समाज वीकली यू के
UGC ने उच्च शिक्षण संस्थानों में “Equity Committee” का प्रावधान किया है—SC, ST के साथ OBC को भी इसमें शामिल किया गया है। यह फैसला यूँ ही नहीं आया। UGC खुद मानता है कि अब तक के “लचीले प्रावधान” कैंपसों में जातिगत अन्याय और भेदभाव को कम करने में नाकाम रहे हैं। और यह सिर्फ़ एक दावा नहीं, बल्कि आधिकारिक आँकड़ों से साबित सच्चाई है।
UGC के अनुसार 2019-20 से 2023-24 के बीच उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव की शिकायतें 118% से ज़्यादा बढ़ी हैं—173 से बढ़कर 378 तक। यह साफ़ बताता है कि समस्या “छिटपुट घटनाओं” की नहीं, बल्कि संरचनात्मक (structural) है। जब उत्पीड़न बढ़ रहा हो, तब सिर्फ़ जागरूकता, पोस्टर या संवेदनशीलता कार्यशालाओं से काम नहीं चलता; सख़्त, समयबद्ध और जवाबदेह प्रावधान ज़रूरी होते हैं। इसी कारण नए नियमों में 24 घंटे में समिति बैठक, 15 दिन में रिपोर्ट और 7 दिन में कार्रवाई की समयसीमा तय की गई है।
अब सवाल उठाया जा रहा है कि इसमें “सामान्य वर्ग” को क्यों नहीं शामिल किया गया। यह ठीक वैसा ही सवाल है जैसे महिला उत्पीड़न रोकने के लिए बनी Women Cell में पुरुषों को क्यों नहीं शामिल किया गया। वजह साफ़ है—जातिगत उत्पीड़न का ढांचा ऐतिहासिक और सामाजिक रूप से SC/ST/OBC के खिलाफ बना है। यह बहिष्कार नहीं, बल्कि उस असमान यथार्थ की स्वीकारोक्ति है जिसे सदियों तक सामान्य बना दिया गया।
एक और तर्क दिया जा रहा है कि “इस नियम का दुरुपयोग होगा।” तो बताइए, ऐसा कौन सा कानून है जिसका दुरुपयोग नहीं हुआ? RTI, श्रम कानून, महिला सुरक्षा कानून—सबके दुरुपयोग के उदाहरण मिल जाएंगे। लेकिन दुरुपयोग की आशंका न्याय से इनकार का आधार नहीं हो सकती। वैसे भी UGC ने अंतिम नियमों में “फ़र्ज़ी शिकायत” वाला डराने वाला प्रावधान हटा दिया है, ताकि पीड़ित चुप न हों।
सच यही है कि जब बात SC/ST/OBC के साथ होने वाले जातिगत भेदभाव को रोकने की आती है, तभी ‘दुरुपयोग’ का शोर सबसे तेज़ हो जाता है। क्योंकि यह नियम किसी व्यक्ति को नहीं, बल्कि उस व्यवस्था को चुनौती देता है जिसने जातिगत असमानता को अब तक ‘नॉर्मल’ बना रखा था। कैंपस में समता भाषणों से नहीं, बल्कि सख़्त, जवाबदेह और लागू होने वाले नियमों से आएगी।
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