
समाज वीकली यू के
करनाल, (कर्मबीर): प्रथम और द्वितीय विश्व युद्धों में भारतीयों ने अदम्य साहस और वीरता का परिचय दिया था। भारतीयों की वीरता का जिक्र तत्कालीन ब्रिटिश सैन्य उच्च अधिकारियों ने भी किया है। उन्होंने माना था कि भारतीय सैनिकोंके बिना वे विश्व युद्ध नहीं जीत सकते थे।
द्वितीय विश्व युद्ध विराम के बाद भारत के तत्कालीन कमांडर इन चीफ फील्ड मार्शल क्लाउड औचिनलेक ने कहा था कि ब्रिटेन दोनों युद्धों में सफल नहीं होता यदि उसके पास भारतीय सेना न होती। द्वितीय विश्व युद्ध में 87000 से ज्यादा भारतीय सैनिक और लगभग 30 लाख नागरिक मारे गए थे।
दयाल सिंह कॉलेज के पूर्व प्राचार्य एवं प्रमुख शिक्षाविद् डॉ. रामजीलाल बताते हैं कि प्रथम विश्व युद्ध (1914- 1918) में ब्रिटिश सरकारने भारतीयों को आश्वासन दिया था कि यह युद्ध स्वतंत्रता के लिए लड़ा जा रहा है तब भारतीयों ने ब्रिटिश सरकार की पूरी मदद की। 1914 से 1916 तक 192000 भारतीय सैनिकों में संयुक्त पंजाब के सैनिकों की संख्या 110000 थी। जनता ने केवल सैनिक ही नहीं दिए अपितु 2 करोड़ रुपए युद्ध का चंदा दिया था।
प्रथम विश्व युद्ध (जनवरी 1915 से नवम्बर 1918) में हरियाणा क्षेत्र (तत्कालीन संयुक्त पंजाब का हिस्सा) से 84001 सैनिकों की भर्ती हुई। इनमें करनाल जिले के 6553 सैनिक थे। हरियाणा क्षेत्र द्वारा युद्ध में 84 लाख 33 हजार 666 रुपए वार फंड के रूप में दिए गए। इनमें करनाल जिले का योगदान 2445226 रुपए था।
विश्व युद्ध में 43000 सैनिकों की मृत्यु के कारण सैनिक परिवारों के आर्थिक स्थिति बहुत अधिक खराब हो गई थी। उन्होंने कहा कि सुभाष चंद्र बोस द्वारा गठित आजाद हिंद फौज ने भारत के पूर्वी क्षेत्र पर हमला कर दिया। आजाद हिंद फौज में हरियाणा के 398 अधिकारी तथा 2317 सैनिक थे। एक अन्य स्रोत के अनुसार हरियाणा से 2847 सैनिक थे जिनमें से 346 सैनिक वीरों ने अपनी कुर्बानी देकर देश की स्वतंत्रता के लिए अभूतपूर्व योगदान दिया। इनमें करनाल जिले के 119 सैनिक और 14 अधिकारी थे जिनमें से जिले के 5 सैनिक तथा अधिकारी शहीद हुएथे।
डॉ. रामजीलाल ने कहा कि फौज में तब भर्ती होने का मूल कारण आर्थिक स्थिति तो था ही वहीं फौजी को बूट, सूट और सैल्यूट सम्मान की बात लगती थी। आज भी भारतीय युवाओं में सेना के प्रति जोश और जज्बा है जिसे पूरी दुनिया देख रही है। दूसरी ओर संयुक्त पंजाब में ब्रिटिश हुकूमत की ओर से सैनिकों की जरूरत पडने पर नौजवानों को फौज में भर्ती के लिए गांवों में संदेश भेजे जाते थे। युवाओं को जबरदस्ती भी फौज में ले जाया जाता था। करनाल जिले के कई गांवों में ऐसे अनेक नाम मिल जाएंगे जो तत्कालीन ब्रिटिश भारतीय सैनिक वापस कभी घर नहीं लौटे।
(साभार पंजाब केसरी)


