ईरान के होर्मुज जलडमरूमध्य के खतरे ने ग्लोबल मार्केट को क्यों हिला दिया?
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सुरजीत सिंह फ्लोरा
सुरजीत सिंह फ्लोरा
(समाज वीकली) डोनाल्ड ट्रंप ने अगर यह माना कि लगातार बमबारी और ईरान के सर्वोच्च नेता की हत्या के बाद तेहरान झुक जाएगा, तो यह आकलन बहुत जल्द कमजोर पड़ता दिखा। 28 फरवरी 2026 को इजरायली हमले में अली खामेनेई की मौत की खबर ने पहले ही पश्चिम एशिया को हिला दिया था। लेकिन असली झटका तब लगा, जब मोजतबा खामेनेई को नया सर्वोच्च नेता माना जाने लगा और ईरान की सत्ता संरचना टूटने के बजाय सख्त होती दिखाई दी। यहीं से बाजारों की घबराहट बढ़ी। कारण साफ था, अगर ईरान होर्मुज जलसंधि को दबाव के हथियार की तरह इस्तेमाल करता है, तो असर केवल खाड़ी तक सीमित नहीं रहेगा। तेल, गैस, बीमा, शिपिंग, महंगाई, चुनावी राजनीति, सब पर उसका प्रभाव पड़ेगा। हालांकि कई दावों की स्वतंत्र पुष्टि सीमित है, फिर भी मार्च 2026 की तस्वीर यह दिखाती है कि सत्ता परिवर्तन ने ईरान को कमजोर नहीं, बल्कि अधिक आक्रामक बना दिया है। इसलिए यह संकट अब केवल सैन्य नहीं, वैश्विक आर्थिक जोखिम का सवाल बन चुका है।
मोजतबा खामेनेई का सत्ता में आगमन और उनकी पहली चेतावनी
उपलब्ध पुष्ट रिपोर्टों के अनुसार, अली खामेनेई की मृत्यु 28 फरवरी 2026 को एक इजरायली हमले में हुई। उसी हमले में परिवार के अन्य सदस्य भी मारे गए, जबकि मोजतबा घायल हुए। बाद की रिपोर्टों में कहा गया कि उनके पैर, हाथ और चेहरे पर चोटें आईं, और वे सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आए। फिर भी, मार्च के मध्य तक उन्हें नया सर्वोच्च नेता माना जाने लगा। उनके नाम से 16 मार्च को राज्य टीवी पर संदेश भी पढ़ा गया, हालांकि उसका वीडियो या ऑडियो सामने नहीं आया।
यही बिंदु अहम है। ईरान की सत्ता अक्सर व्यक्ति से अधिक संस्थानों पर टिकी रहती है। आईआरजीसी, धार्मिक ढांचा और सुरक्षा तंत्र, इन सबने संकेत दिया कि शासन मशीनरी काम कर रही है। इसलिए वॉशिंगटन की वह उम्मीद कमजोर पड़ी कि शीर्ष नेतृत्व हटते ही व्यवस्था बिखर जाएगी।
इसी बीच, मोजतबा के नाम से प्रसारित कठोर संदेशों और क्षेत्रीय चेतावनियों की चर्चा तेज हुई। कई दावों में कहा गया कि खून का बदला खून से लेने, खाड़ी देशों को अमेरिकी अड्डों पर पुनर्विचार करने, और होर्मुज को दबाव के औजार की तरह देखने की बात सामने आई। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि पूरी तरह नहीं हुई, लेकिन बाज़ार ने उन्हें हल्के में नहीं लिया। कारण यह था कि ईरान लंबे समय से असममित जवाब देने की क्षमता रखता है।
साथ ही, तेहरान के समर्थक नेटवर्क, जैसे हूती और हिजबुल्लाह, पर भी नजर गई। अगर ईरान सीधे मोर्चे के बजाय समुद्री रास्तों, मिसाइल दबाव और प्रॉक्सी नेटवर्क का सहारा लेता है, तो पड़ोसी देशों पर दबाव कई गुना बढ़ सकता है।
होर्मुज केवल जलमार्ग नहीं, ऊर्जा बाजार की धड़कन है।
होर्मुज जलसंधि का महत्व और बंद होने का खतरा
होर्मुज जलसंधि से दुनिया के समुद्री तेल व्यापार का लगभग 20 प्रतिशत गुजरता है। खाड़ी से एशिया जाने वाले निर्यात का बहुत बड़ा हिस्सा, खासकर चीन, भारत, जापान और दक्षिण कोरिया के लिए, इसी रास्ते पर निर्भर है। इसलिए यहां तनाव का मतलब केवल मानचित्र पर एक बिंदु नहीं, बल्कि पूरी आपूर्ति शृंखला पर चोट है।
अगर यह मार्ग बाधित होता है, तो पहला असर टैंकर यातायात पर पड़ता है। बीमा महंगा होता है, नौसैनिक सुरक्षा की मांग बढ़ती है, और हर जहाज की लागत ऊपर जाती है। इसका सीधा असर तेल कीमत पर दिखता है। बाजार में यह डर तेजी से फैलता है कि कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर जा सकता है।
ट्रंप ने युद्ध समाप्ति और कठोर जवाब, दोनों तरह के संकेत दिए हैं। लेकिन समुद्री मार्ग खुलवाना केवल धमकी से आसान नहीं होता। रणनीतिक भंडार कुछ राहत दे सकते हैं, फिर भी वे बंद जलमार्ग की जगह नहीं ले सकते। सरल उदाहरण यही है, अगर सड़क बंद हो जाए तो गोदाम का माल कुछ दिन चल सकता है, पर नई सप्लाई नहीं आती।
वैश्विक बाजारों पर तत्काल प्रभाव
तेल महंगा होते ही महंगाई बढ़ती है। फिर केंद्रीय बैंक ब्याज दरें ऊंची रखने को मजबूर हो सकते हैं। इससे विकास धीमा पड़ता है, बजट दबाव बढ़ता है, और आयातक देशों की मुद्रा पर बोझ आता है।
अमेरिका में इसका असर और तेज दिख सकता है, क्योंकि 2026 में मध्यावधि चुनाव का माहौल भी बन रहा है। पेट्रोल की कीमतें बढ़ीं, तो घरेलू नाराजगी बढ़ेगी। ऐसी स्थिति में ट्रंप की पार्टी पर राजनीतिक दबाव बढ़ सकता है। यूरोप में भी सरकारों पर ऊर्जा और सुरक्षा, दोनों मोर्चों पर जवाबदेही बढ़ेगी।
ट्रंप के सहयोगी क्यों पीछे हट रहे हैं
युद्ध जितना लंबा खिंचता है, उतना ही साफ होता है कि अमेरिका के साझेदार पूर्ण सैन्य भागीदारी से बचना चाहते हैं। उपलब्ध बयानों के अनुसार, जर्मनी के रक्षा मंत्री बोरिस पिस्टोरियस ने साफ कहा कि यह यूरोप का युद्ध नहीं है। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ने भी संकेत दिया कि उनका देश किसी बड़े युद्ध में नहीं फंसेगा, हालांकि उन्होंने यह माना कि तेल बाजार को स्थिर रखने के लिए होर्मुज का खुलना जरूरी है। इटली ने संवाद पर जोर दिया और यह भी कहा कि मौजूदा यूरोपीय नौसैनिक मिशन समुद्री डकैती-रोधी और रक्षा तक सीमित हैं, उन्हें युद्ध अभियान में नहीं बदला जाना चाहिए।
ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस और जापान के बारे में भी यही रुख सामने आया कि वे अपने युद्धपोत नहीं भेजेंगे। नाटो देशों और यूरोपीय संघ के भीतर भी यह भावना दिखी कि अमेरिका और इजरायल के युद्ध लक्ष्यों की स्पष्टता के बिना आगे बढ़ना जोखिम भरा है। यही कारण है कि ट्रंप की वह दलील, जिसमें लाभ उठाने वाले देशों से समुद्री सुरक्षा में भागीदारी मांगी गई, अपेक्षित समर्थन नहीं जुटा सकी।
हालांकि यह दबाव कूटनीतिक मंचों पर जारी है, यूरोपीय देशों की प्राथमिकता युद्धविराम और तनाव घटाना लगती है। साथ ही, अमेरिकी खुफिया आकलनों के बारे में आई रिपोर्टें भी ट्रंप की रणनीति के खिलाफ जाती दिखती हैं। उनमें कहा गया कि मौजूदा हालात में ईरानी शासन गिरने वाला नहीं है, क्योंकि सत्ता तंत्र अब भी नियंत्रण में है।
जमीन पर युद्ध का जोखिम भी इसी वजह से बड़ा माना जा रहा है। ईरानी अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि अगर अमेरिकी सेना ईरानी धरती पर उतरी, तो परिणाम वियतनाम जैसे हो सकते हैं। इस बीच, अमेरिका ने करीब 200 घायल और 13 मृत सैनिकों की बात स्वीकार की है। इसलिए वॉशिंगटन के लिए यह केवल सैन्य नहीं, घरेलू राजनीतिक संकट भी बनता जा रहा है।
इजरायल के हमले और अमेरिकी दावे
युद्ध क्षेत्र से आई रिपोर्टों के अनुसार, इजरायल ने तेहरान, शिराज और तबरीज सहित कई शहरों पर बड़े हमले किए हैं। इजरायली सैन्य दावों में कहा गया कि ईरान के भीतर अब भी हजारों संभावित लक्ष्य मौजूद हैं। दूसरी ओर, ट्रंप ने यह कहा कि ईरान में निशाना बनाने लायक बहुत कम बचा है।
इन दोनों दावों के बीच बड़ा अंतर है। अगर हजारों लक्ष्य अब भी बाकी हैं, तो युद्ध लंबा चल सकता है। अगर सैन्य क्षमता लगभग खत्म हो चुकी है, तो फिर होर्मुज और प्रॉक्सी नेटवर्क का खतरा और बढ़ जाता है। यही विरोधाभास बाजार की बेचैनी का मूल कारण है।
अभी तस्वीर यही कहती है कि ट्रंप ने ईरान की राजनीतिक सहनशक्ति और क्षेत्रीय जवाब देने की क्षमता को कम आंका। अली खामेनेई की मौत के बाद सत्ता ढही नहीं, बल्कि नए रूप में संगठित दिखी। इसलिए संकट का केंद्र अब केवल तेहरान नहीं, होर्मुज जलसंधि बन चुका है। यह मार्ग खुला रहना दुनिया की अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी है।
अब विकल्प दो ही दिखते हैं, कूटनीति या फिर लंबी चढ़ाई वाला युद्ध। पहला रास्ता मुश्किल है, पर सस्ता है। दूसरा रास्ता तेज दिखता है, पर उसका बिल पूरी दुनिया भरती है। 2026 के अमेरिकी चुनावी दबाव, यूरोपीय हिचक और तेल बाजार की बेचैनी, तीनों मिलकर यही बता रहे हैं कि आगे की लड़ाई केवल मोर्चे पर नहीं, राजनीति और अर्थव्यवस्था में भी लड़ी जाएगी।