समाज वीकली यू के
डॉ. रामजीलाल,सामाजिक वैज्ञानिक,
पूर्व प्राचार्य दयाल सिंह कॉलेज करनाल (हरियाणा- भारत)
email id: drramjilal1947@ gmail.com
1 सितंबर 1939 को द्वितीय विश्व युद्ध प्रारंभ हो गया. इस युद्ध के समय सुभाष चंद्र बोस तथा अनेक क्रांतिकारियों की यह नीति थी कि ‘दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता’ है. उस समय तक सोवियत रूस (वर्तमान रूस) युद्ध में सम्मिलित नहीं था. इस युद्ध में एक ओर इंग्लैंड के नेतृत्व में ‘मित्र राष्ट्र’ थे और दूसरी ओर नाजीवादी हिटलर (जर्मनी) व फासीवादी मुसोलिनी (इटली) के नेतृत्व में “धुरी राष्ट्र” थे. सुभाष चंद्र बोस दो विपरीत विचारधाराओं वाले राष्ट्रों- साम्यवादी रूस और नाजीवादी जर्मनी व फासीवादी इटली से सहायता प्राप्त करके भारत से ब्रिटिश साम्राज्यवाद को समाप्त करके स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए ‘सुनहरी अवसर’ मानते थे. न केवल सुभाष चंद्र बोस, बल्कि क्रांतिकारी समाजवादी पार्टी (आरएसपी) भी इस ‘साम्राज्यवादी युद्ध को गृहयुद्ध’ में बदलने और भारत से साम्राज्यवाद के उन्मूलन के पक्ष में थी. इसी प्रकार, फॉरवर्ड ब्लॉक और कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी (सीएसपी) तथा जयप्रकाश नारायण और राम मनोहर लोहिया सहित इसके वरिष्ठ नेताओं ने भी साम्राज्यवादी सरकार का विरोध किया. दूसरे शब्दों में, सभी क्रांतिकारी और समाजवादी अहिंसक और हिंसक सशस्त्र आंदोलनों के संयोजन के माध्यम से भारत को गुलामी से मुक्त कराना चाहते थे.
मुख्य बिंदु:
द्वितीय विश्व युद्ध और सुभाष चंद्र बोस— विदेश यात्रा-रूस, जर्मनी, जापान और सिंगापुर
सुभाष चंद्र बोस :आजाद हिंद फौज के कमांडर इन चीफ: 4 जुलाई 1943
अंतरिम सरकार की स्थापना:21 अक्टूबर 1943
दिल्ली चलो’ का उद्घोष:5 जुलाई 1943
कोहिमा और इम्फ़ाल पर कब्जा करने में सफलता:21मार्च सन 1944
आजाद हिन्द फौज : प्रयाण गीत , ध्वज व तमगे
राष्ट्रपिता संबोधित करते हुए महात्मा गांधी से मांगा आशीर्वाद : 6 जुलाई 1944
सुभाष चंद्र बोस की वीरगति : 18 अगस्त 1945
रेड फोर्ट ट्रायल’ : नवंबर 1945
सामूहिक जन प्रदर्शनों का प्रभाव :जनता, भारतीय नागरिक सेवा, भारतीय सेना – इंडियन नेवी, एयरफोर्स, आर्मी , (पूर्वी कमान कोलकाता) और पुलिस में बगावत
विस्तार
द्वितीय विश्व युद्ध और सुभाष चंद्र बोस— विदेश यात्रा-रूस, जर्मनी, जापान और सिंगापुर
इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए सुभाष चंद्र बोस जनवरी 1941 में पेशावर से होते हुए काबुल, मास्को जाने में सफल हुए. 2 अप्रैल 1941 को हवाई जहाज के द्वारा मास्को से जर्मनी गए तथा हिटलर से मुलाकात की. जर्मनी में उन्होंने फ्री इंडिया लीजन और आज़ाद हिंद रेडियो की स्थापना की. जनवरी 1943 में, जापान ने सुभाष चंद्र बोस को पूर्वी एशिया में रहने वाले प्रवासी भारतीयों को संगठित करके भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का नेतृत्व करने के लिए आमंत्रित किया. तीन महीने की जोखिम भरी पनडुब्बी यात्रा के बाद जर्मनी से 13 जून 1943 को जापान जाने में सफलता प्राप्त की.
सुभाष चंद्र बोस :आजाद हिंद फौज के कमांडर इन चीफ व अंतरिम सरकार की स्थापना
12 फरवरी 1942 को जापान की सहायता से मनमोहन सिंह के द्वारा आजाद हिंद फौज (इंडियन नेशनल आर्मी—INA) की स्थापना की गई. रासबिहारी बोस ने 4 जुलाई 1943 को सुभाष को आजाद हिन्द फौज की कमान सौंप दी. आईएनए सैनिक की संख्या लगभग 43,000 थी .समुचित संचालन हेतु इसकी-गांधी ब्रिगेड, नेहरू ब्रिगेड, आज़ाद ब्रिगेड, सुभाष ब्रिगेड, झाँसी की रानी रेजिमेंट थी.आईएनए का आदर्श वाक्य- इत्तेफ़ाक, एत्माद और क़ुर्बानी( सद्भाव, विश्वास और बलिदान)था.इसका मार्च गीत- ‘क़दम क़दम बढ़ाएँ जा’ आज भी लोकप्रिय है. 5 जुलाई 1943 को सिंगापुर में सुभाष चंद्र बोस ने इंडियन नेशनल आर्मी को सम्बोधित करते हुए “दिल्ली चलो!” का नारा दिया.
कोहिमा और इम्फ़ाल पर कब्जा करने में सफलता: 21मार्च सन 1944
इंडियन नेशनल आर्मी और जापानी सेना मिलकर 21मार्च सन 1944 को कोहिमा और इम्फ़ाल पर कब्जा करने में सफलता प्राप्त की. सन्1907 में, आबिद हसन सफ़रानी द्वारा गढ़ा गया ‘जय हिन्द ‘का नारा आजाद हिंद फौज के नारे के रूप में अपनाया गया. जय हिन्द का नारा और आई.एन.ए. का प्रयाण गीत- कदम कदम बढाये जा- आसमान में गूंज उठे,जिससे सैनिकों में प्रेरणा उत्पन्न हुई. ‘दिल्ली चलो’ का उद्घोष आज भी भारत की जनता में धैर्य और जोश पैदा करता है.
अंतरिम सरकार की स्थापना: 21 अक्टूबर 1943
सुभाष चंद्र बोस ने 21 अक्टूबर 1943 को अंतरिम सरकार की स्थापना की जिसको विश्व के नौ देशों–जर्मनी, इटली,जापान, फिलीपीन्स, कोरिया, चीन, इटली, मान्चुको और आयरलैंड ने मान्यता प्रदान की. जापान ने अंडमान व निकोबार द्वीप अस्थायी सरकार को दे दिये. अंडमान व निकोबार द्वीपों पर 30 दिसम्बर 1943 को स्वतन्त्र भारत का ध्वज भी फहरा दिया गया. इसके उपरांत सुभाष चंद्र बोस ने सिंगापुर एवं रंगून मेंआजाद हिंद फौज का मुख्यालय स्थापित किया.
आजाद हिन्द फौज : प्रयाण गीत, ध्वज व तमगे
आज़ाद हिन्द फौज़ के ध्वज को सलूट करते हुए आजाद हिन्द फौज के प्रयाण- कदम कदम बढाये जा – सैनिकों को प्रेरणाऔर देशकी आजादीके लिए कुर्बानी करने के लिए प्रोत्साहित करता थाकदम कदम बढाये जा –गीत (क्विक मार्च) की रचना राम सिंह ठकुरि ने की थी. इस की धुन (ट्यून) भारतीय सेना के प्रयाण गीत के रूप में आज भी प्रयोग होती है. पूरा प्रयाण गीत अग्रलिखित है:
कदम कदम बढ़ाये जा
खुशी के गीत गाये जा
ये जिंदगी है क़ौम की
तू क़ौम पे लुटाये जा
खुशी के गीत गाये जा
ये जिंदगी है क़ौम की
तू क़ौम पे लुटाये जा
तू शेर-ए-हिन्द आगे बढ़
मरने से तू कभी न डर
उड़ा के दुश्मनों का सरl
जोश-ए-वतन बढ़ाये जा
हिम्मत तेरी बढ़ती रहे
खुदा तेरी सुनता रहे
जो सामने तेरे खड़े
तू खाक में मिलाये जा
चलो दिल्ली पुकार के
ग़म-ए-निशाँ संभाल के
लाल क़िले पे गाड़ के
लहराये जा लहराये जा
कदम कदम बढ़ाये जा
खुशी के गीत गाये जा
ये जिंदगी है क़ौम की
तू क़ौम पे लुटाये जा
आज़ाद हिन्द फौज के वरीयता के क्रम में शेरे-हिन्द, सरदारे-जंग, वीरे-हिन्द, शहीदे-भारत चार तमगे थे.
राष्ट्रपिता संबोधित करते हुए महात्मा गांधी से मांगा आशीर्वाद : 6 जुलाई 1944
6 जुलाई 1944 को रंगून रेडियो स्टेशन से महात्मा गांधी के नाम प्रसारण करते हुए सुभाष चंद्र बोस ने भारत की स्वाधीनता के आखिरी पावन युद्ध में अपनी स्थिति को स्पष्ट करते हुए महात्मा गांधी को ‘राष्ट्रपिता’ संबोधित करके शुभकामनाएं मांगी. सुभाष चंद्र बोस ने जनता से अपील करते हुए कहा ‘’मैं जानता हूँ कि ब्रिटिश सरकार भारत की स्वाधीनता की माँग कभी स्वीकार नहीं करेगी. मैं इस का कायल हो चुका हूँ कि यदि हमें आज़ादी चाहिये तो हमें खून के दरिया से गुजरने को तैयार रहना चाहिये. अगर मुझे उम्मीद होती कि आज़ादी पाने का एक और सुनहरा मौका अपनी जिन्दगी में हमें मिलेगा तो मैं शायद घर छोड़ता ही नहीं. मैंने जो कुछ किया है अपने देश के लिये किया है. विश्व में भारत की प्रतिष्ठा बढ़ाने और भारत की स्वाधीनता के लक्ष्य के निकट पहुँचने के लिये किया है. भारत की स्वाधीनता की आखिरी लड़ाई शुरू हो चुकी है. आज़ाद हिन्द फौज़ के सैनिक भारत की भूमि पर सफलतापूर्वक लड़ रहे हैं. हे राष्ट्रपिता! भारत की स्वाधीनता के इस पावन युद्ध में हम आपका आशीर्वाद और शुभ कामनायें चाहते हैं।
सुभाष चंद्र बोस की वीरगति : 18 अगस्त 1945
18 अगस्त 1945को टोक्यो जाते हुए वह हवाई जहाज में आग लगने के कारण वीरगति को प्राप्त हुए. हालांकि उनकी मृत्यु के सम्बन्ध में विवाद भी रहे हैं.
रेड फोर्ट ट्रायल’ : नवंबर 1945
आजाद हिंद फौज के 17000 सैनिकों को अलग-अलग स्थानों पर जेलों में डाला दिया गया. जेलों में बंदी सैनिकों को फांसी देने के लिए मुकदमें नवंबर 1945 में शुरू हुए. इनमें सबसे प्रसिद्ध अभियोग लाल किले में चलाया गया. इसको ‘रेड फोर्ट ट्रायल’ के नाम से भी जाना जाता है. इसमें कर्नल प्रेम सहगल (हिन्दू ), कर्नल गुरबख्श सिंह ढिल्लों (सिक्ख) व मेजर जनरल शाहनवाज खान (मुस्लिम) आरोपी थे.
रक्षा समिति का गठन
नवम्बर 1945 से मई 1946 तक दिल्ली के लाल किले में आयोजित कोर्ट मार्शल की एक श्रृंखला थी. सन्19 45 में कांग्रेस कार्य समिति ने आजाद हिंद फौज के सैनिकों का प्रतिनिधित्व करने के लिए रक्षा समिति का गठन किया. इस समिति का मुख्य कार्य कानूनी बचाव प्रदान करना, सूचना का समन्वय करना और आजाद हिंद फौज के सैनिकों के लिए राहत प्रयासों की व्यवस्था करना था. लाल किले के मुकदमो में आजाद हिंद फौज की पैरवी करने वाले वकीलों में जवाहरलाल नेहरू, भूलाभाई देसाई, तेज बहादुर सप्रू , आसफ अली, कैलाश नाथ काटजू व लेफ्टिनेंट कर्नल होरीलाल वर्मा शामिल थे.
लाल किले को तोड़ दो, आजाद हिन्द फौज को छोड़ दो
आज़ाद हिंद फ़ौज के सैनिकों को जेलों से छुड़वाने के लिए भारत की राजधानी दिल्ली से लेकर गांव की झोपड़ियों तक जन सभाएं आयोजित की गई. जनता का क्रोध चरम सीमा पर था. समस्त हिंदुस्तान में यह दो उद्घोष गूंज रहे थे –‘लाल किले को तोड़ दो, आजाद ” और ‘’लाल किले से आयी आवाज़, सहगल ढिल्लों, शाहनवाज ! … तीनों की उम्र हो दराज !!’’आजाद हिन्द फौज के 17 हजार जवानों के खिलाफ चलने वाले मुकदमों के विरोध में जनाक्रोश के सामूहिक प्रदर्शन हो रहे थे. इन प्रदर्शनों में पुलिसिया जुल्म से दिल्ली, मुम्बई, मदुराई और लाहौर में 326 से अधिक लोगों की जान चली गयी थी.
31 दिसंबर, 1945 को अदालत ने सहगल, ढिल्लों और शाहनवाज़ को ब्रिटिश राज के विरुद्ध युद्ध छेड़ने का दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई. अंततः 3 जनवरी, 1946 को इन तीनों वीरों को जेल से रिहा कर दिया गया. यह भारतीय जनमत की एक उल्लेखनीय विजय और ब्रिटिश साम्राज्यवादी सरकार की पराजय थी.
सामूहिक जन प्रदर्शनों का प्रभाव :जनता, भारतीय नागरिक सेवा, भारतीय सेना – इंडियन नेवी, एयरफोर्स, आर्मी, (पूर्वी कमान कोलकाता) और पुलिस में बगावत
भारत में ब्रिटिश साम्राज्यवाद का प्रभाव नगण्य हो गया. इन प्रदर्शनों के प्रभावों का वर्णन हमें राष्ट्रीय अभिलेखागार, नई दिल्ली में रखी हुई गृह मंत्रालय की फाइलों से भी प्राप्त होता है.दिल्ली के चीफ कमिश्नर ने भारत के सचिव को 14 नवंबर 1945 को लिखा ‘’मैं लोगों पर सेवाओं में वफादार तत्व विशेष रूप में पुलिस व फौज पर पड़ने वाले प्रभाव के बारे में चिंतित हूं. ’’ भारत सरकार के गृह विभाग के इंटेलिजेंस ब्यूरो ने दिसंबर 1945 में लिखा, ’हिंदुस्तान की जनता की भावनाएं आजाद हिंद फौज के व्यक्तियों के साथ शहरों से गांव तक है तथा सरकारी प्रचार का कोई प्रभाव नहीं है. आजाद हिंद फौज के प्रभाव के कारण भारतीय सेना में भी भारतीय सिपाही और भारतीय ऑफिसर जो अभी तक अंग्रेजों के साथ थे अपने आप को ‘राष्ट्र का गद्दार और नमक हराम’ समझने लगे हैं. वायसराय की कार्यकारी परिषद के तत्कालीन गृह सदस्य आर. एफ. मुडी ने कहा: “बंगाल पर आजाद हिंद फौज का प्रभाव काफी था… इसने सभी नस्लों, जातियों और समुदायों को प्रभावित किया. लोग भारत की पहली ‘राष्ट्रीय सेना’ को संगठित करने और खुद को इस तरह संचालित करने के लिए उनकी (बोस की) प्रशंसा करते थे… जापानियों को भारतीयों के साथ सहयोगी के रूप में व्यवहार करने के लिए मजबूर होना पड़ा. कई लोगों की नज़र में, वे गांधी के बराबर थे.”
आजाद हिंद फौज की जन प्रियता को देखते हुए महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल ने सन् 1946 के निर्वाचन में आजाद हिंद फौज के सैनिकों की कुर्बानी की प्रशंसा की. भारत छोड़ो आंदोलन (1942) के प्रभाव के कारण साम्राज्यवादी सरकार का नियंत्रण हिंदुस्तान की जनता पर लगभग खत्म हो चुका था और उस समय अधिकारियों का यह मानना था कि या तो ‘भारत छोड़ दिया जाए या कत्ल होने के लिए तैयार’ रहना चाहिए.
भारतीय नागरिक सेवा, भारतीय सेना – इंडियन नेवी, एयरफोर्स, आर्मी, (पूर्वी कमान कोलकाता) और पुलिस में बगावत
आजाद हिंद फौज के प्रभाव के कारण भारतीय नागरिक सेवा, भारतीय सेना – इंडियन नेवी, एयरफोर्स, आर्मी, (पूर्वी कमान कोलकाता) और पुलिस में बगावत हो गई. परिणाम स्वरूप इस प्रकार की रिपोर्ट जब गवर्नर ऑफ इंडिया के द्वारा इंग्लैंड की कैबिनेट को भेजी गई तो उनके सामने एक ही वैकल्पिक था और उन्होंने भारत को विभाजित राष्ट्र के रूप में छोड़कर जाना पड़ा. भारत को एक विभाजित राष्ट्र के रूप में 15 अगस्त 1947 को ब्रिटिश साम्राज्यवाद, भारतीय नरेशों व नवाबों के नियंत्रण एवं शोषण से मुक्ति प्राप्त हुई.



