समाज वीकली यू के

डॉ. रामजीलाल, समाज वैज्ञानिक,
पूर्व प्रिंसिपल, दयाल सिंह कॉलेज,
करनाल (हरियाणा, भारत)।
ईमेल: [email protected]
प्रथम विश्व युद्ध (सन् 1914 – सन् 1918) के समय अंग्रेजी सरकार का यह कहना था कि ‘युद्ध स्वतंत्रता के लिए’ लड़ा जा रहा है. इस युद्ध में भारतीयों के द्वारा ब्रिटिश साम्राज्यवादी की अभूतपूर्व सहायता की गई थी. सन् 1914- सन् 1916 तक 1,92,000 भारतीय सैनिकों में पंजाब के सैनिकों की संख्या 1,10,000 थी . भारतीय जनता ने केवल सैनिक ही नहीं दिए अपितु 2 करोड रुपए युद्ध का चंदा तथा 10 करोड रुपए ब्याज के रूप में भी दिए. इसके अतिरिक्त ब्रिटिश साम्राज्यवादी सरकार ने भारतीय जनता से चंदा स्वैच्छिक तथा बलपूर्वक चंदा भी लिया.
प्रथम विश्व युद्ध (सन् 1914 – सन् 1918): असंतोष की चरम सीमा
प्रथम विश्वयुद्ध में 43,000 सैनिकों की मृत्यु के कारण सैनिक परिवारों के आर्थिक स्थिति बहुत अधिक खराब हो गई .युद्ध के दौरान जनता से बलपूर्वक युद्ध का चंदा इकट्ठा करना, अभूतपूर्व महंगाई ,बेरोजगारी,भूखमरी,जनता पर कर्ज , महामारी, असंतुलित मानसून, आर्थिक मंदी का दौर ,गदर पार्टी के क्रांतिकारी आंदोलन का पंजाबी युवाओं पर निरंतर बढ़ता हुआ प्रभाव एवं तुर्की में पैन इस्लामिक मूवमेंट के कारण भारतीय जनता में भी असंतोष की भावना चरम सीमा पर थी.
क्रांतिकारी आंदोलन का खतरा :डिफेंस ऑफ़ इंडिया एक्ट, 1915
बंगाल और पंजाब में क्रांतिकारी हमले, फरवरी 1915 में ब्रिटिश इंडियन आर्मी में विद्रोह की योजना,सन् 1914 और सन् 1917 के बीच भारत, अमेरिका और जर्मनी में भारतीय राष्ट्रवादियों द्वारा प्लान किए गए कई विद्रोह, ग़दरवादी क्रांतिकारी आंदोलन का खतरा, एडमिनिस्ट्रेशन के कमज़ोर होने का खतरा, और जाने-माने ग़दरवादी क्रांतिकारियों की गिरफ्तारी, ब्रिटिश युद्ध की कोशिशों को चुनौती, और भारत में अलगाववादी आंदोलन के खतरे इत्यादि की संभावना के कारण डिफेंस ऑफ़ इंडिया एक्ट 1915 पास हुआ, जिससे भारतीयों की नागरिक और राजनीतिक आज़ादी पर रोक लग गई. उस समय के लेफ्टिनेंट गवर्नर, माइकल ओ’डायर, पंजाब में ग़दरवादी खतरे की बढ़ती संभावना के कारण इस एक्ट के पक्के समर्थक थे.
अराजक और क्रांतिकारी क्रिमिनल एक्ट, 1919
ब्रिटिश साम्राज्यवादी सरकार ने असहमति को दबाने के लिए अराजक और क्रांतिकारी क्रिमिनल एक्ट, 1919 (रॉलेट एक्ट) लागू किया.इन अधिनियम के अंतर्गत प्रेस पर नियंत्रण, स्वतंत्र आंदोलन को रोकना, नेताओं पर बिना मुकदमा चलाए जेल में डालना, बिना वारंट गिरफ्तार करना एवं विशेष न्यायाधिकरणों तथा बंद कमरों में बिना किसी जिम्मेवारी के अभियोग चलाना इत्यादि अधिकार सरकार को दिए गए.
रॉलेट एक्ट, 1919 :भारत की तीव्र प्रतिक्रिया
भारत में रॉलेट एक्ट के विरुद्ध तीव्र प्रतिक्रिया हुई, मुहम्मद अली जिन्ना ने अपनी बॉम्बे सीट से इस्तीफ़ा दे दिया. इस एक्ट की आलोचना करते हुए उन्होंने वायसराय को एक पत्र में लिखा, “इसलिए, बिल के पास होने और जिस तरह से इसे पास किया गया, उसके विरोध में मैं अपना इस्तीफ़ा देता हूँ… जो सरकार शांति के समय में ऐसा कानून पास करती है या मंज़ूरी देती है, वह सभ्य सरकार कहलाने का अपना दावा खो देती है.” इसके अतिरिक्त महात्मा गांधी, जिन्होंने ब्रिटिश सरकार की युद्ध के समय सहायता की थी उन्होंने रॉलेट एक्ट के खिलाफ विरोध का ज़ोरदार आह्वान किया.. इन ‘काले कानूनों’ के खिलाफ ‘कोई अपील नहीं, कोई दलील नहीं, कोई वकील नहीं’ का नारा पूरे भारत में गांवों की झौपड़ियों से लेकर देश की राजधानी – नई दिल्ली तक हर घर में गूंज उठा.
परंतु सर्वाधिक विरोध पंजाब में हुआ.10 अप्रैल 1919 को, मशहूर राष्ट्रीय नेताओं -सत्यपाल और सैफुद्दीन किचलू की रिहाई के लिए अमृतसर के तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर माइल्स इरविंग के घर पर आंदोलनकारियों ने विरोध प्रदर्शन किया किया.12 अप्रैल की शाम को यह घोषणा की कि अगले दिन (13 अप्रैल)16:30 बजे अमृतसर के जलियांवाला बाग में इनका विरोध करने के लिए जन सभा आयोजित की जाएगी ..दूसरी तरफ साम्राज्यवादी सरकार ने 13 अप्रैल को पंजाब में मार्शल लॉ लगा दिया गया.
जलियांवाला बाग सुनियोजित नरसंहार:13 अप्रैल 1919 बैसाखी (“वैसाखी”) का त्यौहार
13 अप्रैल 1919 को जलियांवाला बाग में वैशाखी मनाने और रौल्ट एक्ट का विरोध करने के लिए लगभग 20,000 लोग शांतिपूर्ण सभा कर रहे थे. इस शांतिपूर्ण समारोह पर सुनियोजित योजना के आधार पर भारतीयों को सबक सिखाने के लिए ब्रिगेडियर जनरल रेजीनाल्ड एडवर्ड डायर ने शाम 5.15 बजे नेपाली मूल के गोरखा और ब्रिटिश इंडियन आर्मी के सिख सैनिकों की टुकड़ी के साथ सभा स्थल को घेर लिया और बिना किसी चेतावनी के गोली चलाने के आदेश दिए .सैनिक टुकड़ी ने लगभग 1650 गोलियां फायर की तथा फायरिंग गोलियां समाप्त होने तक चलती रही. लगभग 15 मिनट में अमृतसर के सिविल सर्जन डॉ. स्मिथ के अनुसार 1800 लोग मारे गए. मरने वालों में 41 लड़के व एक 6 सप्ताह की बच्ची भी थी. इस हत्याकांड में 1200लोग घायल हुए थे. ब्रिटिश सरकार के द्वारा 581 व्यक्तियों पर मुकदमें चलाए गए और उन में से 108 व्यक्तियों को मृत्यु दंड,265 व्यक्तियों को आजीवन कारावास ,85 व्यक्तियों को सात-सात वर्ष की कैद और शेष को अपमानित किया गया .
भारत में जनता का गुस्सा सातवें आसमान:
जलियांवाला बाग हत्याकांड सन् 1857 की जनक्रांति के पश्चात रक्तरंजित बर्बरता, निर्दयता एवं अमानवीय नरसंहार 20वींशताब्दी प्रथम मिसाल थी. समस्त भारत में जलियांवाला बाग सुनियोजित नरसंहार के परिणाम स्वरूप जनता का गुस्सा सातवें आसमान पर था और इसके बाद जन आंदोलन, किसानों और मजदूरों के संघर्षों एवं राष्ट्रीय आंदोलन में एक नया मोड़ आया .दूसरे शब्दों में ब्रिटिश साम्राज्यवाद पतन की ओर अग्रसर हुआ.
जलियांवाला बाग हत्याकांड : शहीद-ए-आज़म उधम सिंह
उधम सिंह (जन्म -26 दिसंबर 1899 -शहीदी दिवस-31 जुलाई, 1940) – जलियांवाला बाग हत्याकांड का चश्मदीद गवाह था . इसलिए उसने इस राष्ट्रीय अपमान का बदला लेने की कसम खाई थी. 26 दिसंबर 1899 को उधम सिंह का जन्म पिताजी सरदार टहल सिंह कंबोज व माता जी नारायणकौर के घर हुआ इनका बचपन का नाम शेर सिंह तथा इनके भाई का नाम साधु सिंह था. बचपन में उनकी माता जी का सन् 1901 तथा पिताजी का सन् 1907 में देहांत हो गया. किशन सिंह रागी ने दोनों भाइयों – शेर सिंह व साधु सिंह को सेंट्रल खालसा अनाथालय पुतलीघर, अमृतसर में भर्ती कराया जहां सिक्ख धर्म की परम्पराओं के अनुसार इनका नाम शेर सिंह से उधम सिंह और साधु सिंह का नाम मुक्ता सिंह रखा गया.उधम सिंह ने मैट्रिक परीक्षा पास करने के पश्चात अनाथालय छोड़ दिया .
हालाँकि शुरू में उनका लक्ष्य ब्रिगेडियर जनरल रेजीनाल्ड एडवर्ड डायर की हत्या करना था – जिनकी सन् 1927 में मृत्यु हो गई थी. उधम सिंह ने 13 मार्च, 1940 को लंदन के कैक्सटन हॉल में एक भाषण के दौरान माइकल ओ’डायर की हत्या करके अपनी प्रतिज्ञा पूरी की. अपने कृत्य के बाद, सिंह ने आत्मसमर्पण
समर्पण करके सिद्ध कर दिया कि वास्तव में वे भारत के शेर हैं और 31 जुलाई, 1940 को उन्हें फाँसी दे दी गई. सन् 1952 में, भारत के प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू ने सिंह को सम्मानित किया, उन्हें “शहीद-ए-आज़म उधम सिंह” के रूप में नामित किया और टिप्पणी की, “मैं शहीद-ए-आज़म उधम सिंह को अपनी सम्मानजनक श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ, जिन्होंने फाँसी के फंदे को चूमा ताकि हम आज़ाद हो सकें.”
निष्कर्षत: जलियांवाला बाग नरसंहार, जो बैसाखी के दिन हुआ, भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में एक महत्वपूर्ण मोड़ था. उधम सिंह का संघर्ष, बलिदान, राष्ट्रवादी भावना, समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष विचारधारा वाला जीवन सदैव युवाओं के लिए प्रेरणा स्रोत का काम करता रहेगा.



