HOME भीमराव रामजी आंबेडकर के भक्ति आंदोलन और दलित उत्थान संबंधी विचार

भीमराव रामजी आंबेडकर के भक्ति आंदोलन और दलित उत्थान संबंधी विचार

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एस आर दारापुरी आई.पी.एस.(सेवानिवृत)

प्रस्तावना

एस आर दारापुरी आई.पी.एस.(रिटायर्ड)

   (समाज वीकली)   भारतीय सामाजिक और धार्मिक इतिहास में भक्ति आंदोलन का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। सातवीं से सत्रहवीं शताब्दी के बीच भारत के विभिन्न क्षेत्रों में विकसित इस आंदोलन ने ईश्वर के प्रति व्यक्तिगत भक्ति पर बल दिया, कर्मकांड और धार्मिक आडंबरों का विरोध किया तथा व्यक्ति और ईश्वर के बीच प्रत्यक्ष संबंध स्थापित करने का प्रयास किया। कबीर, रैदास, चोखामेला, नामदेव, तुकाराम तथा नंदनार जैसे अनेक संतों ने जातिगत भेदभाव की निंदा की और यह प्रतिपादित किया कि ईश्वर की दृष्टि में सभी मनुष्य समान हैं। इनमें से अनेक संत स्वयं वंचित एवं तथाकथित अछूत समुदायों से थे या उन्होंने जातिगत ऊँच-नीच का खुलकर विरोध किया। इसी कारण भक्ति आंदोलन को प्रायः सामाजिक समानता और दलित मुक्ति का आंदोलन माना जाता है।

किन्तु डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर ने भक्ति आंदोलन का कहीं अधिक आलोचनात्मक और ऐतिहासिक दृष्टि से विश्लेषण किया। उन्होंने भक्ति संतों के नैतिक साहस और समतावादी विचारों की सराहना अवश्य की, परंतु उनका स्पष्ट मत था कि यह आंदोलन जाति व्यवस्था को समाप्त करने तथा दलितों की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक मुक्ति सुनिश्चित करने में असफल रहा। उनके अनुसार भक्ति आंदोलन नैतिक और आध्यात्मिक प्रतिरोध तो था, परंतु वह सामाजिक संरचना में क्रांतिकारी परिवर्तन का कार्यक्रम नहीं बन सका। आध्यात्मिक समानता और सामाजिक समानता के बीच का यही अंतर आंबेडकर की आलोचना का मूल आधार है।

भक्ति संतों के प्रति आंबेडकर की सराहना

आंबेडकर ने भक्ति परंपरा को पूर्णतः अस्वीकार नहीं किया। उन्होंने स्वीकार किया कि अनेक भक्ति संतों ने अपने समय की धार्मिक रूढ़ियों और ब्राह्मणवादी वर्चस्व को चुनौती दी तथा शोषित और वंचित समाज की आकांक्षाओं को स्वर दिया। विशेष रूप से रैदास और चोखामेला, जो स्वयं तथाकथित अछूत समुदायों से थे, ने अपने जीवन और वाणी के माध्यम से जातिगत अपमान और सामाजिक बहिष्कार की अमानवीयता को उजागर किया। कबीर ने ब्राह्मणवादी कर्मकांड और इस्लामी कट्टरता—दोनों की तीखी आलोचना करते हुए नैतिकता, विवेक और मानवता को धर्म का आधार बनाया।

इन संतों ने जन्माधारित श्रेष्ठता को अस्वीकार किया, पुरोहितवादी वर्चस्व का विरोध किया और यह प्रतिपादित किया कि मनुष्य का मूल्य उसकी जाति से नहीं बल्कि उसके आचरण और भक्ति से निर्धारित होना चाहिए। उन्होंने श्रम की गरिमा का सम्मान किया और समाज के वंचित वर्गों में आत्मसम्मान की भावना जगाई। आंबेडकर ने इन योगदानों को भारतीय सामाजिक इतिहास की महत्त्वपूर्ण उपलब्धि माना।

आध्यात्मिक आंदोलनसामाजिक क्रांति नहीं

यद्यपि आंबेडकर ने भक्ति संतों के योगदान को स्वीकार किया, फिर भी उनका मानना था कि भक्ति आंदोलन मूलतः आध्यात्मिक आंदोलन था, सामाजिक क्रांति नहीं। इसका मुख्य उद्देश्य व्यक्ति और ईश्वर के बीच संबंध स्थापित करना था, न कि समाज की अन्यायपूर्ण संरचना को बदलना। संतों ने ईश्वर के समक्ष सभी मनुष्यों की समानता की बात कही, परंतु उन्होंने जाति व्यवस्था को समाप्त करने, आर्थिक संसाधनों के पुनर्वितरण अथवा सामाजिक संस्थाओं के लोकतंत्रीकरण का कोई संगठित कार्यक्रम प्रस्तुत नहीं किया।

आंबेडकर के अनुसार यही इस आंदोलन की सबसे बड़ी सीमा थी। उनका मत था कि यदि धर्म आध्यात्मिक समानता की बात करे, लेकिन सामाजिक असमानता को समाप्त न करे, तो वह वास्तविक मानव मुक्ति का आधार नहीं बन सकता। यदि किसी दलित को मंदिर में प्रवेश न मिले, सार्वजनिक कुएँ से पानी भरने का अधिकार न हो, शिक्षा से वंचित रखा जाए या सम्मानजनक रोजगार से दूर रखा जाए, तो केवल यह कहना कि “ईश्वर की दृष्टि में सभी समान हैं”, उसके जीवन की वास्तविक समस्याओं का समाधान नहीं कर सकता।

इस प्रकार आंबेडकर ने स्पष्ट किया कि आध्यात्मिक समानता तभी सार्थक है जब उसके साथ सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक समानता भी स्थापित हो।

जाति व्यवस्था को समाप्त करने में भक्ति आंदोलन की विफलता

आंबेडकर की सबसे महत्वपूर्ण आलोचना यह थी कि भक्ति आंदोलन जाति व्यवस्था को समाप्त नहीं कर सका। यद्यपि अनेक संतों ने अस्पृश्यता और जातिगत भेदभाव का विरोध किया, फिर भी सदियों बाद भी भारतीय समाज में जातिगत ऊँच-नीच और सामाजिक बहिष्कार बने रहे।

आंबेडकर ने एक महत्वपूर्ण विरोधाभास की ओर ध्यान आकर्षित किया। उच्च जातियों के लोग रैदास, चोखामेला जैसे दलित संतों की पूजा तो करते रहे, लेकिन जीवित दलितों को समान मनुष्य का दर्जा देने के लिए तैयार नहीं हुए। मंदिरों में दलित संतों की मूर्तियाँ स्थापित की गईं, किंतु साधारण दलितों को उन्हीं मंदिरों में प्रवेश नहीं मिला। संतों के भजन गाए गए, परंतु दलितों को सार्वजनिक जीवन में बराबरी का अधिकार नहीं दिया गया।

आंबेडकर के अनुसार यह तथ्य सिद्ध करता है कि किसी महान संत का सम्मान करना और पूरे दलित समाज को समान अधिकार देना दो अलग-अलग बातें हैं। भक्ति आंदोलन ने कुछ महान संत अवश्य उत्पन्न किए, परंतु उसने जाति व्यवस्था और अस्पृश्यता जैसी सामाजिक संस्थाओं को समाप्त नहीं किया।

व्यक्तिगत मोक्ष बनाम सामूहिक मुक्ति

आंबेडकर ने यह भी कहा कि भक्ति आंदोलन का केंद्र व्यक्तिगत मोक्ष था, सामूहिक सामाजिक मुक्ति नहीं। भक्ति का मार्ग व्यक्ति को ईश्वर की शरण में जाने, भक्ति करने और आध्यात्मिक शांति प्राप्त करने की प्रेरणा देता है। इससे व्यक्ति को मानसिक संतोष मिल सकता है, किंतु इससे उत्पीड़ित समुदायों को संगठित होकर अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने की प्रेरणा नहीं मिलती।

आंबेडकर का विश्वास था कि किसी भी शोषित समाज की मुक्ति केवल नैतिक उपदेशों या धार्मिक भक्ति से संभव नहीं है। इसके लिए शिक्षा, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, संवैधानिक अधिकार, आर्थिक संसाधनों तक पहुँच और संगठित सामाजिक आंदोलन आवश्यक हैं। उनका प्रसिद्ध आह्वान—”शिक्षित हो, संघर्ष करो और संगठित हो,”—इसी विचार का प्रतिफल था। उनके अनुसार मुक्ति का मार्ग सामूहिक संघर्ष और लोकतांत्रिक संगठन से होकर गुजरता है, न कि केवल व्यक्तिगत भक्ति से।

भक्ति आंदोलन और सामाजिक लोकतंत्र

आंबेडकर के लिए लोकतंत्र केवल शासन प्रणाली नहीं, बल्कि जीवन पद्धति था, जिसका आधार स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व है। उनका मानना था कि भक्ति आंदोलन ने कभी-कभी बंधुत्व का संदेश अवश्य दिया, परंतु वह सामाजिक जीवन में स्वतंत्रता और समानता स्थापित नहीं कर सका। जाति-आधारित व्यवसाय, अंतर्जातीय विवाह पर प्रतिबंध, ब्राह्मणवादी वर्चस्व और अस्पृश्यता जैसी व्यवस्थाएँ यथावत बनी रहीं।

इस कारण भक्ति आंदोलन सामाजिक लोकतंत्र की स्थापना नहीं कर सका। आंबेडकर का स्पष्ट मत था कि जब तक समाज में समान अवसर, समान सम्मान और समान नागरिकता स्थापित नहीं होगी, तब तक राजनीतिक लोकतंत्र भी स्थायी नहीं रह सकता।

संत-पूजा की आलोचना

आंबेडकर भारतीय समाज में संत-पूजा की प्रवृत्ति के भी आलोचक थे। उनका मत था कि इतिहास का निर्माण केवल महान संतों द्वारा नहीं, बल्कि संगठित और जागरूक जनता द्वारा होता है। संत समाज में नैतिक चेतना जगा सकते हैं, परंतु स्थायी सामाजिक परिवर्तन कानून, संस्थाओं, राजनीतिक आंदोलनों और जनसंघर्षों के माध्यम से ही संभव होता है।

उनके अनुसार संतों पर अत्यधिक निर्भरता कई बार उत्पीड़ित समाज को सक्रिय संघर्ष के बजाय निष्क्रिय सहनशीलता की ओर ले जाती है। इसलिए उन्होंने दलितों से आह्वान किया कि वे स्वयं अपने इतिहास के निर्माता बनें।

आंबेडकर का वैकल्पिक दृष्टिकोण

भक्ति आंदोलन की सीमाओं के विपरीत आंबेडकर ने दलित मुक्ति का एक व्यापक कार्यक्रम प्रस्तुत किया। इसमें जाति का समूल उन्मूलन, सार्वभौमिक शिक्षा, आर्थिक न्याय, संवैधानिक अधिकार, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, भूमि सुधार, श्रमिक अधिकार और लोकतांत्रिक भागीदारी शामिल थे। उनका विश्वास था कि जाति के विरुद्ध संघर्ष केवल धार्मिक सुधार से नहीं, बल्कि सामाजिक और संस्थागत परिवर्तन से सफल हो सकता है।

इसी विचार ने उन्हें 1956 में नवयान बौद्ध धर्म को अपनाने के लिए प्रेरित किया। उनके अनुसार बौद्ध धर्म स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व, तर्कशीलता और करुणा पर आधारित ऐसा नैतिक दर्शन प्रस्तुत करता है जो जाति व्यवस्था से मुक्त लोकतांत्रिक समाज की आधारशिला बन सकता है।

निष्कर्ष

डॉ. भीमराव आंबेडकर का भक्ति आंदोलन का मूल्यांकन अत्यंत संतुलित, गहन और ऐतिहासिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। उन्होंने कबीर, रैदास, चोखामेला तथा अन्य भक्ति संतों के साहस, मानवीय दृष्टिकोण और सामाजिक अन्याय के विरुद्ध उनके प्रतिरोध की सराहना की। उन्होंने स्वीकार किया कि इन संतों ने दलितों और वंचित समुदायों में आत्मसम्मान की भावना जगाई तथा धार्मिक रूढ़ियों को चुनौती दी।

फिर भी आंबेडकर का निष्कर्ष स्पष्ट था कि भक्ति आंदोलन भारतीय समाज की संरचना को मूलतः परिवर्तित नहीं कर सका। उसने आध्यात्मिक समानता का संदेश दिया, परंतु सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक समानता स्थापित नहीं की। उसने महान संत उत्पन्न किए, किंतु जाति व्यवस्था, अस्पृश्यता और सामाजिक वर्चस्व को समाप्त नहीं किया। इसलिए आंबेडकर के अनुसार भक्ति आंदोलन नैतिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण अवश्य था, किंतु दलित मुक्ति के लिए पर्याप्त नहीं था।

आंबेडकर की दृष्टि में दलितों की वास्तविक मुक्ति का मार्ग शिक्षा, संगठन, संघर्ष, संवैधानिक लोकतंत्र, सामाजिक न्याय, आर्थिक समानता और जाति के समूल उन्मूलन से होकर गुजरता है। यही कारण है कि उन्होंने व्यक्तिगत मोक्ष के स्थान पर सामूहिक मानव मुक्ति को अपना आदर्श बनाया। भक्ति आंदोलन की उनकी आलोचना आज भी भारतीय समाज में जाति, धर्म और सामाजिक न्याय के प्रश्नों को समझने के लिए एक अत्यंत प्रासंगिक वैचारिक आधार प्रदान करती है।

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