समाज वीकली यू के
डॉ. रामजीलाल, समाज वैज्ञानिक,
पूर्व प्रिंसिपल, दयाल सिंह कॉलेज,
करनाल (हरियाणा, भारत)।
ईमेल: [email protected]
सार:
कंबोज, जिन्हें मध्यकाल में कम्बोह/ कंबोह/ कंबोज कहां गया ,भारत का एक प्राचीन क्षत्रिय वंश है .महाभारत के युद्ध में कंबोज महाजनपद के महाराजा सुदक्षिण कंबोज ने कौरवों का साथ दिया था. कंबोज शब्द संस्कृत साहित्य में काबुल क्षेत्र के लिए प्रयुक्त होता था. सिकंदर के आक्रमण 327 -326 ईसवी पूर्व में महारानी कृपा कंबोज ने पति व पुत्र के युद्ध में शहीद होने के पश्चात कई सप्ताह तक सिकंदर के विरूद्ध मसागा किले से युद्ध में सेना का नेतृत्व किया और उसे संधि के लिए मजबूर किया .इतिहासकार कोर्टियस ने कृपा कंबोज के शौर्य की प्रशंसा की है.
सातवीं शताब्दी में अरब आक्रमण और ग्यारहवीं शताब्दी में महमूद गज़नवी के अभियानों के बाद इस समुदाय का एक हिस्सा इस्लाम में दीक्षित हो गया था . मियॉ जुम्मन खाँ कंबोह, शेख इत्तमाद-उल- अमीर -मुल्क-सम्बल कंबोह , शेख समा-अल-दीन कंबोह, हज़रत शेख समा-अल-दीन कंबोह , शेख जमाली कंबोह व शेख नसीरुद्दीन देहलवी(कंबोह), शाहनवाज खाँ कंबोह , शेख गदाई कंबोह, मुहम्मद सालेह कंबोह, नवाब खैर अंदेश खाँ कम्बोह (प्रथम),शेख अब्दुल्ला बियाबानी कम्बोह व हसन महमूदी कम्बोह इत्यादि के नाम उल्लेखनीय हैं.
‘द पीपल ऑफ इंडिया, 1868’ के अनुसार कम्बोह/ कंबोह स्वयं महमूद गज़नवी द्वारा इस्लाम में लाया गया मानते हैं. लोधी सल्तनत से मुगल काल तक और फिर 1857 की क्रांति तक कम्बोह समाज ने प्रशासन, सेना,न्याय और सूफी परंपरा में निर्णायक भूमिका निभाई है .मुगल इतिहासकार एम. अथर अली लिखते हैं:”भारतीय मुसलमानों में सैय्यद और कंबोह मुगल शासन काल के दौरान उच्च सैन्य और नागरिक पदों के लिए विशेष रूप से पसंद किए जाते थे.” .
विस्तार:
- दिल्ली सल्तनत और लोधी काल:
इस काल में कंबोह समाज के अनेक सदस्यों ने महत्वपूर्ण प्रशासनिक पद संभाले .सिकंदर लोधी के शासन में मियॉ जुम्मन खाँ कंबोह हाजिब-ए-खास ( विशेष शयन कक्ष) के मुख्य अधिकारी थे .उमर खाँ कंबोह अमीर-ए-आखुर(घुड़सवार विभाग)के महत्वपूर्ण मंत्री थे .इसके अतिरिक्त मियाँ लादन खाँ कंबोह सिकंदर लोधी के इमाम और शाही नदीम के रूप में प्रसिद्ध थे .शेरशाह सूरी के काल में शेख इत्तमाद-उल- अमीर -मुल्क-सम्बल कंबोह अमीर-ए-अरंज –(वेतन महा निर्देशक) थे और बाद में वह अपने कठिन परिश्रम और ईमानदारी के कारण प्रधानमंत्री पद पर आसीन हुए . कंबोह समाज के इतिहास का यह एक गौरवपूर्ण व स्वर्णिम पृष्ठ है. सल्तनत काल में ही कंबोह /कंबोज समाज के रहबर प्रशासनिक कौशल में अग्रणी थे.
इस्लाम में दीक्षित : यह सूफी विचारधारा
यह सूफी विचारधारा का प्रारंभिक युग था. बहाउद्दीन ज़कारिया सुहरावर्दी और उसके पुत्र सैद्रुद्दीन के प्रभाव के कारण कंबोज काफी संख्या में इस्लाम में दीक्षित हो गए. शेख समा-अल-दीन कंबोह, मुल्तान (पंजाब) के सुहरावर्दी सिलसिले के 15वीं सदी के महान सूफी संत थे. इनका जन्म 1405 ईस्वी में मुल्तान, पंजाब (वर्तमान पाकिस्तान)में हुआ था .वह बहलोल लोधी (मृत्यु 894/1488) के शासनकाल में दिल्ली आए और लोधी वंश – बहलोल लोधी और सिकंदर लोधी के आध्यात्मिक सलाहकार व संरक्षक संत थे और तत्कालीन युग के सबसे बड़े उलेमाओं की श्रेणी में अग्रिम थे. उनके पिता शेख फखरुद्दीन कंबोह, उस दौर के एक सम्मानित धार्मिक नेता आध्यात्मिक सलाहकार या ‘पीर’ रहे. मुस्लिम आध्यात्मिक और धार्मिक नेताओं के बीच उनका बहुत सम्मान था .
हज़रत शेख समा-अल-दीन कंबोह का मज़ार आज भी दिल्ली में स्थित है.उनके प्रसिद्ध शिष्यों में शेख जमाली कंबोह व शेख नसीरुद्दीन देहलवी(कंबोह), थे. उनके पुत्र, शेख नसीरुद्दीन देहलवी (कंबोह), सिकंदर लोदी, इब्राहिम लोदी और बाबर के शासनकाल के दौरान दिल्ली के ‘शेख-उल-इस्लाम’ थे.
शेख गदाई कंबोह, जिनका असली नाम अब्दुर्रहमान था, एक जाने-माने पंजाबी मुस्लिम सूफी संत और विद्वान शेख जमाली कंबोह के बेटे,शिष्य व उत्तराधिकारी थे. सम्राट हुमायूं के शासनकाल उन्हें राज दरबारी होने का श्रेय जाता है. अकबर के शासन काल में उन्होंने “सद्र-उस-सदूर” –हिन्दुस्तान के मुख्य न्यायाधीश /धार्मिक प्रमुख के पद पर काम किया. सन् 1540 में हुमायूं की हार के बाद, गदाई बैरम खान की मदद की और मक्का की तीर्थयात्रा पर गए .गुजरात में प्रवास के समय समा की महफिलें आयोजित की.सन्1555 में मुगल शासन की वापसी पर, वे मुख्य धार्मिक अधिकारी बने और न्याय, काजियों की नियुक्ति और धर्मार्थ कार्यों का प्रबंधन संभाला. के दरबार में गदाई का काफी प्रभाव था और भ्रष्टाचार से निपटने के उनके प्रयासों के कारण अकबर उन्हें बहुत महत्व देते थे . यह तलवार अथवा भय के कारण नहीं अपितु सूफी विचारधारा का करिश्मा था.
मुगल काल -अकबर से औरंगजेब तक: कंबोह समाज का स्वर्ण युग :
अकबर का शासन का स्वर्ण युग माना जाता है .आइन-ए-अकबरी में अबुल फजल लिखते हैं कि अकबर और जहांगीर के शासन में कंबोह वंश से होना सम्मान की बात थी.
सेना नायक और प्रशासक:इस काल में अकबर के सर्वाधिक विश्वसनीय सेनापति शाह नवाज खाँ कंबोह (सन् 1529-सन्1599)थे. वह मीर तोज़क -क्वार्टर मास्टर जनरल, मीर बख़्शी -मुख्य सैन्य सलाहकार और वकील – प्रधानमंत्री के पद पर रहे हैं .सन्1581 में बंगाल के गवर्नर बने और ब्रह्मपुत्र क्षेत्र में 9 000 घुड़सवारों का नेतृत्व किया. इन्हीं की वंश परंपरा में मेरठ के कंबोह नवाब हुए .
मुगल बादशाह औरंगजेब (1658–1707) के शासनकाल में कंबोज (कंबोह):
मुगल बादशाह औरंगजेब (1658–1707) के शासनकाल में कंबोज (कंबोह) समुदाय के कई जाने-माने विद्वान, सूफी और संत-स्वभाव वाले लोग सामने आए. इस दौरान कंबोज वंश के लोगों ने प्रशासन, सुलेख (कैलिग्राफी) और साहित्य के क्षेत्रों में अहम योगदान दिया।. औरंगजेब के दौर की कंबोज हस्तियों में मुहम्मद सालेह कंबोह शामिल थे; उन्होंने शाहजहां के शाही इतिहासकार के तौर पर काम किया और विकिपीडिया पर मौजूद जानकारी के अनुसार, वे बादशाह औरंगज़ेब के शिक्षक भी थे. उन्हें एक बहुत ही नेक, धार्मिक और संत-स्वभाव वाले विद्वान के तौर पर जाना जाता था। एक और हस्ती मुहम्मद हुसैन कंबोह थे; कंबोज समुदाय के ऐतिहासिक रिकॉर्ड के अनुसार, उन्होंने औरंगजेब के शासनकाल में एक ऊंचे ओहदे वाले और प्रतिष्ठित अधिकारी के तौर पर काम किया. इसके अतिरिक्त शेख इनायत-अल्लाह कंबोह थे—जो मुहम्मद सालेह के बड़े भाई थे—वे भी अपने समय के जाने-माने विद्वान और लेखक थे, और औरंगजेब के शुरुआती शासनकाल के साहित्यिक और प्रशासनिक माहौल पर उनका प्रभाव था.
मेरठ के कम्बोह नवाब :
शाहबाज़ खाँ कम्बोह के वंशज 17 शताब्दी में मेरठ आए थे. मुहम्मद खाँ इटावा के फौजदार थे. सन् 1696 के आसपास मेरठ का किलाबंदी करने के बाद मुहम्मद फाजिल खाँ व मुहम्मद मसीह खाँ गद्दी पर बैठे .मुगल सत्ता के पतन होने के बाद भी ब्रिटिश काल में मेरठ की राजनीति पर सन् 1947 तक कम्बोह नवाबों का प्रभुत्व रहा है
नवाब खैर अंदेश खाँ कम्बोह (प्रथम): इनका मूल नाम अबू मुहम्मद खान कम्बोह (मृत्यु1710) था. नवाब खैर अंदेश खाँ कंबोह उर्फ अबू मोहम्मद खाँ (मृत्यु1710 )शाहजहां और औरंगजेब के काल में प्रमुख कंबोह थे. औरंगजेब ने इन्हें 5000 घुड़सवारों का मंसब और “खैर अंदेश खाँ “की उपाधि नवाजी थी .यह इटावा के फौजदार रहे और बहादुर शाह के समय 6000 घुड़सवारों का मंसब हो गया. इन्होंने मेरठ में खैर नगर दरवाजा,किला और सन्1691 में खैर- उल-मस्जिद का निर्माण करवाया था. रुहेलखंड,बिहार,इटावा, बंगाल व कला बाग के गवर्नर रहे हैं.इसी प्रकार नवाब खैर अंदेश खाँ कम्बोह (प्रथम)के दूसरे पुत्र खैर अंदेश खाँ कम्बोह(द्वितीय) 5000 का मंसब व कश्मीर के गवर्नर और श्रीनगर में नवाब बाजार के संस्थापक थे
नवाब मोहब्बत खाँ कम्बोह पेशावर की प्रसिद्ध मस्जिद मोहब्बत खाँ मस्जिद के निर्माता थे. जनरल नवाब बहादुर कम्बोह सर्वाधिक बुद्धिमान सैन्य अधिकारी और वजीर के रूप में प्रसिद्ध थे.
न्यायाधीश और विद्वान:
कम्बोह सिर्फ नवाब,गवर्नर, प्रशासनिक व सैन्य अधिकारी नहीं अपितु न्यायाधीश व विद्वान के रूप में प्रसिद्ध थे.
अकबर के शासनकाल में शेख गदाई कम्बोह सद्र-उस- सुदूर यानी सदर-ए-जहाँ- मुख्य न्यायाधीश ,प्रशासक व जनरल भी थे. शेख गदाई कम्बोह ने अकबर की धार्मिक नीति- दीन-ए-इलाही (दिव्य आस्था-1582 )के निर्माण में अहम भूमिका निभाई थी. यह नीति इस्लाम, हिंदू धर्म, पारसी धर्म और ईसाई धर्म के विचारों का एक अद्भुत मिश्रण थी. इसमें कोई जबरन धर्मांतरण नहीं था, बल्कि यह शांति, दान और सहिष्णुता को बढ़ावा देती थी.
सामाजिक स्थिति :
मुगल कालीन भारत में कम्बोहों को शेखों की श्रेणी में गिना जाता था. मुहम्मद उमर के अनुसार -कम्बोह अपनी बहादुरी,उदारता और बुद्धिमत्ता के लिए प्रसिद्ध थे . मुगल काल में कम्बोह महिलाएं पर्दे में रहते हुए शिक्षा,सूफी परंपरा व घर-परिवार को संभालती थी. मुगल दरबार की कम्बोह बेगमों ने कला-संस्कृति को संरक्षण व बढ़ावा दिया. मुगल कालीन भारत में भारतीय मुसलमान में कम्बोहों को सबसे कुलीन माना जाता था. था -यहां एक महत्वपूर्ण बात कि अपनी वंश की शुद्धता को बनाए रखने के लिए कम्बोह मुसलमानों ने मुगलों से कभी वैवाहिक संबंध स्थापित नहीं किए जैसा की कुछ हिंदू जातियों ने किए.अन्य शब्दों में मुस्लिम कम्बोहों ने इस युग में मैरिज डिप्लोमेसी जो प्राचीन समय में कंबोज समाज में प्रचलित उसका परित्याग कर दिया.
1857 की जन-क्रांति: तलवारें और फाँसी का फंदा
पीपल ऑफ़ इंडिया( 1868) में मुहम्मद उमर के अनुसार कम्बोह एटा, रुहेलखंड व मेरठ में बहुतायत हैं . कम्बोह घुड़सवार सेना , व्यापार और सरकारी सेवा में भी कुशल हैं.
सन्1857 की जन-क्रांति मेरठ और अंबाला छावनियों से शुरू हुई. इस जन-विद्रोह में कंबोह नवाबों ने दोहरी भूमिका निभाई. एक तरफ तो मेरठ के कंबोह नवाब अंग्रेजों के समर्थक थे, वहीं दूसरी तरफ बुलंदशहर के कंबोह जमींदार क्रांति के नायक थे.
मेरठ क्षेत्र के नवाब अहमदुल्ला खाँ कम्बोह और नवाब असदुउल्लाह खाँ कम्बोह अंग्रेजों के प्रति वफादार रहे व नवाबों ने जन क्रांति को कुचलने में सहयोग दिया. परन्तु क्रांतिकारियों ने उन्हें घायल कर दिया और दो बार उनकी संपत्ति लूटी. बाद में, सन्1885-1895 के दौरान उन्हें ब्रिटिश साम्राज्य वादी सरकार ने उनको नवाब और खान बहादुर की उपाधियों से सम्मानित किया गया.
वहीं दूसरी ओर बुलंदशहर में विद्रोह के नायकों में खानपुर रियासत के प्रमुख ज़मींदार अज़ीम खाँ कम्बोह भी शामिल थे. उन्होंने 10 अक्टूबर 1857 को मला घाट की लड़ाई में नवाब वली दाद खाँ के साथ लडे. गंगा पार करते समय उन्हें पकड़ लिया गया और कोर्ट-मार्शल के बाद फाँसी दे दी गई.
इसी बीच, अज़ीम खाँ कम्बोह के बेटे, बुलंदशहर के सेनापति हाजी मुनीर खाँ कम्बोह ने 29 जुलाई 1857 को गुलावठी की लड़ाई में अंग्रेजों का सामना किया . लड़ाई में उनके चेहरे पर तलवार के गहरे घाव होने के कारण ब्रिटिश सेना से लड़ते हुए वे शहीद हो गए.
आम विद्रोह और दमन
आम विद्रोह उसे दबाने की बात करें तो मेरठ इलाके के 50 से ज्यादा गांवों को विद्रोही( बागी)घोषित कर दिया गया; अकेले बसोध गांव में दस घंटे के भीतर 180 लोगों का कत्ले आम किया गया और हजारों लोगों को पेड़ों पर लटका कर फाँसी दे दी गई. अंग्रेजों ने सुनियोजित तरीके से इन विद्रोही गांवों की संपत्ति ज़ब्त कर ली. हालांकि ब्रिटिश रिकॉर्ड में खानपुर, कमालपुर और अन्य बस्तियों के कंबोज लोगों के नाम, पिता के नाम और गांवों का विवरण तो मिलता है, लेकिन अक्सर उनकी जाति की पहचान का ज़िक्र नहीं होता; नतीजतन, फाँसी पाने वाले कंबोज लोगों की पहचान मुख्य रूप से उनके गांवों से की जाती है। मेरठ शहीद स्मारक संग्रहालय के रिकॉर्ड में पकड़े गए और फाँसी पाने वाले लोगों की सूची मौजूद है.
सन 1857 की जन क्रांति में केवल महारानी लक्ष्मीबाई अथवा बेगम हजरत महल के अतिरिक्त असंख्य महिलाओं ने अपने जीवन की आहुति दी है . क्रांति के दौरान पश्चिम उत्तर प्रदेश के मेरठ ,बागपत ,शामली ,मुजफ्फरनगर इत्यादि क्षेत्र की सामान्य किसान व श्रमिक वर्गों की महिलाएं किसी रियासत के लिए नहीं अपितु आजादी के लिए शहीद हुई. पश्चिम उत्तर प्रदेश के मुजफ्फर नगर व मेरठ के बागी गांव -थाना भवन,खानपुर,कमलपुर, कैथवारी,कलिना,कनौनी ,कैराना जैसे कम्बोह बाहुल्य शामिल थे. हिन्दू व मुस्लिम महिलाओं ने भी अंग्रेजों के खिलाफ हथियार उठाए थे. अंग्रेजी साम्राज्य वादी सरकार ने विद्रोह को कुचलने के लिए लगभग एक दर्जन महिलाओं व युवतियों को फांसी पर लटकाया /जिंदा जलाया. मुज़फ़्फ़र नगर, थाना भवन— असगरी बेगम ,हबीबा बीबी, भवानी, जमीला और अन्य महिलाएँ 1857 की जन-क्रांति की ऐसी नायिकाएँ हैं जिन्हें भुला दिया गया है और जिनकी चर्चा नहीं होती. थाना भवन की असगरी बेगम को जिंदा जलाया गया. (Rana Safvi, 23 June 2023,The Wire) .इस क्षेत्र में कितनी कंबोज महिलाओं क्रांति में भाग लिया इसकी आधिकारिक शोध की आवश्यकता है.
संक्षेप में, 712 ईस्वी (कासिम के दौर) से लेकर 1857 की जनक्रांति तक, मुस्लिम कंबोह समुदाय ने भारत के सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक स्वरूप को आकार देने में अहम भूमिका निभाई है. सन्1857 की जनक्रांति के दौरान, खानपुर के कंबोह ज़मींदारों को मौत की सज़ा दी गई थी.इस जनक्रांति में हज़ारों लोगों—जिनमें आम कंबोह किसान, मज़दूर और महिलाएँ शामिल थीं—ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. मुस्लिम इतिहास केवल युद्धों का ब्यौरा ही नहीं है; इसमें न्याय, सूफीवाद और सांस्कृतिक मेल-जोल भी शामिल हैं—ये सभी कंबोह समुदाय के गौरव और विरासत के साक्षी हैं.






