HOME लोहिया के सपने आज की हकीकत

लोहिया के सपने आज की हकीकत

9
डॉ. राममनोहर लोहिया

रामबाबू अग्रवाल

(समाज वीकली)  लोहिया की एक नहीं, अनेक  ऐसी बाते है जो प्रथम दृष्टया समझ में नहीं आती लेकिन जैसे-जैसे घटनाएं होती हैं और उसके द्वारा जो प्रतीति  होती हैं, उनकी बातों का महत्त्व ध्यान में आने लगता है.    जब एक लाख से अधिक किसानों ने लखनऊ विधानसभा पर प्रदर्शन करके नारा लगाया था ‘यू.पी. का किसान जागा और पन्त मिनिस्टर भागा’, ‘सोशलिस्ट पार्टी का ऐलान नहीं देंगे दस गुना लगान’, उत्तर प्रदेश की पन्त सरकार ने जमींदारी विनाश कानून लागू कर दिया था, परन्तु भूमि का स्वामित्व करने के लिए गरीब किसानों से दस गुना लगान वसूल करने का प्राविधान उसमें रख दिया था. सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश में सोशलिस्ट पार्टी ने दस गुना लगान जा करके भूमिधर बनने के खिलाफ एक बड़ा आन्दोलन खड़ा करदिया था. गोरखपुर में भी इस आन्दोलन को खड़ा करने का प्रयत्न किया गया था, पर देवरिया जिले में इसने व्यापक जोर पकड़ा था. लखनऊ प्रदर्शन के लिये गोरखपुर से लगभग ६० कार्यकर्ता और किसान साइकिलों पर सवार होकर तथा पैदल लखनऊ गए गए थे. इसके अतिरिक्त भी रेल्वे और दूसरे वाहनों से गोरखपुर-देवरिया जिले से काफी लोग प्रदर्शन में शामिल होने के लिये लखनऊ पहुंचे थे. इस प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे थे पार्टी के तीनों वरिष्ठ नेता जय प्रकाश, आचार्य नरेन्द्र देव और डॉ. लोहिया. इस पूरे प्रदर्शन में चारों तरफ लाल झण्डा और लाल टोपी ही दिखायी दे रही थी. मानो लाल टोपियों का समुद्र उमड़ पड़ा था.  डॉ. साहब ने न केवल लाल टोपी पहनने से इंकार किया बल्कि अपनी सफेद टोपो भी उतार कर फेंक दी. कार्यकर्ताओं के बीच अपने भाषण में इन्होंने लाल टोपी या इस प्रकार के किसी निशान या गणवेश से कार्यकर्ताओं का पहचाना जाना दल के लिये नुकासनदेह बताया.

वर्षों बाद घटने वाली घटनाओं को वे पहले ही देख लिया करते थे. जब उन्होंने भारत-पाकिस्तान का फेडरेशन बनाने की बात कही थी तो लोगों ने उन्हें यूरोपियन कहा था और इसे मूर्खतापूर्ण कहकर टाल दिया था. बाद में सोशलिस्ट पार्टी ने जोर-शोर के साथ भारत-पाक महासंघ का आन्दोलन चलाया, सम्मेलन किये तब जाकर इसकी तरफ लोगों का ध्यान गया, परन्तु देश के अखबारों ने उसको महत्व देना तो दूर पड़ोसी देश के अखबारों ने उसको महत्व देना तो दूर पड़ोसी देश से हमारे सम्बन्ध बिगाड़ने की बात उठा दी. वर्षों पूर्व उनकी भविष्यवाणी थी कि पूर्वी-पाकिस्तान तीन मुख्य कारणों से पश्चिमी पाकिस्तान के साथ नहीं रहेगा और उसका पाकिस्तान से अलग होना निश्चित प्राय है. डॉ. लोहिया ने जो तीन कारण गिनाए थे, उसी बुनियाद पर बंगलादेश की आज़ादी का संघर्ष चला. ‘पूर्वी पाकिस्तान की भाषा पश्चिमी पाकिस्तान से एकदम भिन्न हैं.’

‘पूर्वी पाकिस्तान व पश्चिमी पाकिस्तान में १५०० किलोमीटर की दूरी है’, ‘पश्चिमी पाकिस्तान, पूर्वी पाकिस्तान के शोषण पर जीवित है’, जिस समय डॉ. लोहिया ने यह बात कही, उस समय पाकिस्तान की नहीं भारत की सरकार ने भी डॉ. लोहिया को गैर जिम्मेदार कहा था, जब सन १९७०-७१ में स्थिति
बदली और बंगलादेश में उग्र आन्दोलन चला तब स्थति से फायदा व श्रेय वे ही लोग उठाने लगे जिन्होंने डॉ. लोहिया को गैर जिम्मेदार व पागल कहा था.

पूर्वी बंगाल, नेपाल के सम्बन्ध में डॉ. लोहिया की जो आलोचना हुई थी वही आलोचना गोमन्तकों के स्वतंत्रता आन्दोलन की नींव डालने और उनके संघर्ष में पुर्तगाली साम्राज्यशाही के खिलाफ स्वयं हिस्सा लेने पर भी हुई. गोवा, भारत का अविभाज्य अंग है, यह मानकर पुर्तगाली साम्राज्यशाही के खिलाफ गोमन्तकों के आन्दोलन का समर्थन करना और गोवावासियों को सलाजार के डंडाशाही के नीचे नारकीय जीवन से छुटकारा दिलाने के कारण साधारण लोगों ने नहीं पं. जवाहर लाल नेहरू ने भी इनकी आलोचना की थी.

१० जून, १९४६ को जूलियों मैनेंजिस के यहां असोलना गांव में डॉ. लोहिया गए थे और वहीं पर उन्होंने साथियों के साथ मिलकर गोवा स्वतंत्रता आन्दोलन की नींव डाली थी. सन् १९४२ का नेता गोमान्तक जैसे गुलाम देश में आया है, यह बात दावानल जैसी पूरे गोवा में फैल गयी. पुरुषोत्तम कंकोरकर जैसे रचनात्मक कार्य में लगे लोग भी डॉ. लोहिया के साथ जुटे और १८ जून को हो गोवा के स्वतंत्रता का जयघोष मडगांव से कर दिया गया था. डॉ. लोहिया को गिरफ्तार कर एक बहुत ही छोटी सी कोठरी में बंद कर उन्हें साधारण कैदियों को दी जाने वाली सुविधाओं से भी वंचित रखा गया था. ११ अगस्त, १९४६ को महात्मा गांधी ने हरिजन में लेख तथा वायसराय को पत्र लिखकर डॉ. लोहिया को रिहा करने की मांग की. तब डॉ. लोहिया जेल से रिहा हुए थे. लगभग ७-८ वर्षों के बाद ही भारत ने गोवा मुक्ति का काम किया और आज गोवा, भारत का अविभाज्य अंग है. यह डॉ. लोहिया के ही कार्यों का फल है, यह देशवासियों को नहीं भूलना चाहिए.

जब भारत के विभाजन की स्वीकृति कांग्रेस ने दे दी तो समाजवादियों ने न तो उसका समर्थन किया और न ही उसका विरोध परन्तु जब भारत विभाजन के सम्बन्ध में कांग्रेस वर्किंग कमेटी में प्रस्ताव का प्रारूप नेहरूजी ने रखा तो डॉ. लोहिया ने एक संशोधन प्रस्तुत किया उसका आशय था कि भारत विभाजन के बाद भी हम अपने दृष्टि के सामने बारत का सम्पूर्ण मानचित्र ओझल नहीं होने देंगे. सार्क और जी-१५ के पीछे भी डॉ. लोहिया की सोच थी जो उन्होंने कांग्रेस के विदेस विभाग के संयोजक की हैसियत से दी थी. भारत, नेपाल, बर्मा, लंका, तिब्बत आदि देशों को मिलाकर एक महासंघ की कल्पना उनकी दृष्टि में रही और उसी के अनुसार उन्होंने पाकिस्तान बनने के बाद सपना संजोये रखा कि भारत-पाक बंगलादेश का एक
महासंघ बनना चाहिए ताकि इस क्षेत्र की विपन्न देशवासियों को अच्छा जीवन दिया जा सकें.

उन्होंने यह भी साफ किया कि पूंजीवाद और कम्यूनिज्म दानों ही एक सिक्के के दो पहलू हैं क्योंकि दोनों के उत्पादन की पद्धति में साम्य है. डॉ. लोहिया ने दुनिया को दो हिस्सों में बांटा है, एक वह हिस्सा जो २० अक्षांश रेखा के ऊपर है और दूसरा उसके नीचे वाला हिस्सा. एक सम्पन्नता का हिस्सा और दूसरा गरीबी का है, पश्चिम के देश और अफ्रोएशियन दे, गरीब दे, गुलाम या उपनिवेश। रोम से होनोलूलू तक और टोकियों से कांहिरा तक. मार्क्सवाद और पूंजीवाद दोनों एशिया के उन हिस्सों का जो गरीबी के दलदल में फंसे हैं उन्हें उभारने का इलाज नहीं कर सकते. आज भी दुनिया इसी तरीके से बंटी है. पंचमढ़ी के बाद ही भारत के समाजवादियों का एक अपना ठोस आधार बना जो इस समय रूस में कम्यूनिज्म के फेल होने के बाद सम्पूर्ण दुनिया में सम्पन्नता और समता के विश्व दर्शन को ठोस आंधार देता है.

डॉ. लोहिया ने कहा था कि मेरी बात सुनी जाएगी शायद मेरे मरने के बाद,

रामबाबू अग्रवाल, मध्य प्रदेश के वरिष्ठ समाजवादी नेता तथा समाजवादी समागम के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं

Previous article40 ਸਾਲਾਂ ਬਾਅਦ ਪੰਜਾਬ ਵਿੱਚ ਹੋਵੇਗੀ ਰਾਸ਼ਟਰੀ ਬੈਡਮਿੰਟਨ ਚੈਂਪੀਅਨਸ਼ਿਪ
Next articleਭਾਰਤ ਰਤਨ ਬਾਬਾ ਸਾਹਿਬ ਡਾ. ਭੀਮ ਰਾਓ ਅੰਬੇਡਕਰ ਦਾ ਜਨਮ ਉਤਸਵ ਮੁੱਖ ਸਮਾਗਮ 14 ਅਪ੍ਰੈਲ ਨੂੰ ਅੰਬੇਡਕਰ ਭਵਨ ‘ਚ