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मनुस्मृति दहन दिवस : 25 दिसंबर 1927

समाज वीकली यू के

मनुस्मृति दहन दिवस : 25 दिसंबर 1927 को बाबा साहब डॉ आंबेडकर ने मनुस्मृति का सार्वजनिक दहन किया था। डॉ आंबेडकर ने मनुस्मृति को असमानता, गुलामी और अमानवीयता का प्रतीक माना था। जाति-भेद व सामाजिक भेदभाव का विरोध करने के लिए 1927 में महाड़ में इसे सार्वजनिक रूप से जलाया था। क्योंकि उनके अनुसार यह ग्रंथ दलितों-शूद्रों और महिलाओं के शोषण को वैध ठहराता है और समाज में ऊंच-नीच को बढ़ावा देता है, जिसे वे समाप्त कर समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व पर आधारित समाज बनाना चाहते थे।

डॉ आंबेडकर के मनुस्मृति पर मुख्य विचार:

• जाति व्यवस्था का आधार: उनका मानना था कि मनुस्मृति जाति व्यवस्था की जड़ है और इसी के कारण समाज में ऊंच-नीच और भेदभाव होता है, जिसे समाप्त करना ज़रूरी है।

• मानवाधिकारों का हनन: बाबा साहब के लिए, मनुस्मृति लोकतंत्र, समानता और मानवीय गरिमा के खिलाफ थी, खासकर महिलाओं और शूद्रों के अधिकारों का हनन करती थी।

• अमानवीय विधान: उन्होंने इसे एक ऐसा ग्रंथ बताया जो मनुष्य को मनुष्य नहीं मानता, बल्कि उसे विभिन्न वर्णों में बांटकर उसका शोषण करता है।

• मनुस्मृति दहन का उद्देश्य: इस दहन को वे विरोध दर्ज कराने का तरीका मानते थे। ठीक वैसे ही जैसे विदेशी कपड़ों या साइमन कमीशन का बहिष्कार किया गया था, ताकि ब्राह्मणवादी विचारधारा और उसके द्वारा थोपी गई असमानता को खत्म किया जा सके।

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