शिक्षा, संघर्ष और समर्पण: एल. आर. बाली जी के जीवन से सीख
बाली जी की श्रद्धांजलि सभा गाजियाबाद (यूपी) में आयोजित की गई
गाज़ियाबाद (समाज वीकली): समाजसेवी, शिक्षाविद् और जन-आंदोलन के प्रतिबद्ध कार्यकर्ता एल. आर. बाली की द्वितीय पुण्यतिथि के अवसर पर दिनांक 06 जुलाई 2025को ग्लोबल कॉलेज ऑफ लॉ, डासना, गाज़ियाबाद में एक भावपूर्ण श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया। इस अवसर पर अनेक गणमान्य अतिथि, शिक्षाविद, छात्रों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने डॉ. भीमराव आंबेडकर एवं एल. आर. बाली जी के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित की तथा उनकी स्मृति में अपने विचार रखते हुए उनके द्वारा समाज के लिए किए गए कार्यों को याद किया। सामाजिक चेतना के अग्रदूत बाली जी अर्थात लाहौरी राम बाली का संपूर्ण जीवन सामाजिक न्याय, शिक्षा, मानवाधिकार और समानता की लड़ाई को समर्पित रहा है। उन्होंने दलित, वंचित, पिछड़े और अल्पसंख्यक वर्गों के अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष किया और शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का माध्यम माना। वे हमेशा इस बात पर जोर देते थे कि- “अगर शिक्षा सब तक नहीं पहुंची, तो स्वतंत्रता अधूरी है।”
ग्लोबल कॉलेज ऑफ लॉ के संस्थापक डॉ. बी. एस. सत्यार्थी ने अपने उद्बोधन में कहा कि- “बाली जी का जीवन एक मिशन था…। बाली जी की जीवन साधना समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति को ऊपर उठाने की रही। वे सच्चे अर्थों में सामाजिक कार्यकर्ता थे, जो अपने जमीनी कार्य से क्रांति लाना चाहते थे।” वे बाली जी को एक ‘संवेदनशील नेतृत्वकर्ता’ बताते हुए उनके जन-समर्पित जीवन पर संक्षिप्त प्रकाश डाला।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे एल. आर. बाली के वरिष्ठ सहयोगी जो लगभग 51 वर्ष उनके साथ रहेआदरणीयश्री भीष्म पाल सिंह ने कहा कि- “बाली जी शिक्षा को केवल ज्ञान का माध्यम नहीं, बल्कि समाज के लिए परिवर्तन की चाबी मानते थे। उनके विचार आज भी हमारे लिए मार्गदर्शक हैं।”बाली जी का साहित्यिक और सामाजिक योगदान बहुआयामी रहा। उन्होंने 1958 में जालंधर से‘भीम पत्रिका’का संपादन कार्य प्रारंभ किया। यह पत्रिका शुरुआत मेंउर्दू भाषामें प्रकाशित हुई, इसके बादपंजाबी, फिरअंग्रेज़ीऔर अंततः 1965 सेहिंदीमें इसका नियमित प्रकाशन होता रहा। बाली जी के जीवनकाल तक यह पत्रिका अनवरत रूप से सामाजिक चेतना, दलित विमर्श और प्रगतिशील विचारधारा का स्वर बनी रही।उनकी प्रेरणा से अनेक सामाजिक संस्थाएं सक्रिय हुईं और गरीबों को मुफ्त विधिक सलाह, बाल अधिकार, महिला सशक्तिकरण तथा शिक्षा अभियान जैसे कार्य प्रारंभ हुए। उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में पुस्तकालय, नि:शुल्क कोचिंग संस्थान और स्वावलंबन केंद्र स्थापित करने में सहयोग किया।
बैंक से सेवानिवृत्त के. पी. सिंह ने बाली जी के शैक्षिक सुधारों का उल्लेख करते हुए बताया कि- “कैसे उन्होंने ग्रामीण युवाओं के लिए विधिक साक्षरता शिविर और न्याय तक पहुँच अभियान चलाए। इसके लिए उनकी जितनी सराहना की जाए वह कम है। “मैनपुरी से आए श्री चंद्र प्रकाश दिवाकर ने बताया कि बाली जी ने सैकड़ों युवाओं को सामाजिक आंदोलनों से जोड़कर नेतृत्व की दिशा दी। उन्होंने कहा कि– “बाली जी की सोच में समावेशिता थी, वे धर्म, जाति और वर्ग से परे इंसानियत के पक्षधर थे।”इसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए शिवराज सिंह ने अपनी व्यक्तिगत प्रेरणा साझा करते हुए कहा कि– “विचारों से बड़ी कोई पूंजी नहीं होती, अगर वह जनहित के लिए हो।”
शिक्षिका के रूप में कार्यरत डॉ. कामिनी ने बाली जी के सामाजिक आंदोलनों और महिला चेतना में योगदान पर प्रकाश डालते हुए कहा कि– “उन्होंने समाज के उन हिस्सों को आवाज़ दी, जो सदियों से खामोश थे।”
कार्यक्रम का सफ़ल संचालन स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय, मेरठ में हिंदी विषय के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. आशीष दीपांकर ने किया। उन्होंने वक्ताओं को जोड़ते हुए बाली जी के विचारों को वर्तमान संदर्भ में भी प्रासंगिक बताया।अंत में दो मिनट का मौन रखकर बाली जी को श्रद्धांजलि दी गई। साथ ही यह घोषणा की गई कि आगामी वर्षों में भी इस श्रृंखला को हम सभी को मिलकर बनाए रखना है ताकि उनके विचार और कार्य नई पीढ़ी तक पहुँच सकें।कार्यक्रम के समापन के पश्चातकॉलेज के संस्थापक डॉ. बी. एस. सत्यार्थीद्वारा सभी अतिथियों एवं प्रतिभागियों के लिएनाश्ते की विधिवत व्यवस्थाकी गई, जिसके लिए हम सभी उनकातहे दिल से आभारएवंहार्दिक सराहनाकरते हैं।



