समाज वीकली यू के
डॉ. सुजाता एच. गौरखेडे
प्रस्तावना:
डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर का जीवन और विचारधारा केवल दलित चेतना की धुरी नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता, समता और न्याय की मशाल रहे हैं। उनके चिंतन और संघर्ष ने भारत के संविधान को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आज जब राष्ट्रवाद और धर्म आधारित विमर्शों की पुनर्रचना की जा रही है, तो डॉ. आंबेडकर की वैचारिकी के साथ छेड़छाड़ और उनके विचारों का प्रतीकात्मक राजनीतिक दोहन चिंता का विषय बन गया है।
डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के विरोधाभासी प्रस्तुतिकरण
डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर को सांप्रदायिक और धार्मिक प्रतीकों से जोड़कर प्रस्तुत करना उनके मूल विचारों के साथ सरासर धोखा है। उनके जीवन और चिंतन को विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा अपने-अपने एजेंडे के अनुरूप ढाला जा रहा है:
प्रतीकात्मक अपमान के उदाहरण:
1. तंजावुर, तमिलनाडु (दिसंबर 2022):
बाबा साहेब की प्रतिमा को भगवा वस्त्र पहनाकर, माथे पर तिलक और भस्म लगाया गया। यह कृत्य “बदू मक्कल कांची” द्वारा किया गया, जिसके एक पदाधिकारी को बाद में पुलिस ने हिरासत में लिया।
2. उत्तर प्रदेश (2018):
भाजपा विधायक मंजू देवी ने डॉ. आंबेडकर की मूर्ति पर दूध चढ़ाकर उन्हें भगवा वस्त्र पहनाए, जिससे राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया। बहुजन समाज पार्टी के पूर्व सांसद त्रिभुवन दत्त ने इस कार्य की तीव्र आलोचना की।
3. संविधान चौक, नागपुर (अक्टूबर 2024):
महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की शक्ति-प्रदर्शन रैली के दौरान डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर प्रतिमा स्थल पर ‘जय श्रीराम’ के नारे लगे और रेलिंग को क्षतिग्रस्त कर दिया गया। यह स्थान बौद्ध समुदाय के लिए अत्यंत पवित्र माना जाता है।
डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर और तीर्थयात्रा विरोध
भारत सरकार द्वारा 2015 में शुरू की गई पंच तीर्थ योजना में बाबासाहेब के जीवन से जुड़े पाँच स्थलों को तीर्थस्थल के रूप में विकसित किया गया:
1. महू (जन्मभूमि)
2. लंदन (शिक्षाभूमि)
3. नागपुर (दीक्षाभूमि)
4. दिल्ली (परिनिर्वाण भूमि)
5. मुंबई, राजगृह (स्मृति भूमि)
यह योजना जहां श्रद्धांजलि देने का प्रयास है, वहीं यह विरोधाभासी भी है क्योंकि स्वयं आंबेडकर तीर्थयात्राओं और मूर्तिपूजा के विरोधी थे। क्या यह योजना उनके विचारों के विरुद्ध नहीं जाती?
डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर का सही सम्मान क्या होगा?
1. शिक्षा को सर्वोच्च अस्त्र बनाना:
बाबासाहेब कहते थे – “शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो।” बिना शिक्षा के सामाजिक बदलाव अधूरा है।
2. जातिवाद और भेदभाव का विरोध:
आज भी जातीय भेदभाव, ऊँच-नीच की मानसिकता व्याप्त है। इससे लड़ना ही बाबासाहेब को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
3. संविधान और लोकतंत्र की रक्षा:
वर्तमान में संविधान पर हमले हो रहे हैं। डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर का संविधान ही हर नागरिक के अधिकारों की गारंटी है।
4. बौद्धिक और सामाजिक आंदोलनों को मजबूत करना:
स्थानीय स्तर पर अध्ययन मंडल, विचार-विमर्श समूह, सामाजिक न्याय मंचों की स्थापना अत्यावश्यक है।
5. डिजिटल माध्यमों से विचारों का प्रचार:
सोशल मीडिया, वेबसाइट, पुस्तकें व डिजिटल प्लेटफॉर्म के ज़रिए उनके विचारों को युवाओं तक पहुँचाना समय की माँग है।
6. वंचित समुदायों के साथ खड़ा होना:
बाबासाहेब सदैव शोषितों, मजदूरों, महिलाओं और अल्पसंख्यकों के पक्षधर रहे। हमें भी उनके संघर्षों को आगे बढ़ाना है।
7. अपने जीवन में अम्बेडकरवादी सोच को अपनाना:
उनकी वैज्ञानिक, मानवीय और तर्कसंगत सोच को अपनाना ही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि है।
निष्कर्ष:
डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर का सपना था – एक ऐसा भारत, जहाँ जाति, धर्म, लिंग या वर्ग के आधार पर किसी के साथ भेदभाव न हो। यह सपना आज भी अधूरा है। जब तक हम केवल प्रतिमाओं की पूजा करेंगे और उनके विचारों को भूलते रहेंगे, तब तक असली परिवर्तन संभव नहीं।
“जो अपने इतिहास को भूल जाते हैं, उनका भूगोल भी मिटा दिया जाता है।”
इसलिए, साथियों! अब वक्त है उठने का, संघर्ष करने का –
हर मंच, हर गली, हर आवाज़ में बाबासाहेब की पुकार बुलंद करने का।
“ना मंदिर का मोह था, ना मस्जिद की आस –
बाबासाहेब ने उठाया था इंसाफ़ का हfथयार
कहा की, नहीं चाहिए धर्म का ताज,
चाहिए इंसान को उसका असली समाज!”



