HOME डॉ. बी. आर. अंबेडकर और भगत सिंह के चिंतन में तुलनात्मक अध्ययन

डॉ. बी. आर. अंबेडकर और भगत सिंह के चिंतन में तुलनात्मक अध्ययन

5

समाज वीकली यू के

डॉ. ममता कुमारी
असिस्टेंट प्रोफेसर राजनीति विज्ञान विभाग
राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय
अंबाला कैंट

शोध पत्र :- डॉ. बी. आर. अंबेडकर और भगत सिंह के चिंतन में तुलनात्मक अध्ययन 

आलेख सार :- डॉ. भीमराव अंबेडकर (14 अप्रैल 1891 – 6 दिसंबर 1956)
डॉ. अंबेडकर की पहचान भारत में संविधान निर्माता व दलितों के मसीहा के रूप में सर्वविदित है । डॉक्टर अंबेडकर को यहां तक सीमित करना उनके महान व्यक्तित्व के साथ अन्याय होगा ।
भगत सिंह (28 सितंबर 1907 – 23 मार्च 1931)
भगत सिंह की पहचान एक क्रांतिकारी, देशभक्त, स्वतंत्र सेनानी, के रूप में की गई । जबकि भगत सिंह एक महान विचारक थे । भगत सिंह ने अपने लेखों व जेल डायरी ने अपने विचारों को बड़े ही जिम्मेदारी व परिपक्वता से व्यक्त किए हैं ।
शोधार्थी ने अपने शोध पत्र में डॉ. अंबेडकर और भगत सिंह के चिंतन में तुलनात्मक अध्ययन करने का प्रयास किया है ।
प्रमुख शब्द :- शिल्पीकार, वास्तुकार, वर्ण व्यवस्था, जाति उन्मूलन, पाखंड, अंधविश्वास, क्रांतिकारी, पथ प्रदर्शक
डॉ. भीमराव अंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1891 महार जाति के एक सैनिक परिवार में हुआ । मध्य प्रदेश के महू ग्राम में हुआ । उनके पिता का नाम रामजी राव मालोजी अंबेडकर व माता का नाम भीमाबाई था । डॉक्टर आंबेडकर का संपूर्ण जीवन संघर्ष व तिरस्कार से भरा हुआ था । डॉ भीमराव अंबेडकर, भारत के संविधान निर्माता विश्व के महान विद्वानों व समाज सुधारकों में इनका नाम बड़े ही सम्मान से लिया जाता है । अंग्रेजों ने तो भारत में सिर्फ 250 वर्ष शासन किया परंतु भारत में दलित, शोषित वर्ग व महिलाओं का शोषण तो सदियों से हो रहा था । अंग्रेजों से तो मुक्ति कैसे मिले इस विषय में सब चिंतित थे, परन्तु समाज के दलित, शोषित, कमजोर पिछड़े वर्ग का उद्धार कैसे हो इसकी आवश्यकता किसी को न तो तब थी और न ही आज है ।

भारतीय समाज में व्याप्त वर्ण व्यवस्था के अनुसार डॉक्टर अंबेडकर का जन्म चौथे वर्ण में हुआ । डॉ अंबेडकर ने शिक्षा के महत्व को समझा और विश्व में शिक्षा प्राप्ति के क्षेत्र में एक मिसाल कायम की । डॉ. भीमराव अंबेडकर ने अपने जीवन काल में 64 विषयों पर विस्तार पूर्वक लिखा है डॉक्टर अंबेडकर का मानना था कि समाज में व्याप्त बुराइयों का अंत केवल शिक्षा के माध्यम से ही किया जा सकता है । डॉ अंबेडकर का मानना था कि “शिक्षा शेरनी का दूध है जो पिएगा वह दहाड़ेगा.” अंबेडकर भारतीय संविधान सभा की प्रारूप समिति के अध्यक्ष, भारतीय संविधान के शिल्पकार, प्रसिद्ध अधिवक्ता, अर्थशास्त्री, समाज सुधारक, स्वतंत्र व निर्भीक पत्रकार, पुस्तक कीट, राजनेता, स्वतंत्र भारत के प्रथम कानून मंत्री, सामाजिक क्रांतिकारी, पथ प्रदर्शक, प्रत्येक संघर्षशील के प्रेरणा स्रोत थे ।

भगत सिंह (28 सितंबर 1907) डॉ. आबेडकर से 16 वर्ष छोटे थे । उनका जन्म एक प्रतिष्ठित किसान परिवार में हुआ था । उन्हें जाति प्रथा का वह दंश नहीं झेलना पड़ा जो डॉ. अंबेडकर को झेलना पड़ा था परंतु सक्रिय क्रांतिकारी आंदोलन में भाग लेने के कारण जेल में यातनाएं सही । भगत सिंह की पिछली तीन पीढ़ियां स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय थी । इसलिए भगत सिंह की पारिवारिक स्थिति काफी अव्यवस्थित थी । भगत सिंह के पिता सरदार किशन सिंह का जेल में आना जाना लगा रहता था । भगत सिंह के चाचा सरदार अजीत सिंह 38 वर्ष देश की स्वतंत्रता के लिए विदेशों में ख़ाक छानते रहे । भगत सिंह के छोटे चाचा सरदार स्वर्ण सिंह मात्र 23 वर्ष की आयु में जेल की यातनाएं सहकर शहीद हो गए । भगत सिंह अपनी पारिवारिक परिस्थितियों व गांधी जी की अहिंसात्मक नीतियों से क्षुब्ध होकर सक्रिय क्रांतिकारी दल के सदस्य बने । भगत सिंह को भी स्वतंत्रता सेनानी व क्रांतिकारी तक सीमित कर देना उनके बहुआयामी व्यक्तित्व के साथ अन्याय होगा ।

भगत सिंह भी पढ़ने व लिखने बहुत अधिक शौकीन थे । ”भगत सिंह अपने लेख मैं नास्तिक क्यों हूं ? में लिखते हैं इस समय (सन्-1926 के अन्त) तक मैं केवल एक ‘रोमान्टिक आदर्शवादी क्रान्तिकारी’ था । अब तक हम दूसरों का अनुसरण करते थे । अब अपने कन्धों पर ज़िम्मेदारी उठाने का समय आया था । अध्ययन’ की पुकार मेरे मन के गलियारों में गूँज रही थी – विरोधियों द्वारा रखे गये तर्कों का सामना करने योग्य बनने के लिये अध्ययन करो । जब भगत सिंह को फांसी के लिए ले जाने के लिए जेल अधिकारी आए उस समय भी भगत सिंह लेनिन का जीवन चरित्र पढ़ रहे थे ।

डॉ. अंबेडकर व भगत सिंह में वैचारिक समानता ।
स्वतंत्रता पर विचार :-
डॉ. अंबेडकर का मानना था कि स्वतंत्रता के साथ-साथ सामाजिक सुधार भी बहुत आवश्यक है और उन्होंने सामाजिक सुधारों के लिए अंग्रेजों का सहयोग किया 28 जुलाई 1928 में डॉक्टर अंबेडकर ने मातृत्व अवकाश के लिए कानून बनवाया । अंबेडकर अनुसूचित जाति के लोगों को ठोस वैधानिक सुरक्षा प्रदान करने के प्रबल समर्थक थे। वे लंदन में तीनों गोलमेज सम्मेलन में दलितों के एकमात्र प्रतिनिधि थे जहाँ उन्होंने दलितों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र की माँग की थी। यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि बाद में अंबेडकर ने यह सुनिश्चित किया कि अनुसूचित जाति के लोगों के कल्याण की गारंटी 1949 के भारतीय संविधान में विधायी, रोजगार और शैक्षिक क्षेत्रों में आरक्षण के रूप में दी जाए । डॉ. अंबेडकर के अनुसार, स्वतंत्रता का अर्थ केवल राजनीतिक स्वतंत्रता से परे है, बल्कि सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक स्वतंत्रता भी है, जो सभी के लिए समान अधिकार और अवसर सुनिश्चित करती है. डॉक्टर अंबेडकर पहले व्यक्ति थे जिन्होंने तीनों गोलमेज सम्मेलन में भाग लिया और वहां पर उन्होंने दलितों के लिए अलग प्रतिनिधि की मांग की । मजदूरों व कामगारों के लिए काम के घंटे निश्चित करवाना ।
भगत सिंह अपने लेख ‘क़ौम के नाम संदेश’ में लिखते हैं स्वतंत्रता प्राप्ति तो हमारा पहला उद्देश्य है परंतु अंतिम उद्देश्य हर प्रकार के शोषण से मुक्ति है । भगत सिंह का माना था कि स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात जो अधिकार भारतीयों को मिलेंगे क्या वे आम नागरिकों के लिए भी उसी प्रकार होंगे जिस प्रकार देश के शक्तिशाली वर्ग के लिए होंगे ? यह भारत की स्वतंत्र होगी ? कहीं ऐसा तो नहीं है कि यह सिर्फ सत्ता का हस्थानांतरण बनकर रह जाए । भगत सिंह मानते हैं ऐसी स्वतंत्रता का कोई औचित्य नहीं जिसमें मुट्ठी भर लोग राज करें और बाकी जनता अपनी आधारभूत जरूरतों के लिए संघर्ष करें । यह एक राजनीतिक हस्तांतरण होगा वास्तविक स्वतंत्रता नहीं ।

आर्थिक विचार : –
डॉ अंबेडकर एक विश्व प्रसिद्ध अर्थशास्त्री रहें हैं । अंबेडकर राजनीतिक समानता के साथ-साथ आर्थिक व सामाजिक समानता की भी पैरवी करते हैं । डॉ आंबेडकर की किताब “रुपए की समस्या – उसका उद्भव और प्रभाव,” और “भारतीय चलन व बैंकिंग का इतिहास” 1935 में हिल्टन यंग के समक्ष साक्ष्य सहित प्रस्तुत उनके विचारों के आधार पर 1 अप्रैल 1935 को रिजर्व बैंक की स्थापना हुई । ब्रिटिश भारत में प्रांतीय वित्त आयोग बना । सन 1945 में उन्होंने जल नीति व देश की औद्योगिकरण की आर्थिक नीतियां, नदियों को जोड़ना जैसे हीराकुंड बांध, दामोदर घाटी परियोजना, सोन नदी घाटी परियोजना, राष्ट्रीय जलमार्ग, केंद्रीय जल व विद्युत प्राधिकरण बनाने के मार्ग प्रशस्त किया । बड़े बांधों वाली तकनीकों को भारत में लागू करने प्रस्तावित किया ।

भगत सिंह मार्क्सवाद से प्रभावित थे । भगत सिंह पर कार्ल मार्क्स व लेनिन का इतना अधिक प्रभाव पड़ चुका था कि पूंजीवाद को मानवता का सबसे बड़ा दुश्मन मानने लगे थे । भगत सिंह पूंजीपतियों को “पिशाच” का नाम देते हैं भगत सिंह पूंजीवाद के कट्टर विरोधी, मजदूर और किसान वर्ग के समर्थक थे । भगत सिंह ने असेंबली में जो बम फेंका था वह भी मजदूरों के हितों में फेंका था क्योंकि वह नहीं चाहते थे कि मजदूर विरोधी विधेयक पारित हो । भगत सिंह अपनी जेल डायरी में बाल मजदूरी, भिक्षावृत्ति, असहाय मजबूर व टैक्स के जुल्मों सितम जी बात करते हैं । भगत सिंह अपने लेख में विलियम डिग्वी की प्रशंसा करते हैं जिन्होंने भारत में आर्थिक सुधार के विषय में महत्वपूर्ण सुझाव दिए ।

सामाजिक विचार :-
डॉक्टर अंबेडकर समाज में व्याप्त जाति प्रथा के सख्त खिलाफ थे । छोटी जाति में जन्म लेने के कारण हमेशा ही तिरस्कार का सामना किया उन्होंने यह महसूस किया उच्च शिक्षा प्राप्ति के पश्चात भी उन्हें सम्मान नहीं मिला क्योंकि हमारे समाज में जाति प्रथा की जड़ें बहुत गहरी हैं और वह जाति प्रथा को जड़ से खत्म कर देना चाहते थे महात्मा गांधी के द्वारा अस्पृश्यता का विरोध करते हुए दलितों को ’हरिजन’ शब्द से संबोधित किया. स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात “नेशनल शेड्यूल्ड कास्ट कमीशन” ने दलित शब्द को असंवैधानिक माना. डॉ. अंबेडकर एक समाज सुधारक तथा महिला सशक्तिकरण के अग्रदूत थे. डॉ. अंबेडकर की जातिवाद और वर्ण व्यवस्था से संबंधित विश्व प्रसिद्ध पुस्तक “जाति का उच्छेद” (एनीहिलेशन ऑफ कास्ट, 1937) है. जातिवाद और वर्ण व्यवस्था के संबंध में उनकी अन्य पुस्तकें ‘भारत में जातियां और उनका मशीनीकरण (1916)’, ‘श्री गांधी एवं अछूतों की विमुक्ति’ (1942), ‘कांग्रेस और गांधी ने अछूतों के लिए क्या किया’? (1945), ’अछूत कौन और कैसे?’ (1948) मुख्य हैं. डा.अंबेडकर के अनुसार ‘छुआछूत गुलामी से भी बदतर है’. जातिवाद और वर्ण व्यवस्था के कारण उत्पन्न अस्पृश्यता को संकुचित, अमानवीय, अवैज्ञानिक, अनैतिक, विभाजक तथा संकीर्ण माना है. डॉ अंबेडकर ने संवैधानिक तरीके से जाति प्रथा को समाप्त करने का प्रयास किया संविधान में समानता का अधिकार समानता के अधिकार का प्रबंध करके भगत सिंह ने भी “अछूत का प्रश्न” अपने लेख में जाति प्रथा का विरोध किया है । ” काकीनाडा में 1923 में कांग्रेस अधिवेशन हुआ मोहम्मद अली जिन्ना ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा आजकल कि अनुसूचित जातियों को जिन्हें इन दिनों अछूत कहा जाता है हिंदू या मुस्लिम मिशनरी संस्थाओं में बांट देने का सुझाव दिया हिंदू व मुस्लिम वर्ग भेद को पक्का करने के लिए धन देने को तैयार थे 30 करोड़ में से छह करोड़ अछूत है इनके द्वारा कूंए का पानी निकाल लेने से कूंआ अपवित्र हो जाएगा यह सवाल बीसवीं शताब्दी में किए जा रहे हैं जिन्हें सुनते ही शर्म आती है भगत सिंह आगे लिखते हैं एक कुत्ता निश:क रसोई में घूम सकता है परंतु एक दलित की परछाई से भी अपवित्र हो जाते हैं । भगत सिंह का मानना था ईश्वर ने सभी मनुष्य को समान बनाया है हमें उनमें भेदभाव करने का क्या अधिकार है ? ईश्वर को मानते हो परंतु ईश्वर के बनाए हुए नियमों को नहीं मानते । भगत सिंह देश की स्वतंत्रता ना देख सके और उन्होंने अपने लेख एवं व्यवहार से जाति प्रथा को खत्म करने का प्रयास किया भगत सिंह जाते जाते ही जाति प्रथा को खत्म करने का संदेश देकर गए ।

धर्म पर विचार :-
व्यक्ति ने अपने-अपने संप्रदाय के आधार पर धर्म को अलग-अलग नाम दे दिया है . “इन्हीं नामों के आधार पर भारत में 8 धर्म पाए जाते हैं हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध, पारसी आदि . 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में विभिन्न धर्म का आंकड़ा से इस प्रकार है हिंदू – 79.80% (96.62 करोड़), मुसलमान – 14.23% (17.22 करोड़), ईसाई – 2.30% (2.78 करोड़), सिख – 1.72% (2.08 करोड़), बौद्ध – 0.70% (84.43 लाख), जैन – 0.37% (44.52 लाख), अन्य धर्म – 0.66% (79.38 लाख)” . सभी धर्मों में जो एक सामान्य भावना मानव कल्याण है । एक सर्वशक्तिमान ईश्वर जिसे व्यक्ति अलग-अलग नामों से जानता है, और व्यक्ति के अनुसार इस ने सृष्टि का निर्माण किया है . वास्तविकता यह तो है कि इस परमात्मा ने धर्मों को नहीं बनाया . परमात्मा ने सृष्टि के निर्माण में किसी प्रकार का कोई भेदभाव नहीं किया ।

डॉक्टर अंबेडकर ने धर्म के नाम पर होने वाले पाखंड व अंधविश्वास का विरोध किया उनका मानना था कि धर्म व्यक्ति को कर्म हीन बनाता है डॉक्टर अंबेडकर ने धर्म को नहीं नकारा अगर वह धर्म के विरोधी होते तो बौद्ध धर्म को ना अपनाते वह धर्म के नकारात्मक रूप के विरोधी थे । अंबेडकर ने 13 अक्टूबर 1935 को एक घोषणा की. जिसमें उन्होंने कहा कि वो हिंदू धर्म छोड़ने का निर्णय ले चुके हैं. डॉ अंबेडकर का कहना था, मुझे वह धर्म पसंद है जो स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व सिखाता है, क्योंकि एक व्यक्ति के विकास के लिए तीन चीजों की आवश्यकता होती है जो करुणा, समानता और स्वतंत्रता है. धर्म मनुष्य के लिए है न कि मनुष्य धर्म के लिए. उनके मतानुसार जाति प्रथा के चलते हिंदू धर्म में इन तीनों का ही अभाव था .

भगत सिंह अपने लेख “मैं नास्तिक क्यों हूं ?” में लिखते हैं धर्म के पाखंड अधविश्वास पर अपने विचार देते हैं । भगत सिंह ने “अराजकतावाद” पर एक लेख माला शुरू की जिसमें भगत सिंह कहते हैं कि सकारात्मक रूप में सभी धर्म स्वीकार्य हैं ऐसा धर्म जो नफरत फैलाए लोगों को बांटने का काम करें ऐसे धर्म को सिरे से नकार देना चाहिए । सभी धर्मों की आधारभूत बातें सच बोलना चोरी ना करना दूसरों की सेवा करना इस रूप में सभी धर्म स्वीकार्य हैं । भगत सिंह के चिंतन के अनुसार धर्म और भगवान भूत की तरह है . उन्होंने आगे लिखा है . भूत का नाम लेते ही मनुष्य भयभीत हो जाता है अतः धर्म और भगवान मनुष्य को भयभीत करने के लिए हैं क्योंकि यूरोप में इन भूतों के विरुद्ध विद्रोह हुआ था इसलिए आज यूरोपीय शासक वर्ग की श्रेणी में आते हैं । भगत सिंह लिखते हैं हमें अपने दकियानूसी विचार तबाह कर रहे हैं और प्रभु को पाने के लिए आत्मा परमात्मा के विलाप में फंसे हुए हैं

गांधीजी से संबंध : –

डॉक्टर अंबेडकर व गांधीजी के विचारों में मतभेद था जहां गांधीजी वर्ण व्यवस्था का समर्थन करते हैं वह अंबेडकर वर्ण व्यवस्था के खिलाफ हैं . गांधीजी महिलाओं को अंग्रेजी भाषा सीखने की समर्थन में नहीं है वही अंबेडकर महिलाओं को हर प्रकार का अधिकार देने के पक्षधर है गांधीजी विशुद्ध धार्मिक प्रवृत्ति के थे । वहीं अंबेडकर धर्म के नकारात्मक रूप को सिरे से नकारते हैं । महात्मा गांधी और डॉ. भीमराव अंबेडकर के बीच 24 सितंबर 1932 को पूना पैक्ट हुआ, क्योंकि गांधीजी ने दलितों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र (कम्युनल अवार्ड) के ब्रिटिश सरकार के फैसले के खिलाफ आमरण अनशन किया था, और अंबेडकर ने दलितों के लिए बेहतर प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए इस समझौते पर हस्ताक्षर किए.

भगत सिंह गांधीजी की अहिंसात्मक नीतियों के विपरीत सक्रिय क्रांतिकारी आंदोलन में शामिल होते हैं । हिंसक गतिविधियों में भाग लेते हैं । भगत सिंह अपने लेखों में गांधी जी की कई बार आलोचना कर चुके हैं । भगत सिंह लिखते हैं गांधी जी ने खिलाफत आंदोलन का साथ देकर धार्मिक कट्टरता को बढ़ावा दिया ।

निष्कर्ष

भले ही डॉक्टर अंबेडकर व भगत सिंह के विचार गांधीजी से नही मिलते हो परंतु यह विचारों का मतभेद था, मनभेद नहीं दोनों ही गांधी जी का सम्मान करते थे व राष्ट्रीय आंदोलन में गांधी जी की भूमिका के महत्व को स्वीकार करते थे । डॉ भीमराव अंबेडकर व शहीद-ए- आजम भगत सिंह इस देश के वो अनमोल रतन है जिन की कमी कभी पूरी नहीं हो सकती जब जब इस देश में अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई जाएगी डॉ आंबेडकर और भगत सिंह सबको प्रेरित करते रहेंगे .ऐसी महान शख्सियत को हमारा शत-शत नमन है .

अंत में मैं अपने मार्गदर्शक डॉ रामजीलाल का आभार व्यक्त करना चाहूंगी जिनके सानिध्य में यह लेख संपन्न हुआ ।

Dr Mamta Kumari
Assistant Professor
Department of Political Science
Government PG College
Ambala Cantt

Previous articleA comparative study of the thoughts of Dr. B.R. Ambedkar and Bhagat Singh
Next articleUK Community Group Urges Action After UN Raises Alarm Over Gaza Civilian Shelters