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विजय दशमी का असली नाम “अशोक विजयदशमी” है। जानिए सम्राट अशोक का छुपाया गया इतिहास!

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समाज वीकली यू के

अशोक विजयादशमी वह दिन है जब सम्राट अशोक ने कलिंग युद्ध के बाद शस्त्रों का मार्ग छोड़कर अहिंसा और शांति का मार्ग अपनाया और बौद्ध धर्म की दीक्षा ली। इसलिए, यह बौद्धों का एक महत्वपूर्ण त्यौहार है जो शस्त्रों के बजाय शांति और धम्म (धर्म) से प्राप्त ‘विजय’ का प्रतीक है। इसे ‘धम्म-विजय दिवस’ भी कहा जाता है।

इतिहास और महत्व:

कलिंग युद्ध के बाद: अशोक ने कलिंग युद्ध में भीषण रक्तपात देखा, जिसके बाद उन्होंने युद्ध का मार्ग त्याग दिया।

धम्म दीक्षा: कलिंग युद्ध के विजय के दसवें दिन, सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म की दीक्षा ली।

अहिंसा का संकल्प: धम्म दीक्षा के बाद, उन्होंने प्रतिज्ञा की कि वे शस्त्रों से नहीं, बल्कि शांति और अहिंसा से लोगों के दिलों पर विजय प्राप्त करेंगे।

बौद्ध धर्म का प्रचार: इसके बाद उन्होंने बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए स्तूपों और स्तंभों का निर्माण करवाया और बौद्ध धर्म की यात्राओं पर गए।

बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर से जुड़ाव: 1956 में, बाबासाहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर ने इसी अशोक विजयादशमी के दिन नागपुर में लाखों लोगों के साथ बौद्ध धर्म अपनाया था, जिससे यह दिवस विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो गया।

धम्म दीक्षा के बाद सम्राट अशोक ने प्रतिज्ञा ली कि आज के बाद वो शास्त्रों से नही बल्कि शांति और अहिंसा से प्राणी मात्र के दिलों पर विजय प्राप्त करेँगे। इसीलिए सम्पूर्ण बौद्ध जगत इसे अशोक विजय दसमी के रूप में मनाता है। लेकिन कहा जाता है कि ब्राह्मणो ने इसे काल्पनिक राम और रावण कि विजय बताकर बहुजनों के इस महत्त्वपूर्ण त्यौहार पर कब्ज़ा कर लिया है। जहां तक दशहरे की बात है तो इससे जुड़ा तथ्य यह है कि चन्द्रगुप्त मौर्य से लेकर मौर्य साम्राज्य के अंतिम शासक बृहद्रथ मौर्य तक कुल दस सम्राट हुए।

अंतिम सम्राट बृहद्रथ मौर्य की उनके सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने हत्या कर दी और “शुंग वंश” की स्थापना की। पुष्यमित्र शुंग ब्राह्मण था। इस समाज ने इस दिन बहुत बड़ा उत्सव मनाया। उस साल यह अशोक विजयदशमी का ही दिन था। उन्होंने “अशोक” शब्द को हटा दिया और जश्न मनाया। इस जश्न में मौर्य वंश के 10 सम्राटों के अलग-अलग पुतले न बनाकर एक ही पुतला बनाया और उसके 10 सर बना दिए और उसका दहन किया गया।

2500 साल के सम्राट अशोक की विरासत से जोड़ते हुए 14 अक्टूबर1956 को अशोक विजयदशमी के दिन ही बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर ने 5 लाख लोगों के साथ बौद्ध धम्म की दीक्षा ली थी।

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