तमिलनाडु में ‘विजय’ के नव-ब्राह्मण राज को खत्म करने और पेरियार-राज को फिर से स्थापित करने के लिए क्या करना होगा?
– प्रोफे. श्रवण देवरे
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‘जब हम किसी और पर एक उंगली उठाते हैं, तो हमारी चार उंगलियां हमारे तरफ होती हैं’ हमने देखा है कि कैसे विजय और उसके कंधों पर बैठी RSS-BJP तमिलनाडु में ब्राह्मणवादी पेशवा प्रतिक्रांती करने मे सफल हो गयी। हमने यह भी देखा है कि कैसे दलित और ईसाई वोटबैंक RSS-BJP की साज़िश का शिकार हुये। हालांकि, इस बात पर भी चर्चा करना ज़रूरी है कि कैसे और किस हद तक तीनों एलिमेंट- खुद स्टालिन, उनकी DMK पार्टी और उनकी गाइडिंग फिलॉसफी पेरियारिज्म- इस स्थिति के लिए ज़िम्मेदार हैं। जातीअंतक मंझील के तरफ तेज गती से दौडनेवाले पेरियार युग की तरह मंडल युग भी हार के कगार पर खडा है, तो मंडल युग के निर्माताही इस हार के लिए कैसे जिम्मेदार है, यह भी देखना पडेगा।
2019 और 2024 के चुनावों से पहले ही, दोनो पॉलिटिकल सुपरस्टार- रजनीकांत और कमल हासन- ने स्टालिन के सामने घुटने टेक दिये। इस वजह से स्टालिन रिलैक्स हो गए। लेकिन क्या संघ-BJP एक-दो एक्सपेरिमेंट फेल होने के बाद चुप बैठने वाले थे? बिल्कुल नहीं। इसी दौरान मुझे चेन्नई से बुलावा आया। 1 मई, 2022 को चेन्नई में 9 वां ‘ऑल इंडिया सोशल जस्टिस कॉन्फ्रेंस’ ऑर्गनाइज़ किया गया था। मैं इस कॉन्फ्रेंस में निमंत्रित वक्ता के तौर पर मौजूद था। टाइम की कमी की वजह से मुझे अपनी स्पीच छोटी करनी पड़ी। उसमें मैंने ब्राह्मण छावणी (War-Camp) के खिलाफ लड़ने वाले देश के तीन मॉडल्स पर बात की। कांशीरामसाहब का जाति-जोड़ो फुले-अंबेडकरिस्ट मॉडल, कर्पुरी-लालू-मुलायम का सोशलिस्ट-लोहियाइस्ट मॉडल जिसने मंडल युग बनाया, और स्टालिन-करुणानिधि का एंटी-ब्राह्मणिस्ट पेरियारिस्ट मॉडल जिसने पेरियार युग को मजबूत किया! कांशीराम मॉडल और लालू-मुलायम मॉडल दोनों फेल हो चुके हैं और अब सिर्फ पेरियारवादी मॉडल, जो उम्मीद की अकेली किरण के तौर पर ज़िंदा है, असरदार तरीके से काम कर रहा है। भाषण मे यह मुद्दा रखने के साथ ही मैंने यह भी कहा कि देश में पेशवाओं की ब्राह्मणवादी घुड़दौड़ तेज़ी से चल रही है। ब्राह्मण-पेशवा की इस घुड़दौड़ में तमिलनाडु के मजबूत किले को ढहने से बचाने के लिए, मैंने भाषण के आखिर में एक छह-सूत्री कार्यक्रम सुझाया था, जो इस प्रकार है- (मूल इंग्लिश भाषण का हिन्दी अनुवाद)
“तमिलनाडु में सामी पेरियारवादी पार्टियों ने कई क्रांतिकारी कानून पास करके ब्राह्मणवाद को पराजीत करके गाड दिया है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि तमिलनाडु में जातिव्यवस्था खत्म हो गई है। भारत में जातिव्यवस्था को बनाए रखते हुए अकेले तमिलनाडु से जातिव्यवस्था को खत्म करना संभव नहीं है। इसके लिए तमिलनाडु के OBC नेतृत्व को राष्ट्रीय स्तर पर जातिवाद के खिलाफ लड़ाई का नेतृत्व करना होगा। तमिलनाडु के OBC नेतृत्व को राष्ट्रीय स्तर पर तुरंत निम्नलिखित कार्यक्रम शुरू करने होंगे।
“1) हालांकि ब्राह्मणवाद ने उत्तर भारत पर पूरी तरह से कब्जा कर लिया है, लेकिन दक्षिणी राज्यों में ‘ब्राह्मणवाद-विरोध’ अभी भी कुछ हद तक जीवित है। इसे पूरी ताकत से खड़ा करने के लिए, तमिल के OBC के नेतृत्व में दक्षिणी राज्यों से ‘सीता, शंबूक, एलकलव्य, रावण और बलिराजा गौरव यात्रा’ शुरू की जानी चाहिए।
“2) तमिलनाडु सरकार ने सामी पेरियार के विचारों और कामों पर आधारित किताबों का देश की सभी भाषाओं में ट्रांसलेशन करके उन राज्यों में भेजा जाना चाहिए।
“3) हम 27 सालों से महाराष्ट्र में ‘फुले अंबेडकर यूनिवर्सिटी’ बनाकर फुले-आंबेडकर की किताबों पर परिक्षाऐ (Examinations) आयोजित कर रहे हैं। इसी आधार पर अगर ‘सामी पेरियार फुले अंबेडकर यूनिवर्सिटी’ बनाई जाए और देश भर में अलग-अलग भाषाओं में राज्य लेवल की परिक्षा (Exams) आयोजित करनी चाहीए, इससे नई पीढ़ी सामी पेरियार के विचारों और कामों को जान पाएगी।
“4) हर राज्य में कुछ OBC कार्यकर्ता ईमानदारी से काम कर रहे हैं। लेकिन, ब्राह्मण-मराठा जैसी शोषक जातियों की पॉलिटिकल पार्टियां झुटे ओबीसी नेता पैदा करती है और यह नकली ओबीसी नेता ईमानदार OBC कार्यकर्ता के काम में रुकावट डालते हैं। ऐसे ईमानदार अ-पक्ष कार्यकर्तोओं को बढ़ावा देने के लिए तमिलनाडु सरकार को उन्हें सम्मानीत करना चाहिए और उनके साथ खड़ा होना चाहिए।
“5) हर राज्य से ऐसे सच्चे OBC कार्यकर्तोओं को लेकर, DMK की तरह OBC की लिडरशिप में नेशनल लेवल पर एक नई ‘अ-ब्राहमणी पेरियारवादी पार्टी’ बनाई जा सकती है।
“6) हिंदी भाषा की कमी के कारण तमिलनाडू बाकी देश से कटा हुआ है। अब, तमिलनाडु को हिंदी भाषा का अच्छा इस्तेमाल करना चाहिए। और बाकी राज्यों से जुड़कर ऑल इंडिया लेव्हल की जाती-अंतक लढाई का नेतृत्व (Lead) करना चाहिये।
“ऊपर दिए गए एक्शन प्रोग्राम को तुरंत शुरू किया जाना चाहिए और नेशनल लेवल पर एंटी-कास्ट (Caste-Ending) मूवमेंट को लीड किया जाना चाहिए और देश में तात्यासाहेब महात्मा फुले के सपनों का समतावादी ‘बली राष्ट्र’ सच में बनाने के लिए शुरुआत की जानी चाहिए। धन्यवाद!…’’
मेरा यह भाषण चेन्नई से छपने वाली इंग्लिश और तमिल भाषा की मैगज़ीन ‘OBC Voice’ ने पूरा, विस्तारसे और जैसा है वैसा ही छापा। हालांकि यह मैगज़ीन DMK पार्टी का माउथपीस नहीं है, लेकिन यह अकेली पेरियारिस्ट मैगज़ीन है और तमिलनाडु के दलित-OBC नेता इसे रेग्युलर पढ़ते हैं। तो मेरा भाषण स्टालिन ने ज़रूर देखा होगा! मुझे लगा था कि वह मेरे बताए छह-पॉइंट प्रोग्राम पर रिएक्ट करेंगे या एक्शन लेंगे, लेकिन कुछ नहीं हुआ। इसका मतलब है कि रजनीकांत और कमल हासन के शांत होने के बाद स्टॅलिन भी शांत हो गए। यह लापरवाही उनके लिए शर्म की बात थी। राज्य में सत्ता उनकी अपनी पार्टी के हाथ में रहनी चाहिए, इसके लिए जो कुछ भी करने की ज़रूरत है, वह किया जा रहा था। चूंकि तमिल की जनता पेरियारिस्ट हैं, स्टालिन को यकीन था कि राज्य में ज़्यादा से ज़्यादा कड़े कानून बनाकर अधमरे ब्राह्मणवाद को लताडनेसे सत्ता उनकी ही पार्टी के हाथ में रहेगी।
लेकिन, स्टालिन उन साज़िशों पर ध्यान नहीं देना चाहते थे जो उनके दुश्मन- संघ-BJP- राज्य के बाहर कर रहे थे। राज्य के बाहर के ईमानदार कार्यकर्ता संघ-BJP के खिलाफ़ कैसे लड़ रहे हैं? स्टालिन ने कभी नहीं सोचा कि मेरे जैसा कोई सामाजिक कार्यकर्ता- जो ज़िंदगी भर जातिअंतक आंदोलन में काम करता रहा है– चेन्नई आकर हमारे लिए कुछ मुद्दे उठा रहा है, और उन्हे उन पर ध्यान देना चाहिए। स्टालिन इस गलत-फहमी के शिकार हो रहे थे कि, वह अपने राज्य की सत्ता मे बैठे है और अपने किये हुये काम की वजहसे फिर से सत्ता मे आ जाएंगे। पड़ोसी दक्षिणी राज्यों- केरल, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक- में भी ब्राह्मण विरोधी परंपरा है, फिर भी वह राज्य ब्राह्मणवाद की आग मे जल रह है। क्या स्टालिन को यह सीधी-सादी समझ नहीं होनी चाहिए कि, ‘अगर पड़ोसी के घर में आग लगी, तो वही आग उनके घर को भी जला देगी?’
कर्पूरी-लालू-मुलायम का लोहिया-सोशलिस्ट मॉडल क्रांतिकारी था। क्योंकि कर्पूरी-लालू-मुलायमने मंडल युग को जन्म दिया और मंडल युग की राजनीति को सफलतापूर्वक चलाया। दलित और OBC जैसे क्रांतिकारी जाती-कॅटेगिरीयों को एक साथ लाया, और सही मायने में, ब्राह्मणवादी संघ-BJP से कोई भी कॉम्प्रोमाइज़ किए बिना, उन्होंने ब्राह्मणवाद को राजनीतिक सत्ता से बाहर करने के लिए अपनी जान जोखिम में डाल दी। कुछ हद तक कर्पूरी-मुलायम-लालू के मंडल-युग ने ब्राह्मणवाद को सत्ता से बाहर कर दिया। लेकिन, कोई भी फिलॉसॉफी कितनी भी क्रांतिकारी या प्रति-क्रांतिकारी क्यों न हो और कुछ समय तक कितनी भी कामयाबी से काम करे, वह फिलॉसॉफी कभी परफेक्ट नहीं हो सकती।
हर फिलॉसॉफी की समय की अपनी सीमाएं (Limitations) होती हैं, और उन्हें पहचानकर उसे डेवलप किया जाना चाहिए। लेकिन, लालू-मुलायम ने लोहियावाद की गंभीर सीमाओं का ध्यान नहीं रखा। जब कर्पूरी ठाकुर, लालू, मुलायम जैसे जाने-माने नेशनल OBC नेता मंडल युग की नींव रख रहे थे, तभी से संघ-BJP-कॉंग्रेस की ब्राह्मणवादी छावणी (War-Camp) मंडल के खिलाफ लढने की तयारी कर रहे थे। जातीअंतक मंडल जैसे सामाजिक मुद्दों पर ब्राह्मणवादी लोग आमने-सामने आकर कभी नही लढते। ब्राह्मणवादी युद्ध-छावणी दलित रिझर्वेशन के खिलाफ लढ सकती है, मगर ओबीसी आरक्षण के खिलाफ आमने-सामने की लढाई वो कभी नही कर सकती। क्यों की ब्राह्मणवाद को मालूम है की ओबीसी के साथ आमने-सामने की लढाई हुयी तो ब्राह्मणवाद जलकर राख हो जाता है, यह सीख उन्होने तामीलनाडू के पेरियार से ली है। हम बहुजन लोग ब्राह्मणवादी युद्ध-छावणी को ओबीसी-आरक्षण जैसे सामाजिक मुद्दों पर लढने के लिए चुनौती देते है, लेकीन ब्राह्मणवाद बहुजनों को राम-कृष्ण जैसे सांस्कृतिक मुद्दों पर लढने के लिए मजबुर कर देते है, जहां हमारी हार निश्चित हो जाती है।
ब्राह्मणवाद की जान सांस्कृतिक मुद्दों मे है, यह राज सबसे पहले जाना तात्यासाहब महात्मा जोतीराव फुले साहब ने। और इस राज को जानकर सबसे पहला सांस्कृतिक हमला किया सामी पेरियारने। परिणाम हमारे सामने है- 70 साल तक ब्राह्मणवाद तामीलनाडू मे मुर्दा बन गया था जिसको विजय थलपती ने फिरसे जिंदा कर दिया है।
लेकीन मंडल-युग की लढाई उत्तर भारत के मैदान पर होने जा रही थी। और उत्तर भारत मे ब्राह्मणवाद के लिए मैदान बिल्कूल साफ था, क्यों कि उत्तर भारत मे कोई पेरियार साहब नही थे। उत्तर भारत मे एक कांशिराम साहब थे, जो सबकुछ जानकर भी ब्राह्मणों के खिलाफ सांस्कृतिक लढाई करना ही नही चाहते थे। उत्तर भारत मे दुसरे थे लालू-मुलायम जिनको सांस्कृतिक लढाई मालूम ही नही थी। ब्राह्मणवादी युद्ध-छावणी मंडल-युग के खिलाफ लढने के लिए सांस्कृतिक प्रतीक राम को तयार कर रहे थे। ब्राह्मणवादी युद्ध-खेमा (War-Camp) कभी जाति के मैदान में लड़ने नहीं आता, वह आपको कल्चरल मैदान में ले जाता है और वहां आप हथियार डालने के अलावा कुछ नहीं कर सकते। उत्तर भारत मे मंडल-युग के खिलाफ राम लढा और जित गया।
लोहियावादी लालू-मुलायम राम के खिलाफ कल्चरल लड़ाई नहीं लड़ सकते, क्योंकि लोहिया खुद राम-कृष्ण के बहुत बड़े भक्त थे। आज भी, लालू-मुलायम जब पुणे आते हैं तो कभी तात्यासाहेब के फुलेवाड़ा जाते नहीं दिखते। या जब वे मुंबई आते हैं तो कभी बाबासाहेब की चैत्यभूमि जाते नहीं दिखते। लेकिन महाराष्ट्र मे आकर वे शिरडी के साईं बाबा के दर्शन करना कभी नहीं भूलते। यह लोहियावाद का नतीजा है। अगर लालू-मुलायम फुले-आंबेडकरवादी या पेरियारवादी होते, तो वे BJP के राम रथ के खिलाफ सीता, शंबूक, एकलव्य, रावण, बलीराजा जैसे गैर-ब्राह्मण प्रतीकों के साथ बिहार-उत्तर प्रदेश में रथयात्रा निकालते और राम के साथ संघ-BJP-कांग्रेस को हमेशा के लिए दफना देते। जो काम सामी पेरियार ने 60 साल पहले तमिलनाडु में कर दिखाया, वह बिहार-उत्तर प्रदेश में लालू-मुलायम क्यों नहीं कर सके? इसका जवाब है- उनके द्वारा अपनाया गया लोहियावाद- जो कल्चरल लढाई जानताही नही है। लालू-मुलायम लोहियावाद की सांस्कृतिक सीमाओं (Limitations) को नहीं तोड़ सके! उसका नतीजा हम देख रहे है- पूरा उत्तर भारत आर्यावर्त (Cow Belt) बनके रह गया है- जहां साडे तिन टका ब्राह्मणों का सौ-प्रतिशत राज चल रहा है।
लेकिन, जब फुले-आंबेडकरवाद की ऐसी कोई सांस्कृतिक सीमा नहीं थी, तो सवाल उठता है कि कांशीराम साहेब उत्तर प्रदेश में पेरियार जैसा काम क्यों नहीं कर सके। क्योंकि कांशीरामजी खुद को फुले-आंबेडकरवादी कहते थे। तात्यासाहेब महात्मा फुले ने उन्हें ‘गुलामगिरी‘ (Slavery), ‘शेतकर्याचा आसुड‘ (Cultivator’s Whip) और बाबा साहेब की ‘रिडल्स इन हिंदुइज़्म‘ (Riddles in Hinduism) जैसी क्रांतिकारी किताबों के ज़रिए राम-कृष्ण से लड़ने के लिए तेज़ मॉडर्न हथियार दिए, उसके बाद भी कांशीरामजी ने राम से लड़ने की हिम्मत नहीं की। कांशीराम साहेब ने तात्या साहेब के दिए बलिराजा के कल्चरल प्रतिक (cultural icon) और बाबासाहेब के दिए शंबूक के प्रतिक को कभी नहीं अपनाया। इसलिए, वे कभी भी संघ-बीजेपी के (राम के) खिलाफ नहीं लड़ सके। कांशीरामजी ऐसी पॉलिटिक्स करते रहे जिससे संघ-बीजेपी को फ़ायदा हो। उन्होंने तमिलनाडु के ‘विजय’ की तरह फुले अंबेडकर की सिर्फ़ फ़ोटो का इस्तेमाल किया। अपने कैडर कैंप में, उन्होंने कभी बाबा साहेब की रिडल्स किताब का ज़िक्र नहीं किया और राम-कृष्ण के बारे में कभी भी कोई बात नही की।
कांशीराम साहेब गर्व से कहते थे, “मैंने बाबा साहेब की किताब ‘जाती का विनाश’ (Annihilation of Caste) 10 बार पढ़ी है!” तो फिर यह कैसे कहा जा सकता है कि कांशीराम साहेब ने बाबा साहेब की किताब ‘रिडल्स इन हिंदुइज्म‘ एक बार भी नहीं पढ़ी? अगर कांशीराम साहेब ने कैडर कैंप में ‘रिडल्स इन हिंदुइज्म’ की राम-शंबूक की पहेली समझाई होती, तो BSP के कार्यकर्ता उत्तर प्रदेश में रामरथ के खिलाफ शंबूक रथ जरूर निकालते! उत्तर प्रदेश में संघ-BJP के राम को खुली छूट देना फुले-आंबेडकरवाद की सीमा (Limitations) नहीं थी, बल्कि यह खुद कांशीरामजी की गलतियां थी। कांशीरामजी ने ध्यान रखा कि संघ-BJP को ज़रा भी बुरा न लगे। इसी गलती का फायदा उठाकर बहन मायावती ने कभी ब्राह्मण जाति से दोस्ती की, कभी संघ से, तो कभी BJP से दोस्ती-युती करके बाबा साहेब के हाथी को ‘गणेश‘ बनाकर रख दिया और ब्राह्मणों के पिता परशुराम को अपने सिर पर बिठाकर नचाया।
सामी पेरियार ने फुले-आंबेडकरवाद से आगे बढ़कर अ-ब्राह्मणवाद को आक्रामक नास्तिकता से जोड़कर ‘पेरियारवाद‘ को साबित किया और ब्राह्मण संस्कृति, यानी राम, गणपति और सरस्वती के खिलाफ सड़कों पर उतरकर ज़मीनी लड़ाई लड़ी और जीत हासिल की। लालू-मुलायम संघ-बीजेपी के खिलाफ सिर्फ राजनीतिक मैदान में लड़ते रहे। लालू-मुलायम सांस्कृतिक मैदान पर नहीं लड़ सकते थे, जहां संघ-बीजेपी की जान बसी हुयी है। कांशीराम साहेब ने संघ-बीजेपी के खिलाफ न तो राजनीतिक मैदान में लड़ाई लड़ी और न ही सांस्कृतिक मैदान में! बहुजन नेता कांशीराम, लालू, मुलायम ब्राह्मणवाद के खिलाफ लड़ाई में पूरी तरह हार चुके हैं। नेता गलतियां कर सकते हैं, कार्यकर्ता उन्हें बार-बार क्यों दोहराएं? उन्हें पेरियारवाद का वह सफल मॉडल क्यों नहीं दिखता जो जिंदा है और सफलता से काम भी कर रहा है? आज भी देश भर के प्रोग्रेसिव कार्यकर्ता, नेता और बहुजन बुद्धिवादी विद्वान लोग कांशीराम-लालू-मुलायम के मरे हुये मॉडल (Dead Model) को अपना रहे हैं। इसी वजह से संघ-बीजेपी के लिए मैदान साफ हो जाता है और उनकी पेशवाई का रामरथ पूरे देश में धूम मचा रहा है।
पेरियार, जिन्होंने ब्राह्मणवाद के खिलाफ कामयाबी से लड़ाई लड़ी, लेकीन जाति व्यवस्था के खिलाफ लड़ने में नाकाम रहे। हालांकि ब्राह्मणवाद और जाति व्यवस्था एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, लेकिन वे दो अलग-अलग पहलू हैं, इसलिए पेरियार साहब को कभी एहसास नहीं हुआ कि ब्राह्मणवाद और जाति व्यवस्था के खिलाफ लड़ने का प्रोग्राम अलग-अलग हो सकता है। पेरियारवाद की सीमाएं ((Limitations-circumscription) यह हैं कि उन्होंने जाति खत्म करने के लिए कोई ठोस प्रोग्राम नहीं बनाया। डॉ. बाबासाहेब ने 1944 में जो पहला संविधान (States and Minorities) लिखा था, उसमें उन्होंने दो प्रोग्राम दिए थे, क्लास सिस्टम को खत्म करने के लिए उद्योग-क्षेत्रका राष्ट्रीयकरण और जातिव्यवस्था को खत्म करने के लिए ज़मीन का राष्ट्रीयकरण (Nationalization of Industry and Land)। उसके साथ उन्होंने राज्य-समाजवाद (State Socialism) और स्वतंत्र मतदर संघ (Separate Constituency) का एक बहुत बड़ा क्रांतिकारी हत्यार (Weapons) भी दिये थे। लेकिन डॉ. बाबासाहब ने ब्राह्मणवादी छावणी (कांग्रेस) से दोस्ती करके जो दूसरा संविधान बनाया वो जातिसंघर्ष और वर्ग संघर्ष का समन्वय करानेवाला संविधान है। डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर के इस फिलॉसॉफिकल समझौते ने जातिवाद के खिलाफ लड़ाई को नरम कर दिया और पेशवाओंकी ब्राह्मणवादी प्रतिक्रांती का रास्ता आसान कर दिया। इसलिए, पेरियार कहते हैं- “भारतीय संविधान जाति व्यवस्था और ब्राह्मणवाद के लिए फायदेमंद है”। पेरियार सिर्फ इतना कहकर नहीं रुके, उन्होंने संविधान के कुछ पन्ने भी सबके सामने जला दिए। लेकिन, पेरियार जब दूसरे (authoritative) संविधान का विरोध कर रहे थे तब उन्होंने पहले संविधान की ओर ध्यान नहीं दिया, यह पेरियारवाद की एक गंभीर भूल (मर्यादा) थी! भूमि पुनर्वितरण (Land redistribution) अथवा भूमि के राष्ट्रीयकरण के बिना जाति व्यवस्था को हमेशा के लिए जलाकर नष्ट नहीं किया जा सकता।
पेरियारवाद जाति के अंत की ओर बढ़ने का प्रथम चरण है। उसके पश्चात कॉमरेड शरद पाटिल का सौत्रान्तिक मार्क्सवाद जाति-वर्ग-गुलामी को जड से नष्ट करने का दूसरा चरण है। यदि भारतीय राजनीति को जाति-वर्ग-स्त्रीगुलामी के अंत की दिशा नहीं दी गई तो युवा वर्ग इन दिशाहीन एवं भ्रामक पोखर (Pond)– कभी अन्ना हजारे, कभी आप पार्टी, कभी काकरोच पार्टी- में गोते लगाता रहेगा और एक दिन डूबकर मर जाएगा, इसमें कोई संदेह नहीं है।
-प्रोफे. श्रवण देवरे,
OBC पॉलिटिकल अलायंस,
मोबाइल- 81 77 86 12 56
Email: [email protected]
ज़रूरी सूचना-
1) आर्टिकल का यह आखरी छठा (P6) पार्ट दैनिक बहुजन भारत मे 29 मई 2026 को प्रकाशित हुआ है।
2) या लेखाची मराठी pdf (P6) फाइल हवी असल्यास पुढील लिंक वर क्लिक करा- https://drive.google.com/file/d/1XprcjypEm4xv0HCfeHkVJO0mPo8AAgZ5/view?usp=drive_link
3) इस आर्टिकल की हिंदी pdf (P6) फाइल के लिए, निचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें-
https://drive.google.com/file/d/1LwlkrAPxTvCQTxU0EpTe_178r-wFUAvX/view?usp=drive_link
4) For English pdf file of this last article (P6) please click following Link- https://drive.google.com/file/d/16Q53FfN77uFekBqPlO93BqWIYnrNMSgR/view?usp=drive_link
5) जिनको यही विचार संक्षिप्त मे हिन्दी मे सुनना है वो बहुजन-85 चॅनल की VDO लिंक क्लिक करे- लिंक-
https://youtu.be/3jDC9Si3UAQ?si=T4GQ05SbWZ09mGLM




