्होंने प्रस्ताव रखा कि पुरोहितों के लिए विधिवत शिक्षा, परीक्षा तथा राज्य द्वारा जारी लाइसेंस की व्यवस्था होनी चाहिए। जिस प्रकार चिकित्सक, वकील और अध्यापक योग्यता के आधार पर अपने पेशे में प्रवेश करते हैं, उसी प्रकार पुरोहितों को भी प्रशिक्षण प्राप्त करना चाहिए और वे समाज के प्रति उत्तरदायी हों। यदि कोई पुरोहित अनैतिक आचरण करे या अपने दायित्वों का पालन न करे, तो राज्य उसका लाइसेंस रद्द कर सके। इस प्रकार पुरोहित व्यवस्था जातीय विशेषाधिकार के बजाय योग्यता, नैतिकता और उत्तरदायित्व पर आधारित होगी।
हिन्दू मन्दिरों का लोकतांत्रिक प्रशासन
डॉ. अम्बेडकर का मानना था कि हिन्दू मन्दिर किसी व्यक्ति, परिवार या विशेष जाति की निजी सम्पत्ति नहीं हैं। उनका निर्माण और संचालन करोड़ों श्रद्धालुओं के दान से होता है, इसलिए उनका प्रशासन भी सार्वजनिक और लोकतांत्रिक होना चाहिए।
उन्होंने प्रस्तावित किया कि मन्दिरों के प्रबंधन में समाज के सभी वर्गों—विशेषकर अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, महिलाओं तथा अन्य वंचित समूहों—को पर्याप्त प्रतिनिधित्व दिया जाए। मन्दिरों का संचालन पारदर्शी, उत्तरदायी और भ्रष्टाचार-मुक्त होना चाहिए।
उनका यह भी मानना था कि मन्दिरों के आय-व्यय का नियमित लेखा-परीक्षण (ऑडिट) हो, वित्तीय विवरण सार्वजनिक किए जाएँ तथा सम्पूर्ण प्रशासन जन-उत्तरदायी बनाया जाए। धार्मिक संस्थाओं का संचालन लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप होना चाहिए, न कि वंशानुगत विशेषाधिकारों के आधार पर।
मन्दिर की आय का सामाजिक कल्याण में उपयोग
डॉ. अम्बेडकर के विचारों का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष मन्दिरों की आय के उपयोग से सम्बन्धित था। उन्होंने देखा कि देश के अनेक मन्दिरों में प्रतिवर्ष भारी मात्रा में धन चढ़ावे के रूप में आता है, किन्तु उसका अधिकांश भाग धार्मिक अनुष्ठानों, उत्सवों और कर्मकाण्डों पर व्यय होता है, जबकि समाज का एक बड़ा वर्ग गरीबी, अशिक्षा और बीमारी से जूझता रहता है।
उनका स्पष्ट मत था कि धर्म का उद्देश्य केवल पूजा-पाठ और कर्मकाण्ड नहीं, बल्कि मानव सेवा होना चाहिए। इसलिए मन्दिरों की आय का प्रमुख भाग विद्यालयों, महाविद्यालयों, अस्पतालों, छात्रावासों, पुस्तकालयों, अनाथालयों, वृद्धाश्रमों, छात्रवृत्तियों तथा निर्धनों और वंचित समुदायों के कल्याण पर व्यय किया जाना चाहिए।
यदि मन्दिरों की विशाल सम्पत्ति का उपयोग शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक न्याय के लिए किया जाए, तो धार्मिक संस्थाएँ समाज के विकास की प्रभावशाली एजेंसियाँ बन सकती हैं। डॉ. अम्बेडकर के अनुसार धर्म की वास्तविक महत्ता भव्य धार्मिक अनुष्ठानों में नहीं, बल्कि मानव कल्याण में निहित है।
धार्मिक सुधार की व्यापक परिकल्पना
डॉ. अम्बेडकर केवल पुरोहित व्यवस्था या मन्दिर प्रशासन तक सीमित नहीं थे। उनका मानना था कि हिन्दू धर्म को लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप बनाने के लिए व्यापक सुधार आवश्यक हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि हिन्दुओं के लिए एक सर्वमान्य धर्मग्रंथ हो, जाति व्यवस्था और जन्माधारित विशेषाधिकार समाप्त किए जाएँ तथा धर्म को नैतिकता, समानता और विवेक पर आधारित बनाया जाए।
उनकी दृष्टि में धर्म का उद्देश्य मनुष्यों को विभाजित करना नहीं, बल्कि उन्हें समानता और बंधुत्व के सूत्र में बाँधना होना चाहिए। यही कारण था कि उन्होंने धर्म को संविधान के मूल्यों के अनुरूप ढालने की आवश्यकता पर बल दिया।
वर्तमान परिदृश्य
स्वतंत्र भारत में डॉ. अम्बेडकर के कुछ सुझावों पर आंशिक रूप से अमल हुआ है, किन्तु उनकी सम्पूर्ण दृष्टि अभी भी साकार नहीं हो सकी है।
तमिलनाडू और केरल जैसे राज्यों में गैर-ब्राह्मण तथा अनुसूचित जातियों के प्रशिक्षित व्यक्तियों को मन्दिरों में पुरोहित नियुक्त करने की पहल की गई है। इससे वंशानुगत ब्राह्मण एकाधिकार को कुछ चुनौती मिली है। फिर भी देश के अधिकांश मन्दिरों में आज भी पुरोहित पद मुख्यतः ब्राह्मण परिवारों के नियंत्रण में है तथा महिला पुरोहितों की संख्या अत्यन्त सीमित है।
मन्दिर प्रशासन में भी कुछ सुधार हुए हैं। अनेक बड़े मन्दिर राज्य सरकारों के अधीन विभिन्न देवस्वम बोर्डों तथा हिन्दू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्ती विभागों द्वारा संचालित किए जाते हैं। इनका उद्देश्य वित्तीय पारदर्शिता और उत्तरदायित्व सुनिश्चित करना है। इसके बावजूद राजनीतिक हस्तक्षेप, भ्रष्टाचार, पारदर्शिता की कमी तथा वंचित समुदायों के अपर्याप्त प्रतिनिधित्व जैसी समस्याएँ अभी भी बनी हुई हैं।
आज भारत के प्रमुख मन्दिरों को प्रतिवर्ष हजारों करोड़ रुपये का चढ़ावा प्राप्त होता है। इस धन का उपयोग मन्दिरों के रख-रखाव, कर्मचारियों के वेतन, धार्मिक उत्सवों, तीर्थयात्रियों की सुविधाओं तथा अनेक सामाजिक एवं धर्मार्थ कार्यों—जैसे निःशुल्क भोजन, अस्पतालों, शैक्षणिक संस्थानों और कल्याणकारी योजनाओं—पर किया जाता है। फिर भी अनेक विद्वानों का मत है कि इस विशाल धनराशि का कहीं अधिक भाग शिक्षा, स्वास्थ्य, वैज्ञानिक अनुसंधान तथा गरीबी उन्मूलन पर व्यय किया जा सकता है, जैसा कि डॉ. अम्बेडकर ने कल्पना की थी।
संवैधानिक एवं विधिक परिप्रेक्ष्य
भारत के संविधान ने डॉ. अम्बेडकर की अनेक मूल अवधारणाओं को संवैधानिक स्वरूप प्रदान किया। संविधान का अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता का उन्मूलन करता है तथा अनुच्छेद 14, 15 और 16 समानता और समान अवसर की गारंटी देते हैं। न्यायालयों ने भी कई मामलों में यह माना है कि पुरोहित पद का वंशानुगत होना हिन्दू धर्म की अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं है और राज्य पुरोहितों की योग्यता निर्धारित कर सकता है। साथ ही, अनुच्छेद 25 और 26 धार्मिक स्वतंत्रता तथा धार्मिक सम्प्रदायों के अधिकारों की रक्षा भी करते हैं। इस प्रकार भारत में सामाजिक सुधार और धार्मिक स्वतंत्रता के बीच संवैधानिक संतुलन बनाए रखने का प्रयास किया गया है।
निष्कर्ष
डॉ. भीमराव अम्बेडकर द्वारा प्रस्तुत हिन्दू पुरोहित व्यवस्था, मन्दिर प्रशासन तथा मन्दिर सम्पत्ति के सामाजिक उपयोग संबंधी विचार आधुनिक भारत के सबसे व्यापक और दूरदर्शी धार्मिक सुधार कार्यक्रमों में से एक हैं। उनका उद्देश्य केवल प्रशासनिक सुधार करना नहीं था, बल्कि धर्म को लोकतंत्र, समानता, सामाजिक न्याय और मानव गरिमा के मूल्यों के अनुरूप पुनर्गठित करना था।
यद्यपि स्वतंत्र भारत ने पुरोहित पद को सभी जातियों के लिए आंशिक रूप से खोलने, मन्दिर प्रशासन में सुधार लाने तथा मन्दिरों की आय से कुछ सामाजिक कल्याणकारी कार्य संचालित करने की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति की है, फिर भी डॉ. अम्बेडकर की व्यापक दृष्टि अभी भी पूर्णतः साकार नहीं हो सकी है। वंशानुगत पुरोहितवाद, जातिगत वर्चस्व, प्रशासनिक अपारदर्शिता तथा मन्दिरों की विशाल सम्पत्ति के सीमित सामाजिक उपयोग जैसी चुनौतियाँ आज भी विद्यमान हैं।
आज, जब भारत सामाजिक न्याय, समानता और लोकतांत्रिक मूल्यों को और अधिक सुदृढ़ बनाने की दिशा में अग्रसर है, तब डॉ. अम्बेडकर के ये विचार पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक प्रतीत होते हैं। उनका संदेश स्पष्ट था कि धर्म तभी सार्थक है जब वह मानव की गरिमा की रक्षा करे, भेदभाव का विरोध करे और समाज के प्रत्येक व्यक्ति के कल्याण एवं उत्थान का माध्यम बने।





