समाज वीकली यू के
राजेश कुमार
दिल्ली के जंतर-मंतर पर कॉक्रोच जनता पार्टी के हालिया प्रदर्शन ने राजनीतिक हलकों के साथ-साथ मुख्यधारा और सोशल मीडिया पर भी बहस को जन्म दिया है। धड़ल्ले से जनता का आक्रोश और वैकल्पिक राजनीति जैसे जुमले उछाले जा रहे हैं। प्रदर्शन में जुटी भीड़ के बाद समर्थकों ने इसे जनता के गुस्से और वैकल्पिक राजनीति की तलाश का संकेत बताया है। ऐसे दावेदार भी हैं जो कह रहे हैं कि जैसे 2014 में कांग्रेस हटाई गई थी वैसे ही भाजपा भी हटाई जाएगी। एक विद्वान ने यह भी बताया है कि यह अंग्रेजी की ताकत से लैस दलित नेतृत्व का अगला चरण है। लेकिन दूसरी ओर समाजवादी, वामपंथी, गांधीवादी और लोकतांत्रिक राजनीति से जुड़े अनेक लोगों ने इस उभार को लेकर सोशल मीडिया पर कई तरह के सवाल खड़े किए हैं।
सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में लोग कॉक्रोच जनता पार्टी की तुलना एक दशक पहले उभरी आम आदमी पार्टी से कर रहे हैं। उनका तर्क है कि जिस तरह अन्ना आंदोलन और उसके बाद आम आदमी पार्टी के उभार ने कांग्रेस विरोधी जनभावना को अपनी ओर आकर्षित किया और अंततः भाजपा के लिए राजनीतिक परिस्थितियों को अनुकूल बनाया, कहीं वैसा ही परिदृश्य एक बार फिर तो नहीं बन रहा है? क्या जनता के असंतोष और आक्रोश को व्यापक विपक्षी संघर्ष से जोड़ने की बजाय उसे एक नए राजनीतिक मंच की ओर मोड़ा जा रहा है, जिसका अंतिम राजनीतिक लाभ भाजपा को मिलेगा?
दिलचस्प बात यह है कि आज जो प्रश्न सोशल मीडिया पर व्यापक रूप से उठ रहे हैं, वही प्रश्न करीब पंद्रह वर्ष पहले दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षक, वरिष्ठ समाजवादी विचारक और राजनीतिक कार्यकर्ता डॉ प्रेम सिंह उठा रहे थे। लेकिन उस समय उनकी बातों को गंभीरता से सुनने के बजाय उन्हें अलग-थलग करने का प्रयास किया गया।
2011 का अन्ना आंदोलन देश की राजनीति में एक बड़े उफान के रूप में सामने आया था। भ्रष्टाचार विरोधी नारों के बीच लोग सड़कों पर थे। भारत के बड़े कारपोरेट घराने और आरएसएस भी उसमें शामिल थे। मीडिया इसे दूसरी-तीसरी आज़ादी की लड़ाई की तरह प्रस्तुत कर रहा था। स्वतंत्रता आंदोलन और जेपी आंदोलन से उसाकी तुलना कर रहा था। बुद्धिजीवियों का एक बड़ा वर्ग इसे भारतीय लोकतंत्र के पुनर्जागरण के रूप में देख रहा था। लेकिन इसी दौर में डॉ प्रेम सिंह लगातार चेतावनी दे रहे थे कि इस विचारधाराविहीन आंदोलन की राजनीतिक दिशा और उसके संभावित परिणामों को लेकर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। उनका मानना था कि यह आंदोलन केवल भ्रष्टाचार विरोध तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसके राजनीतिक परिणाम भारतीय लोकतंत्र की दिशा को प्रभावित करेंगे। डॉ प्रेम सिंह ने तब स्पष्ट रूप से कहा था कि यह आंदोलन अंततः ‘कॉर्पोरेट-कम्यूनल गठजोड़’ की राजनीति को निर्णायक मजबूती दे सकता है।
जिनको भी उस समय उनका आकलन अतिशयोक्तिपूर्ण और निराधार लगता था, वे सब आज कॉक्रोच जनता पार्टी के बहाने वही बातें दोहरा रहे हैं। लेकिन बाद के वर्षों में भारतीय राजनीति जिस दिशा में बढ़ी, उसने उनकी चेतावनियों को नई प्रासंगिकता प्रदान की। उस आंदोलन और उसमें से निकली पार्टी का विश्लेषण उनकी पुस्तक ‘भ्रष्टाचार विरोध: विभ्रम और यथार्थ’ वाणी प्रकाशन, में विस्तार से दर्ज किया गया है। इस पुस्तक में उन्होंने अन्ना आंदोलन की प्रकृति, उसके सामाजिक आधार, मीडिया की भूमिका, कॉर्पोरेट हित, साम्प्रदायिक तत्वों की मौजूदगी और उसके संभावित राजनीतिक परिणामों पर गंभीर विमर्श प्रस्तुत किया है। दरअसल, आज जो बातें सोशल मीडिया पर समाजवादी, वामपंथी और गांधीवादी धारा के लोग कह रहे हैं, उनका बड़ा हिस्सा उस पुस्तक में वर्षों पहले दर्ज किया जा चुका था। यदि उस समय इन सवालों और आशंकाओं पर गंभीर बहस हुई होती, यदि आंदोलन के उत्साह के बीच आलोचनात्मक विवेक को भी स्थान मिला होता, तो संभव है कि भारतीय राजनीति आज पूरी तरह नवसाम्राज्यवाद के शिकंजे में नहीं फंसी होती। डॉ प्रेम सिंह की यह पुस्तक केवल अतीत का दस्तावेज नहीं है, बल्कि वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों को समझने की भी एक महत्वपूर्ण कुंजी है।
अन्ना आंदोलन से निकली राजनीति ने कांग्रेस विरोधी जनभावना को एक नई दिशा दी। दिल्ली में कांग्रेस का सामाजिक और राजनीतिक आधार तेजी से कमजोर हुआ। आम आदमी पार्टी ने खुद को विकल्प के रूप में स्थापित किया, जबकि भाजपा राष्ट्रीय स्तर पर अपने विस्तार की राह पर आगे बढ़ती गई। परिणामस्वरूप कांग्रेस लगातार सिमटती चली गई और राजनीति का नया ध्रुवीकरण सामने आया। और आज जब कॉक्रोच जनता पार्टी के रूप में एक नया राजनीतिक प्रयोग हो रहा है, तब अनेक राजनीतिक पर्यवेक्षक उसी इतिहास की ओर देख रहे हैं। वे पूछ रहे हैं कि क्या एक बार फिर जनता के असंतोष को ऐसी दिशा दी जा रही है कि विपक्ष का स्पेस और छोटा होगा, और उसका प्रत्यक्ष या परोक्ष लाभ बीजेपी को मिलेगा?
राजनीति में किसी भी चेतावनी का मूल्य तत्काल नहीं समझा जाता। कई बार समय बीतने के बाद ही उसकी प्रासंगिकता सामने आती है। डॉ प्रेम सिंह के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। जिस दौर में उनकी बातों को हाशिये पर डाल दिया गया था, आज उसी दौर का पुनर्मूल्यांकन हो रहा है। आज सोशल मीडिया पर चल रही बहस केवल कॉक्रोच जनता पार्टी को लेकर नहीं है। यह दरअसल उस व्यापक प्रश्न को लेकर है कि नई राजनीति के दावे और उसके वास्तविक राजनीतिक परिणामों के बीच क्या संबंध होता है। क्या हर नया राजनीतिक मंच लोकतांत्रिक विकल्प को मजबूत करता है, या कभी-कभी वह जाने-अनजाने में उन शक्तियों को और मजबूत कर देता है जिनका वह विरोध करने का दावा करता है?
इन सवालों के अंतिम जवाब भविष्य देगा। लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि जिन चिंताओं को डॉ प्रेम सिंह ने वर्षों पहले अपनी पुस्तक ‘भ्रष्टाचार विरोध: विभ्रम और यथार्थ’ में दर्ज किया था, उन्हें अगर समय रहते गंभीरता से समझ लिया गया होता, तो शायद आज बार-बार उसी बहस को दोहराने की जरूरत नहीं पड़ती। देर से ही सही, कम से कम अब राजनीतिक और बौद्धिक जगत में यह स्वीकार्यता तो बन रही है कि अंधे उत्साह से अधिक महत्वपूर्ण आलोचनात्मक विवेक होता है। और शायद यही वह बिंदु है जहां डॉ प्रेम सिंह की राजनीतिक दूरदृष्टि सबसे अधिक प्रासंगिक दिखाई देती है।
कहते हैं कि इतिहास खुद को हूबहू नहीं दोहराता, लेकिन उसकी प्रतिध्वनियां बार-बार सुनाई देती हैं। आज कॉक्रोच जनता पार्टी को लेकर चल रही बहस के बीच यही चिंता सबसे अधिक बेचैन करती है। जब हम देखते हैं कि दीपांकर भट्टाचार्य जैसे वामपंथी नेता पार्टी के पहले ही प्रदर्शन में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं, जब योगेंद्र यादव सोशल मीडिया पर आंदोलन के समर्थन में कविता पाठ करते दिखाई देते हैं, और जब वरिष्ठ समाजवादी चिंतक आनंद कुमार अपनी शुभकामनाएं प्रेषित करते हैं, तब स्वाभाविक रूप से चिंता और गहरी हो जाती है।
चिंता इसलिए नहीं कि किसी नए राजनीतिक प्रयोग का समर्थन क्यों किया जा रहा है। लोकतंत्र में नए प्रयासों और नए प्रयोगों का स्वागत होना चाहिए। चिंता इसलिए है कि कहीं हम एक बार फिर वही राजनीतिक भूल तो नहीं दोहरा रहे, जिसे लेकर वर्षों पहले चेतावनी दी गई थी। कहीं ऐसा तो नहीं कि व्यवस्था-विरोधी ऊर्जा, जनाक्रोश और बदलाव की आकांक्षा को फिर ऐसी दिशा में मोड़ा जा रहा है, जिसके दीर्घकालिक राजनीतिक परिणामों पर पर्याप्त विचार नहीं किया गया है? अन्ना आंदोलन के दौर में भी अनेक ईमानदार लोकतांत्रिक, समाजवादी, गांधीवादी और वामपंथी कार्यकर्ता उसी उम्मीद के साथ उसके साथ खड़े हुए थे कि यह भारतीय राजनीति को बेहतर दिशा देगा। यह शगूफ़ा भी छोड़ा गया कि उस विचारधारहीन राजनीति के दूल्हे केजरीवाल को जबरन सोशलिस्ट/कम्युनिस्ट बना लिया जाएगा! आम आदमी पार्टी को एक सच्ची लोकतांत्रिक पार्टी बनाया जाएगा! प्रकाश करात को तो केजरीवाल में पार्टी बनने के पहले ही कामरेड लेनिन नजर आ गए थे!
बताने की जरूरत नहीं कि ऐसे सभी शगूफ़ाबाजों को केजरीवाल ने लात मार कर पार्टी से बाहर किया था। लेकिन बाद के घटनाक्रमों ने कई लोगों को अपने आकलनों पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर किया। यही वजह है कि आज जब कॉक्रोच जनता पार्टी के इर्द-गिर्द वैसा ही उत्साह, वैसी ही नैतिक भाषा और वैसी ही वैकल्पिक राजनीति का दावा दिखाई देता है, तब डॉ प्रेम सिंह की चेतावनियां फिर याद आती हैं।
सवाल यह नहीं है कि यह प्रयोग सफल होगा या असफल। सवाल यह है कि इसके राजनीतिक परिणाम किसके पक्ष में जाएंगे और इसका लाभ अंततः कौन उठाएगा? इतिहास का सबसे बड़ा सबक यही है कि वह केवल अतीत की कहानी नहीं होता, वह भविष्य के लिए चेतावनी भी होता है। और शायद इसी कारण आज डॉ प्रेम सिंह पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक दिखाई देते है। उनकी चिंताओं को अगर उस समय (या बाद में भी) गंभीरता से लिया गया होता, तो संभव है कि आज हमें यह सवाल नहीं पूछना पड़ता। क्या हम फिर से वही पुरानी गलती दोहराने जा रहे हैं?
डॉ प्रेम सिंह ने अभी तक इस मामले में अपना कोई विचार साझा नहीं किया है। यह देखना दिलचस्प होगा कि तुरत-फुरत और हवा में बनी इस पार्टी और बहस को लेकर उनकी क्या राय है।
(लेखक युवा टीवी पत्रकार हैं)



