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हिंदू धर्म : एक आधुनिक आविष्कार

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एक धर्मनिरपेक्ष संविधान वाले देश की सरकार का नेतृत्व करने वाले प्रधानमंत्री ने राम मंदिर के निर्माण के उद्घाटन के एक धार्मिक समारोह के दौरान धार्मिक अनुष्ठान में भाग लिया और एक पुजारी की भूमिका भी निभाई. पीआईबी

दिव्या द्विवेदीशाज मोहन, जे रेघू

    (समाज वीकली)   आज भारत में तकरीबन पूरा मीडिया “हिंदू राष्ट्रवाद” के दायरे में समेटा जा चुका है. यह आभासी दुनिया के राजनीतिक धरातल पर एकमात्र नजरिए के रूप में छाया दिख रहा है. इस नजरिए के हिसाब से एक तो “हिंदू” प्राचीन धर्म है और दूसरा विशेष जातीय समूह है जो पौराणिक रूप से इस जातीयता के साथ ही जन्मा है. इस धारणा ने “हिंदुओं” को भारत का सनातन मूल निवासी मान लिया है. यह राजनीतिक मुहिम भारत को उस अनैतिहासिक अतीत में वापस ले जाने का प्रयास करती है जहां हिंदू बाहरी क्षेत्रों से आए प्राचीन यूनानियों से लेकर यूरोपीय औपनिवेशिक शक्तियों तक यानी “म्लेच्छ,” या अशुद्ध नस्लीय मिलावटों से सुरक्षित थे.

कई उत्साही राजनीतिक पर्यवेक्षकों ने हाल ही में दावा किया था कि हिंदू राज्य” 5 अगस्त 2020 से प्रभाव में आ गया हैजब राम मंदिर के निर्माण का उद्घाटन एक धार्मिक समारोह के साथ हुआ था. इस मंदिर का निर्माण अयोध्या, जिसे पहले फैजाबाद कहा जाता था, की जमीन पर हो रहा है जहां कभी सोलवीं शताब्दी में बनी मस्जिद हुआ करती थी. इस मस्जिद को 1992 में हिंदू संगठनों, जिसमें वर्तमान में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी भी शामिल थी, के नेताओं द्वारा जुटाई गई भीड़ ने ध्वस्त कर दिया था. एक धर्मनिरपेक्ष संविधान के आधार पर सरकार का नेतृत्व करने वाले प्रधानमंत्री ने इस समारोह में एक पुजारी की तरह धार्मिक अनुष्ठान में भाग लिया जिसका प्रसारण हर प्रमुख समाचार चैनल द्वारा किया गया. यह आयोजन – जिसमें धर्मशासित और लोकतांत्रिक मूल्य आपस में गड्डमड्ड थे – एक विशेष कारण से उस तारीख पर आयोजित किया गया था.

ठीक एक साल पहले 5 अगस्त 2019 को तत्कालीन राज्य जम्मू और कश्मीर को एक निश्चित स्तर की स्वायत्तता प्रदान करने वाले संविधान के अनुच्छेद 370 को बीजेपी सरकार ने रद्द कर दिया था. सरकार ने इस क्षेत्र में भारी सैन्य-बल की तैनाती कीनागरिक स्वतंत्रता को निलंबित कर दियासंचार प्रणालियों को गंभीर रूप से प्रतिबंधित कर दिया और विरोध करने के किसी भी प्रयास को दबा दिया. सरकार ने 2019 में नागरिकता (संशोधन) अधिनियम के पारित होने के बाद से विरोध प्रदर्शनों पर नकेल कसना शुरू कर दिया था. दमन का यही तरीका अब देश के बाकी हिस्सों में भी नजर आ रहा है. सरकार ने कई बार अपने धार्मिक और जातिगत पूर्वाग्रहों को सार्वजनिक तौर पर उजागर किया है और अब जब कि कार्यकारी और औपचारिक पुजारी के बीच का फासला भी खत्म कर दिया है, ऐसे में संविधान के मूल सिद्धांत खारिज होते नजर आ रहे हैं. संविधान एक समझौता हैएक लोकतांत्रिक वादा है जिसे भारतीयता को अपनाते हुए सबने एक दूसरे से लिखित तौर पर किया है. हम अब इस वादे के टूटने के साक्षी बने हैं.

इस स्पष्ट प्रभुत्व के बावजूद, हिंदूवादी पहचान को नागरिकों पर, देश पर या राज्य पर स्थायी तौर पर थोप पाने की परियोजना मुमकिन नहीं है और इसकी शुरुआत से ही इसे कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा है.

उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में, उपमहाद्वीप के आधुनिक राजनीतिक गठन के शुरुआती दिनों से ही दो अलग-अलग राजनीतिक नियतियां साफ तौर पर नजर आने लगीं थीं. ये दोनों राजनीतिक लाइनें शुरुआत से ही एक दूसरे से असंगत रही हैं और संभवतः दोनों का अलग-अलग प्रकार के राजनीतिक परिपेक्ष में जन्म हुआ. एक ने सवर्ण जातियों के वर्चस्व के तहत जाति-आधारित संगठन को जारी रखने की मांग की और दूसरी ने जाति और लिंग के भेदभाव से मुक्त एक समतावादी समाज के रूप में अन्य वास्तविक स्वतंत्रता की कल्पना की. पहली परिजोयना, जो अब हिंदू राष्ट्रवाद के प्रचार के माध्यम से साफ तौर से आगे बढ़ रही है, की पहचान राजनेता बाल गंगाधर तिलक के रूप में की जा सकती है. दूसरी का प्रतिनिधित्व राजनीतिक विचार की एक अद्वितीय प्रतिभा और अथक सुधारक जोतिराव फुले द्वारा किया जाता है, जिसे कांग्रेस सहित ऊंची-जाति के वर्चस्व वाले हर पटल ने दबाने की कोशिश की है.

फुले ने उन्नीसवीं शताब्दी में निचली जातियों के लिए पहली आधुनिक उद्धार विषयक परियोजना का नेतृत्व किया. उन्होंने उनकी सामाजिक और आर्थिक स्थितियों का विश्लेषण किया और शिक्षा, सामाजिक कार्य और राहत के लिए संस्थानों का बहुत व्यापक समाज स्थापित किया. 1873 में उन्होंने सत्यशोधक समाज की स्थापना की जिसने जाति प्रथा की खुलकर निंदा की और पुजारियों, मूर्तिपूजा और जटिल अनुष्ठानों की आवश्यकता को अस्वीकार कर दिया. बीसवीं शताब्दी की शुरुआत में, फुलेवादी महाराष्ट्र में एक प्रमुख राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरे, जहां उन्होंने महिला मुक्ति विरोधी, जाति-समर्थक ब्राह्मण रूढ़िवादियों को चुनौती दी और प्रभावी ढंग से संघर्ष किया और लंबे समय के लिए उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को बाधित कर दिया.

तिलक और उनके साथी हिंदूवादी राजनीतिक परियोजना के सृजनकर्ता थे, जिसे समाज को ब्राह्मणवादी नजरिए को ध्यान में रखते हुए कड़ाई से परिभाषित किया जाना था. तिलकवादी निचले पायदान पर मौजूद जातियों और महिलाओं के उत्थान का तीखे स्वरों में विरोध करते थे. उन्होंने उन सभी चीजों को सिरे से खारिज कर दिया जिन्हें वे विदेशी मानते थे. उनमें मुसलमान भी शामिल थे, जो एक हजार से अधिक वर्षों से भारतीय उपमहाद्वीप में रह रहे हैं. तिलकवादी परियोजना ने अंग्रेजी औपनिवेशिक शासन के साथ आई और विकसित हुई आधुनिक लोकतांत्रिक मापदंडों और न्यायिक प्रणालियों को विकृत कर दिया. यही प्रक्रिया वर्तमान सरकार की देखरेख में तेज गति से जारी है.

इन दोनों नियतियों के बीच 1980 और 1990 के दशक में राजनीतिक रंगमंच पर टकराव की शुरुआत हुई. मंडल आयोग, जिसे पिछड़ी जाति के लोगों की संख्या निर्धारित करने और उनके लिए आरक्षण नीतियों का सुझाव देने का काम सौंपा गया था, ने 1980 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की. उस समय की कांग्रेस सरकारों ने रिपोर्ट की सिफारिशों को लागू करना आवश्यक नहीं समझा. इसके बजाय, 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद प्रधानमंत्री बने राजीव गांधी ने हिंदू राष्ट्रवादियों के लिए बाबरी मस्जिद का दरवाजा खुलवा दिया ताकि वे अंदर जाकर पूजा-अर्चना कर सकें.

अगस्त 1990 में वीपी सिंह के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार ने मंडल आयोग की रिपोर्ट को लागू करने की प्रक्रिया शुरू की. कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियों सहित मुख्यधारा के अधिकांश राजनीतिक संगठनों ने इसका पुरजोर विरोध किया. इसके तुरंत बाद, सितंबर 1990 में, बीजेपी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अन्य सहयोगियों ने मस्जिद के स्थान पर एक मंदिर बनाने की मांग को लेकर सोमनाथ मंदिर से बाबरी मस्जिद तक एक मोटर चालित रथ का जुलूस निकाला, जिसका चेहरा लालकृष्ण आडवाणी थे. 16 नवंबर 1992 को सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने वीपी सिंह सरकार द्वारा लिए गए फैसले को बरकरार रखने का आदेश दिया, जिसके साथ मंडल रिपोर्ट को आधिकारिक तौर पर लागू करने का काम शुरू हुआ. तीन हफ्तों के भीतर 6 दिसंबर को मोटर चालित रथ जुलूस का एक हिस्सा बनी भीड़ द्वारा बाबरी मस्जिद को ध्वस्त कर दिया गया. केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार सत्ता में थी. सितंबर 2020 में एक निचली अदालत ने 32 लोगों को विध्वंस में शामिल होने का आरोपी घोषित किया, जिनमें आडवाणी और अन्य नेता शामिल थे, लेकिन उन्हें दोषी नहीं करार दिया गया.

हिंदू राष्ट्रवादियों द्वारा निर्मित किए गए शत्रुओं- खासतौर पर मुसलमानों- के प्रति किए जाने वाले व्यवहार पर ज्यादा ध्यान दिया गया है लेकिन हिंदू धर्म नाम के छलावे पर बहुत कम लिखा गया है. “हिंदू” की परिभाषा में वास्तविकता का अभाव है और यह विभिन्न विषयों में हाल की विद्वता के विपरीत है.

मंडल आयोग की रिपोर्ट को लागू होने के साथ ही बाबरी मस्जिद का ढांचा गिराए जाने के पीछे के कारणों को समझने के लिए आधुनिक भारत के दो वैचारिक नियतिवादों के बीच के संघर्ष को समझना आवश्यक है. संजय शर्मा/हिंदुस्तान टाइम्स

कांग्रेस और बीजेपी दोनों एक ही तिलकवादी प्रोजेक्ट का हिस्सा हैं जो आजादी के बाद से भारत की राष्ट्रीय राजनीति पर हावी रहा है. मंडल आयोग की रिपोर्ट के कार्यान्वयन के साथ बाबरी मस्जिद के विध्वंस के कारणों को समझने के लिए आधुनिक भारत के दो वैचारिक नियतिवादों के बीच संघर्ष को समझना आवश्यक है. विध्वंस के बाद की स्थिति, जिसमें बाबरी भूमि विवाद पर न्यायालय के फैसले और अनुष्ठानों का सीधा प्रसारण शामिल है, इस पर लगभग सभी राजनीतिक दलों द्वारा दी जाने वाली स्वीकृति को समझने के लिए, उस निहितार्थ को उजागर करना आवश्यक है जो हिंदू शब्द में छिपा है.

पिछले तीन दशकों में लगभग सभी राजनीतिक दलों ने “हिंदुत्व” से “हिंदू धर्म” को अलग करने की बात कही है और धार्मिक अल्पसंख्यकों को “हिंदू बहुसंख्यकवाद” से बचाने की आवश्यकता पर जोर दिया है. यह करने से “हिंदू” के अर्थ को छिपाने में कांग्रेस सहित सभी राजनीतिक दलों के हितों को मदद मिली है.

हिंदू राष्ट्रवादियों द्वारा निर्मित किए गए शत्रुओं- खासतौर पर मुसलमानों- के प्रति किए जाने वाले व्यवहार पर ज्यादा ध्यान दिया गया है – हिंदू धर्म के प्रपंच पर बहुत कम लिखा गया है. “हिंदू” की परिभाषा में वास्तविकता का अभाव है और यह विभिन्न विषयों में हाल की विद्वता के विपरीत है. इस धर्म का उपयोग उन शोषित जातियों की राजनीतिक आकांक्षा को दबाने और नियंत्रित करने के लिए किया गया है, जिन्हें पिछली सदी में बिना कोई मशविरा किए हिंदू धार्मिक श्रेणी में जोड़ दिया गया था. हाल ही में इजात की गई इस नई धार्मिक श्रेणी को बहुसंख्यक की पहचान के रूप में अपनाने से, ब्राह्मणवादी आरएसएस के नेतृत्व वाले हिंदू राष्ट्रवादी यह दावा करने में सक्षम हो गए हैं कि वे भी बहुसंख्यक समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं.

इस तरह, सवर्ण जातियां एक आधुनिक संवैधानिक लोकतंत्र में राजनीतिक शक्ति का उपयोग करने में सक्षम हैं और उपमहाद्वीप में जाति के उत्पीड़न के इतिहास और रोजमर्रा होने वाली घटनाओं की वास्तविकता को अपनी सुविधा अनुसार तोड़-मरोड़ रही हैं. कुछ इतिहासकारों, बुद्धिजीवियों और मीडिया की कमोवेश खामोश स्वीकृति के कारण “हिंदू धर्म” को लेकर आम समझ और उपमहाद्वीप में अधिकांश निचली जाति के लोगों की खुद को लेकर धारणा में पिछली एक सदी में काफी हद तक बदलाव देखने को मिला है.

हालांकि इसे एक प्राचीन धर्म होने का दावा किया जाता है लेकिन व्यापक अकादमिक सहमति है कि हिंदू धर्म एक हालिया आविष्कार है, किसी आस्था की प्रणाली को धर्म का पदनाम दिए जाने के लिए एक तो इसे राज्य द्वारा धर्म के रूप में मान्यता प्राप्त होनी चाहिए और साथ ही उन लोगों द्वारा भी जो इस आस्था में विश्वास रखते हैं. हिंदू धर्म के मामले में यह केवल बीसवीं शताब्दी की शुरुआत में है कि अंग्रेजी सरकार ने एक मापदंड को परिभाषित करने की कोशिश की कि किसे हिंदू धर्म का मानने वाला माना जा सकता है. उससे पहले तक, अंग्रेज अधिकारियों ने हिंदू धर्म के शब्द का सुविधा अनुसार इस्तेमाल किया था, जिसे उन्होंने ईसाई मिशनरियों से विरासत में प्राप्त किया था, जो उन लोगों की पहचान करने के लिए था जो न तो ईसाई, न यहूदी और न ही मुसलमान थे. अंग्रेद इसे एक नकारात्मक अवधारणा के रूप में इस्तेमाल किया करते थे.

अंग्रेज सिविल सेवक लुईस माक्लेवर ने 1881 में मद्रास की जनगणना रिपोर्ट में लिखा था : “धर्म की परिभाषा के रूप में, या जाति की भी, यह सटीक होने की तुलना में अधिक उदार है. नस्ल के दृष्टिकोण से, [हिंदू धर्म शब्द] समूहों में व्यापक रूप से ऐसे सच्चे आर्य ब्राह्मण और कुछ क्षत्रियों के रूप में अलग-अलग लोग हैं जिनमें दक्षिण के वेल्लाल और कल्लर, पश्चिम की नायर और दक्षिणी पहाड़ी की तरफ की आदिवासी जनजातियां शामिल हैं. एक धार्मिक वर्गीकरण के रूप में यह वैदिक मान्यता के अनुसार शुद्ध जीवित रूपों को टिननेवेल्ली और दक्षिणपारा के दानव उपासकों के साथ जोड़ता है.”

अपनी पत्नी, सावित्रीबाई के साथ, जोतिराव फुले भारत के दलितों, शूद्रों और महिलाओं जैसे शोषित समुदायों के लिए शिक्षा की वकालत करने वाले शख्स थे. उन्होंने निचली जातियों के लिए पहली आधुनिक उद्धार परियोजना का नेतृत्व किया. विकीमीडिया कॉमंस

औपनिवेशिक भारत के एक जनगणना आयुक्त की 1921 की रिपोर्ट में लिखा है, “कोई भी भारतीय अपने धर्म के तौर पर ‘हिंदू’ शब्द से परिचित नहीं है.” उन्नीसवीं शताब्दी के अंत तक अंग्रेजी भाषा में शिक्षित कुछ ही ऊंची जाति के भारतीय थे जो हिंदू धर्म के हिस्से के रूप में अपनी पहचान बना रहे थे. चूंकि पिछली शताब्दी में ही “हिंदू” शब्द साफ तौर पर सामने आया जिसका मतलब एक राज्य से और एक बड़ी आबादी से था जिसमें विशेष रूप से निचली जातियों को बिना मशविरा किए शामिल कर लिया गया था. इससे यह बात पूरी तरह साबित होती है “हिंदू धर्म” बीसवीं सदी का आविष्कार है. उपमहाद्वीप के लंबे इतिहास में प्रभावशाली सवर्ण समुदाय खुद को और दूसरों को एक ही धर्म का मानने को तैयार नहीं थे, बल्कि वे अपनी पहचान अलग-अलग जातियों से करते थे और हाल के बढ़ते जातिगत अत्याचार यह दर्शाते हैं कि यह तथ्य अभी भी नहीं बदला है. शुरुआत में वे खुद को नीची जाति के लोगों के साथ जिन्हें वे नीच और अछूत मानते थे, एक ही श्रेणी में रखने पर भी ऐतराज जताते थे.

बीसवीं शताब्दी की शुरुआत में जाहिर तौर पर देखा गया कि कैसे मुख्य रूप से सवर्ण राष्ट्रवादी नेताओं ने स्पष्ट और रणनीतिक रूप से हिंदू धर्म को एक राजनीतिक परियोजना के रूप में अपनाया. मोहनदास गांधी और जवाहरलाल नेहरू की कांग्रेस ने इस एकीकरण पर सवाल नहीं उठाया. इसलिए नहीं कि इसका मतलब उत्पीड़ित-बहुसंख्यक वर्ग के साथ राजनीतिक सत्ता को साझा करना था बल्कि इसलिए कि नीची जाति के लोगों को “हिंदू” श्रेणी के तहत लाकर ऊंची जाति को उनका प्रतिनिधित्व करने की अनुमति मिल गई और जब 1950 के दशक के अंत में अंग्रेजों से सत्ता भारतियों के हाथ में आई तो वह प्रभावी जाति-कुलीन वर्ग के हाथों में केंद्रित हो गई.

अन्य सवर्ण नेताओं ने हिंदू परियोजना को अधिक निस्संकोच रूप से आगे बढ़ाया. आर्य समाज के बनिया नेता लाला लाजपत राय और रूढ़िवादी सनातन आंदोलन के ब्राह्मण नेता मदन मोहन मालवीय 1915 में हिंदू महासभा नाम की राजनीतिक पार्टी बनाने के लिए एक साथ आए जिसने आगे चलकर भारतीय जनसंघ और बीजेपी का रूप लिया. 1925 में महासभा के सदस्य केशव बलिराम हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की, जो हिंदू पहचान का प्रचार करने के लिए समर्पित संगठन है.

बीसवीं शताब्दी के दौरान सवर्ण नेताओं ने निचली जाति के लोगों को आत्मसात करने और संयोजित करने के माध्यम से एक हिंदू निर्वाचन आधार बनाने की कोशिश की है. उन्होंने प्रमुख जातियों द्वारा पूजे जाने वाले देवताओं का प्रचार करते हुए निचली जातियों की परंपराओं को खत्म करके धार्मिक मान्यताओं की एकरूपता पैदा करने की कोशिश की है. जर्मन इंडोलॉजिस्ट (भारतविज्ञ) हेनरिक वॉन स्टीटेनक्रोन उत्तर-पश्चिमी प्रांतों की सवर्ण जातियों के देवी-देवताओं द्वारा “भारत के औपनिवेशीकरण” की बात करते हैं और कहते हैं कि “स्थानीय देवताओं के हिंदूकरण की निरंतर प्रक्रिया भारत के कई हिस्सों में साफ तौर से देखी जा सकती है.”

इस परियोजना को धार्मिक सुधार के नाम पर एक “सांस्कृतिक नरसंहार” के रूप में भी वर्णित किया जा सकता है. जिसमें एक जातीय समूह की संस्कृति का जानबूझकर और व्यवस्थित तौर पर विनाश कर दिया जाता हो.

जनजातियों और दलित जातियों की सांस्कृतिक प्रथाओं में भारी बदलाव आया है. उदाहरण के लिए ओडिशा, केरल और तमिलनाडु में मारी अम्मन, भुआसुनी, मणिनागेस्वरी, माडन और थांपुरान जैसे लंबे समय से पारंपरिक देवताओं की जगह अब शिव और दुर्गा जैसे “महान हिंदू देवताओं” ने ले ली है. मंदिर-प्रवेश कार्यक्रम बनाए गए, जिससे भारत के कई हिस्सों में मंदिर के राजस्व में वृद्धि हुई है.

जब भी जातियों के बीच बढ़ता तनाव सवर्णों के हितों के लिए हानिकारक साबित होने लगता, उन आपसी संघर्षों से ध्यान हटाने के लिए सांप्रदायिक दंगों को शुरू कर दिया जाता है. जातिगत दंगों ने अक्सर हिंदू-मुसलमान के बीच होने वाली हिंसा की शक्ल ले ली. मुसलमानों को एक साझे दुश्मन की तरह पेश किया गया ताकि दलित समज का ध्यान भटक जाए और वे सवर्णों से सामाजिक न्याय की मांग नहीं करें. एक छद्म “हिंदू” धर्म ने एक छद्म हिंदू बहुसंख्यक समाज का निर्माण किया, जिसने इस तथ्य को दबा दिया कि राजनीतिक आकांक्षाओं के साथ जीने वाले दलित समाज ही वास्तविक रूप में बहुसंख्यक थे. मुसलमान और अन्य धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय के लोग हिंदू धर्म के झांसे के शिकार हैं.

केरल के पेरुम्बावुर में पुलकोट्टा सस्ति मंदिर में एक अनाम प्राचीन देवता. ओडिशा, केरल और तमिल नाडु में, लंबे समय से पारंपरिक देवता जैसे मारी आममन, भुआसुनी, मणिनागे ,वरि, मादन और थमपुरन की जगह अब शिव और दुर्गा जैसे “महान हिंदू देवताओं” ने ले ली है. अजय शेखर

हाल ही में आविष्कृत धर्म में सुधार के पर्दे के पीछे, सवर्ण जातियों ने बहुसंख्यक दलित समाज के लोगों पर अपनी क्रूर शक्ति का प्रयोग किया है. आज भी मंदिरों में प्रवेश करने पर, जाति से बाहर शादी करने पर या पानी को “प्रदूषित” कर देने पर दलितों की हत्या कर दी जाती है. उनके अपने कुओं में सजा के तौर पर जहर घोल दिया जाता है. दलित महिलाओं के साथ सवर्ण अधिपत्य की याद दिलाने के लिए बलात्कार किया जाता है. भारत की शोषित जातियों और जनजातियों को सार्वजनिक जीवन के सभी रूपों- राजनीति, व्यवसाय, मीडिया, न्यायपालिका आदि में प्रतिनिधित्व से वंचित रखा गया है. दलित नेताओं ने सुधार, प्रतिनिधित्व और भेदभाव को समाप्त करने के लिए कई राजनीतिक आंदोलनों का नेतृत्व किया है.

इन दो राजनीतिक नियतिओं के बीच का होने वाला संघर्ष – सवर्ण जातियों का हिंदू एकता की बयानबाजी के जरिए समाज में अपने हजारों साल पुराने वर्चस्व को कायम रखने का प्रयास और जाति प्रथा के दंश से मुक्ति पाने के लिए उत्पीड़ित जातियों की लड़ाई – ने भारत के आधुनिक इतिहास को आकार दिया है.

2.

“हिंदू” शब्द का प्रयोग पहली बार छठी शताब्दी ईसा पूर्व में पाया जाता है, जब हखामनी फारसियों ने इसका इस्तेमाल सिन्धु नदी के आसपास के भौगोलिक इलाकों- जिसे उपमहाद्वीप के उत्तर-पश्चिम में सिन्धु के तौर पर जाना जाता है- के सन्दर्भ में किया था. इतिहासकार संजय सुब्रह्मण्यम के अनुसार, इस शब्द का इस्तेमाल कभी भी दक्खन से आगे की भूमि के लिए नहीं किया गया था. वेदों के रूप में संकलित साहित्य की रचना 1500 ईसा पूर्व से 500 ईसा पूर्व के बीच हुई थी, जो लोग खुद को “आर्य” कहते थे और यूरेशियन घास के मैदानी क्षेत्र से उपमहाद्वीप में आकर बस गए थे. प्राचीन ग्रंथ मनुस्मृति ने अनुसार प्रवासी आर्यों को मध्य भारत में विंध्य पर्वत को पार करना प्रतिबंधित था.

चौथी शताब्दी ईसा पूर्व में, सिकंदर की सेना ने “सिंधु” के आसपास के क्षेत्र को इंडस नाम से संदर्भित किया, जहां से आधुनिक नाम “इंडिया” व्युत्पन्न हुआ है. अरबी संस्करण “अल हिंद” भी, उसी भौगोलिक क्षेत्र का उल्लेख करता है और इस शब्द से ही “हिंदू” नाम उपयोग में आया. इतिहासकार रिचर्ड ईटन ने लिखा है कि यह शब्द उपमहाद्वीप के एक हिस्से के लिए अस्पष्ट भौगोलिक धारणा के रूप में 1350 तक इस्तेमाल किया गया था.

रोमिला थापर के अनुसार, “हिंदू” का इस्तेमाल पंद्रहवीं शताब्दी से पहले किसी धर्म के नाम के तौर नहीं किया गया था. इस धर्म को नामित करने के लिए इस शब्द का सबसे पहला उपयोग अठारहवीं शताब्दी में ईस्ट इंडिया कंपनी के सिविल सेवकों और व्यापारियों द्वारा किया गया था.

इन सभी अलग-अलग उपयोगों से पता चलता है कि हिस्टोरियोग्राफी में “हिंदू” शब्द का उपयोग उन्नीसवीं शताब्दी से पहले किसी भी मापदंड के तहत नहीं किया गया था. उन्नीसवीं शताब्दी में भी, इसका उपयोग केवल राजनीतिक और प्रशासनिक प्रक्रियाओं की बात करते समय किया गया था जिसके माध्यम से औपनिवेशिक सरकार बहुत कम मात्रा में इसका प्रयोग करती थी.

ईश्वर या देवताओं में विश्वास, ईश्वर और धर्म के अस्तित्व पर सवाल करना समाज और राजनीति से अलग रह सकता है. लेकिन एक विश्वास प्रणाली को एक धर्म के रूप में तब वर्गीकृत किया जाता है जब एक बड़ी संख्या में लोगों के व्यवहार में, दूर तक ज्यादा समय के लिए, वर्जन और अनुष्ठानों के माध्यम से नियमितता सुनिश्चित करने के लिए उन्हें नियंत्रित किया जा सके. एक पवित्र पंचांग यह सुनिश्चित करता है कि समूह का आचरण साल-दर-साल दोहराता रहे. धर्म सत्ता संरचनाओं का अभिन्न अंग है जो “विश्वास” को विनियमित करके इसे निर्विवाद वैधता प्रदान करते हैं. धार्मिक विश्वासों और प्रथाओं के लिए एकरूपता और नियमितता सुनिश्चित करने के लिए धर्म को राजनीतिक शक्ति के निरंतर अभ्यास की आवश्यकता होती है.

धर्म की बात करना हुआ कि हम किसी ऐसी चीज की बात करें जिसके साफ तौर से लक्षण नजर आएं और एक राजनीतिक दायरे में इसका पालन करने वाली एक निश्चित आबादी हो. ये तथ्य कि समाज “धर्म,” “संप्रदाय” और “पंथ” के बीच के अंतर में रूचि रखते हैं इन वर्गीकरणों के प्रबंधकीय और राजनीतिक चरित्र की ओर इशारा करता है क्योंकि इनमें से किसी ना किसी का नागरिक कानून के तहत परिणाम प्राप्त होगा. यहां तक कि साइंटोलॉजी या डिंकॉइज्म की तरह विश्वासों और प्रथाओं के अलग होने के बावजूद इनका कोई महत्व नहीं जब तक कि एक राजनीतिक प्रणाली औपचारिक रूप से स्थापित मापदंडों के आधार पर औपचारिक मान्यता प्रदान नहीं करती है. भारत में, हम लिंगायतों द्वारा उनकी आस्था को धर्म का दर्जा दिलाने के संघर्ष को मिसाल के तौर पर देख सकते हैं.

यूरोप में, जहां से हमारी धर्म को लेकर मौजूदा सोच का आगमन हुआ, “धर्म”, “राष्ट्र” और “नस्ल” जैसे शब्दों का इस्तेमाल सत्रहवीं और अठारहवीं शताब्दियों में अदल-बदल कर किया जाता था. कोलंबस के दौर में और उसके बाद गैर-यूरोपीय लोगों और उनके रीती-रिवाजों की खोज के चलते, ईसाई धर्मशास्त्रियों को कई धर्मों के होने की संभावना सताने लगी और वे चिंतित होने लगे कि सही धर्म कौन सा है. एक लंबे समय तक यह स्थापित मान्यता थी कि केवल ईसाई धर्म ही एकमात्र धर्म है या सच्चा धर्म है. धर्म को परिभाषित करने और विभिन्न समूहों की प्रथाओं के बीच अंतर करने के इन प्रयासों ने धार्मिक बहसों को और ज्यादा तरजीह दी जाने लगी जब राज्य ने प्रशासनिक मामलों में एक व्यवस्था के रूप में धर्म को अपना लिया. राज्य विधानों के लिए वर्णनात्मक श्रेणियां जरूरी बन गईं- उदाहरण के लिए, फ्रांसीसी साम्राज्य में नस्लवादी कोड नोइर द्वारा यहूदियों, ईसाइयों और दासों के बीच विवाह और संपत्ति संबंधों को विनियमित किया जाता था. इस प्रकार, विभिन्न समूहों के धर्मों को निर्धारित करने और उसके आधार पर उन्हें पहचानने और गिनने और उनके अनुसार प्रशासन करने के लिए एक आवश्यकता उत्पन्न हुई.

मुगल काल के दौरान उपमहाद्वीप में पहुंचने वाले यूरोपीय मिशनरियों का मानना था कि दुनिया में सिर्फ़ चार धर्म ईसाई, इस्लाम, यहूदी और मूर्ती पूजा करने वालों के विश्वास और प्रथाएं हैं. जबकि उन्होंने उपमहाद्वीप में अलग-अलग तरह की धार्मिक परंपराओं को देखा, तो उन्होंने ईसाई, इस्लाम और यहूदी धर्म के अलावा अलग धर्म में आस्था रखने वाले लोगों को ‘जेंटआइल’ यानि शैतान-पूजा करने वाले मूर्तिपूजक के रूप में माना. स्पैनिश मिशनरियों ने बहुदेववाद, मूर्ति पूजा और जाति व्यवस्था के विभिन्न तरीकों का अध्ययन किया, जिनके बारे में उनका मानना था कि वे पहले से ही गेंटाइल नामक एक धर्म का गठन कर चुके थे, जो जल्द ही “जेंटू” बन गया.

प्रारंभिक ब्रिटिश प्राच्यविदों ने इस शब्द को चुन लिया. 1770 के दशक के प्रारंभ में, बंगाल के गवर्नर जनरल, वारेन हेस्टिंग्स ने ब्राह्मणों के एक समूह को संस्कृत के “शास्टेर्स”, या शास्त्रों से एक कानूनी संहिता का चयन करने और संकलित करने का काम सौंपा और इसका अनुवाद तबकी अधिक प्रचलित फ़ारसी भाषा में किया गया और फिर फ़ारसी से अंग्रेजी में. यह करने का अभिप्राय यह था कि गैर मुसलमान आबादी को इस संहिता द्वारा नागरिक मामलों में प्रशासित किया जाएगा. 1776 में, अंगरेज प्राच्यवादी नथानिएल बी हालहेड ने इस संहिता का अंग्रेजी अनुवाद पूरा किया और इसे ‘ए कोड ऑफ जेंटू लॉज’ या ‘ओर्डीनेशन्स ऑफ द पंडित्स’ के रूप में प्रकाशित किया.

इस विवध उपयोग का मतलब ये नहीं है कि कोई धर्म या उससे जुड़े लोग अस्तित्व में थे. मुगल काल से लेकर औपनिवेशिक प्रशासन के शुरुआती दिनों तक ज़्यादातर यूरोपीय यात्रियों द्वारा दर्ज किए अभिलेखों से जाहिर होता है कि उनकी जानकारी और संबंध केवल ऊंची जातियों, विशेषकर ब्राह्मणों की धार्मिक परंपराओं तक ही सीमित था. चूंकि यूरोपीय उपनिवेशवादियों के मध्यस्थ अक्सर ब्राह्मण होते थे, इसलिए ब्राह्मणों की मान्यताओं को अक्सर अन्य जातियों के धर्म के प्रतिनिधि के रूप में बिना कोई साक्ष्य जुटाए मान लिया जाता था.

ये सोचने वाली बात है कि पूरे देश में माने जाने वाले धर्म की उत्पत्ति अंग्रेजों के आने से पहले क्यों नहीं हुई थी. इसके कई कारण हैं जिसमें सबसे महत्वपूर्ण है कि जाति प्रथा कुछ लोगों को उन यौनिक, सामाजिक और सांस्कृतिक प्रथाओं से बहार रखने पर निर्भर करती है जोकि सिर्फ कुछ लोगों के लिए सुरक्षित की गई हैं. आज भी ऐसा कोई सबूत मौजूद नहीं है जो इस अवधारणा को बल दे सके कि जातियों, संप्रदायों और जनजातियों के लोग एक धार्मिक समूह से संबंधित हैं. जैसा कि इतिहासकार सैंड्रिया बी फ्रिटैग ने 1980 के निबंध में लिखा था, “भारतीयों ने खुद को हमेशा अपनी जाति से पहचाना है.” दूसरे शब्दों में, भारतीय उपमहाद्वीप में जातिगत उत्पीड़न ही एकमात्र कारक है जो कभी भी बदला नहीं है.

हिंदू धर्म का उपयोग उन शोषित जातियों की राजनीतिक आकांक्षा को दबाने और नियंत्रित करने के लिए किया गया हैजिन्हें पिछली सदी में बिना कोई मशविरा किए हिंदू धार्मिक श्रेणी में जोड़ दिया गया था. हाल ही में इजात की गई इस नई धार्मिक श्रेणी को बहुसंख्यक की पहचान के रूप में अपनाने सेब्राह्मणवादी आरएसएस के नेतृत्व वाले हिंदू राष्ट्रवादी यह दावा करने में सक्षम हो गए हैं कि वे भी बहुसंख्यक समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं.

जाति एक संगठनात्मक सिद्धांत था जिसके तहत उपमहाद्वीप में रहने वाले लोगों को इकट्ठा किया गया था और बांटा गया था. पूर्व-औपनिवेशिक युग में ब्राह्मणों और अन्य सवर्ण बहुसंख्यक नीची-जाति के लोगों को ‘म्लेच्छ’ और ‘धर्महीन’ मानते थे, या नास्तिक मानते थे. इसलिए जाति के दृष्टिकोण से सभी लोगों के लिए एक धर्म के अंतर्गत एक समावेशी अवधारणा कल्पना के परे रही होगी.

इसके बावजूद, अंग्रेज विद्वानों ने भारत के लोगों के धर्म का वर्णन करने के लिए हिंदू शब्द का उपयोग करना जारी रखा, जबकि वास्तव में, वे केवल सवर्णों की सांस्कृतिक प्रथाओं और संहिता का उल्लेख कर रहे थे. बंगाल में खनन कार्यों के लिए कलकत्ता में तैनात एक प्राच्यवादी और धातुविज्ञानी एचएच विल्सन ने 1819 में एक संस्कृत शब्दकोश तैयार किया, जिसमें “हिंदू” शब्द का उल्लेख किया गया था, लेकिन उन्होंने किसी धर्म के सन्दर्भ में इसका इस्तेमाल नहीं किया. 1827 में, विल्सन ने ‘सिलेक्ट स्पीशीज ऑफ द थिएटर ऑफ द हिंदू’ नामक किताब का प्रकाशित की, जिसमें “हिंदू” शब्द को उपमहाद्वीप में रहने वाले गैर-इस्लामिक लोगों और संस्कृतियों के लिए संदर्भित किया गया था. उन्होंने उपमहाद्वीप के “संप्रदायों” पर दो व्याख्यान दिए, जो 1840 में ‘स्केच ऑफ द रिलीजियस सेक्ट्स ऑफ द हिंदू’ के रूप में प्रकाशित हुए, जहां वे अलग-अलग लेकिन संबंधित संप्रदायों और मान्यताओं का वर्णन करते नजर आते हैं. यहां तक कि संप्रदायों का यह समूह भी काफी हद तक वैष्णवों, शैवों और पशुपति जैसे सवर्ण जाति-वर्ग से संबंधित था. उन्नीसवीं शताब्दी में “हिंदू” शब्द का प्रयोग मुख्यतः ऊंची-जाति की मान्यताओं का वर्णन करने के लिए किया जाता था.

“हिंदू” शब्द का बतौर धर्म प्रशासनिक इस्तेमाल और उपयोग केवल 1850 के दशक से शुरू हुआ, विशेष रूप से जाति निर्योग्यता निवारण अधिनियम 1850 में. उससे पहले तक, औपनिवेशिक नृवंशविज्ञानियों के लिए एक अस्थायी वर्णनात्मक शब्द था. “हिंदू” नाम से जाने जाने वाले लोगों ने न तो खुद के लिए इस शब्द का इस्तेमाल किया था, न ही वे खुद को एक धर्म के अनुयायी के रूप में देखते थे. इस शब्द के सीमित उपयोग का मूल निवासियों के जीवन पर कोई खास असर भी नहीं नजर आता था. ऊंची जाति के लोगों को, जिनकी मान्यताओं ने अंग्रेजों को “हिंदू” शब्द के लिए जानकारियां मुहैया कराईं थी, अब उन्हें इस बात से तकलीफ होना शुरू हो गई कि अब वे उन निचली जातियों के साथ उसी धर्म को साझा कर रहे थे, जिन्हें उन्होंने सदियों से गुलाम बनाकर शोषण किया और सभ्य समाज से बाहर रखा. उन्होंने अब इस शब्द के उपयोग का विरोध किया और वैकल्पिक नामों की तलाश शुरू की, जिसकी मदद से अपने प्रतिनिधित्व को नियंत्रित कर सकती थी और साथ ही खुद को उन लोगों से अलग रख सकतीं थीं जिन्हें वो नीचा मानते थे.

ईसाई और इस्लाम धर्म अपनाने वाली उत्पीडित जातियों के अधिकारों की रक्षा करने वाला जाति निर्योग्यता निवारण अधिनियम सवर्ण जातियों के लिए एक न्यायिक झटका था. ये कानून साफ तौर से इशारा कर रहा था कि दलित समुदाय के लोग अब आधुनिक न्याय प्रणाली का उपयोग करके हजारों साल से चले आ रहे उत्पीड़न से बचने के लिए सामूहिक धर्म परिवर्तन का रास्ता चुन रहे थे. इस कानून में ‘हिंदू” शब्द के उपयोग का सवर्ण जातियों द्वारा विरोध किया गया. प्रसिद्ध उपदेशक विष्णुबूवा ब्रह्मचारी ने “हिंदू” शब्द को म्लेच्छ मानकर उसका परित्याग कर दिया.

वीणा नरेगाल के अनुसार, “ब्रह्मचारी ने अपने तीखे बयानबाजी के अंदाज से बड़ी मात्रा में लोगों को अपनी ओर आकर्षित किया.” उन्होंने 1864 में “वेदोक्त धर्मप्रकाश”, या वेदों के अनुसार धर्म नाम की एक किताब लिखी. उन्होंने इसमें “हिंदू धर्म” के बजाय “वेदोक्त-धर्म” शब्द को प्राथमिकता दी, उस समय के कई सवर्ण जाति के नेता वेदों के जरिए यूरोपीय औपनिवेशिक शक्तियों से करीबी हासिल करना चाह रहे थे.

भारत की बहुत कम चीजों ने वेदों की तरह यूरोपीय चित को अपनी ओर आकर्षित किया. ये तथ्य कि वेदों का अस्तित्व दो हजार सालों से बरक़रार रहा है, इन्हें और ज्यादा दिलचस्प बना देता है. इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि यूरोपीय विद्वानों को “आर्यों” ने अपनी ओर मोहित कर लिया था जो यूरेशिया के घास के इलाकों से सफर करके उपमहाद्वीप में आ बसे थे और जो कभी वही भाषा बोलते थे जो उनकी बोली के करीब थी.

फुले से प्रभावित होकर, कोल्हापुर के महाराज शाहू और केशवराव जेडे महाराष्ट्र में गैर-ब्राह्मण आंदोलन के सबसे प्रमुख नेताओं में से एक बन गए. विकीमीडिया कॉमंस

ऋग्वेद में वर्णित “आर्य” संस्कृति मौजूदा पाकिस्तान के इलाके में बहुत पहले ही खत्म हो चुकी थी. ऋग वेद और यजुर वेद में उनके लेखक जिस जमीन को छोड़ कर आए थे, उसे याद करते हैं और वो जमीन उपमहाद्वीप नहीं है.

उदाहरण के तौर पर, “अग्निचयन” नाम के वैदिक अनुष्ठान में एक मानचित्र सी व्यवस्था बनायी जाती है जो उत्तर-पश्चिम यूरेशियाई घास के मैदानों वाले क्षेत्र में स्थित मातृभूमि से दक्षिण-पूर्व की तरफ पलायन की ओर इशारा करती है. उच्च जातियों ने राजनीतिक लाभ उठाने के लिए उन ग्रंथों के “अधिकार” और उनकी “प्रतिष्ठा” का उपयोग करना शुरू कर दिया, जिसमें उस भूमि की यादें बसी हुई थी जिसे वो छोड़ उपमहाद्वीप में आ बसे थे.

खुद को अंग्रेजों के समकक्ष बनाने के लिए, उच्च-वर्णीय नेताओं इस नए धर्म को उनके लिए रुचिकर बनाने की कोशिश में लग गए. इस मायने में. ब्रह्मचारी अरविंदो, दयानंद सरस्वती और वेवेकानंद के अग्रगामी साबित हुए. उन्नीसवीं शताब्दी के अन्य उच्च-जाति के नेताओं की तरह, ब्रह्मचारी ने सती प्रथा, जिसे औपनिवेशिक प्रशासन ने पहले ही आपराधिक घोषित कर दिया था, का विरोध किया और सशर्त विधवा पुनर्विवाह की वकालत की थी. उन्होंने शाकाहार पर जोर दिया इसके बावजूद कि यह उनके वैदिक और आर्य पूर्वजों के विश्वासों के विरूद्ध था जो मांसाहरी थे. ब्रह्मचारी वैदिक भौतिकी, वैदिक रसायन विज्ञान और यहां तक कि वैदिक समय यात्रा की वकालत करते थे. विवेकानंद ने दावा किया कि आर्यों ने चार्ल्स डार्विन से पहले क्रम विकास यानी एवोलुशन के विचार की खोज की थी, “दयानानद के इस विचार में कुछ भी अद्बुद्ध नहीं है कि वेद में विज्ञान के साथ-साथ धर्म के सत्य भी हैं.” अरविंदो ने लिखा. “मैं साथ ही अपना विश्वास भी जोड़ूंगा कि वेद में विज्ञान के वो सत्य भी शामिल हैं जो आधुनिक दुनिया तक के पास नहीं हैं.”

अंग्रेजों के साथ गठजोड़ स्थापित करने के लिए और औपनिवेशिक आकाओं की कुछ शक्ति साझा करने के लिए उच्च वर्णीय लोगों द्वारा वेदों पर जोर दिया गया था. 1893 में, नेटाल के पूर्व ब्रिटिश उपनिवेश की संसद को एक खुले पत्र में, मोहनदास गांधी ने उच्च जाति के भारतीयों को “आर्य” कहा था.

“मैं इस बात की ओर इशारा करने की हिम्मत करता हूँ कि अंग्रेज और भारतियों का समान उद्भव है, जिसे इंडो-आर्यन कहा गया.” गांधी ने लिखा उन्होंने जोर दिया कि इस साझी नस्लीय उत्पत्ति के माध्यम से, “ईश्वरीय शक्ति ने अंग्रेजों और भारतियों को एक साथ ला दिया है, और पहले के हाथों में दूसरे की नियति को सौंप दिया है.”

इस बीच, दयानंद सरस्वती ने खुद के प्राचीन धर्म की स्थापना की, जिसका नाम “आर्य-धर्म” था और वे उसे केवल वेदों पर आधारित रखना चाहते थे, जो कि ब्राह्मणवादी धर्मग्रंथों के दायरे को विस्तार देता था. बनारस के रूढ़िवादी ब्राह्मणों ने दयानंद को एक खतरे के रूप में देखा और आर नए आंदोलन की शुरुआत की जिसे उन्होंने सनातन धर्म, या सनातन व्यवस्था कहा जोकि गैर-ईसाई और गैर-मुसलमान आबादी के लिए नए राष्ट्रीय धर्म के रूप में स्थापित किया गया था. गांधी ने खुद को “सनातनी हिंदू” की पहचान दी.

“सनातन धर्म” शब्दावली कुछ हिंदू राष्ट्रवादियों की पसंद है जो ये जानते हैं कि “हिंदू” एक फारसी शब्द है और इस प्रकार म्लेच्छ है और इसलिए उनके कार्यक्रम को प्रभावित किए बिना वे इससे पीछा छुड़ाने से खुश हैं. इंडोलॉजिस्ट विल्हेम हल्बफास के अनुसार, “धर्म मुख्य रूप से और मूल रूप से वर्णाश्रमधर्म, जातियों और जीवन के चरणों का क्रम है,” और “यह धर्म ही है जो जातियों को एक दूसरे से अलग करता है और ‘आर्य’ और ‘गैर- आर्य’ के बीच एक रेखा खींचता है.

जब उनका सामना पश्चिम से हुआ और वे ईसाई-धर्मप्रचारकों से मुकाबला हुआ तो उच्च जातीयों ने पश्चिमी मानकों के अनुकूल करने के लिए धर्म की व्याख्या सदाचार और नैतिक दृष्टि से करी ताकि उनका सामाजिक प्रभुत्व को जारी रखा जा सके. इस प्रकार, हलबफस का कहना है कि “सनातन धर्म ईसाई धर्म के खिलाफ स्वाग्रह की अवधारणा थी.”

उपमहाद्वीप के उच्च जातियों की तुलना में बहुत अधिक आबादी वाले शोषित वर्ग का औपनिवेशिकों के साथ मुलाक़ात का अनुभव अलग तरह का था. उन्होंने पाया कि उपनिवेशवाद ने उन्हें मुक्तिदायक परिस्थितियां प्रदान कीं: धार्मिक परिवर्तन, भेदभाव के खिलाफ कानूनी मदद, लोकतांत्रिक चुनावी प्रक्रियाएँ, आधुनिक शिक्षा तक पहुँच और नए प्रकार के रोज़गार. पहली बार, वे समान अधिकारों की तलाश कर सकते हैं – बेहद मामूली स्वतंत्रता जैसे सभी के समान एक ही सड़कों पर चलने का अधिकार, गांव के कुएँ से पीने का पानी लेने का अधिकार और अपने श्रम का मुआवजा मांगने का अधिकार.

एक तरफ अल्पसंख्यक सवर्णों ने निचली जातियों को न अपनाते हुए उन्हें अछूत माना, दूसरी तरफ वे चाहते थे कि यह लोग जाति पदानुक्रम को पहचानें और पारंपरिक, जाति-निर्धारित कामों को स्वीकार करें. उपनिवेशवाद द्वारा प्रस्तावित उपायों के तहत बहुसंख्यक निचली जाति द्वारा अपनी किस्मत को बदलने के किसी भी प्रयास का भारत के इतिहासकारों ने शायद ही कहीं उल्लेख किया है.

अंग्रेज भारतीय सेना ने जातिगत व्यवसायों से बाहर उत्पीड़ित समुदायों के लिए रोजगार खोला, जैसे कि मद्रास में परियर (बाद में अंग्रेजी में, पारिया), बंगाल में नामशुद्र और महाराष्ट्र में महार, इन समुदायों के लिए सामाजिक सीढ़ी चढ़ने के नए अवसर खुले. महार जाति के बीआर अंबेडकर के पिता और दादा दोनों ने ब्रिटिश सेना में अपनी सेवा दी थी.

जैसा कि जाति निर्योग्यता निवारण अधिनियम से पता चलता है कि उपमहाद्वीप में धर्म परिवर्तन प्रचलित था. शायद तब और आज भी, सवर्ण जातियों द्वारा उनके वर्चस्व के खिलाफ धर्म परिवर्तन को सबसे खतरनाक रणनीति के तौर पर देखा जाता है. भारत के कई राज्यों में आज भी धर्म परिवर्तन को रोकने के लिए कानून बनाए गए हैं.

1840 और 1850 के दशक के बीचतत्कालीन मद्रास प्रेसीडेंसी की उच्च जातियों ने धर्मांतरण के लिए दो व्यापारिक संगठनों का गठन किया- विभूति संगमया पवित्र-विभूति समाजऔर साधु वेद सिद्धान्त सभाया समाज में वेदों में लिखे धर्मशास्त्र के प्रसार के लिए सभा.

मद्रास प्रेसीडेंसी ईसाई धर्म को अपनाने वाली निचली जातियों के खिलाफ हुए हमलों और नरसंहार का साक्षी बना. आज तक, उच्च-जाति के संगठन धर्म परिवर्तन का जवाब हिंसा से देते हैं. उदाहरण के लिए, इसी क्षेत्र का नादर समुदाय, जिसने बड़े पैमाने पर धर्मांतरण किया, एक हिंसक हमले का गवाह बना. इन घटनाओं ने अंग्रेजों को जाति निर्योग्यता निवारण अधिनियम बनाने के लिए मजबूर किया.

फुले से प्रभावित होकर, कोल्हापुर के महाराज शाहू और केशवराव जेडे महाराष्ट्र में गैर-ब्राह्मण आंदोलन के सबसे प्रमुख नेताओं में से एक बन गए विकीमीडिया कॉमंस

औपनिवेशिक संबंध ने आधुनिक शिक्षा की संभावना को भी खोल दिया. तब तक उपमहाद्वीप में उपलब्ध एकमात्र वैध शिक्षा ब्राह्मणवादी धर्मग्रंथों और कर्मकांडों के साधनों पर केंद्रित थीजो निचली जातियों के लिए निषिद्ध थी. गैर-ब्राह्मणवादी संप्रदायों के विचारों को कम आंका गया. औपनिवेशिक शिक्षा द्वारा शुरू किए गए मूल्य- विज्ञानअंग्रेजी भाषाआधुनिक न्यायशास्त्र और प्रगति की धारणा पर आधारित – इन्होंने उच्च जातियों की पुरानी मूल्य प्रणाली को विस्थापित करना शुरू कर दियाजो वेदोंधर्मशास्त्रोंसंस्कृत और जाति की श्रेणी पर आधारित थी.

औपनिवेशिक और मिशनरी शिक्षा का एक महत्वपूर्ण उत्पाद जोतिराव फुले थे, जो 1827 में महाराष्ट्र में उत्पीड़ित माली जाति के परिवार में पैदा हुए थे जो पारंपरिक रूप से बागवानी का काम करता था. फुले ने पुणे के स्कॉटिश मिशन हाई स्कूल से अंग्रेजी स्कूली शिक्षा प्राप्त की. उन्होंने पाया कि औपनिवेशिक शासन के कारण जातिगत क्रम में ऐतिहासिक ढंग से टूटन पैदा हो रही है जो एक क्रांतिकारी इत्तेफाक से कम नहीं थी. कोई मूर्ख ही उन अंग्रेजों को हमारी भूमि से दूर भगाने की उनकी सलाह को स्वीकार करेगा, जिन्होंने हमें भट- महाराष्ट्र के ब्राह्मणों -की गुलामी से बचाया है” फुले ने लिखा. “भगवान का शुक्र है कि उसने भट के विद्रोह को दबाने में बहादुर अंग्रेजों की मदद की.”

फुले के प्रगतिशील विवाद ने “आर्यन” प्रवचन को उसके ही हिमायतियों, जिनमें तिलक सबसे उल्लेखनीय थे, के खिलाफ मोड़ दिया. फुले ने कहा कि सवर्ण “आर्य” भारत के प्रतिनिधि और नेता होने के बजाय उत्पीड़क थे. उन्होंने आर्य प्रवासन सिद्धांत की व्याख्या की क्योंकि आर्य एक बाहरी शक्ति थे जिन्होंने भारत के मूल निवासियों पर विजय प्राप्त की थी. उन्होंने आर्यों के विषय में उनकी नस्लीय श्रेष्ठता या सभ्यता की ताक़त नहीं, बल्कि बर्बर अत्याचारियों के रूप में बात की. उन्होंने राम को भारत में आर्य विजय के प्रतीक के रूप में देखा और वेदों के विचारों पर हमला किया. अपनी पत्नी, सावित्रीबाई के साथ, फुले भारत के दलितों, शूद्रों और महिलाओं जैसे शोषित समुदायों की शिक्षा के प्रस्तावक बन गए. जाति और रूढ़िवाद के सभी रूपों के खिलाफ अपने बौद्धिक और संगठनात्मक कार्यों के माध्यम से, उन्होंने उपमहाद्वीप पर एक वास्तविक सामाजिक क्रांति के जन्म और विकास को गति दी.

फुले का सत्यशोधक समाज, उच्च-जाति द्वारा संचालित प्रार्थना समाज के समकालीन और आर्य समाज के बाद सबसे पहला समाज-सुधार संगठन था. इसकी स्थापना भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के पहले हुई थी और कांग्रेस के समय के आसपास यह एक जन आंदोलन बन गया. 1875 में सत्यशोधकों ने ‘दीन बंधु’ नाम के अखबार की शरुआत की.

ब्राह्मण राष्ट्रवाद के सबसे प्रतिष्ठित प्रतीक तिलक फुले के विरोधी बन गए. 1881 में, तिलक ने अपने अखबार केसरी की शुरुआत की. जब जोतिबा और सावित्रीबाई फुले महिलाओं की शिक्षा और समानता के शुरुआती प्रस्तावक थे, तिलक ने घोषणा की कि महिलाओं को सार्वजनिक स्थान से दूर रखना “हिंदुत्व” के लिए आवश्यक है. अकादमिक डोरोथी एम फिग्यूइरा लिखती है कि जब एक 11 वर्षीय लड़की के पति के खिलाफ मामला दर्ज किया गया कि वह लड़की “अपने से बहुत ज्यादा उम्र के पति के साथ संभोग के दौरान लगी चोटों के कारण मर गई,” तो तिलक ने उस व्यक्ति का बचाव किया और सहमति की उम्र बढ़ाने का विरोध यह कहकर किया कि लड़की शारीरिक रूप से विकृत थी और “प्राकृतिक तौर पर खतरनाक विचित्र ” जीवों में से एक थी. विद्वान परिमला राव ने 2008 के एक निबंध, “तिलक’स क्रिटिसिस्म ऑफ रुखमाबाई एंड रमाबाई” में समीक्षा की है कि इस उभरती अवधारणा में “हिंदू धर्म सभी व्यावहारिक उद्देश्यों से कुछ और नहीं बल्कि वर्णाश्रम धर्म ही था, महिलाओं को पुरुषों के आधीन रखा गया था और इसे बदलने के किसी भी प्रयास को खतरे की तरह देखा जाता था.” राव के अनुसार, तिलक के विचार के अनुकूल एक आज्ञाकारी बहू के रूप में एक हिंदू महिला “मुक्त और शिक्षित महिलाओं के सुधारवादी ख्याल के बिलकुल विपरीत थी. इसलिए, औपनिवेशिक शासन का राष्ट्रवादी मूल्यांकन पितृसत्तात्मक और जातिगत हितों से प्रेरित था.”

उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य से फुले ने भारत में हर उस सामाजिक तंत्र के निर्माण का विरोध किया जो जाति के आधार पर था और जिसका नेतृत्व ब्राह्मणों के हाथ में था. 1818 के बाद से ब्राह्मण पुनरुत्थानवादी संगठनों का मुख्य आधार बन गए थे, जिन्होंने निचली जाति की बढ़ती चुनौती के खिलाफ उच्च-जातियों की सत्ता को बनाए रखने की मांग की थी. फुले ब्राह्मण-प्रभुत्व वाले पुनरुत्थानवादी संगठन जैसे ब्रह्म समाज और विशेष रूप से हिंदू महासभा, जो पश्चिमी भारत में पैर जमाने की कोशिश कर रहे थे, को कमज़ोर करने में सफल रहे. फुले ने भोंसले वंश के शाहू, केशवराव जेडे और दिनकरराव जावलकर जैसे नेताओं को प्रभावित किया, जिन्होंने आगे चलकर महाराष्ट्र में गैर-ब्राह्मण आंदोलन का नेतृत्व किया.

आमतौर पर पेरियार के नाम से मशहूर रामासामी के नेतृत्व में, द्रविड़ आंदोलन ब्राह्मणवाद और धर्म के खिलाफ चला गया. जिसने अगली शताब्दी में तमिल नाडु की राजनीति को आकार दिया. विकीमीडिया कॉमंस

इतिहासकार रोजालिंड ओ हैनलोन ने 1985 में लिखा था कि, “यह फुले थे जिन्होंने लगभग अकेले ही अतीत की पुन: व्याख्याएं प्रदान की थीं, शक्तिशाली प्रतीकवाद और विशद कल्पना जिसे इस पहचान के वैचारिक पदार्थ का निर्माण करना था…अपनी आत्म चेतना के साथ, महाराष्ट्र के इतिहास और उसकी व्यापक सांस्कृतिक परंपराओं में अनूठी भूमिका के अपने विश्वास, और गैर-ब्राह्मण सामाजिक समूहों की एक बहुत व्यापक श्रेणी को एक साथ लाने की अपनी क्षमता, को लेकर इस पहचान को पुराने सामाजिक और सांस्कृतिक ढांचों से अलग हटकर, अपने तरीके से, क्रांतिकारी सामाजिक सुधार का एक साधन बनना था.”

केरल में, अय्यनकाली और सहोदरन अय्यप्पन निचली जातियों के प्रमुख नेताओं के रूप में उभरे. अय्यप्पन ने राष्ट्रवादी आंदोलन को एक उच्च-जाति की परियोजना बताते हुए उसका बहिष्कार किया और कहा, “मुझे राष्ट्रवादी होने पर शर्म आती है क्योंकि राष्ट्रवाद भ्रामक है और यह उच्च जाति के आधिपत्य को बनाए रखने की एक रणनीति है.”

उपमहाद्वीप के इतिहास के एक बड़े दौर में प्रमुख उच्च जातियों ने ख़ुद को और दूसरों को अपने धर्म से नहीं बल्कि अलग-अलग जातियों से पहचाना है, आज बढ़ते जातिगत अत्याचार दर्शाते हैं कि यह तथ्य बदला नहीं हैं.

गैर-ब्राह्मण आंदोलन मद्रास प्रेसीडेंसी में जस्टिस पार्टी के रूप में उभरी. यह द्रविड़ आंदोलन का अग्रगामी दौर था. द्रविड़ आंदोलन ने भी, “हिंदू धर्म” के निर्माण को भारतीय उपमहाद्वीप के विभिन्न उत्पीड़ित लोगों पर उच्च-जाति “आर्यन” के बढ़ते दबाव के तौर पर देखा. ईवी रामासामी पेरियार के नेतृव में ब्राह्मणवाद और धर्म के खिलाफ आंदोलन चल गया. यह आंदोलन आने वाली सदी में राज्य की राजनीति को आकार देने वाला था.

औपनिवेशिक संस्कृति से आकस्मिक भेंट के विषय पर दलित समुदाय के लोगों और बुद्धिजीवियों के चौंकाने वाले विशिष्ट दृष्टिकोण पर कभी पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है और उनके इतिहास को आधुनिक काल की राजनीतिक समझ के हाशिए पर डाल दिया गया.

बीसवीं सदी की शुरुआत में, राजनीति में जाति उत्पीड़न और जातियों का जनसांख्यिकीय वितरण केंद्रीय प्रश्न बन गया. आपने आप को अल्पसंख्यक पाए जाने पर उच्च जातियों को एक अभूतपूर्व धक्का लगा. उस समय, किसी चीज़ को धर्म के रूप में पहचाने जाने के लिए, उसे राज्य द्वारा मान्यता प्राप्त करने के साथ-साथ पहले से ही एक बड़ी आबादी के “आध्यात्मिक जीवन” को दर्शाने की आवश्यकता थी. “हिंदू” धर्म का वास्तविक जीवन, तब, औपनिवेशिक प्रशासन के जनगणना कार्यों के साथ शुरू हुआ, जिसके माध्यम से इसने राज्य की गिने जाने वाली श्रेणियों में प्रवेश किया.

1872 से, अंग्रेज अधिकारीयों द्वारा किसी भी समझौते पर पहुंचे बगैर “हिंदू” शब्द का उपयोग उपमहाद्वीप के लोगों को वर्गीकृत करने के लिए जनगणना कार्यों में किया जाने लगा था. सर्वेक्षण की गई आबादी को “धर्म” के तहत चुनने के लिए पांच विकल्पों की पेशकश की गई थी – बौद्ध, ईसाई, हिंदू, मुस्लिम और अन्य. जनगणना अधिकारी उपमहाद्वीप पर धार्मिक प्रथाओं में भिन्नता के बारे में जानते थे, और इस तथ्य से हैरान थे कि अधिकांश भारतीयों को, जब उनके धर्म के बारे में भरने के लिए कहा गया था,तब उन्होंने अपनी जाति या स्थानीय समुदाय का नाम भरा था.

इस बात की पहचान करने के लिए कि “हिंदू” होने की श्रेणी में कौन शामिल होंगे गणना करने वाले अधिकारियों ने मापदंडों की एक चेकलिस्ट तैयार की, लेकिन सभी प्रांतों से मिले जवाबों ने उनकी प्रारंभिक धारणा को खारिज कर दिया कि विश्वासों की एक विशाल विविधता, पूजा करने के विभिन्न तरीके और खुद की अलग पहचान वाले समुदाय किसी तरह से भी मिलकर एक संयुक्त, सजातीय धर्म का गठन करते थे. पूर्व के तथाकथित “हिंदू” मांस के बजाय सब्जियों को पसंद करते थे, लेकिन और जगहों पर वे शौक से मांसाहार करते थे. कुछ एक भगवान की पूजा करते थे और कुछ कई भगवानों की पूजा करते थे. कुछ की पहुंच ब्राह्मण पुजारियों तक थी, कुछ के पास अपनी जाति के ही पुजारी थी और कुछ ऐसे भी थे जिन्हें किसी पुजारी की जरुरत नहीं थी. कुछ “हिंदू” अपने मृतकों को दफनाने में विश्वास रखते थे और कुछ अपने मृतकों को जला दिया करते थे. कुछ ऐसे भी “हिंदू” देवता थे जो कुछ और “हिंदुओं” द्वारा अपवित्र माने जाते थे. जनगणना के अधिकारी इस बात से चिंतित थे कि इससे धार्मिक श्रेणियों में असाधारण तौर से बढ़ौतरी हो जाएगी, जिसने इसके अलावा जाति श्रेणियों में दोहराव आ जाएगा.

चेकलिस्ट के मापदंडों की परिकल्पना ब्राह्मणवादी दृष्टिकोण से की गई थी. जब मापदंडों को सीमित और विशेष बिणुओं पर केद्रित किया गया कि कौन “हिंदू” है, तो बड़ी संख्या में लोगों “हिंदू” के बजाय “अन्य” की श्रेणी मैं आ गए.

जनगणना के दौरान उत्तरदाताओं द्वारा दिए गए जवाबों में कई अलग-अलग धर्म सामने आने लगे – उदाहरण के लिए, मैसूर की जनगणना में शैवों, माधवचारियों, लिंगायतों, स्वामी नारायण, रामानुज, वल्लभाचार्य, ब्रिजमार्गी और कबीर पंथियों की मौजूदगी का पता चला, जबकि कूर्ग की जनगणना से पता चला कि कई लोगों ने खुद को “हिंदू” होने के बजाय श्रीवैष्णव, वैष्णव, जैन, बौद्ध, कूर्ग, ब्राह्मण, स्मार्ता और शैव घोषित किया.

तो इस असहज जानकारी के बावजूद कि वे पूरी तरह से सुनिश्चित करने में अमसर्थ रहे थे कि आखिर असली “हिंदू” होते कौन हैं, जनगणना अधिकारी इस शब्द का प्रयोग आगे भी करते रहे. और फिर भी, उन्होंने माना कि 1872 की पहली जनगणना “हिंदू” धर्म को उसके विशेष लक्षणों और विशिष्ट सदस्यता के आधार पर एक धर्म की श्रेणी के तौर पर स्थापित करने में असफल रही.

उन्होंने 1872 की बंगाल की जनगणना रिपोर्ट में हेनरी बेवरली के शब्दों में स्वीकार किया कि “हिंदू ‘शब्द का उपयोग सरल मायनों में गैर-मुसलमान या किसी अन्य धर्म के मानने वालों के लिए किया जाता है.” “हिंदू” नाम जनगणना अधिकारियों द्वारा सुविधाजनक पाया गया था क्योंकि यह नकारने के लिए एक बेहतर कारक था.

नकारात्मक अवधारणाएं यह निर्दिष्ट करने के अलावा बहुत कुछ नहीं करती हैं कि कुछ एक निश्चित प्रकार का नहीं है. उदाहरण के लिए, यदि हर उस वस्तु को “जो गाय नहीं है” हम “न-गाय” की श्रेणी में रख दें तो पुस्तकों, आकाशगंगाओं, गाय के गोबर और द बीटल्स सबको हम “न-गाय” के तौर पर संदर्भित कर सकते हैं. एक नकारात्मक अवधारणा के रूप में, “हिंदू” उन लोगों को चिह्नित करने के उद्देश्य में मददगार साबित हुआ जो ईसाई, यहूदी या मुसलमान नहीं थे. हालांकि, इस समूह के लिए एक सामान्य विशेषता खोज पाना असंभव था, ठीक वैसे, जैसे आज भी है. हम आज भी इस नकारात्मक अवधारणा की खास शक्ति को हिंदू धर्म के विस्तार में देख सकते है, जिसका मानना है कि यदि जीवन का कोई भी पहलू कानून के तहत परिभाषित नहीं किया जा सकता है तो उसे हिंदू करार देकर उस पर अधिकार हासिल किया जा सकता है.

बाद की जनगणना में भी स्थिति वैसी ही बनी रही. “हिंदू” शब्द की अर्थहीनता पर पंजाब के 1881 की जनगणना आयुक्त डेन्ज़िल इबेलस्टन द्वारा निकाली गई “भड़ास” को 2005 के एक निबंध में, समाजशास्त्री माइकल हान ने दूसरे शब्दों में बताया.

मैदानों में रहने वाले हिंदू अपने मुसलमान पड़ोसियों के संतों की पूजा करते थे; पहाड़ियों में बसे हिंदू आदिवासियों द्वारा पूजे जाने वाले शैतान और देवताओं की पूजा करते थे; किसानों के कनिष्ठ देवताओं को शुद्ध और अशुद्ध की श्रेणियों में बाँट दिया गया था. हिन्दुओं के कई देवता वास्तव में क्षेत्रीय थे, जिन्हें भारत के एक हिस्से में ही पूजा जाता था.

जनगणना अधिकारियों ने एक श्रेणी को गैर-मुसलमान, गैर-ईसाई और गैर-बौध पर थोप दिया इस जानकारी के बावजूद कि वह किसी एक धर्म का प्रतिनिधत्व नहीं करती थी बल्कि उसके लचीलेपन के कारण बड़े पैमाने पर विविध लोगों को उसके दायरे में रखा जा सकता था लेकिन दूसरे श्रेणी के धर्मों में इसकी इजाजत नहीं थी.

1890 के दशक में, कई उच्च-जाति के भारतीयों को इस नए धर्म के बारे में पता चला, जिसका इस्तेमाल उन्हें नामित करने के लिए किया जा रहा था. आर्य समाज ने इस म्लेच्छ शब्द के खिलाफ अपने अखबार में एक अभियान चलाया और जनगणना कार्यों से इसे हटाने की मांग की. उन्हें यह सही ढंग से समझ में आ गया था कि “हिंदू” एक अपमानजनक तमगा था जो उन भारतीयों को दिया गया था, जिन्हें एक निश्चित धार्मिक समूह के साथ नहीं पहचाना जा सकता था.

जिस तात्कालिक आवश्यकता ने आर्य समाज के मन को “हिंदू” के विषय में बदलने पर मजबूर किया और उसके पीछे कांग्रेस और अन्य संगठनों के उच्च-जाति के नेताओं को जुटाया, वह सांख्यिकीय था – अल्पसंख्यक के रूप में उजागर होने की संभावना.

जनगणना के आंकड़े का असर सवर्णों और उनके संगठनों पर नहीं नजर आता अगर कांग्रेस अंग्रेज औपनिवेशिक प्रशासन द्वारा लागू किए गए चुनाव सुधारों और आधुनिक न्यायिक प्रथाओं में हिस्सा नहीं लेती.

निर्वाचित स्थानीय शासन की संरचना जो पूरे उपनिवेश में लागू की जा रही थी इसका मतलब था कि बहुसंख्यक निचली जातियां, जो अब लामबंद होने लगी थीं, सदियों में पहली बार के उपमहाद्वीप के शासन में कम से कम एक समान भूमिका निभाने जा रहीं थीं.

सत्ता के संतुलन को दूसरी ओर जाने से रोका जा सकता है बशर्ते बहुसंख्यक निचली जाति का ध्यान इस सांख्यिकीय खुलासे से भटका दिया जाए और औपनिवेशिक कानून के प्रशासनिक प्रावधानों के तहत उच्च जातियों की तरह ही एक श्रेणी के रूप में बरकरार रख उन्हें सवर्णों के अधीन कर दिया जाए.

1901 की जनगणना के मद्देनजर, कुछ मुसलमान संगठनों ने मुसलमानों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र की मांग की. 1906 में, एक और मुसलमान प्रतिनिधिमंडल ने “सरकारी रोजगार में आनुपातिक हिस्से, नगरपालिका बोर्डों और न्यायिक पदों में प्रतिनिधित्व, और विश्वविद्यालय की प्रबंधकारिणी समिति और सभा में सीटें, संक्षेप में सम्पूर्ण सरकारी नियुक्तियों में रोजगार पाने की मांग रखी.” 1909 के मिंटो-मॉर्ले सुधार ने मुसलमानों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र आरक्षित कर दिए. “मुसलमानों को अलग से निर्वाचन क्षेत्र देकर, जिसमें सिर्फ़ वे अपने मताधिकार का उपयोग कर सकते थे, अल्पसंख्यकों के मन में सांप्रदायिक निर्वाचन क्षेत्र का ख्याल बिठा दिया गया जो इस बात को लेकर पहले से ही चिंतित थे कि यदि भविष्य में हिंदू समुदाय की प्रमुख जाति द्वारा चलाई जाने वाली सरकार में उन्हें दमन का सामना करना पड़ेगा.” एलेनोर ज़ेलियट ने “डॉ. अंबेडकर एंड द महार मूवमेंट” में लिखा है.

1911 की जनगणना से पहले, औपनिवेशिक सरकार के जनगणना आयुक्त एडवर्ड अल्बर्ट गैट ने इस समस्या का समाधान करने का फैसला किया कि किन लोगों को “हिंदू” के रूप में गिना जाए. उन्होंने विभिन्न प्रांतों के पुलिस अधीक्षकों को एक परिपत्र जारी किया.

यह दस्तावेज एक कोशिश थी उन मापदंडों को तय करने की जिसका इस्तेमाल करके यह निर्धारित किया जा सके कि कोई शख्स असली हिंदू है या नहीं.” इसमें अधीक्षकों से उन जातियों की सूची तैयार करने का आदेश था जो ब्राह्मणों के वर्चस्व को नकारती हैं, जो वेदों के प्रभुत्व को खारिज करती हैं, “हिंदू देवताओं” की पूजा नहीं करती हैं, जिनकी पुजारियों के तौर पर ब्राह्मणों तक पहुँच नहीं है, जिन्हें ऊंची जातियों द्वारा अछूत समझा जाता है, जिन्हें मंदिरों में प्रवेश करने की अनुमति नहीं है, जो अपने मृतकों को दफनाते हैं, गोमांस खाने वाले समुदाय और गाय की पूजा न करने वाली जातियां. 1911 की जनगणना में प्रकाशित किए गए परिणामों से पता चला कि, हालाँकि, उच्च जातियों, खासतौर पर ब्राह्मणों की जीवन शैली और प्रथाएं व्यापक भौगोलिक दूरियों के बावजूद, कमोवेश एक सी थी लेकिन एक बहुत बड़ी आबादी से बिलकुल मेल नहीं खातीं थी जिन्हें “हिन्दुओं” के तौर पर गिना जा रहा था.

“मध्य प्रांतों और बरार में हिंदू होने की श्रेणी में मौजूद एक चौथाई लोगों ने ब्राह्मणों का वर्चस्व और वेदों का प्रभुत्व मानने से साफ इनकार कर दिया.” 1911 की जनगणना में दर्ज किया गया.

“एक चौथाई महान हिंदू देवताओं की पूजा नहीं करते हैं, और प्रतिष्ठित ब्राह्मण पुजारियों द्वारा उनके अनुष्ठान नहीं किए जाते हैं; एक तिहाई लोग मंदिरों में प्रवेश करने से वंचित हैं; एक चौथाई ऐसे हैं जिनका स्पर्श प्रदूषण का कारण बनता है; एक सातवें अपने मृतकों को दफनाते हैं, जबकि आधे ऐसे हैं जो शव को जलाना अनिवार्य नहीं मानते; और दो-पाँचवें गोमांस खाते हैं.”

इन निष्कर्षों का विरोध कांग्रेस, आर्य समाज से लेकर सनातन धर्म सभा तक के विभिन्न प्रमुख-जाति के नेताओं और समूहों ने एकजुट होकर किया.

1911 की जनगणना में की गई टिप्पड़ियों का ऊंची जातियों पर क्या असर हुआ इस पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है. “एक सवाल जो वर्तमान समय में हिंदू धर्म को परेशान कर रहा है, वह यह है कि क्या इन [अछूत] वर्गों को हिंदू के रूप में गिना जाना चाहिए या नहीं,” थॉमस होल्डरनेस, एक ब्रिटिश सिविल सेवक, ने 1912 में अपनी किताब “पीपुल्स एंड प्रॉब्लम्स ऑफ इंडिया” में लिखा था. “ दस साल पहले, इस सवाल का जवाब पुरजोर तरीक़े से इनकार की शक्ल में होता. आज भी देश की रूढ़िवादी भावना उनके बहिष्कार की वकालत करती हैं.”

1915 में आर्य समाज के नेता लाला लाजपत राय ने भी परिपत्र के प्रभाव के बारे में लिखा था और जनगणना के महत्व के बारे में टिप्पणी की थी, “जनगणना विभाग की चेतावनी से शोषित वर्गों के हिंदू बनने से होने वाले खतरे को हटा दिया गया था”

1915 में आर्य समाज के नेता लाला लाजपत राय ने भी परिपत्र के प्रभाव के बारे में लिखा था और जनगणना के महत्व के बारे में टिप्पणी करते हुए कहा कि ” हिंदू धर्म से शोषित वर्गों को ज

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