आदिवासियों के साथ लेखकों और इतिहासकारों ने बहुत बेईमानी की है : ग्लैडसन डुंगडुंग

आदिवासी समाजसेवी एवं लेखक ग्लैडसन डुंगडुंग
आदिवासी लेखक ग्लैडसन डुंगडुंग ने आदिवासी अस्मिता के संघर्ष और उनके अस्तित्व पर बहुत लिखा है और ख़ुद भी संघर्षरत हैं। उनका कहना है कि प्राकृतिक सम्पदा के लिए आदिवासियों को नक्सली बताकर मारा जा रहा है। समाजसेवी एवं लेखक विद्या भूषण रावत ने उनसे विस्तृत चर्चा की। प्रस्तुत है संपादित अंश :

हम यह बताना चाहते हैं कि इस देश के शासकों ने आम लोगों को लूटा। तकरीबन 9 हज़ार किलोमीटर का जो क्षेत्र है, नेपाल से आंध्र प्रदेश तक। जिसको ये लोग रेड कॉरिडोर बोलते हैं। रेड कॉरिडोर में ये लोग दिखा रहे हैं कि यहां नक्सली हैं, माओवाद है। भारत का नक्शा उठाकर देखिए तो दिखता है कि इस क्षेत्र में आदिवासी रहते हैं। जंगल, खनिज सम्पदा सब इसी कॉरिडोर में है और ये लोग इसी को नक्सली कॉरिडोर बोलते हैं। इसको ये रेड कॉरिडोर क्यों बोल रहे हैं? क्योंकि यहां के प्राकृतिक संसाधनों को निकालना है, लूटना है और उनको बेचना है। 2008 में भारत सरकार ने इसे ब्रिटिश की एक्जीक्यूशन नॉबेल लिमिटेड नाम की बेकिंग कंपनी को स्टडी करने के लिए दिया। उसने इनको बताया कि आपका पूरा बिजनेस इस रेड कॉरिडोर में अटका हुआ है। अगर इसका आप उपयोग करें, तो भारत की इकॉनमी जंप कर जाएगी। जी.के. पिल्लै साहब ने उनको वादा किया कि हम 2013 तक रेड कॉरिडोर को खाली करा देंगे। यह बाकायदा लिखित में है। और इसी के तहत दो लाख पैरा मिलिट्री फोर्स को इस क्षेत्र में भेज दिया गया। उन्होंने आदिवासी लोगों को देखिए किस तरह मारा, उनको नक्सली घोषित किया। कम से कम यह तीन राज्यों में मैंने देखा और किताब में इसका जिक्र किया है कि किस तरह से एक आदिवासी को नक्सली बताकर, उसकी निर्मम हत्या कर दी जाती है। बाद में पता चलता है कि यह तो निर्दोष आदमी है। कम से कम एक हज़ार निर्दोष आदिवासियों को इन्होंने इस तरह से मार दिया गया। लगभग पांच सौ आदिवासी महिलाओं का यौन शोषण किया। उन पर अत्याचार किये। उड़ीसा, छत्तीसगढ़, झारखंड से लगभग 27 हज़ार लोग इन्होंने जेल में डाल दिए।

सारंडा जंगल, जिसके बारे में मैंने ‘मिशन सारंडा’ किताब लिखी। सरकार कहती है कि हम वहां स्कूल नहीं चला सकते। आंगनबाड़ी नहीं चला सकते। रोड नहीं बना सकते। मैंने साबित कर दिया कि वहां माइनिंग कंपनियां माइनिंग कर रही हैं। वहां पर राज्य कुछ नहीं कर सकता, तो माइनिंग कंपनियां माइनिंग कैसे कर रही हैं? रिपोर्ट आयी कि वहां पर माइनिंग कंपनियां कोई 50 लाख, कोई 25 लाख, सब माओवादियों को पैसा दे रही हैं। इतना ही नहीं, वो हथियार भी दे रही हैं। लेकिन, वहीं कोई आदिवासी गन प्वाइंट पर किसी माओवादी को मजबूरी में खाना खिला दे, तो उसे जेल में डाल देते हैं।

इससे यह स्पष्ट है कि आदिवासियों को मारकर, ये उनके जल, जंगल, जमीन और संसाधन, सब छीन लेना चाहते हैं। अंग्रेजी की एक कहावत है कि अगर एक कुत्ता, जिससे आपकी दुश्मनी है, तो उसे पागल घोषित करके मार दीजिए। आपसे कोई नहीं पूछेगा। तो वही तरीका ये आदिवासियों के साथ अपना रहे हैं। नक्सली कह दिया और मार दिया। तो कोई कुछ नहीं बोलता है।

अफसोसजनक बात है कि आदिवासियों के विकास के बारे में वे बातें कर रहे हैं जो उनके बारे में जानते और समझते भी नहीं हैं। मूल सवाल है कि विकास तो चाहिए ही। लेकिन यह कैसे हो, यह वे कैसे तय कर सकते हैं। आपको याद होगा कि चिदंबरम ने पार्लियामेंट के अंदर बोला था कि आदिवासी म्यूजियम में रखे जाने वाले लोग नहीं हैं। असल सवाल यही है कि वे आदिवासियों के विकास के बारे में बिना कुछ जाने कैसे बात कर सकते हैं?

ठीक है, अाप के विकास को हम मान लेते हैं। लेकिन, यह तो बता दीजिए कि सारंडा जंगल, जहां पर 1925 में माइनिंग शुरू हुआ। प्रति वर्ष 3 हजार करोड़ रुपये का आयरन वहां से सरकार निकालती है। फिर भी आदिवासियों के लिए वहां पर न अच्छी सड़क है। न अच्छा स्कूल है। न अच्छा हॉस्पिटल है। क्यों नहीं है वहां पर कुछ भी? आज भी सारंडा जंगल की 70 प्रतिशत महिलाएं खून की कमी से क्यों जूझ रही हैं? वहां के 80 प्रतिशत आदिवासी बच्चे कुपोषण के शिकार क्यों हैं?

झारखंड आदिवासी बहुल राज्य है और अपने ही राज्य में आदिवासी अल्पसंख्यक हैं?

देखिए, चाहे वह भाजपा हो या कांग्रेस हो, शुरू से ही इनका एजेंडा रहा है कि आदिवासियों को ख़त्म कर दो। इसके लिए तरीका निकाला। आज़ादी के समय से ही कि दलित/आदिवासी को मुख्य धारा में लाना है। क्या है मुख्य धारा? यही कि आप अपना सब कुछ छोड़ो और हमारी तरफ आ जाओ। ये चाहते हैं कि हमारी अपनी अस्मिता ख़त्म हो जाए। तो हमारी मुख्य लड़ाई अस्मिता की है। सुप्रीम कोर्ट ने भी 5 जून 2011 को कहा था कि आदिवासी इस देश के मूल निवासी हैं। इनको इसी से डर था। इसीलिए यह सब कुछ खत्म करना चाहते हैं।

पूरी दुनिया के अलावा भारतीय सर्वोच्च न्यायालय ने भी माना कि आदिवासी मूल निवासी हैं। परंतु भारत सरकार को यह सच स्वीकारने में क्या दिक्कत है?  

संविधान सभा में इस पर बड़ी चर्चा हुई, जिसमें जयपाल सिंह मुंडा ने स्पष्ट बोल दिया कि हमें संविधान में आदिवासी शब्द चाहिए, उससे कम कुछ भी नहीं। संविधान के अनुच्छेद-13 (5) में आदिवासी शब्द डाला गया है। लेकिन, इसमें क्या है कि बाबा साहब भीमराव आंबेडकर नहीं चाहते थे कि आदिवासी शब्द आए। कई लोग यह भी कहते हैं कि बाबा साहब को डर लग गया कि अगर आदिवासियों को मूलनिवासी कह दिया जाएगा, तो हमारे दलित लोग जो हैं उधर चले जाएंगे या क्या होंगे। बाबा साहब ने कहा भी था कि आदिवासी शब्द का कोई अर्थ नहीं है।

इसका कोई संदर्भ है?

हां, संदर्भ है। संविधान सभा में चर्चा में उन्होंने कहा है कि आदिवासी और अछूत दोनों एक ही तरह के शब्द हैं। इसका तो मतलब ही नहीं है। तो मुझे लगता है कि जब वह खुद ही इतना प्रताड़ित हुए थे, तो कहीं न कहीं आदिवासियों के लिए उन्होंने जो कहा, तो या उन्हें समय नहीं मिला आदिवासी समाज को समझने के लिए या वो अध्ययन नहीं कर सके। यह मैं इसलिए कह रहा हूं कि जब वह एक जगह भाषण देते हैं, तो कहते हैं कि सरकार को चाहिए अनसिविलाइज्ड (असभ्य) आदिवासियों का विकास करे। तो जो अनसिविलाइज्ड उनके मन में आता है, तो आदिवासियों के प्रति उनके दिमाग में इतना नकारात्मक भाव क्यों बैठा हुआ था?