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यूके में प्रवासी विरोधी भावना क्यों बढ़ रही है?

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गुरभिंदर गुरी

   (समाज वीकली)   हाल ही में 13 सितंबर 2025 को टॉमी रॉबिन्सन के नेतृत्व में “Unite the Kingdom” मार्च हुआ, जिसमें करीब 1.1 से 1.5 लाख लोग शामिल हुए। इस मार्च का संदेश सख़्त था — खासकर अवैध प्रवासी, सीमाओं की सुरक्षा और दक्षिण एशियाई समुदाय पर सीधा इशारा किया गया। इससे सवाल उठता है कि यूके में यह प्रवासी-विरोधी भावना क्यों बढ़ रही है?
1. आर्थिक दबाव
लोगों का मानना है कि रोज़गार, आवास, स्वास्थ्य सेवाओं और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में प्रवासी बड़ी प्रतिस्पर्धा पैदा कर रहे हैं। इस कारण “संसाधनों की कमी” की भावना आम होती जा रही है।
2. आप्रवास की बढ़ती संख्या
छोटी नावों से आ रहे प्रवासी, शरण (Asylum) की बढ़ती अर्ज़ियाँ और लगातार हो रही गिरफ्तारियों ने यह अहसास मजबूत किया है कि यूके अब अपनी क्षमता से अधिक बोझ उठा रहा है।
3. राष्ट्रीयता और सांस्कृतिक सुरक्षा
कुछ लोगों को डर है कि बढ़ती प्रवासी संख्या से उनकी अंग्रेज़ी भाषा, पारंपरिक जीवनशैली और धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान खतरे में है।
4. मीडिया और सोशल मीडिया
समाचार और ऑनलाइन पोस्टों में प्रवासियों को “समस्या” के रूप में पेश किया जाता है। अधूरी या गलत जानकारी से लोगों में डर, गुस्सा और असुरक्षा की भावना बढ़ रही है।
5. राजनीतिक हथकंडे
दक्षिणपंथी धड़े और कुछ नेता इस भावना को चुनावी लाभ के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। वे “सीमाओं की सुरक्षा” और “अपने लोगों की तरक्की” जैसे नारे देकर जनता को जोड़ रहे हैं।
6. सरकारी नीतियाँ
होटलों में प्रवासियों का ठहराव, शरण प्रक्रिया की धीमी गति और कानूनी मदद की कमी ने भी प्रवासी-विरोधी माहौल को और भड़काया है।
दक्षिण एशियाई समुदाय पर प्रभाव
डर और असुरक्षा: लोग खुद को निशाने पर महसूस करते हैं।
सामाजिक अलगाव: भाषा, धर्म और रंग के आधार पर भेदभाव।
भेदभाव और पिछड़ापन: नौकरी, शिक्षा और स्वास्थ्य में सीमित अवसर।
मानसिक प्रभाव: कम सुनवाई, अकेलापन और तनाव।
क्या हालात और बिगड़ सकते हैं?
हाँ — अगर प्रवासियों की आमद बढ़ी, आर्थिक दबाव और सरकारी नीतियों में सुधार न हुआ, तो गुस्सा, प्रदर्शन और हिंसा और तेज़ हो सकते हैं। लेकिन अगर नीतियाँ संतुलित रहीं, सही जानकारी दी गई और समुदायों के बीच संवाद बढ़ाया गया, तो हालात नियंत्रित किए जा सकते हैं।
संक्षेप में कहा जाए तो यूके में प्रवासी विरोधी भावना के पीछे आर्थिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और मीडिया-प्रेरित कारक हैं। इसका सबसे अधिक असर दक्षिण एशियाई समुदायों पर पड़ रहा है।

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