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संत रैदास (रविदास) का जीवन और मिशन‘ तथा बेगमपुरा की अवधारणा

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एस आर दारापुरी आई. पी. एस. (से. नि.)

 (समाज वीकली) 

  1. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
एस आर दारापुरी

संत रैदास, जिन्हें रविदास के नाम से भी जाना जाता है, 15वीं–16वीं शताब्दी के एक महान भक्ति संत, कवि और समाज सुधारक थे। उनका जन्म लगभग 1450 ई. में सीर गोवर्धनपुर (वाराणसी के निकट) माना जाता है। वे चर्मकार (चमार) समुदाय में जन्मे थे, जिसे ब्राह्मणवादी सामाजिक व्यवस्था में अछूत माना जाता था।

उनका सामाजिक अनुभव ही उनके चिंतन और संघर्ष का मूल आधार बना। उन्होंने जन्म-आधारित ऊँच–नीच और धार्मिक बहिष्कार का जीवन भर विरोध किया।

  1. आध्यात्मिक दर्शन

संत रैदास निर्गुण भक्ति परंपरा के प्रमुख संत थे। वे साकार मूर्ति-पूजा, कर्मकांड और पुरोहिती वर्चस्व को अस्वीकार करते थे। उनकी भक्ति का आधार था:   बाहरी आडंबर के बजाय आंतरिक शुद्धता, सभी मनुष्यों की समानता, जाति-आधारित भेदभाव का विरोध तथा नैतिक जीवन को ही सच्चा धर्म मानना। उनके अनुसार जन्म नहीं, बल्कि कर्म और आचरण मनुष्य का मूल्य निर्धारित करते हैं। उनकी प्रसिद्ध उक्ति इस विचार को स्पष्ट करती है: “मन चंगा तो कठौती में गंगा” अर्थात यदि मन पवित्र है, तो साधारण पात्र में भी गंगा समाहित हो सकती है।

  1. सामाजिक मिशन

संत रैदास का मिशन केवल आध्यात्मिक मुक्ति तक सीमित नहीं था, बल्कि वह गहराई से सामाजिक और क्रांतिकारी था। उनके प्रमुख उद्देश्य थे: जाति-व्यवस्था का उन्मूलन, शोषित और वंचित समुदायों को मानवीय गरिमा प्रदान करना, छुआछूत और ब्राह्मणवादी प्रभुत्व का विरोध तथा श्रम की प्रतिष्ठा और सम्मान की स्थापना। उन्होंने अपनी रचनाएँ लोकभाषा में कीं, जिससे धर्म और ज्ञान आम जनता तक पहुँचा। उनकी कई वाणियाँ गुरु ग्रंथ साहिब में भी संकलित हैं, जो उनकी व्यापक सामाजिक और धार्मिक स्वीकार्यता को दर्शाता है।

  1. रैदास और भक्ति आंदोलन की क्रांतिकारी धारा

रैदास भक्ति आंदोलन की उस क्रांतिकारी धारा से जुड़े थे, जिसमें कबीर, चोखामेला और नामदेव जैसे संत शामिल थे। यह धारा जाति व्यवस्था को स्वीकार नहीं करती थी, बल्कि उसके नैतिक आधार पर ही प्रश्नचिह्न लगाती थी। उनकी वाणी में सामाजिक अन्याय, धार्मिक पाखंड और ऊँच–नीच के विरुद्ध स्पष्ट प्रतिरोध दिखाई देता है।

बेगमपुरा की अवधारणा

  1. बेगमपुरा का अर्थ:

बेगमपुरा का शाब्दिक अर्थ है – “दुखरहित नगर” (बेगम = दुखरहितपुरा = नगर)। यह संत रैदास की सबसे प्रसिद्ध और क्रांतिकारी सामाजिक कल्पना है, जिसे उन्होंने अपनी वाणी में इस प्रकार व्यक्त किया:

“बेगमपुरा शहर को नाँव,
दुख अन्दोह नहीं तिहि ठाँव।”

अर्थात, वह नगर जहाँ कोई दुख, भय या शोषण नहीं है।

  1. बेगमपुरा की विशेषताएँ

बेगमपुरा एक आदर्श, समतामूलक समाज की कल्पना है, जिसकी मुख्य विशेषताएँ हैं: जाति और सामाजिक श्रेणीकरण का अभाव, गरीबी, शोषण और बेगार का अंत, जन्म या पेशे के आधार पर कोई भेदभाव नहीं, आवागमन और आजीविका की स्वतंत्रता तथा सभी नागरिकों के लिए समान अधिकार और सम्मान।

महत्वपूर्ण बात यह है कि बेगमपुरा कोई स्वर्ग या परलोक नहीं, बल्कि धरती पर ही स्थापित किया जाने वाला समाज है।

  1. सामाजिक और राजनीतिक महत्व

यद्यपि बेगमपुरा को भक्ति की भाषा में प्रस्तुत किया गया है, फिर भी यह मूलतः एक सामाजिक–राजनीतिक यूटोपिया है। यह सीधे-सीधे: सामंती और जातिगत शोषण को, जन्म आधारित नागरिकता की अवधारणा को तथा धर्म के नाम पर असमानता को वैध ठहराने की प्रवृत्ति को चुनौती देता है।

यह विचार आगे चलकर डॉ. भीमराव आंबेडकर की सामाजिक लोकतंत्र की अवधारणा (स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व) से गहरे रूप में जुड़ता है।

  1. दलित चेतना और बेगमपुरा

आज बेगमपुरा दलित–बहुजन चिंतन का केंद्रीय प्रतीक बन चुका है। यह जाति-मुक्त समाज की आकांक्षा, अपमान और उत्पीड़न के विरुद्ध नैतिक प्रतिरोध तथा व्यक्तिगत मोक्ष के बजाय सामूहिक मुक्ति का सपना दर्शाता है।

इस अर्थ में, बेगमपुरा सामाजिक न्याय का एक प्रारंभिक खाका (ब्लूप्रिंट) है।

निष्कर्ष

संत रैदास केवल एक भक्ति संत नहीं, बल्कि जाति-विरोधी सामाजिक क्रांतिकारी थे। उनका जीवन और विचार: जाति व्यवस्था के नैतिक आधार को चुनौती देता है। समानता और मानवीय गरिमा की स्थापना करता है तथा एक ऐसे समाज की कल्पना करता है, जहाँ सभी मनुष्य समान हों। बेगमपुरा आज भी एक सपना नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण समाज के निर्माण का आह्वान है।

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