एस आर दारापुरी आई.पी.एस. (से.नि.)
सारांश

(समाज वीकली) भारत में हाल की “वॉक फ़ॉर पीस” (शांति पदयात्रा) पहलें प्रायः नैतिक-आध्यात्मिक एकता, अंतर-धार्मिक सौहार्द और सामाजिक समरसता पर बल देती हैं। किंतु डॉ. बी.आर. अम्बेडकर के सामाजिक-राजनीतिक चिंतन के आलोक में शांति को केवल नैतिक भाव या प्रतीकात्मक एकता के रूप में नहीं, बल्कि संरचनात्मक न्याय की परियोजना के रूप में समझना आवश्यक है। यह लेख तर्क देता है कि यदि शांति पदयात्राएँ जाति, वर्ग, लिंग और धार्मिक असमानताओं की संरचनात्मक जड़ों को संबोधित नहीं करतीं, तो वे अनजाने में “ग्रेडेड असमानता” की विद्यमान संरचना को स्थिर भी कर सकती हैं। अम्बेडकर के सामाजिक लोकतंत्र, संवैधानिक नैतिकता और बंधुत्व के सिद्धांतों के आधार पर यह लेख समकालीन वॉक फ़ॉर पीस की संभावनाओं और सीमाओं का आलोचनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
- प्रस्तावना: शांति का प्रश्न—नैतिकता या न्याय?
वर्तमान भारत में आयोजित शांति पदयात्राएँ बहुधा इस विचार को प्रस्तुत करती हैं कि सामाजिक तनावों और ध्रुवीकरण का समाधान नैतिक अपील, आध्यात्मिक पुनर्स्मरण और अंतर-धार्मिक संवाद के माध्यम से संभव है। यह दृष्टिकोण मानता है कि यदि लोग एक साथ चलें, संवाद करें और सहानुभूति विकसित करें, तो सामाजिक सद्भाव स्थापित हो सकता है।
अम्बेडकरवादी दृष्टि इस प्रश्न को भिन्न रूप में प्रस्तुत करती है:
क्या बिना सामाजिक-आर्थिक और जातिगत संरचनाओं को बदले वास्तविक शांति संभव है?
डॉ. अम्बेडकर ने स्पष्ट किया था कि राजनीतिक लोकतंत्र सामाजिक लोकतंत्र के बिना टिकाऊ नहीं हो सकता। इसी प्रकार, शांति भी समानता और न्याय के बिना स्थायी नहीं हो सकती।
- अम्बेडकर का सामाजिक लोकतंत्र और शांति का सिद्धांत
2.1 राजनीतिक लोकतंत्र बनाम सामाजिक लोकतंत्र
अम्बेडकर ने चेतावनी दी थी कि भारत में राजनीतिक लोकतंत्र एक “ऊपरी आवरण” (top-dressing) हो सकता है यदि समाज की बुनियादी संरचना—विशेषतः जाति—असमान बनी रहती है। सामाजिक लोकतंत्र का अर्थ है: स्वतंत्रता (Liberty), समानता (Equality) एवं बंधुत्व (Fraternity)। इन तीनों के बिना लोकतंत्र खोखला हो जाता है।
शांति, अम्बेडकर के अनुसार, केवल संघर्ष का अभाव नहीं है; वह सामाजिक न्याय की परिणति है।
2.2 “ग्रेडेड असमानता” और सामाजिक स्थिरता का मिथक
अम्बेडकर ने भारतीय समाज को “ग्रेडेड इनइक्वैलिटी” (क्रमिक असमानता) की व्यवस्था कहा। इस व्यवस्था में: प्रत्येक जाति अपने से नीचे को दबाती है, परंतु स्वयं किसी अन्य के अधीन भी रहती है।
ऐसी संरचना सतही स्थिरता उत्पन्न कर सकती है—परंतु यह न्यायपूर्ण नहीं होती। इसी प्रकार, यदि शांति पदयात्राएँ केवल “समरसता” की भाषा में बात करें और संरचनात्मक विषमता को चुनौती न दें, तो वे एक असमान व्यवस्था की नैतिक स्वीकृति बन सकती हैं।
- शांति पदयात्राएँ: नैतिक अनुष्ठान या संरचनात्मक हस्तक्षेप?
3.1 प्रतीकात्मकता की शक्ति
अम्बेडकर नैतिकता के विरोधी नहीं थे; उन्होंने बौद्ध धर्म को अपनाते हुए नैतिक बंधुत्व पर बल दिया। किंतु उनके लिए नैतिकता का अर्थ सामाजिक पुनर्गठन था, न कि केवल भावनात्मक एकता।
यदि वॉक फ़ॉर पीस: हाशिए के समुदायों की आवाज़ को केंद्र में लाती है, सामाजिक भेदभाव के विरुद्ध स्पष्ट रुख अपनाती है एवं संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए संगठित होती है, तो वह अम्बेडकरवादी अर्थ में “बंधुत्व” का विस्तार हो सकती है।
3.2 जाति प्रश्न की अनुपस्थिति
अनेक समकालीन शांति यात्राएँ “सभी मनुष्य समान हैं” जैसे सार्वभौमिक वक्तव्यों तक सीमित रहती हैं। किंतु अम्बेडकर ने चेताया था कि अमूर्त समानता का विचार तब तक निरर्थक है जब तक वास्तविक सामाजिक विषमता बनी रहती है।
यदि शांति का विमर्श जाति-विरोधी संघर्ष से पृथक रहता है, तो वह अधूरा है।
3.3 आर्थिक न्याय और प्रतिनिधित्व
अम्बेडकर का लोकतंत्र प्रतिनिधित्व और संसाधनों के न्यायपूर्ण वितरण पर आधारित था। अतः शांति पदयात्रा की प्रासंगिकता इस बात पर निर्भर करती है कि: क्या वह श्रमिक अधिकारों, भूमि और संसाधन वितरण, शिक्षा और स्वास्थ्य तक समान पहुँच तथा राजनीतिक प्रतिनिधित्व के प्रश्नों को उठाती है?
बिना इन मुद्दों के शांति केवल नैतिक अपील बनकर रह जाती है।
- संवैधानिक नैतिकता और सार्वजनिक पदयात्रा
अम्बेडकर ने “संवैधानिक नैतिकता” (constitutional morality) को लोकतंत्र का आधार बताया। इसका अर्थ है: विधि के शासन का सम्मान, अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा तथा संस्थागत जवाबदेही।
यदि वॉक फ़ॉर पीस संविधान की प्रस्तावना—स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व—को सक्रिय रूप से सार्वजनिक जीवन में पुनर्स्थापित करे, तो वह एक लोकतांत्रिक नागरिक अनुष्ठान बन सकती है। अन्यथा, केवल आध्यात्मिक समरसता का आह्वान लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व को प्रतिस्थापित नहीं कर सकता।
| 5. तुलनात्मक परिप्रेक्ष्य: गांधी और अम्बेडकर
यद्यपि गांधी और अम्बेडकर दोनों ने अहिंसा और नैतिकता पर बल दिया, परंतु उनकी पद्धतियों में भिन्नता थी: गांधी जी की दृष्टि नैतिक आत्म शुद्धि एवं सामाजिक समरस्ता और ग्राम-केंद्रित थी जबकि डा. अंबेडकर की दृष्टि संरचनात्मक पुनर्गठन, सामाजिक न्याय एवं संवैधानिक-राज्य केंद्रित थी। |
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| समकालीन शांति पदयात्राएँ प्रायः गांधीवादी प्रतीकवाद से प्रेरित हैं; किंतु अम्बेडकरवादी दृष्टि उनसे अपेक्षा करती है कि वे संरचनात्मक न्याय को केंद्रीय विषय बनाएँ। | |
- संभावनाएँ: अम्बेडकरवादी दिशा में रूपांतरण
यदि वॉक फ़ॉर पीस निम्न कदम उठाए, तो वह अम्बेडकरवादी अर्थ में अधिक प्रासंगिक हो सकती है:
- जाति-विरोधी और भेदभाव-विरोधी संकल्पों को सार्वजनिक रूप से अपनाना।
- दलित-बहुजन और अन्य वंचित समुदायों के नेतृत्व को केंद्र में लाना।
- संवैधानिक अधिकारों की रक्षा हेतु दीर्घकालिक कार्यक्रम बनाना।
- प्रतीकात्मक पदयात्रा को नीति-स्तरीय संवाद से जोड़ना।
- निष्कर्ष: शांति का पुनर्परिभाषण
अम्बेडकरवादी दृष्टिकोण से शांति केवल “संघर्ष का अभाव” नहीं, बल्कि “अन्याय का अंत” है। यदि वॉक फ़ॉर पीस सामाजिक न्याय के प्रश्नों से दूरी बनाए रखती है, तो वह संरचनात्मक असमानताओं को चुनौती देने में असफल रहेगी। किंतु यदि वह संवैधानिक नैतिकता, सामाजिक लोकतंत्र और प्रतिनिधित्व के सिद्धांतों को अंगीकार करती है, तो वह लोकतांत्रिक पुनर्जागरण का माध्यम बन सकती है।
अंततः, अम्बेडकर के शब्दों में, लोकतंत्र केवल शासन-पद्धति नहीं, बल्कि “संबद्ध जीवन की एक विधि” है। शांति पदयात्रा उस विधि का दृश्य रूप हो सकती है—परंतु तभी, जब वह समानता और न्याय की दिशा में वास्तविक कदम उठाए।
साभार: ChatGPT



