HOME दिवाली एक मौसमी त्यौहार है

दिवाली एक मौसमी त्यौहार है

2

समाज वीकली यू के

बलदेव राज जस्सल

दिवाली एक मौसमी त्यौहार है। हर साल भयंकर गर्मी के बाद भारी बारिश होती है और सभी चीजें गंदी मंदी तथा खराब सी लगने लगती हैं। बहुत सी वस्तुएं जो पहले से भी थोड़ी खराब होती हैं तो बारिश तथा मौसम की मार के कारण और ज्यादा भद्दी एवं बुरी लगने लग जाती हैं। दूसरी तरफ मानव शरीर में भी इन दिनों नए रक्त का संचार होता है, शरीर में नया जोश नया हौसला निर्माण होता है। यह सब मौसम की तब्दीली के कारण ही होता है। इस नए बतावरण में लोगों का मन आनंदित हो उठता है। यह सब युगों युगांतरों तक ऐसा ही हो रहा है। अगर इसको बुद्ध धम्म के परिपेक्ष में देखा जाए तो सदियों पहले बुद्ध को जब सत्य का ज्ञान हुआ तो उन्होंने भरी गर्मी के चलते और उसके बाद बरसात के चार महीने के मौसम में सारनाथ में धम्म प्रशिक्षण का केडर कैंप लगाकर पहले पांच उसके बाद कुल साठ भिक्षुओं को धम्म की शिक्षा देकर लोक कल्याण के लिए अलग अलग दिशा में जाके धम्म का प्रचार प्रसार करने भेजा। धम्म का प्रकाश अंधेरा दूर करने वाले दीपक की लो के समान चारों ओर फैला तो धीरे धीरे यह परम्परा एक त्यौहार में बदल गई। थोड़ा चिंतन मनन करके देखें तो यह पूरा महीना बौद्ध धम्म के इतिहास में भरपूर खुशियां मनाने ओर सम्पूर्ण मानवीय धम्म जीवन में क्रांति का ही महीना है जिसमें वर्षा वास, गुरु पूर्णिमा, संघ दान, कठिन चीवर दान या धम्म चक्क पवत्तन दिवस, अशोका विजय दशमी दिवस, धम्म क्रांति दिवस आदि बड़े बड़े उत्सव मनाए जाते हैं और समय के अनुरूप इन उत्सवों को ही बदले हुए स्वरूप में मनाया या जाना जाने लगा है। पूर्णिमा के बाद अंधेरी रातें आईं तो लोगों ने धम्म का प्रकाश देने के लिए आने वाले बुद्ध और भिक्षु संघ की साहूलीयत के लिए दीपक जलाए।

लोगों का यह सुभाव है के जैसे लोग थोड़े से दुःख के कारण ही रोने कुरलाने लगते हैं ऐसे ही मानव को थोड़ी सी खुशी मिले तो उसका आनंद उठाने में भी पीछे नहीं रहते।इसी सिलसिले के अंतर्गत यह मौसमी त्यौहार भी धीरे धीरे वैश्विक त्यौहार के रूप में प्रचलित हो गया। इस त्यौहार को अब चाहकर भी कोई मनाने से मना नहीं कर सकता। इस लिए लोगों ने या यूं कहो के बाद में समय समय पर सारे धर्मों ने इसको अपने धर्म और अपने इतिहास से जोड़ने का काम किया है। कुश लोगों का मत है कि दिवाली नहीं मनाई जानी चाहिए क्योंकि त्यौहार का अर्थ है तुम्हारी यानि के हमारी हार ऐसे लोगों का तर्क ठीक भी है और ऐसी सोच वाले लोगों को किसी ऐसे काम के लिए मजबूर करना या समझाना उचित भी नहीं है। लेकिन कुश लोग इस उत्सव में शरीक होना पसंद करते हैं तो इसी हालत में एक तर्क दिया जा सकता है कि जैसे बुद्ध की तुलना धम्म के ज्ञान का प्रकाश देने वाले सूर्या के समान की जाती है, और दीपक उसी प्रकाश को फैलाने वाला एक स्रोत है। बुद्ध की पूजा हम त्रिरत्न को धूप, दीप ओर फूलों के अर्पण से करते हैं जिसको बाद में सारे संसार ने अपनी श्रद्धा प्रकट करने के जरिए के तौर पर अपनाया है। यह भी मानना उच्चित है कि सारनाथ में धम्म चक्र प्रवर्तित करके जब बुद्ध और भिक्षु संघ धम्म प्रचार प्रसार हेतु पहली बार निकले और भिक्षु संघ ने धम्म क्रांति हेतु गांव गांव शहर शहर प्रवेश किया तो लोगों ने उनके आगमन पर अंधेरा दूर करने वाले दीपक की भांति दिए जलाए या बुद्ध को ज्ञान हुआ और यह ज्ञान उन्होंने दुनिया को देकर दुनिया के अज्ञान रूपी अंधकार को दूर किया तथा अपना संकल्प पूरा करके अपने परिवार जनों को मिलने राज भाग छोड़कर गए और बुद्ध के रूप में भिक्षा पात्र लेकर अपने राज्य की जनता तथा परिवार को दर्शन देने आए तो पूरी दुनिया ने दीप जलाकर उनका पुण्य अनुमोदन किया या यूं कहें कि स्वागत किया। और बुद्ध की वंदना में दीप प्रज्वलित करके अपनी श्रद्धा प्रकट करने के ढंग को ही बाद में त्यौहार के रूप में समाज ने प्रचलित कर दिया। लेकिन यह बात स्पष्ट है के दीया अंधकार को मिटाने और धम्म रूपी प्रकाश या सत्य को प्रदर्शित करने का ही प्रतीक है। अब यह उत्सव सभी लोग मनाते हैं। हर कोई इसको अपने धर्म या इतिहास के साथ जोड़कर मनाने की कोशिश करता है। हरेक ने इस के साथ कोई न कोई सच्ची या झूठी कहानी घड़ ली है। अब सवाल यह है कि बौद्धों को इस दिन क्या करना चाहिए। इसका बड़ा सीधा जवाब है कि बही करना चाहिए जो सदियों पहले करते थे। अपने घर दुआर काम काज के स्थान को अच्छी तरह साफ स्वच्छ करना चाहिए और साफ सुथरे स्वच्छ वातावरण में अच्छे ढंग से बुद्ध पूजा वंदना करने के बाद खुशी मनानी चाहिए, नजदीकी बुद्ध विहार में जाकर बुद्ध वंदना करनी चाहिए ओर त्रिरत्न को अगर बत्ती, मोमबत्ती, फूल अर्थात सुगंध, दीपक और पुष्प अर्पण करना चाहिए। लेकिन बुरी आदतों और बुरी चीजों से दूर रहना चाहिए। बौद्धों को इस दिन बुद्ध विहार जाकर धम्म दान देना चाहिए, धम्म चर्चा करनी चाहिए, धम्म प्रवचन सुनना चाहिए धम्म बंधु, धम्म अनुयाइयों के संपर्क में आना चाहिए। किसी भिक्षु, धम्म चारी या धम्म प्रचारक को घर में बुलाकर प्रवचन का आयोजन करना चाहिए। या जैसे भी संभव हो धम्म कार्य में सहयोग करना ओर करवाना चाहिए। पंचशील का पालन करते हुए परिवार के साथ खुशियां मनाई जा सकती हैं । पटाखे, घटिया किस्म की मिठाइयां या और गंदी चीजों से दूर रहना चाहिए। अगर कोई चीज खरीदनी ही है तो चाहे बाद में अच्छी तरह छानबीन करके ही खरीदनी चाहिए। लेकिन किसी भी किस्म के पाखंड, भ्रम, बहम आदि से दूर रहना चाहिए। आज अगर हम यह कहें के इस त्यौहार को न मानो या न मनाओ तो घर परिवार के लोग बुरा मानते हैं और फिर हम अलग थलग पड़ सकते हैं इस लिए सावधानी से बुराइयों से बचकर बुद्ध धम्म तथा संघ को प्रतिबद्ध रहते हुए इस त्यौहार में शामिल हुआ जा सकता हे। सावधान रहें के इसमें बाबा साहब, बुद्ध ओर अपने बड़े बुजुर्गों, माता पिता या आदरणीय धम्म गुरुओं के प्रति श्रद्धा भाव प्रकट करने के सिवा किसी किस्म का पाखंड, आडंबर या टूना टोटका न माना जाए और न किया जाए। शराब, जुहा या पटाखे आदि बुराइयों से बचकर शांति से परिवार के साथ खुशी मनाई जा सकती है।

बुद्ध वंदना एवं बौद्ध साहित्य में एक शब्द आता है जिसमें हम बुद्धों को वंदना करते हुए हाथ जोड़ सांझली याचना करते हैं के दुर्गतियों के विनाश हेतु दुनिया के अज्ञान रूपी अंधकार को दूर करने के लिए बुद्ध और बोधिसत्वों ने धम्म दीप जलाकर सृष्टि को रोशन करने की याचना करते हैं क्योंकि जब से सृष्टि का निर्माण हुआ है तबसे ही बुद्धों ओर बोधिसत्वों ने ऐसा ही किया है और यह त्यौहार ऐसे ही धम्म दीपों को प्रकाशमान करने का प्रतीक है। यह भी कहा जा सकता है कि जब यह उत्सव शुरू हुआ तो आप मैं या फिर हम सब में से कोई भी मौजूद नहीं था तो अगर दूसरे लोगों ने हमारे कल्चर और इतिहास को बदलकर इसका प्रारूप बदल दिया है और मौजूदा राजनीतिक, धार्मिक एवं सामाजिक परस्थितियों के चलते हमें ऐसा लगता है के दिवाली से हमारा कोई संबंध नहीं है और हमारे समाज को दिवाली नहीं मनानी चाहिए तो भी हमें भारतीय उपमहाद्वीप की ताजा स्थिति को ध्यान में रखते हुए उपाय कौशल्याण से इसी प्रकार धीरे धीरे कल्चरल रेवोल्यूशन एवं धम्म क्रांति की और बढ़ना ही चाहिए।

 

समाज वीकली ऍप डाउनलोड करने के लिए नीचे लिंक पर क्लिक करें
https://play.google.com/store/apps/details?id=in.yourhost.samajweekly

Previous articleThe Illusion Shattered: How Recent Conflicts Exposed Pakistan’s Empty Promises
Next articleStarmer’s Evasions Exposed: The Chinese Spy Scandal