* राज्यपाल महोदय संवैधानिक प्रावधान एवं सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का अनुपालन सुनिश्चित करें
लखनऊ (समाज वीकली) हमारे संविधान में यह व्यवस्था है कि चुनाव में यदि किसी एक दल या गठबंधन को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता, तो राज्यपाल का यह प्राथमिक कर्तव्य है कि वह सबसे बड़े अकेले दल या चुनाव-पूर्व बने गठबंधन को सरकार बनाने का न्योता दे। यह प्रक्रिया इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि लोकतंत्र में जनता के मत का सम्मान सर्वोपरि है, सबसे बड़े दल के पास सबसे अधिक जनसमर्थन होता है। एस आर बोमई बनाम भारत संघ (1944) के ऐतिहासिक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट कहा है कि किसी भी सरकार के पास बहुमत है या नहीं, इसका निर्णय राजभवन के बंद कमरों में नहीं बल्कि विधान सभा के पटल पर फ्लोर टेस्ट के जरिए होना चहिए। राज्यपाल का काम यह तय करना नहीं है कि इसमें कौन जीतेगा, बल्कि उन्हें उस दल को अवसर देना चाहिए जो सदन में अपना बहुमत साबित करने का दावा पेश करता है। 1996 में अटल बिहारी वाजपेई को केंद्र में तथा 2018 में कर्नाटक की स्थिति इसके ज्वलंत उदाहरण हैं, जहां सबसे बड़े दल को पहले मौका दिया गया था। शपथ ग्रहण से पहले ही विधायकों के समर्थन पत्र की माँग करना या राज्यपाल द्वारा स्वयं ही बहुमत का आकलन कर लेना न केवल संवैधानिक परंपराओं के विरुद्ध है, बल्कि यह निर्वाचित प्रतिनिधियों की स्वायत्तता पर भी सवाल उठाता है। तमिलनाडु में विजय की 108 विधायकों वाली टीवीके पार्टी सबसे अधिक विधायकों वाली पार्टी है तथा 5 विधायकों वाली पार्टी कांग्रेस ने भी उसे समर्थन देने हेतु राज्यपाल को समर्थन पत्र दिया है। इसके अतिरिक्त किसी भी दूसरी पार्टी ने सरकार बनाने का दावा पेश नहीं किया है। ऐसी परिस्थिति में राज्यपाल को विजय की पार्टी को सरकार बनाने हेतु आमंत्रित करना चाहिए था परंतु इसके विपरीत राज्यपाल ने उसे आमंत्रित न करके अपने पक्ष में 118 विधायकों के हस्ताक्षर वाला समर्थन पत्र प्रस्तुत करने हेतु कहा है। राज्यपाल महोदय का यह आदेश संवैधानिक परंपरा तथा बोम्मई मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के विपरीत है। स्वस्थ लोकतंत्र के लिए यह अनिवार्य कि संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्ति राजनीतिक झुकाव से ऊपर उठ कर केवल स्थापित नियमों और न्यायिक मिसालों का पालन करें, ताकि जनमत की गरिमा सुरक्षित रहे। अतः आल इंडिया पीपुल्स फ्रन्ट तमिलनाडु के राज्यपाल महोदय से मांग करता है कि वह तमिलनाडु की सबसे बड़ी पार्टी के अध्यक्ष विजय को सरकार बनाने हेतु आमंत्रित करें ताकि संवैधानिक व्यवस्था एवं सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का सम्मान एवं अनुपालन सुनिश्चित हो सके। एआईपीएफ राज्यपाल महोदय से यह भी अपेक्षा करती है की वह भाजपा के प्रतिनिधि नहीं बल्कि संवैधानिक पद की गरिमा के अनुरूप अपना उत्तरदायित्व निभाएं।
एआईपीएफ की राष्ट्रीय कार्यसमिति की तरफ से जारी,
एस आर दारापुरी, राष्ट्रीय अध्यक्ष, आल इंडिया पीपुल्स फ्रन्ट।



