राम पुनियानी

(समाज वीकली) इस समय पूरा देश अयोध्या के राममंदिर में चंदे की लूट से स्तब्ध है, सदमे में है. इस चंदा चोरी से पूरे देश को, और खासतौर से उन श्रद्धालुओं को गहरा धक्का लगा है जिन्होंने छोटी-सी राशि से लेकर बहुत बड़ी रकमें तक अपने आराध्य भगवान राम को अर्पित की थी. राममंदिर आंदोलन के दौरान बाबरी मस्जिद को ढहा दिया गया था. उसी ज़मीन पर इस मंदिर को बनाया गया है. राममंदिर आंदोलन से देश हिल गया था. भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष लालकृष्ण आडवानी के नेतृत्व में रथयात्रा निकली गई थी. इस आन्दोलन के पीछे भाजपा-आरएसएस का एजेंडा था अयोध्या में बाबरी मस्जिद के स्थान पर राममंदिर का निर्माण. इसके लिए यह कहानी गढ़ी गई कि पहले मुगल बादशाह बाबर ने अयोध्या में भगवान राम के जन्मस्थल पर बने राममंदिर को तोड़कर उसके मलबे पर अपने नाम पर एक मस्जिद बनवाई थी.
न्यायपालिका की मिलीभगत के चलते भाजपा-आरएसएस अपना लक्ष्य हासिल करने में सफल रहे. आन्दोलन के समानांतर चंदा जमा करने का काम बड़े पैमाने पर चल रहा था. बाबरी मस्जिद ढ़हाए जाने की घटना की जांच में लिब्रहान आयोग ने पाया था कि अन्य लोगों के अलावा आडवानी, मुरलीमनोहर जोशी और उमा भारती मस्जिद ढ़हाए जाने के दोषी हैं. यहां तक कि सर्वोच्च न्यायालय के फैसले में भी यह माना गया कि मस्जिद का ध्वंस एक जुर्म था. न्यायपालिका जाहिर तौर पर सत्ताधारियों के दबाव में थी और इसलिए मुजरिमों को पुरस्कार के रूप में मंदिर निर्माण के लिए वह पूरी जमीन दे दी गई जिस पर मस्जिद हुआ करती थी. इसके बाद शानदार मंदिर के निर्माण के लिए बड़े पैमाने पर पैसा मिलने लगा. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दुहरी भूमिका अदा की- पहली राज्य के प्रधान की और दूसरी मंदिर के उद्घाटन समारोह में मुख्य यजमान कीं. कुल मिलाकर राम मंदिर से जुड़े सभी मामलों में अंतिम फैसला लेने वाले वे ही थे.
मंदिर के उद्घाटन के बाद पहली बारिश में ही निर्माण की गुणवत्ता की पोल खुल गई. छत से पानी रिसने लगा. इससे बाल्टी उद्योग को जबरदस्त बढ़ावा मिला. फर्श पर पानी जमा होने से बचाने के लिए ढेर सारी बाल्टियाँ रखी गईं. श्रद्धालुओं का जमघट लगने लगा. दान इकठ्ठा करने से जुड़ी सारी व्यवस्थाएं प्रधानमंत्री कार्यालय के नियंत्रण में थीं. कितने बड़े पैमाने पर दान आ रहा था, इसका अंदाज इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि सिन्धी समुदाय के विश्व सिंधी समाज ने चांदी की लगभग 200 ईटें दान की थीं, जिनमें से हर एक का वजन एक किलो था. उन्हें इसकी कोई पावती नहीं दी गई. तरह-तरह की बहुत सी बहुमूल्य वस्तुएं मंदिर को दान में मिलीं. ट्रस्टियों द्वारा गबन की गई राशि 2000 से 3000 करोड़ रूपये के बीच बताई जा रही है.
कुल मिलाकार यह कहा जा सकता है कि मंदिर को लूटा गया और घोटालेबाजों को न तो भगवन का कोई डर था और ना ही उनका धर्म से कोई लेनादेना था. इसका क्या असर होगा, यह तो आने वाले समय में ही पता लगेगा. सच तो यह है कि राममंदिर का पूरा आंदोलन मुख्यतः राजनैतिक लक्ष्यों को हासिल करने के लिए ही चलाया गया था. इससे भाजपा को सत्ता हासिल हुई और मुसलमानों के प्रति नफरत फैलाकर उसने अपना राजनैतिक आधार बहुत मजबूत कर लिया. हमारे लोकतंत्र से बंधुत्व का भाव बहुत हद तक लुप्त हो गया और मुसलमानों के प्रति नफरत लगातार बढ़ती गई. हमें साम्राज्यों का वह दौर याद आता है जब राजा धन के लिए मंदिरों को लूटते थे. साम्राज्यवादी दौर में राजाओं द्वारा मंदिरों की लूट और वर्तमान अर्ध-लोकतांत्रिक समाज (जो निर्वाचित तानाशाही में तब्दील होता जा रहा है) में इसी तरह की लूट में क्या अंतर है? दौलत की हवस दोनों दौरों में एक जैसी है. लेकिन धर्म-आधारित ध्रुवीकरण राजाओं की नीति नहीं थी. वहीं वर्तमान लुटेरे, जो साम्प्रदायिक शक्तियों से जुड़े हुए हैं, का मुख्य एजेंडा ध्रुवीकरण ही है.
वैसे तो मंदिर और अन्य पवित्र स्थान कई अन्य राजाओं द्वारा भी नष्ट किए गए थे मगर दो प्रमुख उदाहरण याद आते हैं. पहला है 11वीं सदी के कश्मीर के राजा हर्षदेव का और दूसरा महमूद गजनी द्वारा सोमनाथ मंदिर को लूटने का. डी. डी. कोसंबी के अनुसार “कश्मीर के राजा हर्षदेव (1089-1101 ईस्वी), जो सातवीं शताब्दी के शासक हर्ष से अलग थे, ने अत्यंत व्यवस्थित ढंग से अपने साम्राज्य में धातु की सभी देव प्रतिमाओं (मात्र चार को छोड़कर) को गलवा दिया. यह काम इसके लिए विशेष रूप से नियुक्त देवोपतन नायक पदनाम वाले मंत्री के माध्यम से करवाया गया. असगर अली इंजीनियर बताते हैं “महमूद गजनवी के बारे में भी इतिहासवेत्ताओं ने केवल कुछ तथ्यों को सामने रखा है. हम इस बात को प्रमुखता देते हैं कि उसने सोमनाथ के मंदिर को लूटा और नष्ट किया. लेकिन हम इस तथ्य पर प्रकाश नहीं डालते कि उसने अपनी सेना और प्रशासन में हिंदुओं को उच्च पदों पर नियुक्त किया. उसके हिंदू जनरलों में से तिलक, सोंधी, राय हिंद और हरजन आदि का जिक्र तारीख-ए-बैहाकी में है…उसके शासनकाल में जारी सिक्कों में संस्कृत में अभिलेख थे‘‘.
आज समाज में यह आम धारणा है कि मंदिरों को धार्मिक वजहों से नष्ट किया गया. यह धारणा अंग्रेजों द्वारा उनकी ‘फूट डालो और राज करो‘ की नीति के अंतर्गत किए गए साम्प्रदायिक इतिहासलेखन की वजह से बनी. महमूद गजनी ने सोमनाथ मंदिर को नष्ट करने के पहले वहां मौजूद चांदी और सोने की सभी मूर्तियों को अपने कब्जे में ले लिया जिनका कुल मूल्य सोने के बीस हजार दीनारों से अधिक रहा होगा, जो एक बहुत बड़ी रकम थी…. सुलतान इन मूर्तियों को देखकर अचंभित रह गया और उसने इन मूर्तियों और मंदिर के खजाने को जब्त करने का आदेश दिया. वहां चांदी और सोने की बहुत सी मूर्तियां थीं…मंदिर में मिली वस्तुओं का मूल्य बीस हजार दीनार से भी अधिक था‘‘.
रोमिला थापर लिखती हैं, “मंदिरो में भक्तों द्वारा दान की गई नकद राशि, सोने की मूर्तियों और गहनों के रूप में अपार संपदा थी और इसलिए वे स्वाभाविक तौर पर उत्तर भारत में दौलत तलाश रहे गैर-हिन्दुओं के निशाने पर थे. महमूद गज़नी सोने का बहुत लालची था…और सोमनाथ अपनी अथाह संपदा के लिए विख्यात था”. वे आगे लिखती हैं. ‘‘जब बात राजनैतिक लक्ष्य हासिल करने की हो तो धर्म से जुड़े मुद्दों का इस्तेमाल करने में कोई कसर नहीं छोड़ी जाती‘‘. आम लोगों में मुसलमानों और महमूद गजनी का दानवीकरण करने में कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी के उपन्यास ‘जय सोमनाथ‘ की महत्वपूर्ण भूमिका रही है. उसमें घटनाओं को इस तरह प्रस्तुत किया गया जिससे यह धारणा बने कि मंदिरों को लूटने की वजह सिर्फ हिंदुओं का अपमान करना यानि धार्मिक थी.
हालांकि कई मुस्लिम राजाओं को मंदिर नष्ट करने का दोषी बताया जाता है लेकिन इस बात का बहुत कम जिक्र किया जाता है कि बहुत से मुस्लिम राजा हिंदू मंदिरों को दान देते थे. मुझे औरंगजेब द्वारा जारी उन फरमानों की प्रतियां दी गईं हैं जिनमें उत्तर भारत के विभिन्न स्थानों जैसे महाकालेश्वर (उज्जैन), बालाजी मंदिर (चित्रकूट) उमानंद मंदिर (गुवाहाटी), शत्रुंजय के जैन मंदिरों और अन्य कई प्रसिद्ध मंदिरों और गुरूद्वारो को दान दिए जाने का आदेश दिया गया है. ये फरमान इस्लामिक कैलेंडर के सन् 1065 (1659 ईस्वी) और 1095 (1685) के बीच जारी किए गए थे.”
मंदिरों को नष्ट करने वाले गज़नी जैसे राजाओं और वर्तमान सत्ताधारियों के नियंत्रण वाले ट्रस्ट के बीच गजब की समानताएं नजर आ रही हैं. (अंग्रेजी से रूपांतरण अमरीश हरदेनिया. लेखक आईआईटी मुंबई में पढ़ाते थे और सेंटर फॉर स्टडी ऑफ सोसाइटी एंड सेकुलरिज्म के अध्यक्ष हैं)





