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भारत में महिला सशक्तिकरण के बिना नहीं हो सकता विकसित भारत का सपना पूरा

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समाज वीकली यू के

डॉ राकेश सिंहमार,सहायक प्रोफेसर, अर्थशास्त्र-विभाग चौधरी रणबीर सिंह विश्वविद्यालय, जींद (हरियाणा-भारत)
अजीत ग्रोवर, शोधार्थी अर्थशास्त्र- विभाग, चौधरी रणबीर सिंह विश्वविद्यालय जींद (हरियाणा-भारत)

आज हम विकसित भारत का सपना देख रहे है और वतर्मान सरकार भी  इस पर जोरो सोरो से लगी हुई है परन्तु जब हम भारत में महिलाओं  की  सिथति देखते है तो ये अभी कोसो दूर है ।  महिला सशक्तिकरण किसी भी समाज और राष्ट्र के समग्र विकास का एक महत्वपूर्ण आधार है। यह केवल महिलाओं को अधिकार देने तक सीमित नहीं है, बल्कि उन्हें सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक निर्णय-निर्माण की प्रक्रिया में समान अवसर और भागीदारी प्रदान करने से भी संबंधित है। भारत में महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए संविधान ने समानता, स्वतंत्रता और न्याय के सिद्धांतों को स्थापित किया है तथा समय-समय पर सरकार द्वारा विभिन्न योजनाओं और नीतियों के माध्यम से महिलाओं की स्थिति को मजबूत बनाने का प्रयास किया गया है। फिर भी सामाजिक परंपराएँ, लैंगिक भेदभाव और अवसरों की असमानता महिलाओं के पूर्ण सशक्तिकरण में बाधा उत्पन्न करती रही हैं । इसलिए भारत में महिला सशक्तिकरण की वास्तविक स्थिति को समझने के लिए जनसंख्या संरचना, स्वास्थ्य, लिंगानुपात, श्रम भागीदारी और आर्थिक गतिविधियों जैसे संकेतकों का विश्लेषण आवश्यक है।

भारत की जनसंख्या संरचना से स्पष्ट होता है कि कुल जनसंख्या में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग 48.5 प्रतिशत है, जबकि पुरुषों की हिस्सेदारी लगभग 51.5 प्रतिशत है। यह स्थिति दर्शाती है कि जनसंख्या के स्तर पर अभी भी पूर्ण लैंगिक संतुलन स्थापित नहीं हो पाया है। स्वास्थ्य और जीवन प्रत्याशा के संदर्भ में महिलाओं की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर दिखाई देती है। वर्ल्ड बैंक 2023 की रिपोर्ट के अनुसार भारत में महिलाओं की औसत जीवन प्रत्याशा लगभग 73.6 वर्ष है, जबकि पुरुषों की लगभग 70.5 वर्ष है। इससे यह संकेत मिलता है कि स्वास्थ्य और दीर्घायु के मामले में महिलाओं की स्थिति अपेक्षाकृत मजबूत है, यद्यपि ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की सीमित उपलब्धता, पोषण की कमी तथा मातृ स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएँ अभी भी चिंता का विषय हैं।

महिलाओं की जनसंख्या में लगभग समान हिस्सेदारी होने के बावजूद उनकी आर्थिक (GDP में) भागीदारी केवल लगभग 18% है, जो एक गंभीर असंतुलन को दर्शाती है। यह स्थिति बताती है कि देश की आधी आबादी का आर्थिक योगदान पूरी तरह से उपयोग नहीं हो पा रहा है। यदि महिलाओं की यह भागीदारी बढ़ती है, तो न केवल GDP में वृद्धि होगी बल्कि आर्थिक विकास को भी नई दिशा मिलेगी। अतः महिलाओं की पर्याप्त भागीदारी के बिना “विकसित भारत” का लक्ष्य साकार नहीं हो सकता और यह केवल एक सपना बनकर रह जाएगा

भारत में बाल लिंगानुपात भी महिला सशक्तिकरण की स्थिति को समझने का एक महत्वपूर्ण संकेतक है। उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार 0–6 वर्ष आयु वर्ग का बाल लिंगानुपात लगभग 941 प्रति 1000 है (UNICEF, 2022) यह आँकड़ा दर्शाता है कि समाज में अभी भी पुत्र प्राथमिकता जैसी प्रवृत्तियाँ मौजूद हैं। इस प्रकार की प्रवृत्तियाँ लैंगिक असमानता को बढ़ाती हैं और दीर्घकाल में सामाजिक संतुलन को भी प्रभावित करती हैं। इसलिए लैंगिक समानता को बढ़ावा देने के लिए सामाजिक जागरूकता, शिक्षा और प्रभावी नीतिगत प्रयासों की आवश्यकता है।

आर्थिक सशक्तिकरण महिलाओं की स्वतंत्रता और सामाजिक स्थिति को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। भारत में महिला श्रम शक्ति भागीदारी दर में हाल के वर्षों में वृद्धि देखी गई है। वर्ष 2017–18 में यह दर लगभग 22 प्रतिशत थी, जो वर्ष 2023–24 में बढ़कर लगभग 40 प्रतिशत तक पहुँच गई है (Government of India, 2024)। यह वृद्धि मुख्य रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में स्वयं सहायता समूहों की सक्रियता, स्वरोजगार के अवसरों तथा विभिन्न सरकारी योजनाओं के प्रभाव के कारण संभव हुई है। फिर भी पुरुषों की तुलना में महिलाओं की श्रम भागीदारी दर अभी भी कम है, जो आर्थिक अवसरों की असमानता को दर्शाती है।

क्षेत्रीय वितरण के संदर्भ में देखा जाए तो भारत में महिलाओं की आर्थिक गतिविधियाँ मुख्यतः कृषि क्षेत्र में केंद्रित हैं। उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार लगभग 48 प्रतिशत महिलाएँ कृषि क्षेत्र में कार्यरत हैं, जबकि लगभग 20 प्रतिशत महिलाएँ उद्योग क्षेत्र में और लगभग 30 प्रतिशत महिलाएँ सेवा क्षेत्र में कार्य करती हैं (International Labour Organization, 2023)। यह स्थिति इस तथ्य को दर्शाती है कि भारतीय अर्थव्यवस्था में महिलाओं की बड़ी संख्या अभी भी कृषि पर निर्भर है। उद्योग और सेवा क्षेत्रों में महिलाओं की अपेक्षाकृत कम भागीदारी का कारण शिक्षा, कौशल विकास तथा औपचारिक रोजगार के सीमित अवसर हैं।

हाल के वर्षों में महिलाओं की उद्यमिता में भी वृद्धि देखी गई है। भारत में लगभग 10 प्रतिशत स्टार्ट-अप ऐसे हैं जिनका संचालन या सह-संचालन महिलाएँ कर रही हैं (Startup India, 2023)। यह परिवर्तन इस बात का संकेत है कि महिलाएँ नवाचार और उद्यमिता के क्षेत्र में अपनी भूमिका को धीरे-धीरे सशक्त बना रही हैं। इसके साथ ही वित्तीय समावेशन की दिशा में भी प्रगति हुई है। विभिन्न सरकारी योजनाओं और बैंकिंग पहलों के कारण महिलाओं की बैंकिंग सेवाओं तक पहुँच में वृद्धि हुई है, जिससे उनकी आर्थिक स्वतंत्रता और वित्तीय निर्णय-निर्माण की क्षमता में सुधार हुआ है (World Bank, 2023)।

उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि भारत में महिला सशक्तिकरण की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। जीवन प्रत्याशा में सुधार, श्रम भागीदारी में वृद्धि तथा उद्यमिता के क्षेत्र में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी इसके सकारात्मक संकेतक हैं। फिर भी बाल लिंगानुपात, रोजगार के अवसरों में असमानता तथा उद्योग और सेवा क्षेत्रों में सीमित भागीदारी जैसी चुनौतियाँ अभी भी मौजूद हैं। इसलिए महिलाओं के सशक्तिकरण को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल विकास, रोजगार के अवसरों और सामाजिक जागरूकता को बढ़ावा देना आवश्यक है। यदि महिलाओं को समान अवसर और संसाधन उपलब्ध कराए जाएँ, तो वे न केवल अपने जीवन स्तर में सुधार ला सकती हैं बल्कि देश के समग्र आर्थिक और सामाजिक विकास में भी महत्वपूर्ण योगदान दे सकती हैं।उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि भारत में महिला सशक्तिकरण की दिशा में काफी प्रगति हुई है। जीवन प्रत्याशा में सुधार, कामकाजी महिलाओं की संख्या में वृद्धि और उद्यमिता में भागीदारी इसके अच्छे संकेत हैं। फिर भी बाल लिंगानुपात,रोजगार के अवसरों में असमानता और उद्योग व सेवा क्षेत्र में कम भागीदारी जैसी समस्याएँ अभी भी मौजूद हैं।

इसके अलावा, राजनीतिक सशक्तिकरण भी बहुत महत्वपूर्ण है, लेकिन इस क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी अभी कम है। वर्तमान में लोकसभा की 543 सीटों में से केवल 74 महिलाएँ सांसद हैं (लगभग 13.6%)। राज्यसभा में लगभग 42 महिलाएँ हैं (लगभग 16–17%)। राज्य स्तर पर स्थिति और कमजोर है, जहाँ लगभग 4,123 विधायकों में से केवल करीब 390 महिलाएँ हैं, यानी लगभग 9–10%। मुख्यमंत्री जैसे बड़े पदों पर भी महिलाओं की संख्या बहुत कम है (10% से भी कम)। हालाँकि, पंचायत स्तर पर लगभग 46% महिलाओं की भागीदारी यह दिखाती है कि यदि अवसर और आरक्षण दिए जाएँ, तो महिलाएँ राजनीति में आगे बढ़ सकती हैं।

इससे यह साफ होता है कि महिलाओं की सामाजिक और आर्थिक स्थिति में सुधार तो हुआ है, लेकिन राजनीति में उनकी भागीदारी अभी भी कम है। इसलिए महिला सशक्तिकरण को मजबूत करने के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार के साथ-साथ राजनीतिक भागीदारी बढ़ाना भी बहुत जरूरी है। यदि महिलाओं को बराबर अवसर मिलें, तो वे अपने जीवन को बेहतर बनाने के साथ-साथ देश के विकास में भी महत्वपूर्ण योगदान दे सकती हैं।

 

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