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US hits India with forced labour tariff threat during trade talks

SAMAJ WEEKLY UK

    Bal Ram Sampla

Bal Ram Sampla
Geopolitics

The US government is threatening to put a new 12.5% tax (tariff) on items that India sells to America.
​This has caused a lot of surprise because the US isn’t accusing India of using forced labour inside its own borders. Instead, Washington is upset that India buys materials from other countries (like China) that use forced labour, and then uses those materials to make goods that end up in the US.

​The US has very strict laws banning any imports made with forced labour. They are now tracking global supply chains more closely than ever.
​The US Trade Representative (USTR) recently looked at 60 countries around the world. They divided them into two groups based on how they handle forced labour imports:

(1) The 12.5% Tariff Group (54 countries, including India): The US says these countries do not have a clear law that bans importing goods made with forced labour.

​(2) The 10% Tariff Group (6 countries, including the EU and Canada): These countries have a ban on the books, but the US feels they do not enforce it strictly enough.

​Because India does not block these tainted materials from entering its own factories, the US argues that India is acting as a “backdoor” that lets forced-labour goods slip into the global market.

Which Goods Could Get Hit?

​If these tariffs go into effect, it will make Indian products more expensive for American buyers. The main industries at risk include:
​(I) Clothing and Textiles: Many Indian clothing factories import cotton, yarn, or fabric from China. The US claims some of this fabric comes from regions using forced labour.
​(II) Engineering and Metals: Steel and aluminium products.
​(III) Technology and Cars: Electronics, car parts, and automobiles.
​(IV)Agriculture: Certain farmed goods.

​Why is This Happening Right Now?

​The timing of this threat is a classic pressure tactic. The US dropped this massive report right in the middle of important trade talks happening in New Delhi.
​US and Indian officials have been working hard to sign a new, major trade deal. By threatening a 12.5% tax right now, Washington gets extra leverage to push India into agreeing to strict new rules on how it tracks and buys raw materials.

What Happens Next?

​The extra taxes are not starting immediately. The US government is letting the public give feedback on the plan until July 6, 2026, and will hold official hearings the next day.
​Meanwhile, India’s trade experts are arguing that the US is overstepping its bounds. They believe one country shouldn’t be allowed to use tax threats to force another independent country to change its internal import laws. Trade talks between the two nations are continuing, but the mood just got a lot more tense.

References

1.https://ustr.gov/about/policy-offices/press-office/press-releases/2026/june/ustr-section-301-determination-brazils-unreasonable-acts-policies-and-practices?hl=en-GB
2.https://indianexpress.com/article/world/us-news/us-trump-tariffs-india-forced-labor-imports-ustr-forced-labour-10721276/?hl=en-GB

तमिलनाडु में क्रांती और प्रति-क्रांतीः

प्रोफे. श्रावन देवरे,

समाज वीकली यू के

तमिलनाडु में क्रांती और प्रति-क्रांतीः
ब्राह्मणवादी दिमक विजय के कंधे पर बैठकर तमिलनाडु की खुशहाल ज़िंदगी कुतर-कुतर के बर्बाद कर देगा!

– प्रोफे. श्रवन देवरे
मोबाईल: 8177 86 1256

(पार्ट-4)

भारतीय राजनीति में, अगर किसी पार्टी में प्रोग्रेसिव या क्रांतिकारी विचारों का मेल नहीं है और उसके पास ऑर्गेनाइज़ेशनल काम भी नहीं है, तो ऐसी प्र-स्थापित विचारों वाली पार्टी को चुनाव लड़ने के लिए करोड़ों रुपये खर्च करने पड़ते हैं। ये करोड़ों रुपये सिर्फ़ वोट खरीदने के लिए ही नहीं, बल्कि माफिया, गुंडों और साज़िश करने वाले बुद्धिजीवियों को खिलाने के लिए भी खर्च किए जाते हैं। ब्राह्मणवादियों ने प्रशांत किशोर नाम का एक ‘चुनावी-भगवान’ बनाया है। इस चुनावी भगवान के पास सभी प्र-स्थापित राजनीतिक पार्टियों से ऑफ़र्स आते रहते हैं, इससे आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि किसी एक पार्टी के लिए चुनावी रन-नीति बनाने के लिए उसे कितने करोड़ रूपये दिए जाते होंगे?

मैं पिछले तीसरे पार्ट से एक लाइन फिर से कोट करूँगा- ‘‘राजनीतिक रूप से महत्वाकांक्षी लोग कभी अपनी जेब से पैसे खर्च करके राजनीति नहीं करते।’’ तो इन प्र-स्थापित राजनीतिक पार्टियों को चुनाव लड़ने के लिए करोड़ों रुपये कौन देता है? यह राज़ मुझे मेरे एक कुंभार-OBC पत्रकार ने बताया था। बेशक, वह इस लेन-देन में एक बड़े कैरियर का काम करता है। ये करोड़ों रुपये देश और विदेश के उद्योगपतियों-पूंजीपतियों द्वारा चलाए गए हवाला रैकेट से कुछ फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशन के ज़रिए आते हैं और चुनाव से ठीक पहले भारत की पॉलिटिकल पार्टियों को बांटे जाते हैं। बेशक, कुछ तथाकथित प्रोग्रेसिव-फुले अंबेडकरवादी पार्टियां जो ब्राह्मण-क्षत्रिय जातियों की पार्टियों को सत्ता में बिठाने के लिए वोट-कटवा का काम करती हैं, उन्हें भी अपनी काबिलियत के हिसाब से पैसा मिलता है। भारत में हवाला बांटने के कंट्रोल रूम में संघ के भक्त हैं। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के मुस्लिम वोट बैंक को कटवाने के लिए संघ-BJP ने हुमायूं कबीर को एक हजार करोड़ रुपये दिए, यह पैसा कहां से आया, इसका जवाब इस तरह है।

तमिलनाडु में विजय की कोई आइडियोलॉजिकल-पॉलिटिकल विरासत नही है और ना कोई इतिहास है। कोई उद्योगपती या पूंजीपती (Capitalist) सिर्फ पार्टी बनाने भर से विजय के नए चेहरे पर करोड़ों रुपये क्यों लगाएगा? उद्योगपती या पूंजीपती तभी अपना पैसा इन्व्हेस्ट करते है, जब नुकसान कम और फायदा ज्यादा होने की गॅरंटी हो। कोई वैचारिक विरासत या इतिहास न होने के बावजूद विजय ने नयी पार्टी बनाईतुरंत चुनाव लड़े गए और तुरंत सत्ता हथिया ली गई! इसका मतलब है कि विजय को भी हुमायूं मुसलमान की तरह करोड़ों रुपये दिए गए हैं, तो इसके पीछे के कारणों को तलाशना होगा।

रजनीकांत और कमल हासन, जो संघ के पहले पालतू थे, करोड़ों रुपये देने के बाद भी बुरी तरह फेल हो गए। उससे सीखकर, संघ-RSS को एक नया बलि का बकरा मिला, विजय। और वह पहले ही चुनाव में सफल हो गया। इसके पीछे असली कारण यह है कि रजनीकांत और कमल हासन के पीछे अपनी जाति का कोई वोट बैंक नहीं था और ना ही उनके धर्म का वोटबँक। इसलिएसुपरस्टार होने के बावजूद वे फेल हो गए। मगर विजय के पीछे अपनी जाति और धर्म का वोट बैंक हैऔर वह उसमें करोड़ों रुपये डालने के बाद सफल हुआ है। चूंकि विजय के पास कोई आइडियोलॉजिकल सपोर्ट नहीं था, इसलिए संघ-बीजेपी ने उसे कैपिटलिस्ट के ज़रिए भारी फाइनेंशियल मदद दी!

विजय की सफलता से सबसे ज़्यादा खुश कौन था? क्या बीजेपी? बीजेपी खुश तो हुई होगी क्योंकि संघ-बीजेपी की यह साजीश थी। लेकिन वे विजय से बहुत दूरी बनाए हुए हैं। क्योंकि सेफ दूरी बनाए रखना भी साज़िश का हिस्सा है। लेकिन कांग्रेस विजय की जीत से इतनी खुश क्यों होगी? कॉंग्रेस तो हमेशा डी.एम.के. (DMK) पार्टीसे दोस्ती (Alliance) बनाकर चुनाव लढता है। खुदके पार्टी अलायन्स को पराजीत करनेवाली दुश्मन पार्टी की जीत पर कॉंग्रेस इतनी खुश क्यों थी? विजय की पार्टी (TVK) की जीत पर कांग्रेस इतनी खुश थी कि नतीजों वाले दिन उसने जोश में आकर विजय को सरकार बनाने के लिए बिना शर्त सपोर्ट दे दियाऔर वो भी विजय के बिना मांगे! बिना मांगे सपोर्ट देने वालों में पहला नाम शरद पवार का है और अब दूसरा नाम राहुल गांधी का है! दोनों ही कांग्रेसी हैं! पहले वाले ने 2014 में महाराष्ट्र में सरकार बनाने के लिए सीधे BJP को सपोर्ट किया था और दूसरे वाले ने अब सीधे संघ-BJP की साज़िश का सपोर्ट किया है। तमिलनाडु में कांग्रेस के सभी पांच MLA को DMK कार्यकर्ताओं ने सड़कों पर दौडा-दौडाकर पीटा है। पेरियार के विचारों से गद्दारी करने की यह सज़ा कांग्रेस को मिलनी ही थी। लेकिन अगर कांग्रेस के MLAs पिटने के बावजूद विजय को सपोर्ट कर रहे हैं, तो गंभीरता से सोचना चाहिए।

तमिलनाडु में संघ-BJP की केंद्र सरकार का बनाया हुआ गवर्नर है। अगर विजय संघ-BJP की साज़िश का हिस्सा है, तो संघ-BJP के गवर्नर को विजय को तुरंत मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला देनी चाहिए थी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। गवर्नर ने विजय को सरकार बनाने के लिए चार चक्कर क्यों लगवाए? क्या एक साज़िश के तौर पर सेफ़ डिस्टेंस बनाए रखने के लिए? यह सच है, लेकिन एक बड़ा कारण और भी है। कॉंग्रेस के 5 MLAs के सपोर्ट के बाद भी विजय बहुमत में नहीं पहुँचे। दोनों कम्युनिस्ट पार्टियों के चार MLAs का साथ ज़रूरी था। इसमें जयललिता की पार्टी AIADMK ने स्टालिन की DMK पार्टी के साथ मिलकर सरकार बनाने का ऐलान कर दिया। नैरेटिव यह भी है कि कम्युनिस्ट पार्टियाँ आमतौर पर धोखा नहीं देतीं। इसलिए संघ-BJP के गवर्नर को शक था कि विजय की सरकार विश्वास मत जीत पाएगी या नहीं। संघ-BJP को पता है कि पेरियारवाद के खिलाफ़ साज़िशें तभी सफल की जा सकती हैं जब विजय की सरकार पाँच साल तक चले। इसलिए गवर्नर ने विजय को बार-बार कम्युनिस्ट पार्टियों के MLAs के पास भेजा। कम्युनिस्टों का साथ मिलने के बाद ही गवर्नर ने विजय को शपथ लेने दी।

तमिलनाडु में कांग्रेस, कम्युनिस्ट, आंबेडकरवादी और दूसरी छोटी पार्टियों के जो 7-8 MLAs चुनकर आते हैं, वे सिर्फ़ DMK पार्टी के साथ उनके गठबंधन की वजह से ही चुनकर आते हैं! BJP का जो एकमात्र MLA चुनाव जीता है, वह भी सिर्फ़ AIADMK पार्टी के साथ उनके गठबंधन की वजह से ही चुनकर आया है! पेरियारवाद के क्रांतिकारी बरगद के पेड़ पर पलने वाले इन परजीवी बांडगूळ (Parasites) ने पेरियारवाद को धोखा दिया और संघ-BJP के पालतू विजय की सरकार बनाने का समर्थन किया। इससे अंदाज़ा लगता है कि यह कितनी बड़ी साज़िश है।

विजय ने चुनाव के समय पहले बाबासाहेब की फ़ोटो दिखाई और फिर मस्जिद, गणपति और चर्च की मिली-जुली फ़ोटो दिखाई। इससे हमें अंदाज़ा हो गया कि उनकी पॉलिटिक्स किस दिशा में जा रही है। वह खुलेआम जाति और धर्म की नुकसान पहुँचाने वाली पॉलिटिक्स कर रहे हैं और हम यह भी अंदाज़ा लगा सकते हैं कि भविष्य में इसके क्या नतीजे होंगे। असेंबली के पहले ही दिन विजय ने जाति और धर्म की इस नुकसान पहुँचाने वाली पॉलिटिक्स की एक झलक दिखा दी। असेंबली में पहले ही दिन विजय ने अपने ऑफ़िस के बहुत महत्वपूर्ण और स्ट्रेटेजिक OSD पोस्ट पर एक संघी-ब्राह्मण पांडे-ज्योतिष को अपॉइंट किया। विजय की इस ब्राह्मणवादी साज़िश को DMK के अपोजझिशन लीडर उदयनिधि और अंबेडकरवादी डॉ. थिरुवलन की पार्टी के दो MLA ने तुरंत पहचान लिया! पेरियारवादी और अंबेडकरवादी MLAs के कड़े विरोध के सामने गद्दार विजय ने घुटने टेक दिए और उस संघी-ब्राह्मण ज्योतिषी को तुरंत OSD पोस्ट से हटा दिया। यह ज्योतिषी विजय की बड़ी चुनावी मीटिंग्स का मुहुर्त (Auspicious Moment) बता रहा था। इसी ज्योतिषी ने गवर्नर को शपथ ग्रहण समारोह शुभ मुहूर्त के लिए टालने के लिए मजबूर किया था।

विजय ने जाति और धर्म की अपनी विनाशकारी राजनीति की दिशा साफ कर दी है। उन्होंने डॉ. बाबासाहेब की फोटो और एक मस्जिद, गणपति और एक चर्च की एक साथ फोटो दिखाकर दलितों, मुसलमानों, ब्राह्मणों और ईसाइयों के वोट लिए, लेकिन सत्ता में आने के बाद उन्होंने एक ब्राह्मण ज्योतिषी को नियुक्त करके अपना करियर शुरू किया। विजय ने अपने पार्टीसे कितने ब्राह्मण MLAs चुनके लाये हैं और उनमें से कितनों को मंत्री बनाया है, यह मुद्दा महत्वपूर्ण नहीं है। संघ-RSS की ताकत राजनीतिक पदों से नहीं आती है। संघ प्रशासनिक शक्ति के माध्यम से अपने लक्ष्य हासिल करता है। अब OSD पद की नियुक्ति से एक बात पक्की हो गई है कि तमिल प्रशासन में रणनीतिक और महत्वपूर्ण पदों पर संघी-ब्राह्मणों की बड़े पैमाने पर लैटरल एंट्री होगी और प्रशासन के माध्यम से तमिलनाडु में सांप्रदायिक और धार्मिक दंगे-फसाद करवाने की साजिशे रची जाएंगी।

तमिलनाडु को छोड़कर दूसरे राज्यों से हर दिन कई खबरें आती हैं, जिनमें से कम से कम 2-3 खबरें हिंदू-मुस्लिम टकराव की जरूर होती हैं! और ये खबरें बार-बार दोहराई जाती हैं और दिन भर दिखाई जाती हैं। पेरियारवाद के युग मे पिछले 60 सालों में तमिलनाडु में जाती के नामसे एक भी झगडा या धार्मिक दंगा-फसाद नहीं हुआ है। राजीव गांधी हत्याकांड में हुए बम धमाकों को छोड़ दें तो पिछले 60 सालों में तमिलनाडु में एक भी बम धमाका नहीं हुआ। लेकिन अब ब्राह्मण संघी ज़माने में विजय के कंधों पर बैठकर तमिलनाडु से हर दिन धार्मिक दंगेजाति-पाति के झगड़े और बम धमाकों की खबरें आएंगी और 4-4 दिनों तक बार-बार टीवी पर दिखाई जाएंगी!

पतवार में एक छोटा सा छेद भी बड़े जहाज़ को डुबो सकता है। बिस्तर में एक छोटासा खटमल भी आपकी नींद हराम सकता है। एक छोटा सा कीड़ा पूरे महल को तबाह कर सकता है। इसीलिए स्टालिन की पार्टी ने ब्राह्मणों को टिकट देने से मना कर दिया। स्टालिन की पार्टी ने ब्राह्मणोंको कभी भी MLA नहीं बनाया और ना ही किसी ब्राह्मण को मंत्री बनाया। तात्यासाहब महात्मा जोतीराव फुलेजिन्होंने अपने कार्यकर्ताओं को चेतावनी दि थी की, “मेरी लाश पर किसी ब्राह्मण की परछाई भी मत पड़ने देना।” स्टालिन की पार्टी तात्यासाहब महात्मा जोतीराव फुले की असली वारीस है क्यों की स्टालिन ने अपने पार्टी पर कभी भी ब्राह्मण की परछाई नही पडने दी। ब्राह्मण विरोधी पेरियारवादी राजनीति का डर तमिलनाडु की सभी छोटी-बड़ी पार्टियों पर असर डालता है। इसलिए, विजय की पार्टी को छोड़कर, बाकी सभी अंबेडकरवादी, ब्राह्मणवादी कांग्रेस-BJP और लेफ्ट-कम्युनिस्ट पार्टियों ने ब्राह्मणों को MLA टिकट देने की हिम्मत नहीं की। BJP, जिसे शुद्ध ब्राह्मणों की पार्टी कहा जाता है, उसने एक भी ब्राह्मण को टिकट नहीं दिया। केवल राजनिती को ब्राह्मण-मुक्त बनाकर ब्राह्मणवाद खतम नही किया जा सकता, बल्कि प्रशासन और दूसरे सभी ज़रूरी धार्मिक-आर्थिक क्षेत्रों में भी ब्राह्मणों का वर्चस्व (Dominance) तोड़ना ज़रूरी है। तभी वह राज्य सही मायने में ब्राह्मण-मुक्त राष्ट्र या ‘पूरी तरह से गैर-ब्राह्मण राष्ट्र’ के तौर पर जाना जा सकता है। DMK. पार्टी ने यह किया। इस बात का ध्यान रखा गया कि तमिलनाडु के प्रशासन (Administration) में ब्राह्मण अधिकारियों की संख्या ब्राह्मण आबादी की संख्या से (प्रतिशत से) ज्यादा ना हो। स्टालिन सरकार ने राज्य में EWS रिज़र्वेशन देने से मना कर दिया थाक्योंकि उन्हें डर था कि प्रशासन (Administration) में ब्राह्मण अधिकारियों की संख्या बढ़ जाएगी। लेकिन अब विजय के कंधों पर बैठकर तमिलनाडु के शासन और प्रशासन (Administration) में ब्राह्मणों की संख्या भी बढेगी और उनकी षड्यंत्रकारी दखलंदाज़ी भी बढेगी। तमिलनाडु की खुशहाल ज़िंदगी को ब्राह्मण नामकी दिमक कुतर-कुतर के खा जाने वाली है।

किसी भी सोशियो-पॉलिटिकल घटना के कम से कम दो पहलू होते हैं। अब तक, हमने तमिलनाडु में हाल की काउंटर-रेवोल्यूशन का एक पहलू देखा है, यानी विजय का पहलू। अगले आर्टिकल में, हम पेरियारवाद की सीमाओं और DMK की पॉलिटिकल गलतियों का एनालिसिस करेंगे। तब तक, सत्य की जय हो!

-प्रोफे. श्रावन देवरे,
OBC पॉलिटिकल अलायंस,
मोबाइल- 81 77 86 12 56

ज़रूरी सूचना- 1) आर्टिकल का यह चौथा हिस्सा (P4) ‘बहुजन सौरभ’ के 23 मई 2026 के इश्यू में पब्लिश हुआ है।

2) अगर आपको इस आर्टिकल की मराठी pdf (P4) फाइल चाहिए, तो नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें-  https://drive.google.com/file/d/1JXh-JtCnXByBFggN60Utaa9fOrKHjl2r/view?usp=drive_link

3) इस आर्टिकल की हिंदी pdf (P4) फाइल के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें-  https://drive.google.com/file/d/1Ynao9eWNDWd0qEdxkcWsBca34gZztlzV/view?usp=drive_link

4) जिनको यह विचार ब्रीफ में हिंदी में सुनना है वो बहुजन-85 चैनल की VDO लिंक क्लिक करें- लिंक-

https://youtu.be/3jDC9Si3UAQ?si=T4GQ05SbWZ09mGLM

 

Cross-Country Murder Hunt Launched After Body Found in Transit Van

Bal Ram Sampla

SAMAJ WEEKLY UK

Bal Ram Sampla
Geopolitics 

​A major cross-county investigation is underway following the grim discovery of a man’s body inside a parked delivery van in Leicester, triggering a fast-moving homicide inquiry that stretches back to West London.

​Harinder Kaur, 39, of Sutton Dene, Hounslow, appeared before Leicester Magistrates’ Court on Tuesday, June 2, facing charges of murder and perverting the course of justice.

The Grim Discovery

​The investigation began on Wednesday, May 27, when local police officers in Leicester were called to Garden Street, a central commercial area just off the city’s inner ring road. Inside the back of a parked white Ford Transit van, authorities discovered the body of a man believed to be in his 30s. He was pronounced dead at the scene.
​As local detectives began examining the vehicle, a crucial breakthrough altered the direction of the investigation. A registration check revealed the white Transit van was registered to an address in West London. Recognizing the cross-jurisdictional nature of the crime, the Metropolitan Police Specialist Crime Command officially took administrative lead of the homicide probe.

​Fast-Moving Inter-Force Hunt

​Working in tandem, Met detectives and Leicestershire Police tracked the vehicle’s long-distance movements. Within 48 hours of the body’s discovery, tactical units executed a warrant at a residential property in Hounslow.
​Kaur was arrested at her home on Friday, May 29. Following days of intensive questioning at a London police station, CPS London homicide lawyers authorized the charges of murder and perverting the course of justice.

Public Appeal for Footage

​While a suspect has been charged, Scotland Yard emphasizes that the investigation is in its critical early stages. Forensics teams are continuing to examine the vehicle, and specialized officers are working to confirm the victim’s identity and locate his next of kin.
​Detectives have issued an urgent public appeal for anyone who may have witnessed the van’s transit across the Midlands or London highways. Detective Chief Inspectors are particularly keen to speak with drivers or residents who may have captured doorbell or dashcam footage of the specific vehicle involved.

​Police Description: The vehicle is a white Ford Transit van, bearing the registration plate BF18 VNV. Anyone who recalls seeing this vehicle traveling between London and Leicester around late May is urged to contact the incident room.
​Anyone with information is asked to call the police non-emergency line on 101, quoting reference 9873/28MAY. Alternatively, information can be provided anonymously to the independent charity Crimestoppers on 0800 555 111.

Source:

1.https://www.easterneye.biz/woman-charged-murder-man-dead-leicester-van/
2.https://news.met.police.uk/news/woman-charged-with-murder-following-discovery-of-mans-body-in-leicester-510028?hl=en-GB

ਜੀਹਾ ਚੀਰੀ ਲਿਖਿਆ ਤੇਹਾ ਹੁਕਮ ਰਮਾਹਿ। ਘੱਲੇ ਆਵੇ ਨਾਨਕਾ, ਸੱਦੇ ਉਠੀਂ ਜਾਏ

ਸ੍ਰੀ ਦੋਲਤ ਰਾਮ ਮਹਿਮੀ

ਸਮਾਜ ਵੀਕਲੀ ਯੂ ਕੇ

ਸੁਰਿੰਦਰ ਪਾਲ ਮਹਿਮੀ ਤੇ ਰੇਸ਼ਮ ਲਾਲ ਮਹਿਮੀ ਨੂੰ ਸੱਦਮਾ ਪਿੱਤਾ ਸ੍ਰੀ ਦੋਲਤ ਰਾਮ ਮਹਿਮੀ ਦਾ ਦਿਹਾਂਤ।

ਰੇਸ਼ਮ ਭਰੋਲੀ-  ਆਪ ਸਭ ਨਾਲ ਇਹ ਖਬਰ ਬੜੇ ਦੁਖੀ ਹਿਰਦੇ ਨਾਲ ਸਾਂਝੀ ਕਰ ਰਹੇ ਹਾਂ ਕਿ (ਯੂ ਕੇ) ਵਾਸੀ ਸ੍ਰੀ ਦੋਲਤ ਰਾਮ ਮਹਿਮੀ ਗੁਰੂ ਮਹਾਰਾਜ ਜੀ ਦੇ ਦਿੱਤੇ ਹੋਏ ਸਵਾਸਾਂ ਦੀ ਪੂੰਜੀ ਨੂੰ ਪੂਰਾ ਕਰਦੇ ਹੋਏ, ਗੁਰੂ ਮਹਾਰਾਜ ਦੇ ਚਰਨਾਂ ਵਿੱਚ ਜਾ ਬਰਾਜੇ ਹਨ. ਸ੍ਰੀ ਦੋਲਤ ਰਾਮ ਮਹਿਮੀ ਜੀ ਦੀ ਉਮਰ ਤਕਰੀਬਨ 103 ਸਾਲ ਦੇ ਕਰੀਬ ਸੀ ਤੇ ਸ੍ਰੀ ਦੋਲਤ ਰਾਮ ਪੰਜਾਬ ਪਿੰਡ ਸਮਰਾੜੀ ਜ਼ਿਲ੍ਹਾ ਜਲੰਧਰ ਤੋ ਸੀ, ਪਰ ਪਿੱਛੇ ਲੰਮੇ ਸਮੇਂ ਤੋਂ ਆਪਣੇ ਵੱਡੇ ਬੇਟੇ ਸੁਰਿੰਦਰ ਪਾਲ ਤੇ ਉਹਨਾਂ ਦੇ ਪਰਿਵਾਰ ਕੋਲ ਰਹਿੰਦੇ ਸੀ ਹਾਲਾਂਕਿ ਦੂਸਰਾ ਬੇਟਾ ਕੇਵਲ ਮਹਿਮੀ ਤੇ ਸਭ ਤੋਂ ਛੋਟਾ ਬੇਟਾ ਰੇਸ਼ਮ ਲਾਲ ਮਹਿਮੀ ਪਰਿਵਾਰ ਸਮੇਤ (ਯੂ ਐਸ਼ ਏ) ਵਿੱਚ ਆਪਣੇ ਪਰਿਵਾਰ ਨਾਲ ਰਹਿੰਦਾ ਹੈ ਤੇ ਫਿਰ ਵੀ ਸਿਆਣੇ ਦਾ ਬਹੁਤ ਆਸਰਾ ਹੁੰਦਾ ਹੈ ਤੇ ਸਿਆਣੇ ਬੰਦੇ ਦੀ ਬਹੁਤ ਲੋੜ ਹੁੰਦੀ ਹੈ ਤੇ ਪਰਿਵਾਰ ਨੂੰ ਕਦੇ ਵੀ ਨਾ ਪੂਰਾ ਹੋਣ ਵਾਲਾ ਘਾਟਾ ਪਿਆ ਹੈ, ਅਸੀਂ ਵਾਹਿਗੁਰੂ ਅੱਗੇ ਅਰਦਾਸ ਕਰਦੇ ਹਾਂ ਕਿ ਵਾਹਿਗੁਰੂ ਪਿੱਛੇ ਪਰਿਵਾਰ ਨੂੰ ਭਾਣਾ ਮੰਨਣ ਦਾ ਬਲ ਬਖਸ਼ੇ ਤੇ ਵਿਛੜੀ ਹੋਈ ਰੂਹ ਨੂੰ ਆਪਣੇ ਚਰਨਾਂ ਵਿੱਚ ਨਿਵਾਸ ਬਖਸ਼ੇ.

ਕੈਨੇਡੀਅਨ ਪੀਆਰ ਧਾਰਕਾਂ, ਸਾਵਧਾਨ ਰਹੋ! ਇੱਕ ਛੋਟੀ ਜਿਹੀ ਗਲਤੀ ਨਾਲ ਤੁਸੀਂ ਆਪਣਾ ਦਰਜਾ ਗੁਆ ਸਕਦੇ ਹੋ। 8 ਵੱਡੀਆਂ ਗਲਤੀਆਂ ਬਾਰੇ ਜਾਣੋ ਜੋ ਮਹਿੰਗੀਆਂ ਸਾਬਤ ਹੋ ਸਕਦੀਆਂ ਹਨ।

ਟੋਰਾਂਟੋ – ਕੈਨੇਡਾ ਵਿੱਚ ਸਥਾਈ ਨਿਵਾਸ (ਪੀਆਰ) ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰਨਾ ਦੁਨੀਆ ਭਰ ਦੇ ਲੱਖਾਂ ਲੋਕਾਂ ਲਈ ਇੱਕ ਪਿਆਰਾ ਸੁਪਨਾ ਹੈ, ਜਿਸ ਵਿੱਚ ਹਜ਼ਾਰਾਂ ਭਾਰਤੀ ਵੀ ਸ਼ਾਮਲ ਹਨ। ਪੀਆਰ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰਨ ਨਾਲ ਵਿਅਕਤੀਆਂ ਨੂੰ ਕੈਨੇਡਾ ਵਿੱਚ ਰਹਿਣ, ਕੰਮ ਕਰਨ ਅਤੇ ਸਿੱਖਿਆ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰਨ ਦੇ ਬਰਾਬਰ ਅਧਿਕਾਰ ਮਿਲਦੇ ਹਨ। ਹਾਲਾਂਕਿ, ਜ਼ਿਆਦਾਤਰ ਲੋਕ ਇਸ ਗਲਤ ਧਾਰਨਾ ਦਾ ਸ਼ਿਕਾਰ ਹੋ ਜਾਂਦੇ ਹਨ ਕਿ ਇੱਕ ਵਾਰ ਜਦੋਂ ਉਹ ਪੀਆਰ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰ ਲੈਂਦੇ ਹਨ, ਤਾਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦਾ ਦਰਜਾ ਸਥਾਈ ਤੌਰ ‘ਤੇ ਸੁਰੱਖਿਅਤ ਹੋ ਜਾਂਦਾ ਹੈ। ਪਰ ਅਸਲੀਅਤ ਬਿਲਕੁਲ ਵੱਖਰੀ ਹੈ। ਕੈਨੇਡਾ ਦੀ ਇਮੀਗ੍ਰੇਸ਼ਨ ਏਜੰਸੀ, ਆਈਆਰਸੀਸੀ (ਇਮੀਗ੍ਰੇਸ਼ਨ, ਸ਼ਰਨਾਰਥੀ ਅਤੇ ਨਾਗਰਿਕਤਾ ਕੈਨੇਡਾ) ਦੇ ਸਖ਼ਤ ਨਿਯਮਾਂ ਨੂੰ ਨਜ਼ਰਅੰਦਾਜ਼ ਕਰਨ ਨਾਲ ਇਸ ਕੀਮਤੀ ਦਰਜੇ ਨੂੰ ਹਮੇਸ਼ਾ ਲਈ ਗੁਆਉਣਾ ਪੈ ਸਕਦਾ ਹੈ।

5-ਸਾਲਾ ‘ਰੋਲਿੰਗ ਵਿੰਡੋ’ ਨਿਯਮ ਕੀ ਹੈ, ਜਿੱਥੇ ਸਭ ਤੋਂ ਵੱਡੀ ਗਲਤੀ ਹੁੰਦੀ ਹੈ?

ਕੈਨੇਡਾ ਦੇ ਇਮੀਗ੍ਰੇਸ਼ਨ ਕਾਨੂੰਨ ਦੇ ਅਨੁਸਾਰ, ਹਰੇਕ ਪੀਆਰ ਧਾਰਕ ਨੂੰ ਆਪਣੇ 5-ਸਾਲ ਦੇ ਕਾਰਜਕਾਲ ਦੌਰਾਨ ਘੱਟੋ-ਘੱਟ 730 ਦਿਨ (ਜਾਂ ਦੋ ਪੂਰੇ ਸਾਲ) ਕੈਨੇਡਾ ਵਿੱਚ ਸਰੀਰਕ ਤੌਰ ‘ਤੇ ਮੌਜੂਦ ਰਹਿਣਾ ਜ਼ਰੂਰੀ ਹੈ। ਇਹ 730 ਦਿਨ ਕੈਨੇਡਾ ਵਿੱਚ ਲਗਾਤਾਰ ਬਿਤਾਉਣ ਦੀ ਲੋੜ ਨਹੀਂ ਹੈ, ਸਗੋਂ, ਇਹਨਾਂ ਨੂੰ 5 ਸਾਲਾਂ ਦੀ ਰੋਲਿੰਗ ਵਿੰਡੋ ਦੇ ਅੰਦਰ ਪੂਰਾ ਕਰਨਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ। ਇਹ ਉਹ ਥਾਂ ਹੈ ਜਿੱਥੇ ਜ਼ਿਆਦਾਤਰ ਲੋਕ ਘੱਟ ਜਾਂਦੇ ਹਨ। ਬਹੁਤ ਸਾਰੇ ਪ੍ਰਵਾਸੀ ਸੋਚਦੇ ਹਨ ਕਿ ਉਹ ਸ਼ੁਰੂਆਤੀ ਸਾਲਾਂ ਵਿੱਚ ਕਾਫ਼ੀ ਸਮਾਂ ਬਿਤਾਉਣ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਲੰਬੇ ਸਮੇਂ ਲਈ ਕੈਨੇਡਾ ਤੋਂ ਬਾਹਰ ਰਹਿ ਸਕਦੇ ਹਨ, ਪਰ ਜਿਵੇਂ-ਜਿਵੇਂ ਸਮਾਂ ਵਧਦਾ ਹੈ, ਪੁਰਾਣੇ ਦਿਨ ਅਣਗਿਣਤ ਹੋ ਜਾਂਦੇ ਹਨ, ਅਤੇ ਉਹ ਇਸ ਲਾਜ਼ਮੀ ਲੋੜ ਨੂੰ ਪੂਰਾ ਕਰਨ ਵਿੱਚ ਅਸਫਲ ਰਹਿੰਦੇ ਹਨ।

ਇਹ 8 ਵੱਡੀਆਂ ਗਲਤੀਆਂ ਤੁਹਾਡੇ ਭਵਿੱਖ ਨੂੰ ਅਧੂਰੇ ਛੱਡ ਸਕਦੀਆਂ ਹਨ।

ਕੈਨੇਡਾ ਤੋਂ ਬਾਹਰ ਲੰਬੇ ਸਮੇਂ ਲਈ ਰਹਿਣਾ: ਬਹੁਤ ਸਾਰੇ ਭਾਰਤੀ, ਆਪਣਾ ਪੀਆਰ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰਨ ਤੋਂ ਬਾਅਦ, ਕੰਮ, ਕਾਰੋਬਾਰ ਜਾਂ ਪਰਿਵਾਰ ਲਈ ਲੰਬੇ ਸਮੇਂ ਲਈ ਭਾਰਤ ਵਾਪਸ ਆਉਂਦੇ ਹਨ, ਜਿਸ ਨਾਲ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀ 730-ਦਿਨਾਂ ਦੀ ਮੌਜੂਦਗੀ ਘੱਟ ਜਾਂਦੀ ਹੈ।

ਵਿਦੇਸ਼ ਵਿੱਚ ਬਿਤਾਏ ਸਮੇਂ ਦੀ ਗਲਤ ਗਣਨਾ: ਲੋਕ ਸੋਚਦੇ ਹਨ ਕਿ ਵਿਦੇਸ਼ ਵਿੱਚ ਕੰਮ ਕਰਨਾ ਵੀ ਇੱਕ ਕਾਰਕ ਵਜੋਂ ਗਿਣਿਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ, ਜੋ ਕਿ ਗਲਤ ਹੈ। ਇਸ ਸਮੇਂ ਨੂੰ ਸਿਰਫ਼ ਕੁਝ ਖਾਸ ਮਾਮਲਿਆਂ ਵਿੱਚ ਛੋਟ ਦਿੱਤੀ ਜਾਂਦੀ ਹੈ (ਜਿਵੇਂ ਕਿ ਕੈਨੇਡੀਅਨ ਨਾਗਰਿਕ ਜੀਵਨ ਸਾਥੀ ਨਾਲ ਵਿਦੇਸ਼ ਵਿੱਚ ਰਹਿਣਾ ਜਾਂ ਕਿਸੇ ਕੈਨੇਡੀਅਨ ਕੰਪਨੀ ਵੱਲੋਂ ਵਿਦੇਸ਼ ਵਿੱਚ ਕੰਮ ਕਰਨਾ), ਅਤੇ ਉਹ ਵੀ ਮਜ਼ਬੂਤ ​​ਸਬੂਤਾਂ ਨਾਲ।

ਕੈਨੇਡਾ ਵਿੱਚ ਰਿਹਾਇਸ਼ ਦਾ ਸਬੂਤ ਨਾ ਰੱਖਣਾ: IRCC ਸਿਰਫ਼ ਦਾਅਵਿਆਂ ‘ਤੇ ਭਰੋਸਾ ਨਹੀਂ ਕਰਦਾ। ਪਾਸਪੋਰਟ ਸਟੈਂਪ, ਫਲਾਈਟ ਟਿਕਟਾਂ, ਕਿਰਾਏ ਦੇ ਸਮਝੌਤੇ, ਨੌਕਰੀ ਦੇ ਰਿਕਾਰਡ, ਬੈਂਕ ਸਟੇਟਮੈਂਟਾਂ ਅਤੇ ਸਿਹਤ ਕਾਰਡ ਵਰਗੇ ਪ੍ਰਮਾਣਿਕ ​​ਦਸਤਾਵੇਜ਼ਾਂ ਦਾ ਹੋਣਾ ਬਹੁਤ ਜ਼ਰੂਰੀ ਹੈ।

ਸਰਹੱਦ ‘ਤੇ ਰਹਿਣਾ (730 ਦਿਨ) ਅਤੇ ਵਿਦੇਸ਼ ਯਾਤਰਾ ਕਰਨਾ: ਬਹੁਤ ਸਾਰੇ ਲੋਕ 730 ਦਿਨਾਂ ਦੇ ਨਿਸ਼ਾਨ ‘ਤੇ ਪਹੁੰਚਦੇ ਹੀ ਲੰਬੇ ਸਫ਼ਰ ਲਈ ਰਵਾਨਾ ਹੋ ਜਾਂਦੇ ਹਨ। ਜੇਕਰ ਕੋਈ ਫਲਾਈਟ ਰੱਦ ਹੋ ਜਾਂਦੀ ਹੈ ਜਾਂ ਕੋਈ ਮੈਡੀਕਲ ਐਮਰਜੈਂਸੀ ਹੁੰਦੀ ਹੈ, ਤਾਂ ਉਹ ਸੀਮਾ ਤੋਂ ਹੇਠਾਂ ਆ ਜਾਂਦੇ ਹਨ। ਇਸ ਲਈ, ਕੁਝ ਵਾਧੂ ਦਿਨਾਂ ਦਾ ਹਾਸ਼ੀਏ ਰੱਖਣਾ ਹਮੇਸ਼ਾ ਮਹੱਤਵਪੂਰਨ ਹੁੰਦਾ ਹੈ।

ਕਮਜ਼ੋਰ ਦਸਤਾਵੇਜ਼ਾਂ ਦੇ ਨਾਲ PRTD ਲਈ ਅਰਜ਼ੀ ਦੇਣਾ: ਜੇਕਰ ਤੁਹਾਡੇ PR ਕਾਰਡ ਦੀ ਮਿਆਦ ਪੁੱਗ ਗਈ ਹੈ ਅਤੇ ਤੁਸੀਂ ਕੈਨੇਡਾ ਤੋਂ ਬਾਹਰ ਹੋ, ਤਾਂ ਵਾਪਸੀ ਲਈ ਇੱਕ ਸਥਾਈ ਨਿਵਾਸੀ ਯਾਤਰਾ ਦਸਤਾਵੇਜ਼ (PRTD) ਦੀ ਲੋੜ ਹੁੰਦੀ ਹੈ। ਜੇਕਰ ਕੋਈ ਠੋਸ ਸਬੂਤ ਨਹੀਂ ਹੈ ਤਾਂ ਇਸ ਅਰਜ਼ੀ ਨੂੰ ਰੱਦ ਕੀਤਾ ਜਾ ਸਕਦਾ ਹੈ।

IRCC ਨੋਟਿਸਾਂ ਜਾਂ ਸਮੀਖਿਆਵਾਂ ਨੂੰ ਹਲਕੇ ਢੰਗ ਨਾਲ ਪੇਸ਼ ਕਰਨਾ: ਇਮੀਗ੍ਰੇਸ਼ਨ ਵਿਭਾਗ ਨਿਯਮਾਂ ਵਿੱਚ ਸ਼ੱਕੀ ਬੇਨਿਯਮੀਆਂ ਹੋਣ ‘ਤੇ ਨੋਟਿਸ ਭੇਜਦਾ ਹੈ। ਜਵਾਬ ਵਿੱਚ ਦੇਰੀ ਕਰਨਾ ਜਾਂ ਅਣਦੇਖਾ ਕਰਨਾ ਮਹਿੰਗਾ ਹੋ ਸਕਦਾ ਹੈ ਅਤੇ ਇਸਦੇ ਨਤੀਜੇ ਵਜੋਂ ਅਪੀਲ ਗੁੰਮ ਵੀ ਹੋ ਸਕਦੀ ਹੈ।

ਗਲਤ ਜਾਂ ਅਸੰਗਤ ਯਾਤਰਾ ਇਤਿਹਾਸ ਪ੍ਰਦਾਨ ਕਰਨਾ: PR ਨਵੀਨੀਕਰਨ ਜਾਂ ਨਾਗਰਿਕਤਾ ਲਈ ਅਰਜ਼ੀ ਦਿੰਦੇ ਸਮੇਂ ਪ੍ਰਦਾਨ ਕੀਤੀਆਂ ਗਈਆਂ ਯਾਤਰਾ ਤਾਰੀਖਾਂ ਹਮੇਸ਼ਾ ਇਕਸਾਰ ਹੋਣੀਆਂ ਚਾਹੀਦੀਆਂ ਹਨ। IRCC ਵੱਖ-ਵੱਖ ਵੇਰਵਿਆਂ ਨੂੰ ਗਲਤ ਬਿਆਨਬਾਜ਼ੀ ਵਜੋਂ ਪ੍ਰਦਾਨ ਕਰਨ ‘ਤੇ ਵਿਚਾਰ ਕਰ ਸਕਦਾ ਹੈ ਅਤੇ ਸਖ਼ਤ ਕਾਰਵਾਈ ਕਰ ਸਕਦਾ ਹੈ।

ਉਲਝਣ ਵਾਲੇ ਪੀਆਰ ਅਤੇ ਨਾਗਰਿਕਤਾ ਦੇ ਨਿਯਮ: ਪੀਆਰ ਬਣਾਈ ਰੱਖਣ ਲਈ ਪੰਜ ਸਾਲਾਂ ਦੀ ਮਿਆਦ ਵਿੱਚ 730 ਦਿਨ ਦੀ ਲੋੜ ਹੁੰਦੀ ਹੈ, ਜਦੋਂ ਕਿ ਕੈਨੇਡੀਅਨ ਨਾਗਰਿਕਤਾ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰਨ ਲਈ ਪਿਛਲੇ ਪੰਜ ਸਾਲਾਂ ਵਿੱਚ ਘੱਟੋ-ਘੱਟ 1,095 ਦਿਨ ਸਰੀਰਕ ਤੌਰ ‘ਤੇ ਮੌਜੂਦ ਰਹਿਣ ਦੀ ਲੋੜ ਹੁੰਦੀ ਹੈ। ਦੋਵੇਂ ਗਣਨਾਵਾਂ ਬਿਲਕੁਲ ਵੱਖਰੀਆਂ ਹਨ।

ਕਾਰਡ ਦੀ ਮਿਆਦ ਪੁੱਗਣ ਦਾ ਮਤਲਬ ਸਥਿਤੀ ਦਾ ਨੁਕਸਾਨ ਨਹੀਂ ਹੈ।

ਕੈਨੇਡਾ ਇਮੀਗ੍ਰੇਸ਼ਨ ਮਾਹਿਰਾਂ ਨੇ ਇੱਕ ਹੋਰ ਵੱਡੀ ਗਲਤ ਧਾਰਨਾ ਨੂੰ ਦੂਰ ਕੀਤਾ ਹੈ: ਲੋਕ ਸੋਚਦੇ ਹਨ ਕਿ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦਾ ਪੀਆਰ ਕਾਰਡ ਉਦੋਂ ਖਤਮ ਹੋ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ਜਦੋਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦਾ ਸਥਿਤੀ ਵੀ ਖਤਮ ਹੋ ਜਾਂਦੀ ਹੈ, ਪਰ ਅਜਿਹਾ ਨਹੀਂ ਹੈ। ਪੀਆਰ ਕਾਰਡ ਸਿਰਫ਼ ਇੱਕ ਯਾਤਰਾ ਅਤੇ ਪਛਾਣ ਦਸਤਾਵੇਜ਼ ਹੈ। ਕਾਰਡ ਦੀ ਮਿਆਦ ਪੁੱਗਣ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਵੀ ਤੁਹਾਡੀ ਸਥਿਤੀ ਬਦਲੀ ਨਹੀਂ ਰਹਿੰਦੀ।

 

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ਗੋਵਿੰਦਾ ਨੂੰ ਲਾਂਚ ਕਰਨ ਵਾਲੇ ਬਜ਼ੁਰਗ ਫਿਲਮ ਨਿਰਮਾਤਾ ਪਹਿਲਾਜ ਨਿਹਲਾਨੀ ਦਾ ਦੇਹਾਂਤ; ਬਾਲੀਵੁੱਡ ਵਿੱਚ ਸੋਗ ਹੈ

ਮੁੰਬਈ – ਹਿੰਦੀ ਫਿਲਮ ਇੰਡਸਟਰੀ ਤੋਂ ਦੁਖਦਾਈ ਖ਼ਬਰ ਆਈ ਹੈ। ਫਿਲਮ ਨਿਰਮਾਤਾ ਅਤੇ ਸੈਂਟਰਲ ਬੋਰਡ ਆਫ਼ ਫਿਲਮ ਸਰਟੀਫਿਕੇਸ਼ਨ (ਸੈਂਸਰ ਬੋਰਡ) ਦੇ ਸਾਬਕਾ ਚੇਅਰਮੈਨ ਪਹਿਲਾਜ ਨਿਹਲਾਨੀ ਦਾ 76 ਸਾਲ ਦੀ ਉਮਰ ਵਿੱਚ ਦੇਹਾਂਤ ਹੋ ਗਿਆ ਹੈ। ਭਾਰਤੀ ਫਿਲਮ ਨਿਰਮਾਤਾਵਾਂ ਦੀ ਸਭ ਤੋਂ ਵੱਡੀ ਸੰਸਥਾ, ਇੰਡੀਅਨ ਮੋਸ਼ਨ ਪਿਕਚਰ ਪ੍ਰੋਡਿਊਸਰਜ਼ ਐਸੋਸੀਏਸ਼ਨ (IMPA) ਦੇ ਪ੍ਰਧਾਨ ਅਭੈ ਸਿਨਹਾ ਨੇ ਇਸ ਖ਼ਬਰ ਦੀ ਪੁਸ਼ਟੀ ਕੀਤੀ ਹੈ।

ਰਿਪੋਰਟਾਂ ਅਨੁਸਾਰ, ਪਹਿਲਾਜ ਨਿਹਲਾਨੀ ਲੰਬੇ ਸਮੇਂ ਤੋਂ ਬਿਮਾਰ ਸਨ। ਉਹ ਫਿਲਮ ਇੰਡਸਟਰੀ ਵਿੱਚ ਇੱਕ ਜਾਣੀ-ਪਛਾਣੀ ਹਸਤੀ ਸਨ, ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਕਈ ਸਫਲ ਅਤੇ ਪ੍ਰਸਿੱਧ ਫਿਲਮਾਂ ਦਾ ਨਿਰਮਾਣ ਕੀਤਾ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਦੇਹਾਂਤ ਦੀ ਖ਼ਬਰ ਨੇ ਫਿਲਮ ਇੰਡਸਟਰੀ ਵਿੱਚ ਸਦਮੇ ਦੀ ਲਹਿਰ ਫੈਲਾ ਦਿੱਤੀ ਹੈ। ਉਹ ਨਾ ਸਿਰਫ਼ ਇੱਕ ਨਿਰਮਾਤਾ ਵਜੋਂ ਜਾਣੇ ਜਾਂਦੇ ਸਨ, ਸਗੋਂ ਇੱਕ ਸਖ਼ਤ ਅਤੇ ਮਸ਼ਹੂਰ ਸੈਂਸਰ ਬੋਰਡ ਮੁਖੀ ਵਜੋਂ ਵੀ ਜਾਣੇ ਜਾਂਦੇ ਸਨ।
ਆਪਣੇ ਫਿਲਮੀ ਕਰੀਅਰ ਵਿੱਚ, ਪਹਿਲਾਜ ਨਿਹਲਾਨੀ ਨੇ ਕਈ ਹਿੱਟ ਫਿਲਮਾਂ ਦਾ ਸਮਰਥਨ ਕੀਤਾ। ਇਨ੍ਹਾਂ ਵਿੱਚ “ਇਲਜ਼ਾਮ,” “ਆਗ ਹੀ ਆਗ,” “ਸ਼ੋਲਾ ਔਰ ਸ਼ਬਨਮ,” ਅਤੇ “ਆਂਖੇਂ” ਵਰਗੀਆਂ ਫਿਲਮਾਂ ਸ਼ਾਮਲ ਹਨ। “ਆਂਖੇਂ”, ਖਾਸ ਕਰਕੇ, 1990 ਦੇ ਦਹਾਕੇ ਦੀਆਂ ਸਭ ਤੋਂ ਵੱਡੀਆਂ ਹਿੱਟ ਫਿਲਮਾਂ ਵਿੱਚੋਂ ਇੱਕ ਮੰਨਿਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ਅਤੇ ਅਜੇ ਵੀ ਉਹਨਾਂ ਦੀਆਂ ਸਭ ਤੋਂ ਸਫਲ ਫਿਲਮਾਂ ਵਿੱਚੋਂ ਇੱਕ ਮੰਨਿਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ।

ਪਹਿਲਾਜ ਨਿਹਲਾਨੀ ਨੇ ਕਈ ਪ੍ਰਮੁੱਖ ਅਦਾਕਾਰਾਂ ਨੂੰ ਫਿਲਮ ਇੰਡਸਟਰੀ ਵਿੱਚ ਆਪਣਾ ਪਹਿਲਾ ਬ੍ਰੇਕ ਦਿੱਤਾ। ਉਸਨੇ 1986 ਦੀ ਫਿਲਮ “ਇਲਜ਼ਾਮ” ਨਾਲ ਅਦਾਕਾਰ ਗੋਵਿੰਦਾ ਨੂੰ ਲਾਂਚ ਕੀਤਾ। ਇਸੇ ਤਰ੍ਹਾਂ, ਅਦਾਕਾਰ ਚੰਕੀ ਪਾਂਡੇ ਨੇ ਵੀ ਆਪਣੀ ਫਿਲਮ “ਆਗ ਹੀ ਆਗ” ਨਾਲ ਆਪਣੇ ਕਰੀਅਰ ਦੀ ਸ਼ੁਰੂਆਤ ਕੀਤੀ।

ਇਸ ਤੋਂ ਇਲਾਵਾ, ਗੋਵਿੰਦਾ ਅਤੇ ਚੰਕੀ ਪਾਂਡੇ ਅਭਿਨੀਤ ਉਸਦੀ 1993 ਦੀ ਫਿਲਮ “ਆਂਖੇਂ” ਉਸ ਸਮੇਂ ਦੀਆਂ ਸਭ ਤੋਂ ਵੱਧ ਕਮਾਈ ਕਰਨ ਵਾਲੀਆਂ ਫਿਲਮਾਂ ਵਿੱਚੋਂ ਇੱਕ ਸੀ। ਉਸਦੀ ਫਿਲਮੋਗ੍ਰਾਫੀ ਵਿੱਚ “ਹਠਕੜੀ”, “ਆਂਧੀ ਤੂਫਾਨ”, “ਪਾਪ ਕੀ ਦੁਨੀਆ”, “ਆਗ ਕਾ ਗੋਲਾ”, “ਦਿਲ ਤੇਰਾ ਦੀਵਾਨਾ”, “ਭਾਈ ਭਾਈ”, “ਜੂਲੀ 2” ਅਤੇ “ਰੰਗੀਲਾ ਰਾਜਾ” ਵਰਗੀਆਂ ਕਈ ਸਫਲ ਫਿਲਮਾਂ ਸ਼ਾਮਲ ਹਨ।
ਇੱਕ ਨਿਰਮਾਤਾ ਵਜੋਂ ਆਪਣੇ ਯੋਗਦਾਨ ਤੋਂ ਇਲਾਵਾ, ਪਹਿਲਾਜ ਨਿਹਲਾਨੀ ਨੇ 2015 ਤੋਂ 2017 ਤੱਕ ਸੈਂਸਰ ਬੋਰਡ ਦੇ ਚੇਅਰਮੈਨ ਵਜੋਂ ਵੀ ਸੇਵਾ ਨਿਭਾਈ। ਆਪਣੇ ਕਾਰਜਕਾਲ ਦੌਰਾਨ, ਉਹ ਆਪਣੀਆਂ ਸਖ਼ਤ ਸੈਂਸਰਸ਼ਿਪ ਨੀਤੀਆਂ ਲਈ ਅਕਸਰ ਖ਼ਬਰਾਂ ਵਿੱਚ ਰਹਿੰਦੇ ਸਨ। ਉਸ ਸਮੇਂ ਦੌਰਾਨ ਕਈ ਫਿਲਮਾਂ ਨੂੰ ਵਿਵਾਦਾਂ ਦਾ ਸਾਹਮਣਾ ਵੀ ਕਰਨਾ ਪਿਆ।
ਨਿਹਲਾਨੀ ਲੰਬੇ ਸਮੇਂ ਤੱਕ ਫਿਲਮ ਨਿਰਮਾਣ ਅਤੇ ਫਿਲਮ ਸੰਗਠਨਾਂ ਨਾਲ ਵੀ ਜੁੜੇ ਰਹੇ, ਮੋਸ਼ਨ ਪਿਕਚਰ ਅਤੇ ਟੀਵੀ ਪ੍ਰੋਗਰਾਮ ਨਿਰਮਾਤਾਵਾਂ ਦੀ ਐਸੋਸੀਏਸ਼ਨ ਦੇ ਚੇਅਰਮੈਨ ਵਜੋਂ ਸੇਵਾ ਨਿਭਾਈ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ 2009 ਵਿੱਚ ਅਹੁਦੇ ਤੋਂ ਅਸਤੀਫਾ ਦੇ ਦਿੱਤਾ

 

 

 
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ਮਾਲਵੀਆ ਨਗਰ ਅੱਗ ਮਾਮਲੇ ਵਿੱਚ ਵੱਡਾ ਖੁਲਾਸਾ: ਸਿਲੰਡਰ ਨਹੀਂ ਫਟਿਆ, ਇਸੇ ਕਾਰਨ 21 ਲੋਕ ਜ਼ਿੰਦਾ ਸੜ ਗਏ

ਨਵੀਂ ਦਿੱਲੀ – ਦਿੱਲੀ ਵਿੱਚ ਮਾਲਵੀਆ ਨਗਰ ਅੱਗ ਘਟਨਾ ਵਿੱਚ ਇੱਕ ਵੱਡਾ ਖੁਲਾਸਾ ਹੋਇਆ ਹੈ। ਦਿੱਲੀ ਪੁਲਿਸ ਨਾਲ ਜੁੜੇ ਸੂਤਰਾਂ ਨੇ ਦੱਸਿਆ ਹੈ ਕਿ ਰੈਸਟੋਰੈਂਟ ਵਿੱਚ ਅੱਗ ਸ਼ਾਰਟ ਸਰਕਟ ਕਾਰਨ ਲੱਗੀ ਸੀ। ਜਾਂਚ ਟੀਮ ਨੂੰ ਘਟਨਾ ਦੌਰਾਨ ਕਿਸੇ ਵੀ ਐਲਪੀਜੀ ਸਿਲੰਡਰ ਦੇ ਫਟਣ ਦਾ ਕੋਈ ਸਬੂਤ ਨਹੀਂ ਮਿਲਿਆ।

ਦਿੱਲੀ ਪੁਲਿਸ ਦੀ ਸ਼ੁਰੂਆਤੀ ਜਾਂਚ ਦੇ ਆਧਾਰ ‘ਤੇ, ਸੂਤਰਾਂ ਨੇ ਦੱਸਿਆ ਕਿ ਅੰਦਰੂਨੀ ਤਾਰਾਂ ਵਿੱਚ ਸ਼ਾਰਟ ਸਰਕਟ ਹੋਣ ਕਾਰਨ ਅੱਗ ਇੰਨੀ ਜ਼ਿਆਦਾ ਫੈਲ ਗਈ। ਸੂਤਰਾਂ ਅਨੁਸਾਰ, ਹੋਟਲ ਦੇ ਬੇਸਮੈਂਟ ਅਤੇ ਉੱਪਰਲੀ ਮੰਜ਼ਿਲ ‘ਤੇ ਦੋ ਰਸੋਈਆਂ ਸਨ। ਐਲਪੀਜੀ ਸਿਲੰਡਰ ਦੋਵਾਂ ਰਸੋਈਆਂ ਦੇ ਅੰਦਰ ਸਟੋਰ ਕੀਤੇ ਗਏ ਸਨ। ਇਨ੍ਹਾਂ ਸਿਲੰਡਰਾਂ ਵਿੱਚ ਕੋਈ ਧਮਾਕਾ ਨਹੀਂ ਹੋਇਆ।
ਹਾਲਾਂਕਿ, ਮਾਲਵੀਆ ਨਗਰ ਰੈਸਟੋਰੈਂਟ ਵਿੱਚ ਅੱਗ ਲੱਗਣ ਦੇ ਸਹੀ ਕਾਰਨਾਂ ਦਾ ਪਤਾ ਲਗਾਉਣ ਲਈ ਜਾਂਚ ਅਜੇ ਵੀ ਜਾਰੀ ਹੈ, ਅਤੇ ਇੱਕ ਵਿਸਤ੍ਰਿਤ ਫੋਰੈਂਸਿਕ ਜਾਂਚ ਕੀਤੀ ਜਾ ਰਹੀ ਹੈ।
ਮਾਲਵੀਆ ਨਗਰ ਖੇਤਰ ਵਿੱਚ ਰੈਸਟੋਰੈਂਟ ਵਿੱਚ ਲੱਗੀ ਭਿਆਨਕ ਅੱਗ ਵਿੱਚ ਘੱਟੋ-ਘੱਟ 21 ਲੋਕਾਂ ਦੀ ਮੌਤ ਹੋ ਗਈ ਹੈ। ਇਨ੍ਹਾਂ 21 ਲੋਕਾਂ ਵਿੱਚੋਂ ਨੌਂ ਭਾਰਤੀ ਸਨ, ਜਦੋਂ ਕਿ 12 ਵਿਦੇਸ਼ੀ ਨਾਗਰਿਕ ਬੰਗਲਾਦੇਸ਼, ਲਾਇਬੇਰੀਆ, ਨਾਈਜੀਰੀਆ ਅਤੇ ਮੋਜ਼ਾਮਬੀਕ ਤੋਂ ਸਨ।

ਅਧਿਕਾਰੀਆਂ ਦੇ ਅਨੁਸਾਰ, ਦਿੱਲੀ ਪੁਲਿਸ ਨੇ ਸਾਰੇ ਵਿਦੇਸ਼ੀ ਨਾਗਰਿਕਾਂ ਦੀ ਇੱਕ ਸੂਚੀ ਵਿਦੇਸ਼ ਮੰਤਰਾਲੇ ਨੂੰ ਭੇਜੀ ਹੈ ਤਾਂ ਜੋ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀਆਂ ਲਾਸ਼ਾਂ ਨੂੰ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਗ੍ਰਹਿ ਦੇਸ਼ਾਂ ਵਿੱਚ ਵਾਪਸ ਭੇਜਣ ਵਿੱਚ ਸਹਾਇਤਾ ਕੀਤੀ ਜਾ ਸਕੇ। ਇਨ੍ਹਾਂ ਵਿਦੇਸ਼ੀ ਨਾਗਰਿਕਾਂ ਦੀ ਪਛਾਣ ਘਟਨਾ ਸਥਾਨ ‘ਤੇ ਮਿਲੇ ਪਾਸਪੋਰਟਾਂ ਦੇ ਆਧਾਰ ‘ਤੇ ਕੀਤੀ ਗਈ ਸੀ।

ਪੁਲਿਸ ਨੇ ਸ਼ਾਮਲ ਸਾਰੇ ਵਿਦੇਸ਼ੀ ਨਾਗਰਿਕਾਂ ਦੀ ਡੀਐਨਏ ਪ੍ਰੋਫਾਈਲਿੰਗ ਪੂਰੀ ਕਰ ਲਈ ਹੈ। ਇਹ ਪ੍ਰੋਫਾਈਲਿੰਗ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਸਬੰਧਤ ਦੇਸ਼ਾਂ ਦੇ ਦੂਤਾਵਾਸਾਂ ਤੋਂ ਇਜਾਜ਼ਤ ਲੈਣ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਕੀਤੀ ਗਈ ਸੀ। ਅਧਿਕਾਰੀਆਂ ਨੇ ਅੱਗੇ ਕਿਹਾ ਕਿ ਸਾਰੇ ਵਿਦੇਸ਼ੀ ਨਾਗਰਿਕਾਂ ਦੀਆਂ ਲਾਸ਼ਾਂ ਦਾ ਪੋਸਟਮਾਰਟਮ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਸਬੰਧਤ ਦੂਤਾਵਾਸਾਂ ਦੀ ਇਜਾਜ਼ਤ ਨਾਲ ਕੀਤਾ ਗਿਆ ਸੀ।

ਦਿੱਲੀ ਫਾਇਰ ਸਰਵਿਸ ਦੇ ਅਨੁਸਾਰ, ਅੱਗ ਦੀਆਂ ਲਪਟਾਂ ਨੇ ਇਮਾਰਤ ਦੇ ਬੇਸਮੈਂਟ, ਜ਼ਮੀਨੀ ਮੰਜ਼ਿਲ ਅਤੇ ਪੰਜ ਉੱਪਰਲੀਆਂ ਮੰਜ਼ਿਲਾਂ ਨੂੰ ਆਪਣੀ ਲਪੇਟ ਵਿੱਚ ਲੈ ਲਿਆ, ਜਿਸ ਕਾਰਨ ਗਰਮੀ ਅਤੇ ਧੂੰਏਂ ਕਾਰਨ ਕਾਫ਼ੀ ਨੁਕਸਾਨ ਹੋਇਆ। ਘਟਨਾ ਦੀ ਜਾਂਚ ਇਸ ਸਮੇਂ ਚੱਲ ਰਹੀ ਹੈ।

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ਮਮਤਾ ਬੈਨਰਜੀ ਦੇ ਦਾਅਵਿਆਂ ਦੀ ਕਾਨੂੰਨੀ ਜਾਂਚ, ਗ੍ਰਹਿ ਮੰਤਰੀ ਅਤੇ ਗ੍ਰਹਿ ਮੰਤਰਾਲੇ ਨੂੰ ਫਸਾਉਣ ਲਈ ਐਫਆਈਆਰ ਦਰਜ

ਕੋਲਕਾਤਾ – ਪੱਛਮੀ ਬੰਗਾਲ ਦੀ ਸਾਬਕਾ ਮੁੱਖ ਮੰਤਰੀ ਅਤੇ ਤ੍ਰਿਣਮੂਲ ਕਾਂਗਰਸ (ਟੀਐਮਸੀ) ਮੁਖੀ ਮਮਤਾ ਬੈਨਰਜੀ ਦੀਆਂ ਮੁਸ਼ਕਲਾਂ ਇੱਕ ਵਾਰ ਫਿਰ ਵਧਦੀਆਂ ਜਾ ਰਹੀਆਂ ਹਨ। ਕੋਲਕਾਤਾ ਵਿੱਚ ਇੱਕ ਵਿਰੋਧ ਪ੍ਰਦਰਸ਼ਨ ਦੌਰਾਨ ਬੰਗਲਾਦੇਸ਼ ਵਿੱਚ ਹੋਏ ਇੱਕ ਹਾਈ-ਪ੍ਰੋਫਾਈਲ ਕਤਲ ਨਾਲ ਭਾਰਤ ਦੇ ਕੇਂਦਰੀ ਗ੍ਰਹਿ ਮੰਤਰਾਲੇ ਅਤੇ ਗ੍ਰਹਿ ਮੰਤਰੀ ਅਮਿਤ ਸ਼ਾਹ ਨੂੰ ਕਥਿਤ ਤੌਰ ‘ਤੇ ਜੋੜਨ ਦੇ ਦੋਸ਼ ਵਿੱਚ ਉਨ੍ਹਾਂ ਵਿਰੁੱਧ ਇੱਕ ਅਪਰਾਧਿਕ ਐਫਆਈਆਰ ਦਰਜ ਕੀਤੀ ਗਈ ਹੈ। ਸਿਲੀਗੁੜੀ ਸਾਈਬਰ ਕ੍ਰਾਈਮ ਪੁਲਿਸ ਸਟੇਸ਼ਨ ਵਿੱਚ ਇੱਕ ਸਥਾਨਕ ਮਹਿਲਾ ਵਕੀਲ ਦੁਆਰਾ ਦਾਇਰ ਇਸ ਹਾਈ-ਪ੍ਰੋਫਾਈਲ ਸ਼ਿਕਾਇਤ ਨੇ ਇੱਕ ਵਾਰ ਫਿਰ ਰਾਜ ਦੇ ਰਾਜਨੀਤਿਕ ਦ੍ਰਿਸ਼ ਨੂੰ ਹਿਲਾ ਕੇ ਰੱਖ ਦਿੱਤਾ ਹੈ।
ਪੂਰਾ ਮਾਮਲਾ ਕੀ ਹੈ?
ਇਹ ਸਾਰਾ ਵਿਵਾਦ 2 ਜੂਨ, 2026 ਨੂੰ ਧਰਮਤਲਾ (ਵਾਈ-ਚੈਨਲ), ਕੋਲਕਾਤਾ ਵਿਖੇ ਟੀਐਮਸੀ ਦੁਆਰਾ ਆਯੋਜਿਤ ਇੱਕ ਧਰਨਾ ਪ੍ਰਦਰਸ਼ਨ ਦੌਰਾਨ ਸ਼ੁਰੂ ਹੋਇਆ ਸੀ। ਸਟੇਜ ਤੋਂ ਆਪਣੇ ਸੰਬੋਧਨ ਵਿੱਚ, ਮਮਤਾ ਬੈਨਰਜੀ ਨੇ ਇੱਕ ਦਲੇਰਾਨਾ ਦਾਅਵਾ ਕੀਤਾ, ਦਾਅਵਾ ਕੀਤਾ ਕਿ ਉਸਨੂੰ ਬੰਗਲਾਦੇਸ਼ ਵਿੱਚ ਇੱਕ “ਵੱਡੇ ਕਤਲ” ਦੇ ਪਿੱਛੇ ਦੀ ਪੂਰੀ ਸਾਜ਼ਿਸ਼ ਅਤੇ ਇਸ ਵਿੱਚ ਸ਼ਾਮਲ ਮਾਸਟਰਮਾਈਂਡਾਂ ਦੇ ਨਾਵਾਂ ਦਾ ਪੂਰਾ ਗਿਆਨ ਸੀ। ਹਾਲਾਂਕਿ, ਉਸਨੇ ਕਿਹਾ ਕਿ ਉਹ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨਾਵਾਂ ਦਾ ਖੁਲਾਸਾ ਨਹੀਂ ਕਰੇਗੀ, ਕਿਉਂਕਿ ਇਹ ਗੁਆਂਢੀ ਬੰਗਲਾਦੇਸ਼ ਵਿੱਚ ਵਿਆਪਕ ਅਸ਼ਾਂਤੀ ਪੈਦਾ ਕਰ ਸਕਦਾ ਹੈ। ਰਾਜਨੀਤਿਕ ਹਲਕਿਆਂ ਦਾ ਮੰਨਣਾ ਹੈ ਕਿ ਇਹ ਬੰਗਲਾਦੇਸ਼ੀ ਵਿਦਿਆਰਥੀ ਨੇਤਾ ਸ਼ਰੀਫ ਉਸਮਾਨ ਬਿਨ ਹਾਦੀ ਦੇ ਬਹੁਤ ਪ੍ਰਚਾਰਿਤ ਕਤਲ ਦਾ ਸਿੱਧਾ ਹਵਾਲਾ ਸੀ।

ਗ੍ਰਹਿ ਮੰਤਰਾਲੇ ਨੂੰ ਨਿਸ਼ਾਨਾ ਬਣਾਇਆ

ਪੁਲਿਸ ਸ਼ਿਕਾਇਤ ਦੇ ਅਨੁਸਾਰ, ਮਮਤਾ ਬੈਨਰਜੀ ਨੇ ਵਿਰੋਧ ਸਥਾਨ ਤੋਂ ਖੁੱਲ੍ਹ ਕੇ ਕਿਹਾ, “ਸਾਡੀ ਵਿਸ਼ੇਸ਼ ਟਾਸਕ ਫੋਰਸ (STF) ਨੇ ਬੰਗਲਾਦੇਸ਼ ਤੋਂ ਇੱਕ ਵੱਡੇ ਕਾਤਲ ਨੂੰ ਗ੍ਰਿਫਤਾਰ ਕੀਤਾ। ਇਸ ਗ੍ਰਿਫਤਾਰੀ ਨਾਲ ਬੰਗਲਾਦੇਸ਼ ਵਿੱਚ ਵਿਆਪਕ ਵਿਰੋਧ ਪ੍ਰਦਰਸ਼ਨ ਹੋਏ। ਮੈਂ ਇੱਥੇ ਦੂਜੇ ਦੇਸ਼ਾਂ ਬਾਰੇ ਗੱਲ ਨਹੀਂ ਕਰ ਰਹੀ ਹਾਂ; ਮੇਰਾ ਮੁੱਖ ਨੁਕਤਾ ਇਹ ਹੈ ਕਿ ਇਹ ਲੋਕ ਮੇਘਾਲਿਆ ਰਾਹੀਂ ਬੰਗਾਲ ਵਿੱਚ ਦਾਖਲ ਹੋਏ ਸਨ। ਇੱਥੇ ਪਹੁੰਚਣ ਤੋਂ ਬਾਅਦ, ਸਾਡੀ ਸੁਚੇਤ STF ਨੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਫੜ ਲਿਆ। ਗ੍ਰਹਿ ਮੰਤਰੀ ਖੁਦ ਕਹਿ ਰਹੇ ਹਨ… ਮੈਂ ਇਸ ‘ਤੇ ਇੰਨੇ ਸਮੇਂ ਤੱਕ ਨਹੀਂ ਬੋਲਿਆ, ਪਰ ਅੱਜ, ਜਦੋਂ ਅੱਤਿਆਚਾਰ ਆਪਣੇ ਸਿਖਰ ‘ਤੇ ਪਹੁੰਚ ਗਏ ਹਨ, ਤਾਂ ਮੈਂ ਬੋਲਣ ਲਈ ਮਜਬੂਰ ਹਾਂ। ਮੇਰਾ ਦਿਲ ਸੱਚਾਈ ਦਾ ਭੰਡਾਰ ਹੈ।”
ਰਾਸ਼ਟਰੀ ਸੁਰੱਖਿਆ ਲਈ ਖ਼ਤਰਾ ਕਿਹਾ
ਮਮਤਾ ਬੈਨਰਜੀ ਦੇ ਵਿਵਾਦਪੂਰਨ ਅਤੇ ਸਨਸਨੀਖੇਜ਼ ਭਾਸ਼ਣ ਤੋਂ ਤੁਰੰਤ ਬਾਅਦ, ਸਿਲੀਗੁੜੀ ਸਥਿਤ ਵਕੀਲ ਰਿੰਕੀ ਚੈਟਰਜੀ ਸਿੰਘ ਨੇ ਸਖ਼ਤ ਰੁਖ਼ ਅਪਣਾਇਆ ਅਤੇ ਸਿਲੀਗੁੜੀ ਸਾਈਬਰ ਕ੍ਰਾਈਮ ਪੁਲਿਸ ਸਟੇਸ਼ਨ ਵਿੱਚ ਉਨ੍ਹਾਂ ਵਿਰੁੱਧ ਕਾਨੂੰਨੀ ਕੇਸ ਦਾਇਰ ਕੀਤਾ। ਸ਼ਿਕਾਇਤਕਰਤਾ ਵਕੀਲ ਦਾ ਦੋਸ਼ ਹੈ ਕਿ ਮਮਤਾ ਬੈਨਰਜੀ ਨੇ ਆਪਣੇ ਰਾਜਨੀਤਿਕ ਭਾਸ਼ਣ ਵਿੱਚ, ਦੇਸ਼ ਦੇ ਸਿਖਰਲੇ ਗ੍ਰਹਿ ਮੰਤਰਾਲੇ ਦਾ ਨਾਮ ਬਿਨਾਂ ਕਿਸੇ ਸਬੂਤ ਦੇ ਜਨਤਕ ਖੇਤਰ ਵਿੱਚ ਘਸੀਟਿਆ ਹੈ। ਐਫਆਈਆਰ ਦੇ ਅਨੁਸਾਰ, ਦੇਸ਼ ਦੇ ਪ੍ਰਸ਼ਾਸਨ, ਖੁਫੀਆ ਪ੍ਰਣਾਲੀ ਅਤੇ ਅੰਤਰਰਾਸ਼ਟਰੀ ਸਰਹੱਦਾਂ ਨਾਲ ਸਬੰਧਤ ਅਜਿਹੀ ਸੰਵੇਦਨਸ਼ੀਲ ਅਤੇ ਗੁਪਤ ਜਾਣਕਾਰੀ ਨੂੰ ਜਨਤਕ ਅਤੇ ਖੁੱਲ੍ਹੇ ਪਲੇਟਫਾਰਮ ‘ਤੇ ਪ੍ਰਗਟ ਕਰਨਾ ਭਾਰਤ ਦੀ ਅੰਦਰੂਨੀ ਅਤੇ ਬਾਹਰੀ ਸੁਰੱਖਿਆ ਲਈ ਇੱਕ ਵੱਡਾ ਖ਼ਤਰਾ ਪੈਦਾ ਕਰ ਸਕਦਾ ਹੈ। ਇਹ ਧਿਆਨ ਦੇਣ ਯੋਗ ਹੈ ਕਿ ਸ਼ਿਕਾਇਤ ਦਰਜ ਕਰਵਾਉਣ ਵਾਲੀ ਉਹੀ ਮਹਿਲਾ ਵਕੀਲ ਨੇ ਪਿਛਲੇ ਹਫ਼ਤੇ ਸਾਈਬਰ ਕ੍ਰਾਈਮ ਪੁਲਿਸ ਸਟੇਸ਼ਨ ਵਿੱਚ ਇੱਕ ਵੱਖਰੇ ਮਾਮਲੇ ਸੰਬੰਧੀ ਸ਼ਿਕਾਇਤ ਦਰਜ ਕਰਵਾਈ ਸੀ। ਪੁਲਿਸ ਨੇ ਮਾਮਲਾ ਦਰਜ ਕਰਕੇ ਅਗਲੇਰੀ ਜਾਂਚ ਸ਼ੁਰੂ ਕਰ ਦਿੱਤੀ ਹੈ।

 

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ਭਾਜਪਾ ਤੋਂ ਨਾਰਾਜ਼ ਕੈਪਟਨ ਅਮਰਿੰਦਰ ਸਿੰਘ ਕਾਂਗਰਸ ਵਿੱਚ ਵਾਪਸ ਆ ਸਕਦੇ ਹਨ; ਸਾਬਕਾ ਮੁੱਖ ਮੰਤਰੀ ਨੇ ਅੰਦਰੂਨੀ ਕਹਾਣੀ ਦਾ ਖੁਲਾਸਾ ਕੀਤਾ

ਚੰਡੀਗੜ੍ਹ – 2027 ਦੀਆਂ ਪੰਜਾਬ ਵਿਧਾਨ ਸਭਾ ਚੋਣਾਂ ਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ ਸਾਬਕਾ ਮੁੱਖ ਮੰਤਰੀ ਕੈਪਟਨ ਅਮਰਿੰਦਰ ਸਿੰਘ ਦੀ ਕਾਂਗਰਸ ਵਿੱਚ ਸੰਭਾਵਿਤ ਵਾਪਸੀ ਨੂੰ ਲੈ ਕੇ ਇੱਕ ਵਾਰ ਫਿਰ ਸਿਆਸੀ ਚਰਚਾ ਤੇਜ਼ ਹੋ ਗਈ ਹੈ। ਹਰਿਆਣਾ ਦੇ ਸਾਬਕਾ ਮੁੱਖ ਮੰਤਰੀ ਅਤੇ ਸੀਨੀਅਰ ਕਾਂਗਰਸੀ ਨੇਤਾ ਭੁਪਿੰਦਰ ਸਿੰਘ ਹੁੱਡਾ ਦੇ ਇੱਕ ਬਿਆਨ ਨੇ ਪੰਜਾਬ ਦੀ ਰਾਜਨੀਤੀ ਵਿੱਚ ਇੱਕ ਨਵੀਂ ਹਲਚਲ ਪੈਦਾ ਕਰ ਦਿੱਤੀ ਹੈ।
ਹੁੱਡਾ ਨੇ ਕਿਹਾ ਕਿ ਕੈਪਟਨ ਅਮਰਿੰਦਰ ਸਿੰਘ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਸੰਪਰਕ ਵਿੱਚ ਹਨ ਅਤੇ ਇੱਕ ਲੰਬੇ ਸਮੇਂ ਤੋਂ ਸਤਿਕਾਰਤ ਕਾਂਗਰਸੀ ਨੇਤਾ ਹਨ। ਦੋਵਾਂ ਆਗੂਆਂ ਦਾ ਲੰਬੇ ਸਮੇਂ ਤੋਂ ਨਜ਼ਦੀਕੀ ਸਬੰਧ ਰਿਹਾ ਹੈ, ਜਿਸ ਨਾਲ ਸਿਆਸੀ ਹਲਕਿਆਂ ਵਿੱਚ ਇਸ ਬਾਰੇ ਚਰਚਾ ਛਿੜ ਗਈ ਹੈ ਕਿ ਕੀ ਕਾਂਗਰਸ ਲੀਡਰਸ਼ਿਪ ਕੈਪਟਨ ਅਮਰਿੰਦਰ ਦੀ ਵਾਪਸੀ ਦੀ ਸੰਭਾਵਨਾ ਦੀ ਪੜਚੋਲ ਕਰ ਰਹੀ ਹੈ।
ਦਰਅਸਲ, ਕੁਝ ਸਮੇਂ ਤੋਂ, ਕੈਪਟਨ ਅਮਰਿੰਦਰ ਸਿੰਘ ਨੇ ਜਨਤਕ ਤੌਰ ‘ਤੇ ਭਾਜਪਾ ਦੇ ਕੰਮ ਕਰਨ ਦੇ ਢੰਗ ਨਾਲ ਅਸੰਤੁਸ਼ਟੀ ਪ੍ਰਗਟ ਕੀਤੀ ਹੈ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਕਈ ਮੌਕਿਆਂ ‘ਤੇ ਕਾਂਗਰਸ ਦੇ ਸੰਗਠਨਾਤਮਕ ਢਾਂਚੇ ਅਤੇ ਪੁਰਾਣੇ ਸਹਿਯੋਗੀਆਂ ਦੀ ਵੀ ਪ੍ਰਸ਼ੰਸਾ ਕੀਤੀ ਹੈ, ਜਿਸ ਨਾਲ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਵਾਪਸੀ ਬਾਰੇ ਕਿਆਸਅਰਾਈਆਂ ਤੇਜ਼ ਹੋ ਗਈਆਂ ਹਨ। ਹਾਲਾਂਕਿ, ਪੰਜਾਬ ਭਾਜਪਾ ਨੇ ਇਨ੍ਹਾਂ ਚਰਚਾਵਾਂ ਨੂੰ ਬਹੁਤ ਮਹੱਤਵ ਦੇਣ ਤੋਂ ਇਨਕਾਰ ਕਰ ਦਿੱਤਾ ਹੈ। ਪਾਰਟੀ ਦੇ ਬੁਲਾਰੇ ਪ੍ਰਿਤਪਾਲ ਸਿੰਘ ਬਾਲੀਵਾਲ ਦਾ ਕਹਿਣਾ ਹੈ ਕਿ ਕਿਸੇ ਆਗੂ ਨਾਲ ਸੰਪਰਕ ਕਰਨਾ ਇੱਕ ਆਮ ਸਿਆਸੀ ਪ੍ਰਕਿਰਿਆ ਹੈ ਅਤੇ ਇਸਦੀ ਸਿਆਸੀ ਤੌਰ ‘ਤੇ ਵਿਆਖਿਆ ਨਹੀਂ ਕੀਤੀ ਜਾਣੀ ਚਾਹੀਦੀ।
ਭਾਜਪਾ ਵਿਚਕਾਰ ਦੂਰੀ ਵਧਾਉਣ ਵਾਲੇ ਮੁੱਦੇ
ਰਾਜਨੀਤਿਕ ਵਿਸ਼ਲੇਸ਼ਕਾਂ ਅਨੁਸਾਰ, ਕੈਪਟਨ ਅਮਰਿੰਦਰ ਸਿੰਘ ਦੀ ਭਾਜਪਾ ਨਾਲ ਨਾਰਾਜ਼ਗੀ ਦੇ ਕਈ ਕਾਰਨ ਦੱਸੇ ਜਾ ਰਹੇ ਹਨ। ਕੈਪਟਨ ਅਮਰਿੰਦਰ ਸਿੰਘ ਨੇ ਵਾਰ-ਵਾਰ ਭਾਜਪਾ ਨਾਲ ਆਪਣੀ ਅਸਹਿਮਤੀ ਪ੍ਰਗਟ ਕੀਤੀ ਹੈ, ਜਿਸ ਵਿੱਚ ਪੰਜਾਬ ਭਾਜਪਾ ਪ੍ਰਧਾਨ ਦੀ ਨਿਯੁਕਤੀ ਤੋਂ ਲੈ ਕੇ ਸੰਗਠਨਾਤਮਕ ਫੈਸਲਿਆਂ ‘ਤੇ ਸਲਾਹ ਨਾ ਲੈਣ ਤੱਕ ਸ਼ਾਮਲ ਹੈ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਜਨਤਕ ਤੌਰ ‘ਤੇ ਕਿਹਾ ਕਿ ਕਾਂਗਰਸ ਦੇ ਪ੍ਰਧਾਨ ਵਜੋਂ ਸੇਵਾ ਨਿਭਾਉਂਦੇ ਹੋਏ, ਮਹੱਤਵਪੂਰਨ ਫੈਸਲਿਆਂ ‘ਤੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨਾਲ ਸਲਾਹ-ਮਸ਼ਵਰਾ ਕੀਤਾ ਜਾਂਦਾ ਸੀ, ਜਦੋਂ ਕਿ ਭਾਜਪਾ ਵਿੱਚ, ਜ਼ਿਆਦਾਤਰ ਫੈਸਲੇ ਸਿਖਰਲੀ ਲੀਡਰਸ਼ਿਪ ਦੁਆਰਾ ਲਏ ਜਾਂਦੇ ਹਨ। ਇਸ ਤੋਂ ਇਲਾਵਾ, ਪੰਜਾਬ ਵਿੱਚ ਭਾਜਪਾ ਅਤੇ ਅਕਾਲੀ ਦਲ ਵਿਚਕਾਰ ਸੰਭਾਵੀ ਗਠਜੋੜ ਪ੍ਰਤੀ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦਾ ਪਹੁੰਚ ਪਾਰਟੀ ਦੀ ਮੌਜੂਦਾ ਰਣਨੀਤੀ ਤੋਂ ਵੱਖਰਾ ਮੰਨਿਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ। ਕੈਪਟਨ ਅਮਰਿੰਦਰ ਸਿੰਘ ਨੇ ਇਹ ਵੀ ਕਿਹਾ ਕਿ ਕਾਂਗਰਸ ਇੱਕ ਪਰਿਵਾਰ ਵਾਂਗ ਸੀ, ਜਿਸਦੀ ਸੀਨੀਅਰ ਨੇਤਾਵਾਂ ਤੱਕ ਆਸਾਨ ਪਹੁੰਚ ਸੀ, ਜਦੋਂ ਕਿ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਭਾਜਪਾ ਵਿੱਚ ਅਜਿਹੀ ਸੰਚਾਰ ਪ੍ਰਣਾਲੀ ਦਾ ਅਨੁਭਵ ਨਹੀਂ ਸੀ।

ਕਾਂਗਰਸ ਨੂੰ ਵੱਡੇ ਰਾਜਨੀਤਿਕ ਲਾਭ ਮਿਲ ਸਕਦੇ ਹਨ
ਜੇਕਰ ਕੈਪਟਨ ਅਮਰਿੰਦਰ ਸਿੰਘ ਕਾਂਗਰਸ ਵਿੱਚ ਵਾਪਸ ਆਉਂਦੇ ਹਨ, ਤਾਂ ਸਭ ਤੋਂ ਵੱਡਾ ਲਾਭ ਪੰਜਾਬ ਕਾਂਗਰਸ ਨੂੰ ਹੋ ਸਕਦਾ ਹੈ, ਜੋ ਇਸ ਸਮੇਂ ਲੀਡਰਸ਼ਿਪ ਅਤੇ ਧੜੇਬੰਦੀ ਦੀਆਂ ਚੁਣੌਤੀਆਂ ਨਾਲ ਜੂਝ ਰਹੀ ਹੈ। ਸੂਬਾ ਪ੍ਰਧਾਨ ਅਮਰਿੰਦਰ ਸਿੰਘ ਰਾਜਾ ਵੜਿੰਗ, ਸਾਬਕਾ ਮੁੱਖ ਮੰਤਰੀ ਚਰਨਜੀਤ ਸਿੰਘ ਚੰਨੀ ਅਤੇ ਵਿਰੋਧੀ ਧਿਰ ਦੇ ਨੇਤਾ ਪ੍ਰਤਾਪ ਸਿੰਘ ਬਾਜਵਾ ਸਮੇਤ ਕਈ ਆਗੂਆਂ ਨੂੰ ਵੱਖ-ਵੱਖ ਸ਼ਕਤੀ ਕੇਂਦਰਾਂ ਵਾਲਾ ਮੰਨਿਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ।

ਅਜਿਹੀ ਸਥਿਤੀ ਵਿੱਚ, ਕੈਪਟਨ ਅਮਰਿੰਦਰ ਦੀ ਵਾਪਸੀ ਕਾਂਗਰਸ ਨੂੰ ਇੱਕ ਤਜਰਬੇਕਾਰ ਅਤੇ ਸਰਵਵਿਆਪੀ ਤੌਰ ‘ਤੇ ਪ੍ਰਵਾਨਿਤ ਚਿਹਰਾ ਪ੍ਰਦਾਨ ਕਰ ਸਕਦੀ ਹੈ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਦਾ ਪੰਜਾਬ ਦੀ ਰਾਜਨੀਤੀ ਵਿੱਚ ਲੰਬੇ ਸਮੇਂ ਤੋਂ ਪ੍ਰਭਾਵ ਰਿਹਾ ਹੈ, ਅਤੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਅਗਵਾਈ ਨੂੰ 2002 ਅਤੇ 2017 ਦੀਆਂ ਵਿਧਾਨ ਸਭਾ ਚੋਣਾਂ ਵਿੱਚ ਕਾਂਗਰਸ ਨੂੰ ਸੱਤਾ ਵਿੱਚ ਲਿਆਉਣ ਦਾ ਸਿਹਰਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ।

 

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ਪੰਜਾਬ ਸਕੱਤਰੇਤ ਨੂੰ ਬੰਬ ਦੀ ਧਮਕੀ, ਈਮੇਲ ਨਾਲ ਦਹਿਸ਼ਤ ਫੈਲ ਗਈ; ਸੁਰੱਖਿਆ ਏਜੰਸੀਆਂ ਅਲਰਟ

ਚੰਡੀਗੜ੍ਹ – ਪੰਜਾਬ ਸਕੱਤਰੇਤ ਵਿੱਚ ਬੰਬ ਦੀ ਧਮਕੀ ਮਿਲਣ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਵੀਰਵਾਰ ਨੂੰ ਸੁਰੱਖਿਆ ਏਜੰਸੀਆਂ ਨੂੰ ਹਾਈ ਅਲਰਟ ‘ਤੇ ਕਰ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ ਸੀ। ਸਕੱਤਰੇਤ ਦੇ ਕੰਟਰੋਲ ਰੂਮ ਨੂੰ ਇੱਕ ਧਮਕੀ ਭਰਿਆ ਈਮੇਲ ਮਿਲਿਆ, ਜਿਸ ਵਿੱਚ ਇਮਾਰਤ ਵਿੱਚ ਬੰਬ ਹੋਣ ਦੀ ਚੇਤਾਵਨੀ ਦਿੱਤੀ ਗਈ ਸੀ।
ਸੂਚਨਾ ਮਿਲਣ ‘ਤੇ, ਪੁਲਿਸ, ਬੰਬ ਸਕੁਐਡ ਅਤੇ ਹੋਰ ਸੁਰੱਖਿਆ ਏਜੰਸੀਆਂ ਨੂੰ ਤੁਰੰਤ ਅਲਰਟ ਕਰ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ। ਧਮਕੀ ਤੋਂ ਬਾਅਦ, ਸਕੱਤਰੇਤ ਕੰਪਲੈਕਸ ਅਤੇ ਆਲੇ ਦੁਆਲੇ ਦੇ ਇਲਾਕਿਆਂ ਵਿੱਚ ਇੱਕ ਵਿਸ਼ਾਲ ਤਲਾਸ਼ੀ ਮੁਹਿੰਮ ਸ਼ੁਰੂ ਕੀਤੀ ਗਈ। ਸੁਰੱਖਿਆ ਏਜੰਸੀਆਂ ਨੇ ਇਮਾਰਤ ਦੇ ਵੱਖ-ਵੱਖ ਹਿੱਸਿਆਂ ਦੀ ਚੰਗੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਤਲਾਸ਼ੀ ਲਈ, ਪਰ ਮੁੱਢਲੀ ਜਾਂਚ ਵਿੱਚ ਕੋਈ ਸ਼ੱਕੀ ਵਸਤੂ ਨਹੀਂ ਮਿਲੀ।
ਸੁਰੱਖਿਆ ਵਧਾ ਦਿੱਤੀ ਗਈ ਹੈ। ਪ੍ਰਵੇਸ਼ ਅਤੇ ਨਿਕਾਸ ਸਥਾਨਾਂ ‘ਤੇ ਵਾਧੂ ਪੁਲਿਸ ਬਲ ਤਾਇਨਾਤ ਕੀਤੇ ਗਏ ਹਨ, ਅਤੇ ਸੈਲਾਨੀਆਂ ਦੀ ਪੂਰੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਜਾਂਚ ਕੀਤੀ ਜਾ ਰਹੀ ਹੈ। ਅਧਿਕਾਰੀ ਪੂਰੀ ਘਟਨਾ ਦੀ ਨਿਗਰਾਨੀ ਕਰ ਰਹੇ ਹਨ।
ਪੁਲਿਸ ਅਤੇ ਸਾਈਬਰ ਸੈੱਲ ਟੀਮਾਂ ਧਮਕੀ ਭਰੇ ਈਮੇਲ ਭੇਜਣ ਵਾਲੇ ਦੀ ਪਛਾਣ ਕਰਨ ਲਈ ਕੰਮ ਕਰ ਰਹੀਆਂ ਹਨ। ਈਮੇਲ ਦੇ ਸਰੋਤ ਅਤੇ ਇਸ ਦੇ ਪਿੱਛੇ ਕੌਣ ਹੈ, ਇਸਦਾ ਪਤਾ ਲਗਾਉਣ ਲਈ ਤਕਨੀਕੀ ਜਾਂਚ ਕੀਤੀ ਜਾ ਰਹੀ ਹੈ।
ਅਧਿਕਾਰੀਆਂ ਨੇ ਜਨਤਾ ਨੂੰ ਅਫਵਾਹਾਂ ਨੂੰ ਨਜ਼ਰਅੰਦਾਜ਼ ਕਰਨ ਅਤੇ ਸਿਰਫ਼ ਅਧਿਕਾਰਤ ਜਾਣਕਾਰੀ ‘ਤੇ ਭਰੋਸਾ ਕਰਨ ਦੀ ਅਪੀਲ ਕੀਤੀ ਹੈ। ਪੁਲਿਸ ਦਾ ਕਹਿਣਾ ਹੈ ਕਿ ਮਾਮਲੇ ਦੀ ਗੰਭੀਰਤਾ ਨਾਲ ਜਾਂਚ ਕੀਤੀ ਜਾ ਰਹੀ ਹੈ ਅਤੇ ਸਾਰੇ ਜ਼ਰੂਰੀ ਸੁਰੱਖਿਆ ਉਪਾਅ ਕੀਤੇ ਗਏ ਹਨ।

 

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