समाज वीकली यू.के.
यह केवल एक स्थापना दिवस समारोह नहीं था।
यह लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की ओर से एक स्पष्ट चेतावनी थी —
कि कलम अभी जिंदा है, और सच अब दबेगा नहीं।
ऑल इंडिया संपादक संघ ने अपने तृतीय स्थापना दिवस पर शक्ति, संघर्ष और संकल्प का ऐसा प्रदर्शन किया, जिसने साफ कर दिया कि देशभर के 800 से अधिक संपादक अब संगठित हैं — और अन्याय के खिलाफ निर्णायक लड़ाई के लिए तैयार हैं।
🔥 तीन साल — एक आंदोलन
तीन वर्ष पहले कुछ निर्भीक संपादकों ने मिलकर यह संकल्प लिया था कि मीडिया को सत्ता और पूंजी के दबाव से मुक्त करना होगा।
आज यह संगठन 27 से अधिक राज्यों में सक्रिय है और दलित, आदिवासी, ओबीसी एवं वंचित समाज के संपादकों को राष्ट्रीय मंच दे रहा है।
यह संगठन किसी दल का नहीं — यह सच का है।
यह किसी सत्ता का नहीं — यह समाज का है।
🎤 राष्ट्रीय अध्यक्ष करन कुमार का तीखा वक्तव्य

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए ऑल इंडिया संपादक संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष करन कुमार ने स्पष्ट कहा:
“आज मीडिया का बड़ा हिस्सा सत्ता के इशारों पर चलने को मजबूर किया जा रहा है।
जो संपादक सवाल पूछता है, उसे डराया जाता है।
जो सच लिखता है, उसका विज्ञापन रोका जाता है।
लेकिन हम डरने वालों में नहीं हैं।”
उन्होंने आगे कहा:
“यह संगठन समझौते की जमीन पर नहीं, संघर्ष की जमीन पर खड़ा हुआ है।
अगर पत्रकार पर वार होगा, तो जवाब आंदोलन से दिया जाएगा।”
अध्यक्ष ने घोषणा की कि संगठन पत्रकार उत्पीड़न के मामलों में कानूनी सहायता प्रकोष्ठ को और मजबूत करेगा तथा राष्ट्रीय स्तर पर “मीडिया स्वाभिमान अभियान” चलाएगा।
🛑 सवाल सत्ता से भी
स्थापना दिवस पर कई संपादकों ने तीखे सवाल उठाए—
• क्यों पत्रकारों पर मुकदमे दर्ज हो रहे हैं?
• क्यों सच लिखने वालों को नोटिस भेजे जाते हैं?
• क्यों बड़े मीडिया घराने सत्ता के प्रवक्ता बनते जा रहे हैं?
सभा में एक स्वर गूंजा —
“अगर कलम डर गई, तो संविधान अकेला पड़ जाएगा।”
🎤 राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष जितेन्द्र चौधरी का प्रहार
कार्यक्रम में बोलते हुए प्रधान संपादक जितेन्द्र चौधरी ने दो टूक शब्दों में कहा:
“आज देश में सबसे बड़ा संकट बेरोजगारी या महंगाई से भी बड़ा है — वह है निर्भीक पत्रकारिता का संकट।
जब सत्ता सवालों से घबराने लगे और संपादक को मैनेजर बना दिया जाए, तब समझ लीजिए लोकतंत्र खतरे में है।”
उन्होंने आगे कहा:
“ऑल इंडिया संपादक संघ किसी सरकार के खिलाफ नहीं, बल्कि अन्याय के खिलाफ खड़ा है।
हम सत्ता के दरबार में खड़े होने नहीं, जनता के दरवाज़े पर खड़े होने आए हैं।”
उनका स्वर और कठोर हुआ जब उन्होंने कहा:
“जो लोग सोचते हैं कि संपादकों को बांटकर या खरीदकर चुप कराया जा सकता है, वे भ्रम में हैं।
कलम बिकेगी नहीं।
सच रुकेगा नहीं।
और अन्याय बचेगा नहीं।”
✊ संकल्प
कार्यक्रम के अंत में सभी सदस्यों ने सामूहिक संकल्प लिया—
• निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकारिता करेंगे
• दबाव और प्रलोभन से दूर रहेंगे
• सामाजिक न्याय और समान प्रतिनिधित्व की लड़ाई को आगे बढ़ाएंगे
🔥 संदेश स्पष्ट है
ऑल इंडिया संपादक संघ का तृतीय स्थापना दिवस केवल उत्सव नहीं, एक उद्घोष था—
“संपादक अब दर्शक नहीं, बदलाव के सूत्रधार होंगे।”
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