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पंजाब में भीषण बाढ़ के संभावित कारण तथा सिंधु जल विवाद से कोई संबंध

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(यह रिपोर्ट grok. com की सहायता से तैयार की गई है जो बहुत वास्तविक प्रतीत होती है: एस आर दारापुरी, राष्ट्रीय अध्यक्ष, आल इंडिया पीपुल्स फ्रन्ट)

पंजाब में भीषण बाढ़ के संभावित कारण

एस आर दारापुरी

 (समाज वीकली)   उत्तरी भारत और पूर्वी पाकिस्तान के कुछ हिस्सों में फैला एक उपजाऊ क्षेत्र, पंजाब, अपनी भौगोलिक स्थिति, नदी प्रणालियों और मौसमी मौसम के कारण बाढ़ के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है। यह क्षेत्र सिंधु बेसिन की प्रमुख नदियों, जिनमें सतलुज, व्यास, रावी, चिनाब और झेलम शामिल हैं, से घिरा हुआ है, जिनका उद्गम हिमालय से होता है और मानसून के मौसम (आमतौर पर जून से सितंबर) के दौरान भारी मात्रा में पानी लाती हैं। इस क्षेत्र में बाढ़ भारतीय पंजाब और पाकिस्तानी पंजाब, दोनों को प्रभावित कर सकती है, अक्सर एक साथ, जैसा कि 2025 की विनाशकारी बाढ़ में देखा गया था जिसने सीमा पार लाखों लोगों को प्रभावित किया था। नीचे, मैं पर्यावरणीय, जलवायु और मानवीय कारकों को ध्यान में रखते हुए, हाल के और ऐतिहासिक पैटर्न के आधार पर प्रमुख कारणों की रूपरेखा प्रस्तुत करूँगा।

  1. भारी मानसूनी वर्षा और चरम मौसम की घटनाएँ

– तीव्र और लंबे समय तक चलने वाली मानसूनी वर्षा पंजाब में बाढ़ का मुख्य कारण है। 2025 में, उत्तरी भारत और पाकिस्तान में दशकों की सबसे भारी बारिश हुई, और पंजाब में अकेले अगस्त में औसत से 74% अधिक बारिश हुई। इसके कारण सतलुज, व्यास, रावी और घग्गर जैसी नदियाँ तेज़ी से उफान पर आ गईं, जिससे विशाल कृषि भूमि और गाँव जलमग्न हो गए।

– हिमालयी राज्यों/क्षेत्रों (जैसे, भारत में हिमाचल प्रदेश, जम्मू और कश्मीर, या उत्तरी पाकिस्तान) में ऊपरी धाराओं में होने वाली वर्षा पंजाब के समतल मैदानों में निचले धाराओं में बाढ़ को बढ़ा देती है, जहाँ पानी की निकासी के लिए कोई जगह नहीं होती।

– जलवायु परिवर्तन ने इन घटनाओं को और तीव्र कर दिया है, जिससे मानसून अधिक अनिश्चित और घातक हो गया है। अध्ययनों से संकेत मिलता है कि ग्लोबल वार्मिंग भारी बारिश की संभावना को बढ़ा देती है, जिससे इस क्षेत्र में भूस्खलन और अचानक बाढ़ आने की संभावना बढ़ जाती है।

  1. नदी का अतिप्रवाह और जल प्रबंधन का खराब बुनियादी ढाँचा

– पंजाब की नदियाँ अक्सर गाद जमाव (नदी की क्षमता को कम करने वाली तलछट का जमाव), तटबंधों में दरार, या अत्यधिक बारिश के दौरान ऊपरी धाराओं के बाँधों से अचानक पानी छोड़े जाने के कारण उफान पर आ जाती हैं। उदाहरण के लिए, 2025 में, भारत में पोंग और भाखड़ा जैसे बांधों से नियंत्रित जल-त्याग ने भारतीय पंजाब में निचले इलाकों में जलप्लावन को बढ़ावा दिया।

– पाकिस्तान के पंजाब में भी इसी तरह की समस्याएँ उत्पन्न होती हैं, जहाँ दबाव के कारण बैराज और नहरें टूट जाती हैं, जैसा कि रावी नदी द्वारा लाहौर जैसे शहरी इलाकों में बाढ़ आने पर देखा गया। 2022 जैसी ऐतिहासिक बाढ़ें, अपर्याप्त बाढ़ अवरोधों और पूर्व चेतावनी प्रणालियों को उजागर करती हैं।

– पंजाब में समतल स्थलाकृति एक प्राकृतिक “सिंक” के रूप में कार्य करती है, जहाँ पानी आसानी से जमा हो जाता है, जिससे बाढ़ लंबी हो जाती है और व्यापक फसल क्षति होती है (उदाहरण के लिए, 2025 में भारतीय पंजाब में 175,000 एकड़ से अधिक भूमि जलमग्न हो गई) ।

  1. मानवीय और विकासात्मक कारक

– शहरीकरण, वनों की कटाई और नदी तटों पर अतिक्रमण प्राकृतिक अवशोषण को कम करते हैं और बाढ़ के मैदानों को संकरा करते हैं, जिससे अपवाह बिगड़ता है। दोनों पंजाबों में, नदियों के किनारे अवैध निर्माणों ने जल निकासी चैनलों को अवरुद्ध कर दिया है।

– कृषि पद्धतियाँ, जिनमें अत्यधिक सिंचाई और खराब भूमि प्रबंधन शामिल हैं, मृदा अपरदन और जल धारण क्षमता में कमी लाती हैं।

– अपर्याप्त बुनियादी ढाँचा, जैसे पुरानी जल निकासी प्रणालियाँ और निकासी में देरी, प्रभावों को और बढ़ा देती है—केवल 2025 में ही पाकिस्तान के पंजाब में लगभग 10 लाख लोगों को निकाला गया।

ये कारण आपस में जुड़े हुए हैं, और जलवायु परिवर्तन प्राकृतिक और मानव-जनित कमज़ोरियों को बढ़ाने में सहायक है।

 चल रहे सिंधु जल संधि विवाद से संबंध

1960 में हस्ताक्षरित और विश्व बैंक द्वारा मध्यस्थता की गई सिंधु जल संधि (IWT), सिंधु नदी प्रणाली के जल को भारत (पूर्वी नदियों: सतलुज, व्यास, रावी पर नियंत्रण) और पाकिस्तान (पश्चिमी नदियाँ: सिंधु, झेलम, चिनाब) के बीच आवंटित करती है। इसे संघर्षों को रोकने के लिए डिज़ाइन किया गया था, जिसमें भारत द्वारा ऊपरी जल प्रवाह में हेरफेर करके पाकिस्तान में बाढ़ या सूखा पैदा करने की क्षमता भी शामिल है। हालाँकि, भारतीय बाँध परियोजनाओं (जैसे, चिनाब और झेलम पर), जलवायु दबाव और भू-राजनीतिक तनावों को लेकर विवादों के कारण यह संधि तनाव में रही है।

– बाढ़ से सीधा संबंध? आरोप हैं, खासकर पाकिस्तान की ओर से, कि इस विवाद के बीच भारत की कार्रवाइयों ने पाकिस्तान के पंजाब में बाढ़ को और बढ़ा दिया है। 2025 में, पाकिस्तान ने एक आतंकवादी हमले के बाद संधि को निलंबित करके भारत पर “पानी का हथियारीकरण” करने का आरोप लगाया, जिसके कारण कथित तौर पर भारतीय बांधों से अघोषित पानी छोड़ा गया जिससे निचले इलाकों में बाढ़ की स्थिति और बिगड़ गई। उदाहरण के लिए, रावी नदी पर बैराजों में दरारों का संबंध भारत द्वारा वास्तविक समय के जल विज्ञान संबंधी आंकड़े साझा करने या बाढ़ की उचित चेतावनी देने में विफलता से था, जो संधि के प्रोटोकॉल का उल्लंघन था।

– भारत का दृष्टिकोण और विशेषज्ञ राय: भारत जानबूझकर बाढ़ आने से इनकार करता है, और भारी बारिश जैसे प्राकृतिक कारणों को इसके लिए जिम्मेदार ठहराता है, और पाकिस्तान पर अपने बुनियादी ढांचे का रखरखाव न करने का आरोप लगाता है। विशेषज्ञ इस बात पर ज़ोर देते हैं कि हालाँकि यह विवाद सहयोग (जैसे, डेटा साझाकरण) में बाधा डालता है, लेकिन 2025 की बाढ़ का मुख्य कारण जलवायु परिवर्तन है, न कि जानबूझकर की गई तोड़फोड़। संधि के निलंबन ने भविष्य में और भी बदतर संकटों की आशंकाएँ बढ़ा दी हैं, क्योंकि यह संयुक्त बाढ़ प्रबंधन के तंत्र को हटा देता है।

– भारतीय पंजाब पर प्रभाव: इस विवाद का यहाँ प्रत्यक्ष प्रभाव कम है, क्योंकि बाढ़ का कारण भारत के आंतरिक नदी प्रबंधन और भारत के भीतर ऊपरी इलाकों में होने वाली बारिश ज़्यादा है। हालाँकि, व्यापक तनाव सिंधु बेसिन में साझा जलवायु जोखिमों से निपटने के द्विपक्षीय प्रयासों को अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित कर सकते हैं।

संक्षेप में, हालाँकि सिंधु जल संधि विवाद ने दोषारोपण को बढ़ावा दिया है और सहयोग को कम किया है—जो खराब डेटा साझाकरण या अनियंत्रित जल निकासी के कारण पाकिस्तान के पंजाब में बाढ़ की स्थिति को और बदतर बना सकता है—लेकिन इसके मूल कारण जलवायु और बुनियादी ढाँचे से जुड़े हैं। इस संधि को मज़बूत करने से दोनों पक्षों के लिए भविष्य के जोखिमों को कम करने में मदद मिल सकती है।

सौजन्य: grok.com

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