साम्यवादी व समाजवादी विचारधाराओं पर आधारित मुख्य किसान आंदोलन: सन् 1930 से आज तक

डॉ. रामजीलाल, सेवानिवृत्त प्राचार्य ,दयाल सिंह कॉलेज, करनाल (हरियाणा)
मोब. 8168810760
e-mail :drramjilal1947@ gmail.com

(समाज वीकली)- अक्टूबर 1917 में लेनिन के नेतृत्व में रूस के जार के विरुद्ध बोलशेविक क्रांति हुई. यह क्रांति कार्ल मार्क्स द्वारा प्रतिपादित विचारधारा के आधार पर हुई. वास्तव में यह मार्क्सवादी विचारधारा के आधार एक देश में क्रांति का प्रथम प्रयोग था . भारत के राष्ट्रीय नेता बिपिन चंद्र पाल, लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक इत्यादि इस क्रांति के प्रशंसक थे. इस विचारधारा का प्रभाव भारतवर्ष के आजादी के संघर्ष के नेताओं,कार्यकर्ताओं, किसानों, मजदूरों और प्रगतिशील लेखकों पर पड़ने लगा. रूसी क्रांति के चार वर्ष के अंतराल में ही भारत में साम्यवादी विचारधारा का प्रभाव किसानों, मजदूरों और युवाओं पर निरंतर बढ़ता चला गया .

सन्  1921 से सन् 1924 तक साम्यवादी विचारधारा के प्रभाव को नियंत्रित करने के लिए ब्रिटिश साम्राज्यवादी सरकार ने कम्युनिस्ट नेताओं के विरूद्ध अभियोग– पेशावर षड्यंत्र केस (सन्  1922 -1923) तथा कानपुर बोल्शेविक  षड्यंत्र केस( सन्  1924 )चलाए गए .कम्युनिस्टों के बदनाम करने के लिए  साम्राज्यवादी सरकार ने झूठी अफवाहें समाचार पत्रों के माध्यम से फैलाई. सरकार के द्वारा यह प्रचार किया गया कि कम्युनिस्ट भारत में हिसक क्रांति  के द्वारा भारत से साम्राज्यवादी प्रभुसत्ता को समूल नष्ट करना चाहते हैं. इस पृष्ठभूमि में 26 दिसंबर 1925 को कानपुर में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का गठन किया गया. कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना की  कॉन्फ्रेंस में समस्त भारत से 500 प्रतिनिधियों ने भाग लिया.  मुजफ्फर अहमद(कोलकाता),एसवी घाटे,आर एस निंबकर व जेपी बागेरहट्टा,(बाम्बे),अब्दुलमजीद(लाहौर), सीके अय़ंगर व सिंगारावेल्यु चेट्टीयार(मद्रास)मुख्य थे. कम्युनिष्ट पार्टी के स्थापना सम्मेलन में एस.ए. डांगे और शौकत उस्मानी जेल में होने के कारण भाग नहीं ले सके . कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन, श्रमिक संगठनों, अखिल भारतीय किसान सभा तथा अन्य ट्रेड यूनियनों के लिए एक ऐतिहासिक मील का पत्थर थी.

साम्यवादी विचारधारा का प्रभाव भारतीय युवाओं पर बहुत अधिक पड़ा. भारतीय क्रांतिकारियों ने संगठनों का गठऩ किया. इन युवाओं में शहीद-ए-आजम भगत सिंह का  नाम ‘ध्रुव तारे’ की तरह चमकता है .वह आज भी भारतीय युवाओं के आईकॉन हैं .

सन् 1934 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी पर ब्रिटिश सरकार के द्वारा प्रतिबंध लगा दिया गया . परंतु यह प्रतिबंध क्रांतिकारियों तथा राष्ट्रीय आंदोलनकारियों के विचारों पर नहीं लग सकता था. परिणाम स्वरूप साम्यवादी विचारधारा का प्रभाव निरंतर बढ़ता चला गया. साम्यवादियों तथा समाजवादियों का द्वारा यह अनुभव किया गया कि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को मजबूत करने के लिए तथा भारतीय रजवाड़ो, शोषण कर्ता साहूकारों व ब्रिटिश शासन के विरुद्ध सफलता प्राप्त करने के लिए और समाज में मूल चूल परिवर्तन के लिए  किसानों का संगठित होना बहुत अनिवार्य है.

सन, 1934 में जयप्रकाश नारायण, राम मनोहर लोहिया तथा आचार्य नरेंद्र देव इत्यादि समाजवादियों ने कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना की . कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी में यदि एक ओर मार्क्सवाद और लेनिन वाद से प्रभावित सशस्त्र संघर्ष के पैरोकार युसूफ मेहर अली, जयप्रकाश नारायण तथा बसावन सिंह सिन्हा थेतो दूसरी ओर आचार्य नरेंद्र  देव जैसे अहिंसक आंदोलन के पक्षधर थे .कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी  का उद्देश्य सहकारी समितियों, योजनाओं ,यूनियनों ,स्वतंत्र किसान यूनियनों तथा स्थानीय अधिकारियों के पास  पर्याप्त आर्थिक शक्ति के आधार पर सामाजिक और आर्थिक ढांचे का पुनर्गठन करना  था. संक्षेप में इसका मुख्य उद्देश्य विकेंद्रीकृत समाजवाद की स्थापना करना था.

सन् 1936 में अखिल भारतीय किसान सभा की स्थापना की गई. अखिल भारतीय किसान सभा के  प्रथम सत्र में ईएमएस नंबूदरीपाद, दिनकर मेहता, कमल सरकार, सोहन सिंह जोश, लाल बहादुर शास्त्री, केडी मालवीय, मोहन लाल गौतम, बी संपूर्णानंद, जयप्रकाश नारायण, स्वामी सहजानंद, नबाकृष्ण चौधरी, हरेकृष्ण महताब, एनजी रंगा, इंदुलाल याज्ञनिक, आरके खादिलकर, बिष्णुराम मेधी ,शरत सिन्हा इत्यादि ने भाग लिया . अखिल भारतीय किसान सभा  का स्वरूप क्षेत्रीय ना होकर राष्ट्रीय स्वरूप है .जिसके द्वारा  क्रमबद्ध तरीके से किसानों की मांगों को उठाया गया. आज इसकी शाखाएं समस्त भारत में विद्यमान हैं.

किसान आंदोलनों के इतिहास में साम्यवादी चिंतनआधार पर अनेक आंदोलन चलाए गए .इन आंदोलनों का प्रारंभ अखिल भारतीय किसान सभा की स्थापना के  बाद हुआ. पंजाब में मुजारा लहर (सन्1930 से  सन् 1951 तक), पश्चिमी बंगाल में तेभागा आंदोलन (सन् 1946) , जम्मू- कश्मीर (सन् 1950), केरल (सन् 1957),  तेलंगाना किसान आंदोलन (सन्1946- सन्1951), आदिवासी किसानों व श्रमिकों का सशस्त्र नक्सलवादी आंदोलन मई1967 से  आज तक) आंदोलन महत्वपूर्ण आंदोलन है:इन आंदोलनों के परिणाम स्वरूप भारतवर्ष में कृषि सुधारों पर बल दिया जाने लगा.कृषि सुधारों के क्षेत्र में बंगाल ,केरल और जम्मू कश्मीर की सरकारों ने जो काम किया वह अतुलनीय है.

1.पंजाब में मुजारा लहर (सन्1930 से  सन् 1951 तक): काश्तकारी और कृषि भूमि अधिनियम

किसान आंदोलनों के इतिहास में मुजारा लहर का विशेष महत्व है.  वास्तव में यह पंजाब के पेप्सू क्षेत्र (8 रियासतों, पटियाला और पूर्वी पंजाब) के 784 गावों में  किराएदार  अथवा बटाईदार  किसानों का बिश्वेदारी(जमींदारी)व्यवस्था के द्वारा किए जाने वाले शोषण व दमनकारी नीतियों के विरूद्ध विद्रोह व लम्बे संघर्ष की कहानी है. इस आंदोलन का मूल कारण यह है कि सरकारी अधिकारियों ,महाराजा पटियाला और उसके रिश्तेदारों के द्वारा किसानों की जमीनों पर अवैध कब्जे कर लिए थे. गावों की जमीन के दो मालिक–वास्तविक मालिक और कब्जा धारी मालिक हो गये. गावों के कब्जाधारियों ने जमीनों के मूल मालिकों को किराएदार अथवा बटाईदार बना दिया और स्वयं बिश्वेदार अथवा जमींदार हो गए. बिश्वेदार अथवा जमींदार किराएदारों  अथवा बटाईदारों की फसल का अधिकांश भाग ले जाते थे .इस शोषण पर आधारित  व्यवस्था के विरुद्ध  दो गावों-रोजो माजरा व भदौडा के किराएदार अथवा बिटाईदार किसानों ने  बिटाई देने से इन्कार कर दिया. इन दोनों गांवों में पुलिस के द्वारा फसलों पर जबरदस्ती कब्जा कर लिया और कुछ किसान नेताओं को जेल में डाल दिया.

किसानों की आर्थिक हालत  खराब होती चली गई और उनमें  असंतोष  व रोष की ज्वाला धीरे-धीरे सुलगने लगी.  अपने आप को संगठित और लामबंद करने के लिए किसानों ने सन् 1938 में मुजारा समिति का गठन किया. इस मुजारा समिति के नेतृत्व में सन् 1939 में जन आंदोलन खड़ा करके संघर्ष का बिगुल बजा दिया और जबरदस्ती भुगतान करने का विरोध किया .परिणामस्वरूप पुलिस तथा जमींदारों के गठबंधन का किसानों के विरूद्ध अत्याचार व शोषण का दमन चक्र तेज हो गया.

सन् 1945 में मजारों के द्वारा पुलिस तथा जमीदारों के गठबंधन के द्वारा किए गए अत्याचारों, दमन और शोषण के विरुद्ध एक सम्मेलन का आयोजन किया गया.पुलिस की फायरिंग में खडौली खुर्द गांव में दो किसानों की मृत्यु हो गई. धर्मगढ़ व बख्शीवाला में जमींदारों की संपत्तियों पर किराएदारों  अथवा बटाईदारों ने कब्जा कर लिया.

सन् 1945- सन्1948 के अंतराल में पुलिस तथा जमींदारों के गठबंधन ने मुजारा आंदोलन को कुचलने के लिए अनेक हथकंडे अपनाए. परंतु इसके बाद भी सफलता प्राप्त नहीं हुई. परिणामस्वरूप मुजारा आंदोलन को कुचलने के लिए जमीदारों के हथियारबंद गुंडों ,पुलिस , महाराजा पटियाला के द्वारा सेना का प्रयोग किया .महाराजा पटियाला ने मार्शल ला लागू करके सेना को मुजारों पर बमबारी का  हुक्म जारी कर दिया.

किशनगढ़ मुजारा आन्दोलन का सबसे बड़ा केंद्र था. महाराजा पटियाला राज की सेना ने किशनगढ़ को चारों ओर से घेर कर तोपों से हमला किया . पांच हजार किसानों के साथ उनके सशस्त्र जत्थे महाराजा की सेना का मुकाबला करने के लिए लड़ाई में आमने-सामने डटे रहे. यहां 19 मार्च 1949 को इस लड़ाई में इस गांव के किसान योद्धा कुंडा सिंह और राम सिंह बागी सहित चार किसान शहीद हुए थे . सैकड़ों किसानों को जेल में डाल कर प्रताड़ित किया गया. इस आंदोलन का मजबूत करने के लिए रेड पार्टी के द्वारा अभूतपूर्व संघर्ष किया गया और किशनगढ़ इस आंदोलन का केंद्र बन गया.किसानों की मृत्यु के प्रतिक्रिया के रूप में किसानों तथा पुलिस मुजारों संघर्ष होते रहे और आंदोलन दमनकारी नीतियों के बावजूद भी बढ़ता चला गया.

बटाईदारों  व मुजारों की समस्याओं का समाधान करने के लिए  कांग्रेस सरकार के द्वारा एक कमेटी का गठन(वर्ष1951) किया गया. पेप्सू काश्तकारी और कृषि भूमि अधिनियम, (अस्थायी) 1952 ( PEPSU Tenancy (Temporary Provision) Act1952) बटाईदारों (मुजारों) को एकमुश्त मुआवजा देकर मालिक बनने के लिए अधिकार प्रदान किया गया. इस अधिनियम के आधार पर बटाईदारों (मुजारों) को बेदखली के खिलाफ अस्थायी तौर पर संरक्षण प्रदान किया गया

पेप्सू काश्तकारी और कृषि भूमि अधिनियम, 1955 तथा पेप्सू काश्तकारी और कृषि भूमि अधिनियम, 1958 के आधार पर जमींदारी व्यवस्था सदैव के लिए समाप्त हो गई .किसानों (मुजारों)को एक लम्बे संघर्ष और कुर्बानियों के पश्चात अपनी भूमि का स्थायी अधिकार प्राप्त हुआ.जमीदारी व्यवस्था के विरुद्ध बटाईदारों  (किरायेदारों व मुजारों ) की यह विजय किसान इतिहास  का गौरवमयी, प्रासंगिक व प्रेरणादायी स्वर्णिम पृष्ठ है.

2.पश्चिमी बंगाल में तेभागा आंदोलन 1946 तथा  भूमि सुधार

दक्षिण पश्चिम भारत में तेलंगाना आंदोलन का नेतृत्व कम्युनिस्ट पार्टी के नेता पी. सुुन्दरैया द्वारा किया गया था. इस आंदोलन में 10,00,000 एकड़ भूमि भूमिहीनों किसानों, जोतेदारों व कृषि श्रमिकों में वितरित कर दी गई थी. तेलंगाना आंदोलन से समस्त भारत के  कम्युनिस्टों को कम्युनिस्ट विचारधारा के आधार पर आंदोलन चलाने का गहरा अनुभव प्राप्त हो चुका था.

बंगाल में वाम मोर्चा किसानों, आदिवासियों और भूमिहीन जोतेदारों की समस्याओं के संबंध में भली-भांति  परिचित था. पश्चिमी बंगाल में तेभागा आंदोलन सन्1946 तथा उग्र नक्सलवादी आंदोलनसन्1967 के द्वारा किसानों, आदिवासियों और भूमिहीन जोतेदारों का जमीदारों, सूदखोरों व पूजींपतियों के द्वारा किये जाने वाले शोषण को राजनीतिक बहस का केंद्र बिंदू बना दिया.

जमीदारों तथा  बटाईदारों की समस्या का समाधान करने के लिए फ्लाइड कमीशन ने लगान की दर एक तिहाई करने की संस्तुति की थी ताकि उपज का दो तिहाई हिस्सा बटाईदारों मिल को सके.परन्तु आयोग की सिफारिशों को अमली जामा नहीं पहनाया गया.

अगस्त 1946 में नोआखाली में भंयकर साम्प्रदायिक दंगों के पश्चात बंगाल में सितंबर 1946 में किसान सभा के नेतृत्व में उपज का दो तिहाई हिस्सा बटाईदारों को दिलवाने के लिए तेभागा आंदोलन चलाया गया.वाममोर्चा के घटकों के द्वारा अपने -अपने क्षेत्रों में हिंदू तथा मुस्लिम बटईदारों , भूमि हीन किसानों , खेतिहर मजदूरों व आदिवासी किसानों को लामबंद किया.  अत: यह आंदोलन जमीदारों के विरुद्ध बटाईदारों का संघर्ष था. पश्चिमी बंगाल के 28 जिलों में से 15  जिलों  में यह एक अभूतपूर्व जन आंदोलन  के रूप में फैल गया. अगस्त 1946 में नोआखाली में भंयकर साम्प्रदायिक दंगों के बावजूद भी इस आंदोलन में 50 लाख हिंदू तथा मुस्लिम बटईदारों , भूमिहीन किसानों व खेतिहर मजदूरों ने भाग लिया था. इस दृष्टि से हिंदू- मुस्लिम एकता का उत्कृष्ट उदाहरण है.

आपातकालीन स्थिति के पश्चात सन् 1977के चुनाव में पश्चिम बंगाल के चुनाव में वाम मोर्चा सत्ता में आया. सन 1965 तक किए गए भूमि सुधारों की कमियों को दूर किया गया. परिणाम स्वरूप पश्चिमी बंगाल की  वाममोर्चा सरकार ने  अनेक कदम उठाए. इनके द्वारा किसानों व आदिवासी किसानों के जीवन में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिवर्तन हुआ .

3.जम्मू- कश्मीर में भूमि सुधार

शेख मोहम्मद अब्दुल्ला( 5 दिसंबर 1905–सितंबर 1982) भारत के ऐसे राजनेता थे जिनकी जम्मू -कश्मीर की राजनीति में केंद्रीय भूमिका रही है. वह जम्मू- कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस के संस्थापक थे. नेशनल कांफ्रेंस ने सन् 1944 के सोपोर अधिवेशन में “भूमि सुधार घोषणा पत्र” को अपने राजनीतिक कार्यक्रम का हिस्सा बनाया. नेशनल कांफ्रेंस यह घोषणा पत्र लाहौर स्थित कम्युनिस्ट बुद्धिजीवियों  के द्वारा तैयार किया गया था.कम्युनिस्ट बुद्धिजीवियों  का लक्ष्य “नया कश्मीर” बनाने का था. घोषणा पत्र के भूमि सुधार ,समान काम के लिए समान वेतन,विश्राम का अधिकार इत्यादि मुख्य केंद्र बिंदु थे. आम जनता के लिए भूमि सुधारों का तात्पर्य  “जोतने वालों को जमीन”  (लैंड़ टू टिलर्स) का उद्घोष था.

26 अक्टूबर 1947 को जम्मू -कश्मीर का भारत में विलय हो गया . विलय के पश्चात शेख मोहम्मद अब्दुल्ला जम्मू- कश्मीर के मार्च 1948 में प्रथम निर्वाचित प्रधानमंत्री बने. परंतु उसी वर्ष भारत-पाक युद्ध(1948) हो गया.

शेख मोहम्मद अब्दुल्ला भूमि सुधारों को लागू करने के लिए बहुत अधिक प्रतिबद्ध थे. यही कारण है कि सन 1949 में सोपोर घोषणा पत्र(1944) को लागू करने के लिए लागू करने के लिए बिग लैंडेड एस्टेट्स एबोलिशन एक्ट, 1950 तैयार किया गया .  इस अधिनियम के द्वारा भूमि के स्वामित्व की सीमा 186 कनाल (लगभग 22 एकड़) निर्धारित की गई. जमीदार की इस सीमा से अधिक भूमि को बटाईदारों व भूमि हीन कृषि मजदूरों में बांट दिया गया . जमीदारों को उनकी अतिरिक्त(सीमा से अधिक )भूमि का कोई मुआवजा नहीं मिला. इस अधिनियम को भारत के सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती थी. क्योंकि भारतीय संविधान के प्रावधान जम्मू- कश्मीर राज्य में लागू नहीं हुए थे.

सन 1975 में भूमि की सीमा को और भी कम कर दिया गया. इससे कश्मीर वैली में आम जनता की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक की स्थिति में मूल चूल परिवर्तन हुआ. भूमि सुधारों की दिशा में शेख मोहम्मद अब्दुल्ला  की भूमिका अतुल्य मानी जाती है .परिणामस्वरूप शेख मोहम्मद अब्दुल्ला कश्मीर वैली में  किसानों व कृषि मजदूरों के लोकप्रिय नेता और मसीहा बन गए .समस्त भारत में उनके द्वारा किए गए कृषि सुधार राष्ट्रीय बहस का केंद्र बिंदु  सिद्ध हुए .इन सुधारों के परिणाम स्वरूप डोगरा काल से चले आ रहे किसानों और मजदूरों के शोषण का अंत हुआ और कश्मीर वैली में 95% भूमिहीन मुस्लिम किसानों व कृषि श्रमिकों को  मुक्ति प्राप्त हुई.

4.सुदूर दक्षिण में केरल में भूमि सुधार

यदि उत्तर पश्चिमी भारत के राज्य जम्मू -कश्मीर में शेख मोहम्मद अब्दुल्ला के द्वारा भूमि सुधार किए गए तो दूसरी ओर सुदूर दक्षिण में केरल में सन् 1957 विश्व में प्रथम निर्वाचित कम्युनिस्ट सरकार का नेतृत्व एलमकुलम मनक्कल शंकरन नंबूदरीपाद ( (13 जून 1909 – 19 मार्च 1998 —ईएमएस नंबूदरीपाद ) विश्व के प्रसिद्ध कम्युनिस्ट चिंतक)कर रहे थे . ईएमएस नंबूदरीपाद की  सरकार बनते ही सन् 1957 में भूमि सुधार अध्यादेश जारी कर दिया. इसको बाद में विधानसभा में पारित करके कानून का रूप दिया गया .परंतु केंद्र में जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस नीत सरकार के द्वारा भारतीय संविधान की धारा 356 का दुरोपयोग करते हुए” शान्ति भंग “होने की सम्भावना का बहाने के आधार पर 31 जुलाई 1959 को नंबूदरीपाद की सरकार विधानसभा को बर्खास्त कर दिया और केरल में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया .

परंतु भूमि सुधारों का सिलसिला जारी रहा. केरल  विधानपालिका के द्वारा सन् 1960 सन् ,1963 सन्  1964 में भूमि सुधार अधिनियम पारित किए गए. सी. अच्युता मेनन (13 जनवरी 1913 – 16 अगस्त 1991) का प्रथम कार्यकाल1 नवंबर 1969 से 1 अगस्त 1970 तक और द्वितीय कार्यकाल 4 अक्टूबर 1970 से 25 मार्च 1977 तक था .1 नवंबर 1969 को संयुक्त मोर्चा का केरल में नेतृत्व किया. लगभग सात वर्षों तक सत्ता में रहा और बुनियादी महत्व के सुधार उपायों को लागू किया जैसे भूमि सुधार अधिनियम, मुआवजे के बिना निजी वनों का अधिग्रहण, कृषि श्रम पर कानून, औद्योगिक श्रमिकों की ग्रेच्युटी, एक लाख आवास योजना आदि महत्वपूर्ण कदम उठाए. सी. अच्युता मेनन सरकार की द्वारा पूर्व  कृषि सुधार  कानूनों की  कमियों को दूर करते हुए केरल भूमि सुधार (संशोधन) अधिनियम, 1969  क्रियान्वित किया गया. यह ऐतिहासिक अधिनियम भूमि सुधारों की दिशा में मील का पत्थर सिद्ध हुआ क्योंकि इसके द्वारा  शोषण पर आधारित सामंतवादी व्यवस्था को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया गया और भूमिहीनों में भूमि का वितरण करके उनका भूमि पर अधिकार सुनिश्चित किया गया. इस अधिनियम के तहत किरायेदारों को कम रेट पर भूमि दी गई .मजदूरों में भूमि का वितरण करके ग्रामीण क्षेत्र में असमानता कम हुई . केरल में भूमि सुधार सन् 2012 जारी रहे.

हरकिशन सिंह सुरजीत के अनुसार:

“केरल में, किसानों ने केंद्रीय हस्तक्षेप के खतरे के खिलाफ सरकारी भूमि पर अधिकारों के लिए कृषि कानून और ऋण राहत कानून के लिए एक राज्यव्यापी आंदोलन चलाया। अभियान के परिणामस्वरूप भूमि के पूर्व-अनधिकृत कब्जाधारियों को एक लाख पट्टे वितरित किए गए। सीमा को नीचे की ओर संशोधित किया गया और परिवार-आधारित बना दिया गया, कई छूट वापस ले ली गईं और झोपड़ियों में रहने वालों को उस भूमि पर अधिकार दिए गए जिस पर वे रहते थे। बेहतर मजदूरी और रहने की स्थिति के लिए दसियों हजार खेतिहर मजदूरों ने शक्तिशाली और सफल संघर्ष किया”.

संक्षेप में राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि केरल की वाम पंथी मोर्चा सरकारों की सबसे बड़ी उपलब्धि भूमि सुधार अधिनियमों को क्रियान्वित करना है.

5.तेलंगाना किसान आंदोलन (सन्1946- सन्1951): भूमि सुधार

19वीं तथा 20वीं शताब्दी के पूर्वार्ध के सभी आंदोलनों से तेलंगाना किसान आंदोलन बिल्कुल अलग है.  इसलिए इसका वर्णन करना जरूरी है. किसानों का यह आंदोलन स्थानीय सामंतों, निजाम हैदराबाद उस्मान अली खान् आसिफ जह सातवें (Vll), ज़मींदारों एवं साहूकारों के शोषणकारी नीतियों तथा भ्रष्ट अधिकारियों के अत्याचार के विरुद्ध प्रारम्भ किया गया. ‘कम क़ीमत पर गल्ला वसूली’ इस आन्दोलन का मुख्य कारण था

यह किसान आंदोलन सन् 1946 में तेलंगाना क्षेत्र (अब तेलंगाना राज्य)  के पोचमपल्ली से “आंध्र महासभा” के बैनर के नीचे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में लड़ा गया और इसका नेतृत्व कामरेड  पी.सुन्दरैया के द्वारा किया गया .

आंदोलन का मुख्य वैचारिक आधार साम्यवादी विचारधारा थी . सामंतों व निजाम हैदराबाद की शोषणकारी और दमनकारी नीतियों के विरुद्ध आंदोलन शांतिपूर्ण तरीके से प्रारंभ हुआ.सरकार की दमनकारी नीति व सशस्त्र बलों का प्रयोग के कारण यह सशस्त्र  किसान आंदोलन में परिवर्तित हो गया. इस आंदोलन का स्वरूप इतना महत्वपूर्ण था कि यह जंगल की आग की भांति 41000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को कवर करता हुआ 4000 सेअधिक गांवों में फैल गया और सामन्तों तथा निजाम हैदराबाद के प्रशासन की चुलें हिल गई. अन्य शब्दों में 4000 गांवों पर आंध्र महासभा एवं भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी नियंत्रण हो गया और 10,00,000 एकड़ कृषि भूमि किसानों में बांट दी गई.

ब्रिटिश सरकार के पद चिन्हों पर चलते हुए स्वतंत्र हिंदुस्तान की सरकार ने भी सन् 1946- सन्1951 तक तेलंगाना आंदोलन को कुचलने के लिए सशस्त्र सेना का प्रयोग किया . इस आंदोलन में लगभग 4000 किसान मारे गए तथा लगभग 25,000 किसानों को गिरफ्तार किया गया. सन् 1950 में लगभग 10,000 किसानों को हिरासत में रखा गया था. सन् 1951 में सरकार से समझौते के पश्चात भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने हिंसा के मार्ग का परित्याग कर दिया और तेलंगाना सशस्त्र किसान आंदोलन समाप्त हो गया.

तेलंगाना किसान आंदोलन (सन्1946- सन्1951) का स्वरूप

इस आंदोलन से पूर्व भी सन् 1772 से सन्1900 तक लगभग 110 हिंसक आंदोलन भारतीय किसान आंदोलन के इतिहास मे दर्ज हैं .परंतु इस आंदोलन का स्वरूप 18वीं, 19 वीं शताब्दियों तथा 20 वीं शताब्दी   के पुर्वाद्ध में होने वाले सभी आंदोलनों से बिल्कुल अलग है क्योंकि किसानों ने बिना किसी मध्यस्थ के अपनी लड़ाई स्वयं लड़ी.उन आंदोलनों में अधिकांश मांगे स्थानीय तौर पर आर्थिक होती थी तथा कुछ एक आंदोलनों को छोड़कर राजनीतिक शक्ति के अभाव में कभी भी ब्रिटिश  साम्राज्यवाद को चुनौती नहीं दी गई  . उन का आंदोलनों का मुख्य उद्देश्य यथास्थिति को चुनौती देना नहीं था अपितु राजनीतिक तथा कृषि  व्यवस्थाओं को बरकरार रखना था .इसके अतिरिक्त उनका आधार कोई राजनीतिक ,सामाजिक और आर्थिक विचारधारा नहीं थी.इसके बिल्कुल विपरीत तेलंगाना आंदोलन  मार्क्सवादी – साम्यवादी विचारधारा के आधार पर लड़ा गया .जिसके परिणाम स्वरूप किसान और श्रमिक वर्ग में अधिक एकता विद्यमान थी.इस आंदोलन के द्वारा शोषण पर आधारित साम्राज्यवादी, सामंतवादी एवं कृषि  व्यवस्थाओं को चुनौती दी गई ताकि शोषणकारी व्यवस्था को बदलकर नई व्यवस्था का निर्माण किया जा सके. इस से पूर्व किसी भी आंदोलन का प्रभाव क्षेत्र इतना अधिक शक्तिशाली नहीं था कि सामंतों की जमीन छीन कर किसानों में बांट दिया जाए. इस आंदोलन में पुलिस तथा अर्धसैनिक बलों का सामना किसानों के द्वारा भी शस्त्रों से किया गया. यही कारण है कि तेलंगाना किसान आंदोलन में 4000 गांवों में 10,00, 000 एकड़ भूमि पर कब्जा लेने  तथा वितरण करने में सफलता प्राप्त की. इतिहासकारों का मानना है कि इस आंदोलन के परिणाम स्वरूप निजाम हैदराबाद का प्रशासन बिल्कुल कमजोर हो गया और तेलंगाना क्षेत्र की जनता का निजाम हैदराबाद को समर्थन समाप्त हो गया था.यह एक मुख्य कारण है कि निजाम अपनी रियास्त को भारतीय संघ में शामिल करने के लिए मजबूर हो गया था.

तेलंगाना किसान सशस्त्र आंदोलन का महत्व

तेलंगाना किसान सशस्त्र आंदोलन का भारतीय किसान आंदोलन के इतिहास में निम्न महत्व है:

तेलंगाना के किसानों सहित कृषि मजदूरों, जनसाधारण व युवाओं के मन से अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिए पुलिस तथा अर्धसैनिक बलों के द्वारा दी गई यातनाओं,जेल और मृत्यु का भय बिल्कुल समाप्त हो गया और कुर्बानी की  भावना में अभूतपूर्व वृद्धि हुई . इसका प्रभाव हमें तेलंगाना के राज्य की मांग के आंदोलनों पर स्पष्ट दिखाई देता है.यही कारण है कि तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव ने कहा कि पूर्व आंध्र प्रदेश में एक अलग राज्य के लिए तेलंगाना आंदोलन के दौरान 1500 से अधिक लोग मारे गए.

तेलंगाना किसान सशस्त्र आंदोलन के प्रभाव के कारण भूमि सुधार भारतीय राजनीति के केंद्र में आ गए और इनको महत्व प्रदान किया गया. सरकारों के द्वारा भूमि सुधार अधिनियम -लैंड सिलिंग एक्ट निर्मित किए गए.  परंतु अफसोस की बात है कि लैंड सीलिंग अधिनियमों को सरकारों के द्वारा पूर्णतया लागू नहीं किया गया. अगर इनको सही तरीके से लागू किया गया होता तो गरीबी और भूख से  छुटकारा प्राप्त हो सकता था.

महात्मा गांधी के परम अनुयायी भारत रत्न संत विनोबा भावे के द्वारा के भूदान आंदोलन की पहली सफलता 18 अप्रैल 1951 को  तेलंगाना के पोचमपल्ली गांव में हुई. इसी गांव से ही सामंतों तथा निजाम हैदराबाद के विरुद्ध सशस्त्र किसान आंदोलन प्रारंभ हुआ था. यह गांव भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की गतिविधियों के केंद्र रूप में प्रसिद्ध हो चुका था.

तेलंगाना किसान सशस्त्र आंदोलन में महिला किसानों और महिला कृषि श्रमिकों भूमिका भी महत्वपूर्ण रही है. इस आंदोलन में महिलाओं  की भूमिका का प्रभाव भविष्य में होने वाले अहिंसात्मक व सशस्त्र आंदोलनों पर भी पड़ा. वाम-उग्रवादी ( माओवादी)   आंदोलनों से लेकर किसान आंदोलन (सन् 2000 -सन्2021) तक महिला किसानों और महिला कृषि श्रमिकों ने यह सिद्ध कर दिया कि वे पुरुषों से कम नहीं है.

स्वतंत्र हिंदुस्तान में 1960 के दशक के मध्य से वामपंथी उग्रवाद (माओवादी-उन्मुख और उग्रवादी विद्रोही और अलगाववादी समूह) की उत्पत्ति पर तेलंगाना किसान आंदोलन (सन्1946- सन्1951) का प्रभाव भी है.

संक्षेप में ब्रिटिश सरकार, भारतीय नवाबों तथा महाराजाओं के द्वारा किसानों के आंदोलनों को कुचलने के लिए अनेक प्रकार के तरीकों का प्रयोग किया. इनमें पुलिस एवं मिलिट्री का प्रयोग सर्वाधिक है.ब्रिटिश सरकार के पद चिन्हों पर चलते हुए स्वतंत्र हिंदुस्तान की सरकार ने भी सन 1950 तक तेलंगाना आंदोलन को कुचलने के लिए सशस्त्र सेना का प्रयोग किया.

हरकिशन सिंह सुरजीत ने तेलंगाना आंदोलन की प्रकृति व महत्व पर  निम्नलिखित टिप्पणी करते हुए कहा:

“सभी किसानों व श्रमिकों के “संघर्षों का ताज तेलंगाना के किसान वर्ग का युगांतरकारी संघर्ष था, जिसका देश के इतिहास में कोई समानता नहीं है, जहां किसानों ने भारतीय राज्य की सेनाओं के खिलाफ 1946-1951 से तीन साल, 1948-51 तक हाथों में हथियारों के साथ लड़ाई लड़ी।

आंदोलन के दौरान गांव से लेकर जिला स्तर तक छापामार दस्ते बनाए गए, जो रजाकारों द्वारा फैलाए गए आतंक का मुकाबला करते थे, और कई मामलों में इलाके के जमींदारों को डराते थे। संघर्ष के चरम पर लगभग 3000 गांवों, लगभग 30 लाख लोगों और 16,000 वर्ग मील के क्षेत्र को मुक्त किया गया और ग्राम राज के प्रशासन के तहत लाया गया।. इस क्षेत्र में 2000 के छापामार दस्ते और 10,000 लोगों के एक मिलिशिया ने गांवों की रक्षा की और लगभग 10 लाख एकड़ भूमि भूमिहीनों के बीच वितरित की गई। क्रांतिकारी नेतृत्व द्वारा शुरू किए गए सुधारों में, जबरन श्रम पर प्रतिबंध लगाने और न्यूनतम मजदूरी का निर्धारण करने वाले सूदखोर हितों को कम करना था। यह ग्रामीण इलाकों में बुर्जुआ जमींदार शासन के लिए विकसित होने वाला वास्तविक विकल्प था और इसका महत्व इस तथ्य में है कि यदि इसे राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन के साथ कृषि क्रांति के संयोजन की स्थिति में गुणात्मक परिवर्तन विकसित करने की अनुमति दी गई होती और इतिहास पूरी तरह से अलग होता।“

6.आदिवासी किसानों व श्रमिकों का सशस्त्र नक्सलवादी आंदोलन :मई1967से  आज तक

बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में आदिवासी किसानों के द्वारा जल ,जंगल और जमीन को बचाने के लिए समस्त भारत में आदिवासी क्षेत्रों में  अनेक आंदोलन चलाए गए.परंतु इन आंदोलनों में तेलंगाना आंदोलन के पश्चात महत्वपूर्ण तथा सर्वाधिक चर्चित   आदिवासी किसानों व श्रमिकों का सशस्त्र  नक्सलवादी आंदोलन है. यह आंदोलन पश्चिम बंगाल के नक्सलबाडी क्षेत्र( दार्जिलिंग  क्षेत्र) के एक छोटे से प्रसादु ज्योत गांव से  मई1967 शुरू हुआ और आज तक भी जारी है.

नक्सलबाड़ी क्षेत्र के आदिवासी किसान व मजदूर सदियों से चाय के बागानों और अन्य सम्पदाओं में काम करके गुजारा कर रहे हैं. चाय के  बागानों और सम्पदाओं के मालिकों, जमींदारों और साहूकारों के द्वारा उनका शोषण किया जा रहा है.इस आंदोलन का मुख्य कारण आदिवासी किसानों की जमीनों पर जमींदारों और साहूकारों का अवैध कब्जा है.एक युवा किसान के पास न्यायपालिका का आदेश था कि वह अवैध रूप से जमींदार द्वारा कब्जा की गई अपनी जमीन को जोत सकता है .परंतु जमीदार के गुंडों ने2 मार्च 1967 को युवा किसान की बेरहमी से पिटाई की गई. परिणाम स्वरूप पूरे क्षेत्र में जमीदारों के विरुद्ध रोष, असंतोष तथा आक्रोश चरम सीमा पर पहुंच गए.

सन्1967 पश्चिमी बंगाल विधानसभा चुनाव के पश्चात संयुक्त मोर्चा की सरकार को 4 मार्च 1967 को शपथ ग्रहण करनी थी. परंतु जमीदार के गुंडों के द्वारा 2 मार्च 1967 को युवा किसान की बेरहमी से पिटाई के परिणाम  स्वरूप शपथ ग्रहण करने के एक दिन पूर्व 3 मार्च 1967 को 150 आदिवासी किसानों ने धनुष – बाणों और भालों से लैस होकर आंदोलन का बिगुल बजा दिया है. 3 मार्च 1967 से 18 मार्च 1967 तक 15 दिन के अंतराल में किसानों और जमींदारों के मध्य अनेक बार हिंसक झड़पें हुई. पश्चिमी बंगाल की संयुक्त मोर्चा की सरकार ने आंदोलन का दमन करने के लिए पुलिस तथा अर्द्धसैनिक बलों का प्रयोग किया.

24 मई 1967 को प्रसादू ज्योति गांव के किसानों ने जमींदारों तथा सरकार के विरुद्ध धरना प्रदर्शन किया.किसानों के धरने को तोड़ने के लिए पुलिस गांव में घुस गई तथा पुलिस और किसानों के बीच झड़प में एक किसान के तीर के लगने से झारू गांव के इंस्पेक्टर की मृत्यु हो गई.

25 मई 1967 को महिलाओं ने गांव के स्कूल के पास आंदोलन प्रारंभ कर दिया और उनका नारा था “लैंड टू टीलर्स”( जोतने वालों की भूमि). महिलाओं के शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर पुलिस के द्वारा इंस्पेक्टर की हत्या का बदला लेने व किसानों सबक को सिखाने हेतु की गयी फायरिंग में नौ महिलाओं और दो बच्चोंकी मौत हो गई. अतः 25 मई 1967 को पुलिस की दमनकारी नीति के परिणाम स्वरुप नक्सलवादी आंदोलन का जन्म हुआ और धीरे -धीरे समस्त भारत में फैलता चला गया. पूर्व निर्धारित गलत कार्रवाई दुर्भाग्यपूर्ण सिद्ध हुई जिसका खमियाजा आज तक भुगत रहे हैं.

भारत सरकार की अधिकारिक रिपोर्ट (सन्2007) के अनुसार नक्सलवादी “भारत के 29 (अब 28 राज्य तथा 8 केंद्रीय प्रशासित क्षेत्र )राज्यों में से आधे” राज्यों में सक्रिय थे, जो भारत के भौगोलिक क्षेत्र का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा है, जिसे ” रेड कॉरिडोर ” के रूप में जाना जाता है.एक अनुमान के अनुसार उनका प्रभाव 92,000 वर्ग किलोमीटर से अधिक भौगोलिक क्षेत्र में था. सन् 2009 में, भारत के दस राज्यों के लगभग 180 जिलों में नक्सलवादी  सक्रिय  थे .55वर्ष बाद, यह आंदोलन मुख्य रूप से छत्तीसगढ़, झारखंड, उड़ीसा और आंध्र प्रदेश के कुछ हिस्सों में चल रहा है.

सन् 1980 और सन् 2015 के अंतराल में, नक्सलवादी आंदोलन के कारण 20,012 लोग हताहत हुए; इन में से 4,761 नक्सलवादी, 3,105 सुरक्षा बलों के सदस्य और 12,146 नागरिक हैं।  भारत सरकार के गृह मंत्रालय की  अधिकारिक रिपोर्ट (सन्2019 )के अनुसार सन् 2013 से सन् 2018 तक पांच वर्षों के अंतराल में माओवादियों से संबंधित हिंसक घटनाओं में 26.7% की कमी आई है .

नक्सलवाद की समस्या का समाधान करने के लिए आदिवासी क्षेत्रों के लिए समग्र दृष्टिकोण पर आधारित नीति की आवश्यकता है. भारत सरकार व राज्य सरकारों की नीतियों और कार्यक्रमों को नक्सलवाद से प्रभावित क्षेत्रों में हर गांव में पहुंचाया जाए .राजधानियों बैठे हुए राजनेताओं तथा नौकरशाहों को यह समझना चाहिए कि “आदिवासी भी भारतीय हैं” .यदि आदिवासियों का विकास नहीं होगा तो भारत का संपूर्ण विकास होना असंभव है.आदिवासियों के प्रति सहानुभूति पूर्ण दृष्टिकोण अपनाकर उनका दिल जीत कर ही राष्ट्रीय मुख्यधारा में लाया जा सकता है. पुलिस तथा सुरक्षा बलों के द्वारा आंदोलनकारियों का दमन तो किया जा सकता है परंतु समस्या का स्थाय़ी समाधान असंभव है .आदिवासियों की समस्या का समाधान करने के लिए जल, जंगल और जमीन पर उनके परंपरागत पुश्तैनी अधिकार को बरकरार रखने की जरूरत है .आधुनिक शोषणकारी कारपोरेट के द्वारा उनकी जमीनों, जंगलों व खदानों पर अवैध कब्जे  बंद होने चाहिए. आधुनिकीकरण  के कारण पारिस्थितिकी पतन हो रहा है.यह एक संवेदनशील मुद्दा है व्यवसायिक वानिकी और गहन कृषि दोनों ही आदिवासी क्षेत्रों के लिए विनाशकारी सिद्ध हुए हैं. क्योंकि जल, जंगल और जमीन आदिवासियों के लिए जीवन यापन का सदियों से मुख्य स्त्रोत रहा है. वास्तव में यह उनकी जीवन रेखा है .संक्षेप में आदिवासी क्षेत्रों के संसाधनों का कारपोरेट के द्वारा अंधाधुंध दोहन बंद होना चाहिए.चहुमुखी विकास आदिवासियों की समस्या का समाधान है .

केरल ,पश्चिमी बंगाल व त्रिपुरा की वामपंथी सरकारों के द्वारा भूमि सुधारों में उपलब्धियों का वर्णन करते हुए हरकिशन सिंह सुरजीत ने कहा: “पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा की वाम मोर्चा सरकार और केरल की वाम लोकतांत्रिक सरकार (एक संक्षिप्त अवधि के लिए) ने संविधान के तहत सीमित शक्ति के साथ, संगठित किसान आंदोलन द्वारा समर्थित, स्थितियों को कम करने की कोशिश की है। किसान वर्ग की। पश्चिम बंगाल में, 12 लाख परिवारों को भूमि वितरित की गई है, 13 लाख बटाईदार पंजीकृत किए गए हैं और उनमें से दो लाख से अधिक एक वर्ष में बैंकों से ऋण प्राप्त करते हैं, दो लाख से अधिक को घरों पर अधिकार दिया गया है, कृषि श्रमिकों के लिए न्यूनतम मजदूरी है नियमित रूप से संशोधित। छोटे किसानों को भू-राजस्व से छूट दी गई है और कर्ज में राहत दी गई है.

त्रिपुरा में एक लाख से अधिक लाभार्थियों को जमीन दी गई है, गरीब किसानों और कारीगरों को कर्ज राहत दी गई है, जबकि न्यूनतम मजदूरी तय की गई है और बटाईदारों को दर्ज किया गया है। केरल में लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट के तहत सरकार ने चार एकड़ से कम की जोत को वृक्षारोपण कर से छूट दी थी, 2.5 एकड़ तक के किराए के बकाया को रद्द कर दिया गया था और इनपुट पर दी गई सब्सिडी और उपहार में दी गई भूमि पर छूट ले ली गई थी।“

अखिल भारतीय किसान सभा के द्वारा वामपंथी आधार पर चलाए गए किसान आंदोलनों के परिणाम स्वरूप भारतवर्ष में कृषि सुधारों पर बल दिया जाने लगा. यदि जम्मू कश्मीर, केरल ,बंगाल,त्रिपुरा एवं  तेलंगाना की भांति भूमि सुधार ईमानदारी, निष्ठा, नियत और नियति के अनुसार लागू किए गए होते तो  ग्रामीण जीवन में मूलभूत परिवर्तन हो जाता और किसानों की समस्याओं का कुछ सीमा तक समाधान संभव हो सकता था .

संक्षेप में कृषि सुधारों के क्षेत्र में जम्मू कश्मीर, केरल ,बंगाल,त्रिपुरा एवं  तेलंगाना  की सरकारों ने जो काम किया वह अतुलनीय है.

मैं दिगंबर सिंह (उत्तर प्रदेश किसान सभा संबंध अखिल भारतीय  किसान सभा, सदस्य, उत्तर राज्य कार्यकारिणी एवं जिला अध्यक्ष, किसान  सभा मथुरा)

(लेखक की शीघ्र प्रकाशित होने वाली पुस्तक –किसान आंदोलन :सन् 2020 -सन् 2021 का यह लेख अध्याय के रूप में है).

 

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