समाज वीकली यू के
– प्रोफे. श्रवण देवरे
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(पार्ट-3)
स्टालिन पर एक फेसबुक दोस्त की पोस्ट में यह एक लाईन दिल को मरोडकर रख देती है-
“अगर कोई इंसान इतना कुछ करने के बाद भी हार जाता है, तो उसे क्या करना चाहिए, यह सवाल एक आम आदमी के तौर पर मेरे मन में उठता है।”
अगली लाईन पढने के बाद संविधान और लोकतंत्र से भरोसा उठ जाता है-
“अगर पिछले 5 साल में किए गए काम के बाद भी वह हार जाता है, तो मुझे नहीं पता कि एक चीफ मिनिस्टर से और क्या उम्मीद की जाती है…”
हमने आर्टिकल के दूसरे पार्ट में चीफ मिनिस्टर के तौर पर स्टालिन और उनकी पार्टी के किए गए 15-16 क्रांतिकारी कामों को खास तौर पर नोट किया है। इस देश में फुले शाहू अंबेडकर और लोहिया के नाम पर वोट मांगने वाले कई मुख्यमंत्री बने हैं और अब भी बन रहे हैं, लेकिन एक भी मुख्यमंत्री ऐसा बताओ जिसने स्टालिन जैसा कम से कम एक काम तो किया हो। कई मुख्यमंत्री ‘दलित की बेटी’, ‘बाबासाहेब का बेटा’ जैसी सहानुभूति पाकर वोट मांगते हैं और मुख्यमंत्री बनते ही संघ-BJP के साथ गठबंधन करके बाबासाहेब के हाथी को ब्राह्मणों का गणेश बनाने का काम करते हैं। जयललिता तो ब्राह्मण की बेटी थी, फिरभी उस ब्राह्मण-कन्या ने फुले-आंबेडकरवादसे बहुत आगे जाकर पेरियारवाद को अपनाया और ब्राह्मणवाद को गाढने मे क्रांतीकारी भुमिका निभायी!
“पिछड़ा पावें सौ में साठ” यह नारा था समाजवादी लोहिया और ओबीसी नेता चंदापुरी का! लोहिया और चंदापूरी के नामसे राजनिती करने वाले लालू-मुलायम जैसे कई नेता मुख्यमंत्री बने हैं, लेकिन पिछड़े OBC को उनकी आबादी के हिसाब से आरक्षण देने वाला एक भी मुख्यमंत्री न तो समाजवादियों में से निकला है और न ही फुले अंबेडकरवादियों में से! यह बात बार-बार साबित होती है कि ऐसा क्रांतिकारी मुख्यमंत्री सिर्फ पेरियारवाद ही पैदा कर सकता है। तामीलनाडू की मुख्यमंत्री (ब्राह्मण) जयललिता ने ओबीसीं को संख्या के अनुपात मे 50 परसेंट आरक्षण दिया। जयललिता ना फुले की बेटी थी, ना बाबासाहेब अंबेडकरकी की बेटी और नाहि वो परशुराम की बेटी थी। जयललिता तो पेरियार की बेटी थी, इसलिए संख्या के अनुपात मे SC+ST+OBC को आरक्षन देने का साहस उसमे था, और उसने कर दिखाया।
OBC मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने आबादी के हिसाब से SC+ST+OBC का आरक्षण बढ़ाने की कोशिश की, जिसके लिए उन्होंने अपनी जान की बाजी लगाकर अपने राज्य बिहार में जातियों की जनगणना भी करवाई। BJP से दोस्ती (Alliance) करके नीतीश मुख्यमंत्री बन गये मगर संघ-भाजापा जाती-जनगणना जैसा क्रांतिकारी काम नहीं करने देंगे यह नितीश अच्छी तरह जानते थे!
नीतीश कुमार इस मामले में होशियार रहे हैं। संघ-BJP के आशीर्वाद से एक दलित-OBC व्यक्ती मुख्यमंत्री, यहाँ तक कि प्रधानमंत्री भी बन सकता है, लेकिन जाति के आधार पर जनगणना जैसा क्रांतिकारी फ़ैसला लेने के बाद भी, वह फैसला अमल मे नहीं ला सकते। नीतीश कुमार ने संघ-भाजपा से यह सीख ली और सिर्फ़ जाति के आधार पर जनगणना कराने के लिए, नीतीश ने BJP को लात मारी और लालू प्रसाद यादव के साथ गठबंधन किया और कई न्यायिक रुकावटों को पार करके जाति के आधार पर जनगणना पूरी की।
तमिलनाडु के विजय की कहानी क्या कहती है? पश्चिम बंगाल में संघ-BJP ने जो षडयंत्र किया, वही तमिलनाडु में भी किया। प. बंगाल में हुमायूँ कबीर नाम के एक मुसलमान ने बाबरी मस्जिद बनाने का फ़ैसला किया और रातों-रात मुस्लिम नेता बन गया। जैसे ही मुस्लिम हुमायूं को संघ-BJP द्वारा बाबरी मस्जिद बनवाने और ममता बनर्जी की पार्टी के खिलाफ चुनाव लड़ने के लिए 1,000 करोड़ रुपये दिए जाने का क्लिप इंटरनेट पर वायरल हुआ, MIM के ओवैसी ने उनसे चुनावी गठबंधन तोड़ लिया। लेकिन नतीजा वही हुआ जो होना था! EVM, SIR, हुमायूं और ओवैसी का मिला-जुला नतीजा यह हुआ कि ममता बनर्जी की भारी हार हुई और दोनों चुनाव क्षेत्रों में हुमायूं कबीर की जीत हुई! इस सारी दखलंदाजी के बाद जो सत्ता का मक्खन निकला, वह बेशक संघ-BJP ले भागा।
अगर संघ-BJP के ब्राह्मण हुमायूं कबीर नाम के एक मुस्लिम को ममता बनर्जी और उनकी पार्टी को हराने के लिए 1,000 करोड़ रुपये दे सकते हैं, तो यह अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि उन्होंने स्टालिन और स्टालिन की पार्टी को हराने के लिए विजय को कितने हजार करोड़ रुपये दिए होंगे। पश्चिम बंगाल में तमिलनाडु जैसी कोई क्रांतिकारी विचारधारा राजनीति में नहीं है। ममता और उनकी पार्टी गांधीवादी ब्राह्मणवादी-पूंजीवादी पार्टी हैं। फिर भी, अगर ब्राह्मणवादी संघ-BJP ने हुमायूं मुस्लिम को वहां ब्राह्मणवादी-पूंजीवादी पार्टी को हराने के लिए एक हजार करोड़ रुपये दिए, तो सोचिए कि तमिलनाडु में क्रांतिकारी ब्राह्मणवादविरोधी सामी पेरियारवाद को सत्ता से हटाने के लिए विजय को कितने हजार करोड़ रुपये दिए गए होंगे?
संघ-BJP ने पहले भी कई बार ऐसी कोशिशें की हैं, लेकिन वे बुरी तरह नाकाम रही हैं। संघ-BJP ने सबसे पहले सुपरस्टार रजनीकांत को राजनीति में ‘कठपुतली’ की तरह नचाया, यह मानकर कि तमिलनाडु के लोग सिनेमा के दीवाने हैं। रजनीकांत ने 2017 में अपने नाम से एक सामाजिक संगठन (रजनी मक्कल मंद्रम) बनाया और राजनीति में आने का वादा किया। राजनीतिक मकसद से बनाए गए ऐसे सामाजिक संगठन सामाजिक काम के लिए नहीं बल्कि लोगों की मदद के नाम पर उन्हें पैसे बांटने के लिए होते हैं। इन सामाजिक संगठनों का एकमात्र मकसद पैसे देकर वोट हासिल करना होता है। रजनीकांत ने सामाजिक काम के नाम पर करोड़ों रुपये बांटे। बेशक, राजनीतिक रूप से महत्वाकांक्षी लोग कभी भी अपनी जेब से पैसे खर्च करके राजनीति नहीं करते। इसमें शक करने की कोई वजह नहीं है कि रजनीकांत ने भी हुमायूं मुसलमान की तरह करोड़ों रुपये संघ-भाजपा से लिए होंगे। बाद में रजनीकांत ने मक्कल सेवई कच्ची नाम की पार्टी बनाई और 2021 का चुनाव लड़ने का ऐलान किया। लेकिन रजनीकांत को संघ-बीजेपी की ब्राह्मणवादी साज़िश का पता चल गया होगा, या पेरियारवादी तामील जनता का अंदाज़ा आ गया होगा या संघ-बीजेपी के साथ हुई सौदेबाजी (Deal) गड़बड़ा गई होगी, वजह जो भी हो, रजनीकांत ने 2021 के चुनाव से पहले अपनी पार्टी और संगठन को भंग कर दिया और हमेशा के लिए राजनीति छोड़ दी।
रजनीकांत के बाद संघ-BJP को एक और बलि का बकरा मिल गया है। कमल हासन नाम का एक सुपरस्टार! वह भी रजनीकांत की ही राह पर चल रहा है। पार्टी बनाने के बाद उसने चुनाव लड़ने के कई ऐलान किए हैं। 2021 से अब तक कई चुनाव हो चुके हैं, लेकिन कमल हासन एक साधारण म्युनिसिपल चुनाव भी नहीं लड़ पाए हैं। संघ-BJP को असली वजह पता चल गई है कि सेनमा स्टार की ये दोनों साज़िशें पूरी तरह फेल क्यों हो गईं! सही वजह क्या है, और संघ-BJP ने इससे क्या सीखा?
कोई भी फिलॉसफी हमें अतीत की स्टडी के ज़रिए मौजूदा और आने वाली समस्याओं के जवाब ढूंढने की राह दिखाती है। लेकिन, ब्राह्मणवादी फिलॉसॉफी अकेली ऐसी फिलॉसफी है जो ठोकर लगने के बादही आगे बढती है। ब्राह्मणवादी फिलॉसॉफी पीछे से ‘झटका लेने वाली’ फिलॉसॉफी है। रजनीकांत और कमल हासन के फेल होने के बाद संघ-BJP को एहसास हुआ कि तमिलनाडु के लोग सिनेमा के दिवाने नहीं हैं। तमिलनाडु के लोगों ने करुणानिधि, रामचंद्रन और जयललिता को अपना नेता माना और उन्हें कई बार मुख्यमंत्री बनाया। क्या तमिलनाडु के लोगों ने करुणानिधि, रामचंद्रन और जयललिता को अपना नेता इसलिए बनाया क्योंकि वे फिल्म इंडस्ट्री के बड़े नाम थे? बिल्कुल नहीं। अगर ऐसा होता, तो आज विजय की जगह रजनीकांत या कमल हासन मुख्यमंत्री होते। क्योंकि रजनीकांत और कमल हासन दोनों विजय से हज़ार गुना बड़े सुपरस्टार हैं और बॉलीवुड ने उन्हें ऑल-इंडिया सुपरस्टार बना दिया है। क्या बॉलीवुड में विजय की एक भी फिल्म है? करुणानिधि, रामचंद्रन और जयललिता यह तिनो पक्के पेरियारवादी थे, इसलिए तमिलनाडु के लोगों ने उन्हें कई बार मुख्यमंत्री बनाया। तमिलनाडु के लोगों की सोच बहुत ऊँची है। और यह सोच पेरियारवाद ने बनाई और पेरियारवाद की राजनीति ने इसे और मज़बूत किया। संघ-BJP के ब्राह्मणों को एहसास हो गया कि तामीलनाडू की जनता सिनेमा की नही, पेरियार की दिवानी है। ऐसी स्थिती मे केवल डी.एम.के. पार्टी के खिलाफ चुनाव लढनेसे तामीलनाडू मे ब्राह्मण-राज नही आयेगा। तामीलनाडू मे ब्राह्मण-राज तभी आयेगा जब पेरीयारवाद पराजित होगा। तो यह लढाई पॉलिटीकल नही, फिलॉसॉफिकल है। एक फिलॉसॉफी को पराजित करने के लिए दुसरी फिलॉसॉफी को हत्यार बनाना पडता है। पेरियारवाद को पराजित करने के लिए ब्राह्मणवादी फिलॉसॉफी कामही नही कर सकती, क्योंकी पेरियारवादने ब्राह्मणवाद को 60-70 साल पहलेही हमेसा के लिए गाढ दिया है। अब मरा हुआ (Dead Body वाला) ब्राह्मणवाद क्रांतीकारी जिंदा पेरियारवाद के सामने खडा कैसे हो सकता है? इसलिए संघ-भाजपा ने यह सोचा की एक क्रांतीकारी फिलॉसॉफी को खतम करने के लिए दुसरी क्रांतिकारी फिलॉसॉफी काम आयेगी। जैसे की उत्तर प्रदेश और बिहार मे क्रांतिकारी समाजवादी-लोहियावादी फिलॉसॉफी को खतम करने के लिए क्रांतिकारी आंबेडकरवादी फिलॉसॉफी को (गैर-) इस्तेमाल किया गया। वैसेही क्रांतीकारी पेरियारवाद को खतम करने के लिए क्रांतिकारी आंबेडकरवाद को (गैर-) इस्तेमाल करना होगा, तभी तामिलनाडू मे ब्राह्मण-राज आयेगा। इस साजिश को अमल मे लाते हुये संघ-BJP ने विजय के हाथ में डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर की फोटो थमा दी और जाति के आधार पर विजय की जातिवाद की पॉलिटिक्स शुरू हो गई।
उन्होंने विजय को बाबासाहेब की सिर्फ एक फोटो दी, कोई विचार नहीं दिया। भारत में जाति की चेतना जगाने और जाति का अहंकार जगाने के लिए सिर्फ फोटो, मूर्तियां, मालाएं और जयकारे ही काफी हैं। विजय का कोई आइडियोलॉजिकल, सोशल और पॉलिटीकल इतिहास नहीं है। वह बस बाबासाहब का फोटो दिखाता रहा और काम हो गया।
तमिलनाडु पेरियारवादी सरकारों की वजह से सभी जातियों और धर्मों के लोगों को उनकी आबादी के हिसाब से सरकार और एडमिनिस्ट्रेशन में रिजर्वेशन और हिस्सेदारी मिलती है। इसलिए वहां जातियों और धर्मों के बीच दंगे कराने की ब्राह्मणों की साजिश कभी कामयाब नहीं हो सकती। हालांकि, सिर्फ बराबर फायदे और शासन-प्रशासन में बराबर हिस्सेदारी देने से जाति व्यवस्था खत्म नहीं होती, इसलिए सिर्फ जातियों और धर्मों के बीच झगड़ा रुकता है। हालांकि, जब तक जाति व्यवस्था जिंदा है, जाति की चेतना जिंदा रहती है। RSS-BJP ने इसी जाति की चेतना का (गलत इस्तेमाल) करने का फैसला किया और वे इसमें कामयाब रहे।
तमिलनाडु में 60 साल से पेरियारवादी पॉलिटिक्स सत्ता में है। सैकड़ों सालों से जड़ जमाए हुए जाति सिस्टम को 60-70 सालों में खत्म करना नामुमकिन है। जिस तरह जातीव्यवस्था कई चरणों से गुजरती हुयी साइंटिफिक फिलॉसॉफी से बनी है, उसी तरह इसे खत्म करने के लिए भी कई चरणों से गुजरना होगा और इसके हर चरणपर साइंटिफिक फिलॉसॉफी भी डेव्हलप करनी होगी। लेकिन, जब आप जातीव्यवस्था को खतम करने के लिए आगे बढते रहेंगे, तो ब्राह्मणवादी कैंप चुपचाप एक कोने मे बैठकर आपको आगे जाने नहीं देगा। वह बीच में किसी मोड़ पर या किसी चरणपर आपको दबोच लेगा और आपको रोक देगा। आपको दबोचने के लिए खुद ब्राह्मण नही आयेगा, दलित-ओबीसी जाती से किसी महत्वाकांक्षी (Ambitious) व्यक्ती को सुपारी देकर दबोचने का काम करेंगे। इसी तरह, संघ-BJP के ब्राह्मण कैंप ने तामीलनाडू मे एक ‘हत्यारा’ ढूंढा, उसे सुपारी दी और पेरियारवाद को परिजित करते हुए सत्ता से हटा दिया। ऐसे सुपारी लेकर काम करनेवाले एंटी-सोशल हत्त्यारे संघ-BJP ने हर राज्य में खडे कर रखे हैं। महाराष्ट्र की जनता भी जान गई है कि उनका ‘विजय’ कौन है।
पेरियारवाद को सत्ता से हटाने के बाद विजय की ब्राह्मणवादी काउंटर-रिव्होल्यूशन की ‘घुड़दौड़’ कैसे शुरू हुई है, आइए अगले चौथे पार्ट में इसका रिव्यू करते हैं!
-प्रोफे. श्रावन देवरे
OBC पॉलिटिकल अलायंस,
मोबाइल- 81 77 86 12 56
ज़रूरी सूचना- 1) आर्टिकल का यह तिसरा हिस्सा (P3) अखबार ‘बहुजन सौरभ’ के 18 मई / 20 May 2026 के अंक में पब्लिश हुआ है।
2) अगर आपको इस आर्टिकल की मराठी pdf (P2) फ़ाइल चाहिए तो नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें-
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4) जिनको यही विचार संक्षिप्त मे हिन्दी मे सुनना है वो बहुजन85 चॅनल की VDO लिंक क्लिक करे- लिंक-
https://youtu.be/3jDC9Si3UAQ?si=T4GQ05SbWZ09mGLM



